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	<title>श्री विजय नड्डा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<title>श्री विजय नड्डा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>भगत सिंह का विचार दर्शन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Mar 2023 06:08:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; विजय नड्डा इस क्षण भंगुर अस्तित्व में यदि कोई तत्व स्थायी हैं तो वे हैं आत्मसम्मान तथा स्वतंत्रता। ये तत्व बहुत मूल्य चुका कर प्राप्त होते हैं। हमारे महान&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> विजय नड्डा</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-6464" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Bhagat-Singh-300x169.jpg" alt="" width="1727" height="973" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Bhagat-Singh-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Bhagat-Singh-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Bhagat-Singh-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Bhagat-Singh-1536x864.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<p style="text-align: justify;">इस क्षण भंगुर अस्तित्व में यदि कोई तत्व स्थायी हैं तो वे हैं आत्मसम्मान तथा स्वतंत्रता। ये तत्व बहुत मूल्य चुका कर प्राप्त होते हैं। हमारे महान क्रांतिकारियों ने अपने स्वप्न, सुख, संपत्ति व जीवन तक का मूल्य चुका कर अपने प्रिय भारत को अंग्रेजों की दासता की जंजीरों से मुक्त कराया है। हमारे क्रांतिकारियों ने ऋषि दधीचि की तरह अपनी हड्डियों से निर्मित व अपने रक्त से सिंचित स्वतंत्रता का दीप स्तंभ हमें संभालने हेतु दिया है। इन नर रत्नों में शहीद भगत सिंह का जीवन अत्यंत प्रेरक है। शहीद भगत सिंह अपनी शहीदी के नौ दशक गुजर जाने के बाद भी युवाओं को देशभक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की ओर प्रेरित करते हैं। वे हमारे युवाओं के हृदय की धड़कन में बसे हैं। भगत सिंह न केवल बम पिस्तौल को भाषा जानते थे बल्कि उनकी कलम की ताकत भी अद्भुत थी। उनकी विचार शक्ति का ब्रिटिश सत्ता भी लोहा मानती थी। उनके विचार दर्शन पर संक्षेप में चर्चा करने का प्रयास करते हैं। विचार दर्शन को समझने के लिए उनका जीवन वृत सबसे प्रभावी माध्यम है क्योंकि वे अपने विचारों के अनुरूप ही जीवन जिए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भगत सिंह वंश परिचय</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भगत सिंह का जन्म लायलपुर जिले के एक सुप्रसिद्ध सिख वंश में हुआ। इनके पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह के समय में खालसा सरदार के नाम से प्रसिद्ध थे। इन्होंने पश्चिम में खूंखार पठानों और पूर्व में शक्तिशाली अंग्रेजों के विरुद्ध सिख साम्राज्य फैलाने में सिख शासकों को यथेष्ठ सहायता पहुंचाई। उनके लिए अपना खून बहा कर इस परिवार ने पुरस्कार स्वरूप काफी जायदाद भी प्राप्त की। दादा अर्जुन सिंह 80 वर्ष की आयु के बाबजूद स्वस्थ थे। लाहौर षड्यंत्र केस में आप बड़े मनोयोग से भाग लिया करते थे। दादी श्रीमती जयकौर हिंदू परिवार की आदर्श महिला थी। सूफी अंबा प्रसाद अर्जुन सिंह के घर आए थे। पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए आ धमकी। इस वीर महिला ने बुद्धिमानी से उन्हें बचा लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">कहा जाता है शहीद भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह ने लाला लाजपत राय को राजनैतिक क्षेत्र की ओर आकर्षित किया था। 11 वर्ष की आयु में ही बड़े भाई जगत सिंह की मृत्यु हो गई जिससे भगत सिंह के कोमल हृदय को झटका लगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>देशभक्ति विरासत में मिली </strong></p>
<p style="text-align: justify;">शहीद भगत सिंह का परिवार मूलत: आर्यसमाजी था। उन दिनों सिखों का खालसा हाई स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का नियम सा हो गया था किंतु उस स्कूल के अधिकारियों का झुकाव राजभक्ति की ओर अधिक होने के कारण सरदार किशन सिंह को पसंद नहीं था। इसीलिए सरदार भगत सिंह डीएवी स्कूल में भर्ती किए गए। धर्म निष्ठ सिख होते हुए भी देशभक्ति के भाव से ओतप्रोत होने के कारण खालसा स्कूल को छोड़ कर आर्यसमाजी स्कूल में भगत सिंह को दाखिल कराया। भगत सिंह इसके बाद नेशनल कॉलेज में पढ़ने लगे। शहीद भगत सिंह के पिता ने क्रांतिकारियों को हजारों रुपए की सहायता पहुंचाई थी।</p>
<p style="text-align: justify;">भगतसिंह भी देश की स्वतंत्रता के इन कार्यों में पिता जी का सहयोग करते थे। पुलिस को जानकारी मिल जाने के कारण अनेक क्रांतिकारी सदस्य गिरफ्तार कर लिए। लाहौर में देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करने के लिए अनुकूल वातावरण न देख कर भगत सिंह पंजाब से बाहर निकल कर कानपुर चले गए। यहां गणेश शंकर विद्यार्थी से जान पहचान हो गई। दोनों की मित्रता अजीवन बनी रही।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भगत सिंह का विचार दर्शन</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कोमल हृदय</strong> &#8211; सामान्यतया क्रांतिकारियों को कठोर दिल का माना जाता है। लेकिन सत्य इसके ठीक विपरित है। लगभग सभी क्रांतिकारी अत्यंत कोमल हृदय के थे। भगत सिंह के जीवन की अनेक घटनाएं उनके कोमल हृदय को सामने लाती हैं। श्री जितेंद्र नाथ सान्याल द्वारा लिखित भगत सिंह की जीवनी के प्रकाशक श्री आर सहगल ने रोचक लेकिन हृदय स्पर्शी घटना का उल्लेख किया है। प्रकाशक व भगत सिंह बाग में टहल रहे थे। देश व क्रांतिकारी संगठन की गंभीर बातों में मग्न थे। इतने में स्नेह (बच्ची) पेड़ पर लटके पतंग को निकालने की जिद करने लगी। अभी श्री आर. सहगल उसे डांटने ही वाले थे कि भगत सिंह ने बंदर की तरह पेड़ पर चढ़ कर पतंग को पेड़ से निकाल कर बच्ची को दे दिया। ऐसे ही क्रांतिकारियों को बैठक में गंभीर चर्चा के बीच दुर्गा भाभी के बेटे का रोना सबको परेशान कर रहा था। इससे पहले कि दुर्गा भाभी उसे डांटती, भगत सिंह उसे गोदी में उठा कर बाजार ले जा कर मिठाई आदि देकर ले आए। वापसी पर दोनों खिलखिला कर हंस रहे थे। भगत सिंह इतने कोमल हृदय के मालिक थे कि किसी का दु:ख सहन कर ही नहीं पाते थे। बचपन में अमृतसर में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद वहां की मिट्टी घर ले जा कर रात्रि भोजन नहीं करना उनके कोमल व भावुक हृदय का प्रतीक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साथी क्रांतिकारी का जीवन महत्वपूर्ण</strong> &#8211; जेल में क्रांतिकारियों पर होने वाले अत्याचारों के विरोध में रखी भूख हड़ताल के लंबा खिंच जाने के कारण क्रांतिकारी यतींद्र दास की तबियत बहुत खराब हो गई। डाक्टर लोगों ने उनका जीवन बचाने के लिए एनिमा ही एकमात्र मार्ग बताया। यतिंद्र दास एनिमा लेने के लिए कत्तई तैयार नहीं थे। जेल अधिकारियों ने जेल प्रशासन को कहा कि अगर भगत सिंह कहें तो यतिंद्र दास जी एनिमा लेने को मान सकते हैं। भगत सिंह को यतिंद्र दास के पास लाया गया। भगत सिंह अपने लिए कठोर थे लेकिन अपने साथी क्रांतिकारी के जीवन की रक्षा के लिए यतिंद्र दास को जिद छोड़ने के लिए मनाने आ गए। भगत सिंह के आग्रह पर वे राजी हो भी गए। भगत सिंह का विचार था कि अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए जीवित रहना आवश्यक था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दल का अनुशासन सर्वोपरि</strong> &#8211; भगत सिंह अपने दल के अनुशासन को सर्वोपरि मानते थे। बहुत लोग जानते हैं कि एसेंबली में बम फेंकने के लिए  क्रांतिकारियों की बैठक में भगत सिंह का चयन नहीं हुआ था। सुखदेव इस निर्णय से सहमत नहीं थे। वे अंग्रेजी पर पकड़ आदि के कारण असेंबली में क्रांतिकारियों के विचार रखने के लिए सबसे उपयुक्त भगत सिंह को मानते थे। उन्हें लगा कि कहीं भगत सिंह मौत के डर के कारण पीछे तो नहीं हट रहे हैं? उन्होंने अपने प्रिय मित्र भगत सिंह को बम फेंकने की टीम में जाने का आग्रह किया। भगत सिंह अनुशासन की बात कर सुखदेव को समझाने का प्रयास कर रहे थे। सुखदेव ने क्रोध में भगत सिंह को कायर आदि भी कह दिया। अंत में भगत सिंह ने बम वाली टोली में शामिल होने का आश्वासन दे दिया। इतना सब होने पर भी सुखदेव के प्रति उनके मन में स्नेह कम नहीं हुआ।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-6465" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/From_the_Archives_Bhagat_Singh_1200x768-300x169.webp" alt="" width="1441" height="812" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/From_the_Archives_Bhagat_Singh_1200x768-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/From_the_Archives_Bhagat_Singh_1200x768-1024x576.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/From_the_Archives_Bhagat_Singh_1200x768-768x432.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/From_the_Archives_Bhagat_Singh_1200x768.webp 1200w" sizes="(max-width: 1441px) 100vw, 1441px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सरकार के कानूनों को मार सह कर भी वापिस कराया</strong> &#8211; भगत सिंह मानते थे कि बड़े लक्ष्य को प्राप्त के लिए त्याग तपस्या व बलिदान ही एक मात्र मार्ग है। भगत सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों के कड़े संघर्ष के परिणामस्वरूप जेल के नियमों में कुछ सुधार हो पाया। इसके लिए उन्हें बहुत मार सहन करनी पड़ी। उन्होंने हथकड़ी के साथ न्यायालय में जाने से मना कर दिया। आखिर में सरकार को झुकना पड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ब्रिटिश न्याय के पाखंड को उजागर करना</strong> &#8211; सब लोग जानते थे कि ब्रिटिश सरकार न्याय का ढोंग कर रही थी। निर्णय तो वे कर ही चुके थे। भगत सिंह अंग्रेजी न्यायालय की कार्यवाही के पाखंड को सबके सामने लाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कार्यवाही में भाग न लेकर विश्व के सामने ब्रिटिश सरकार के पाखंड को सामने लाने के लिए अपने दल को तैयार किया। उनके इस निर्णय ने अंग्रेजी न्याय व्यवस्था की पोल विश्व के सामने खोल कर रख दी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शहीदी अगर समाज में जागृति निर्माण कर दे तो उद्देश्य पूरा</strong> &#8211; भगत सिंह का विचार था कि समाज जागरण व संगठन ही अंग्रेज सरकार के अत्याचारों से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग था। उन्होंने अपना बलिदान भी इसी लक्ष्य को साधने के लिए दिया था। छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखते हैं – “भोर के समुज्जवल प्रकाश के सामने भाग्य के लिखे को कौन टाल सकता है? यदि सारा संसार भी हमारे विरुद्ध खड़ा हो जाए तो हमें उसकी क्या परवाह? प्रिय बंधुओ! मेरे जीवन का अवसान समीप है। प्रात:कालीन दीप के समान टिमटिमाता हुआ मेरा जीवन प्रदीप भोर के प्रकाश में विलीन हो जाएगा। हमारा आदर्श, हमारे विचार बिजली की कौंध के समान सारे संसार में जागृति पैदा कर देंगे फिर यदि यह मुट्ठी भर राख विनिष्ट भी हो जाए तो संसार का इससे क्या बनता बिगड़ता है?”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बम का दर्शन</strong> &#8211; भगत सिंह का विचार दर्शन बम का दर्शन (Philosophy of Bomb) में उभर कर सामने आता है।  इसने पूरे विश्व में सनसनी फैला दी थी। गांधी जी ने क्रांतिकारियों के हिंसक मार्ग के विरोध में बम की पूजा लेख लिखा था। उसमें उन्होंने क्रांतिकारियों के ऊपर आरोप व व्यंग्य किया था। शहीद भगत सिंह ने बम की पूजा लेख में उठाए सभी प्रश्नों का न केवल सटीक उत्तर दिया बल्कि क्रांतिकारियों के मार्ग को भी तार्किक ढंग से उचित ठहराया। इस लेख में हिंसा-अहिंसा के विषय को भी स्पष्ट किया।</p>
<p style="text-align: justify;">भगत सिंह नास्तिक से ज्यादा अपने ईश्वर से नाराज भगत की तरह थे। गुरु नानक की तर्ज पर &#8220;तैं कि दर्द न आया&#8221; उनका मानना था की ईश्वर अगर है तो इस संसार में व्याप्त अन्याय को दूर क्यों नहीं करता? भारत मां की आजादी के लिए भगत सिंह जैसे हजारों नौजवानों के जीवन का दर्शन उनके ही शब्दों में इस प्रकार समेटा जा सकता है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>इन्हीं बिगड़े दिमागों में घनी खुशियों के लच्छे हैं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>हमें पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/bharat-tell-your-children-the-stories-of-tukaram-omleye-26-11-special/" target="_blank" rel="noopener">अपने बच्चों को तुकाराम ओम्बले की कहानियाँ सुनाना भारत! 26/11 विशेष</a></span></strong></p>
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		<title>कोविड पश्चात् शिक्षा – विद्यालय व अभिभावकों की भूमिका</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Apr 2022 06:41:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; विजय नड्डा विद्यालय प्रारम्भ होते ही सुनसान पड़े विद्यालय परिसर बच्चों की किलकारियों से फिर से गूंजने लगे हैं। विद्यालय प्रारम्भ होने से बच्चों, अभिभावकों तथा विद्यालयों ने राहत&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; विजय नड्डा</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5200" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-300x200.jpg" alt="" width="1298" height="865" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1298px) 100vw, 1298px" /></p>
<p>विद्यालय प्रारम्भ होते ही सुनसान पड़े विद्यालय परिसर बच्चों की किलकारियों से फिर से गूंजने लगे हैं। विद्यालय प्रारम्भ होने से बच्चों, अभिभावकों तथा विद्यालयों ने राहत की सांस ली है। ज्ञात इतिहास में शायद ही ऐसा कोई कालखंड रहा हो जब दो वर्ष तक शिक्षा का औपचारिक प्रवाह रुका हो। बच्चे घरों की चारदीवारी में सहमे से स्वयं को कैद अनुभव करते थे। बदली हुई परिस्थिति से बच्चे सबसे जल्दी सामंजस्य बैठा लेते हैं इसलिए उन्होंने तो अपनी दुनिया घर व गलियों में बसा ली थी। बच्चों के भविष्य को लेकर अभिभावकों की चिंता तथा विद्यालयों प्रबंधन की परेशानी चरम पर थी। गैरसरकारी विद्यालयों में सेवारत आचार्य व अन्य कर्मचारी अपनी जीविका पर मंडराए संकट से घबरा कर धैर्य खो रहे थे। देर से ही सही लेकिन सब कुछ सामान्य होने पर सब ने राहत की सांस ली है। बच्चों के शोर शराबे तथा बेमतलब की भागदौड़ से सभी के चेहरे पर मुस्कराहट देखी जा सकती है।</p>
<p><strong>लर्निंग गैप्स को करना होगा कवर</strong></p>
<p>दो वर्ष तक औपचारिक पढ़ाई का रूक जाना अपने आप में एक बड़ी घटना है। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित नन्हें-मुन्ने बच्चों की पढ़ाई हुई है। वैसे तो ऊपर से सब कुछ सामान्य दिखता है, कक्षाकक्ष की पढ़ाई भी शुरू हो गई है लेकिन शिक्षाविद बच्चों में आए लर्निंग गेप के कारण हुए लर्निंग लॉस को लेकर चिंतिंत हैं। इस चिंता को वे लोग ही समझ पा रहे हैं जिन्होंने शिक्षा को पूजा या साधना माना है। विद्या भारती के अधिकारी व आचार्य लगभग एक  वर्ष से इस विषय पर कार्य कर रहे हैं। लर्निंग गेप को कवर करने के लिए प्रत्येक विषय के कक्षानुसार ब्रिज कोर्स बनाए जा रहे हैं। विद्या भारती के विद्यालयों में अवकाश में विशेष कक्षाओं तथा शेष समय में अतिरिक्त कक्षाओं की योजना की जा रही है। लर्निंग गेप को कवर करना अत्यंत आवश्यक है। यह नहीं हो पाने पर बच्चे के जीवन में यह लॉस हमेशा कमी बन कर दस्तक देता रहेगा।</p>
<p><strong>ऑनलाइन शिक्षा को रखना होगा साथ</strong></p>
<p>आपदा अवसर लेकर भी आती है। कम से कम शिक्षा जगत ने तो इस कहावत को ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ चरितार्थ किया है। कल तक ईमेल देखने व करने में असहाय हमारे आचार्य अब आत्मविश्वास पूर्वक ऑनलाइन कक्षाओं का प्रभावी ढंग से संचालन कर रहे हैं। कोविड संकट के कारण ही सही लेकिन आभासी दुनिया में शिक्षकों के प्रवेश ने स्वयं उनके विकास की अनन्त संभावनाएं खोल दी हैं। कोविड से पूर्व बहुत सारे शिक्षक स्वयं को डिजिटली अशिक्षित मानते थे। वे अपने फोन पर कुछ करने के लिए अपने छात्रों पर पूर्णतः निर्भर से थे। बच्चे घर में माता-पिता तथा विद्यालय में आचार्यों की इस बेबसी का खूब आनंद लेते थे। कोविड की इस आपदा में आचार्यों को डिजिटली साक्षर किया है। आवश्यकता है कि औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ हो जाने पर भी शिक्षक ऑनलाइन शिक्षा का दामन न छोड़ें। आचार्य व छात्रों को समझना होगा कि गूगल गुरु का विकल्प नहीं हो सकता है लेकिन गूगल व गुरू की जुगलबंदी गुरू को शक्तिशाली अवश्य बना सकती है।</p>
<p><strong>कोविड पश्चात छात्र मन को भी समझना होगा</strong></p>
<p>कोविड के पश्चात शिक्षा प्रारम्भ होने पर अधिकांश विद्यालय व अभिभावक पढ़ाई को लेकर बच्चों पर पिल गए हैं। सबको लग रहा है कि दो वर्षों की सारी पढ़ाई छः महीनों में ही छात्रों पर उड़ेल दें। इस सारी परिस्थिति में सबको समझना होगा कि जब तक छात्र स्वयं पढ़ने की आवश्यकता अनुभव नहीं करेगा तब तक सबके प्रयास न केवल विफल होंगे बल्कि छात्र के मन मे आक्रोश, गुस्सा व निराशा बढ़ा कर समस्या को और गम्भीर बना देंगे। स्थिति कमोवेश ऐसी ही बन जाएगी- मर्ज बढ़ता ही गया ज्यूँ ज्यूँ दवा की&#8230;। पढ़ाई का आग्रह बढ़ाने से पहले बच्चे के मन को सहज करना होगा। इस परिस्थिति में आचार्यों व अभिभावकों को धैर्य व कुशलता से काम लेना होगा। प्यार, दुलार तथा तकनीकी कुशलता को माध्यम बनाना होगा। विद्यालयों को बड़े स्तर पर खेलों व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा। प्रतिदिन खेल का कालांश तथा जहां खेल के मैदान नहीं है वहां योग कक्षा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की मात्रा बढ़ानी होगी। पढ़ाई से भी पहले छात्र के चेहरे पर हंसी लाना सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए। शिक्षाविदों के इस निष्कर्ष को आचार्य, अभिभावकों तथा विद्यलयों को समझना होगा कि प्रसन्न मन से छात्र शीघ्र सीखता तथा याद रखता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5201" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/atoz_parentengagement-300x151.jpg" alt="" width="1206" height="607" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/atoz_parentengagement-300x151.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/atoz_parentengagement.jpg 360w" sizes="auto, (max-width: 1206px) 100vw, 1206px" /></p>
<p><strong>विद्यालय पर श्रद्धा व विश्वास बनाना आवश्यक</strong></p>
<p>कोविड के इन तीन वर्षों ने रिश्तों को भी आइना दिखाया है। मानव जाति पर आए उस भयंकर संकट में जहां एक ओर अनजान लोगों ने मदद का हाथ बढ़ाया है वहीं बहुत जगह अपने भी मुंह मोड़ते देखे गए हैं। कोविड के भयंकर दौर में लोग केवल ऑक्सीजन के लिए भाग दौड़ करते नहीं दिखे बल्कि अनेक जगह पर मानवता खुद भी वेंटिलेटर पर देखी गई है। बहुत जगह विद्यालयों के प्रति अभिभावकों का रवैया चिंताजनक दिखाई दिया। जो संस्था हमारे बालकों के जीवन को आकार देती है उसके प्रति बच्चों के मन में श्रद्धा व विश्वास पैदा करना अत्यंत आवश्यक है। विद्यालय व छात्र के रिश्ते को बाजार के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। छात्र के मन में विद्यालय व आचार्यों के प्रति श्रद्धा निर्माण करना आज की प्रथम आवश्यकता है। ध्यान रखें! आज विद्यालय के प्रति बच्चे के मन में श्रद्धा कम हुई तो कल हमारा नम्बर लगना निश्चित है। अनेक गैरसरकारी विद्यालयों में शिक्षकों को आंशिक वेतन ही मिला है। सरकार ने भी शिक्षकों का हाथ पकड़ने के बजाए एक प्रकार से अभिभावकों को फीस न देने के लिए ही उकसाया है। कोविड की इस त्रासदी में सरकार ने समाज के लगभग सब वर्गों की सहायता की, पैकेज दिए लेकिन गैरसरकारी विद्यालय, उन में सेवारत लाखों आचार्य व अन्य स्टाफ उपेक्षित हो गए। शिक्षा जगत के लिए सरकार का रवैया &#8216;हुए तुम दोस्त जिनके दुश्मन की उन्हें जरूरत क्या&#8217;, जैसा रहा। ऐसे में समाज को अपने आचार्य परिवार की चिंता करनी होगी। अभिभावकों को अन्य आवश्यक खर्चों की श्रेणी में डाल कर पिछली फीस स्वयं हो कर जमा करानी चाहिए।  याद रखें! हंसता, मुस्कराता व प्रसन्न आचार्य ही पूरे मनोयोग से हमारे बच्चे के जीवन को संवार सकता है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-right-time-for-radical-change-in-the-model-of-bharatiya-education-pre-and-post-corona/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षा के मॉडल में आमूलचूल परिवर्तन का सही समय : कोरोना पूर्व एवं पश्चात्</a></strong></span></p>
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		<title>बच्चों को सुनाएँ ‘कारगिल के हीरो’ की कहानियां</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Jul 2020 06:06:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Kargil]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Vijay Diwas]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेख  &#8211; विजय नड्डा   युद्ध में प्रत्येक सैनिक हीरो होता है। युद्ध की जीत में सामान्य समाज से लेकर राजनीतिक, प्रशासनिक व सैन्य नेतृत्व सबका योगदान होता है। इस&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लेख</p>
<p style="text-align: right;"> &#8211; विजय नड्डा</p>
<p> <img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1782" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Presentation1-2-300x145.jpg" alt="बच्चों को सुनाएँ ‘कारगिल के हीरो’ की कहानियां" width="904" height="437" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Presentation1-2-300x145.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Presentation1-2-1024x496.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Presentation1-2-768x372.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Presentation1-2.jpg 1250w" sizes="auto, (max-width: 904px) 100vw, 904px" /></p>
<p>युद्ध में प्रत्येक सैनिक हीरो होता है। युद्ध की जीत में सामान्य समाज से लेकर राजनीतिक, प्रशासनिक व सैन्य नेतृत्व सबका योगदान होता है। इस के बाद भी सैनिक द्वारा मृत्यु को सामने देख कर भी जीवन को दाव पर लगाकर एक-एक कदम आगे बढ़ना साहस की चरमसीमा ही होती है। इन रणनायकों में कुछ लोगों को अपने रक्त से इतिहास लिखने का अवसर मिलता है। 1999 में भारत की सीमा सुरक्षा के लिए लड़े गए कारगिल युद्ध के कुछ नायकों के प्रेरक साहस, शौर्य को स्मरण कर प्रणाम करना आवश्यक है।</p>
<p><strong>ब्रिगेडियर खुशाल सिंह</strong><strong>:</strong> हिमाचल के मंडी जिला निवासी ब्रिगेडियर खुशहाल सिंह को कारगिल युद्ध में इनके और इनकी बटालियन को दुश्मनों के छक्के छुड़ाने पर सबसे ज्यादा बहादुरी सम्मान मिले थे। ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने जिस 18 ग्रनेडियर का नेतृत्व किया उसमें 900 जवान थे। इनकी कमान के 34 जवान शहीद हुए और सबसे ज्यादा 52 वीरता पुरस्कार भी इनकी कमान को ही मिले थे। इसमें 1 परमवीर चक्र, 2 महावीर चक्र, 6 वीरचक्र और 18 सेना मेडल सहित अन्य सैन्य सम्मान भी शामिल थे। खुद ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर युद्ध सेवा मेडल जैसे सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।</p>
<p><strong>एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस</strong><strong>:</strong> कारगिल युद्ध के समय एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस थे। कारगिल युद्ध के समय टिपनिस ने अपनी टीम के साथ एयर फोर्स का कुशल नेतृत्व किया था। 18 हज़ार फीट की ऊंचाई से सेना को हवाई मदद देने की चुनौती को बखूबी अंजाम देने में टिपनिस और उनकी फोर्स ने अपनी कुशलता का परिचय देकर इतिहास रचने में मदद की थी।</p>
<p><strong>मेजर अजय प्रसाद</strong><strong>:</strong> मध्य प्रदेश के सपूत मेजर अजय प्रसाद उन चुनिंदा सैनिकों में शामिल थे, जिन्होंने कारगिल युद्ध की शुरुआती जंग में दुश्मनों से लोहा लिया था। सेना में शामिल होने के बाद वे श्रीलंका में लिट्टे से भिड़े। वहां कामयाबी के बाद मिजोरम में उल्फा उग्रवादियों को नेस्तनाबूद किया और फिर पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ाते हुए कारगिल युद्ध में शहीद हो गए।</p>
<p><strong>सिपाही कृष्ण कुमार</strong><strong>:</strong> हरियाणा के सिरसा के गांव तरकांवाली के सिपाही कृष्ण कुमार ने भी देश के खातिर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। जयसिंह बांदर का 25 वर्षीय पुत्र कृष्ण कुमार कारगिल युद्ध के समय जाट रैजिमेंट में सिपाही के पद पर तैनात था। कृषक जय सिंह के चार पुत्रों में सबसे छोटा कृष्ण ही था। शुरू से ही उसमें देश सेवा का जज्बा था। परम्परागत कृषि कार्य को छोड़कर उसने फौज में जाने का फैसला लिया। इस नौजवान ने देश सेवा के लिए सेना को चुना और शहादत से करीब दो वर्ष पूर्व ही जाट रैजिमेंट में भर्ती हुआ। कारगिल युद्ध में कृष्ण कुमार जैसे अनेक वीर शहीद हुए थे।</p>
<p><strong>जयराम सिंह</strong><strong>:</strong> कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले जयराम सिंह को उनकी वीरता के लिए राष्ट्रपति ने वीर चक्र से नवाजा तो परिवार ही नहीं, बल्कि राजस्थान का पूरा सीकर जिला गौरवान्वित हो उठा था। कारगिल युद्ध का जिक्र करते ही जयराम की आंखों के सामने वही पुराना मंजर आ जाता है। वो बताते हैं कि किस तरह से उन्हें 25 अप्रैल 1999 को करगिल में दुश्मन के घुसपैठ करने की सूचना मिली थी। उसके बाद वे अपनी कंपनी के साथ दुश्मनों से लोहा लेने निकल पड़े थे। करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर पर स्थित तेलोलिंग पहाड़ी जिस पर पाकिस्तानी सेना ने अपना कब्जा कर रखा था, उसको छुड़ाने का ज़िम्मा इन्हें दिया गया था।</p>
<p><strong>मेजर राजेश अधिकारी</strong><strong>:</strong> मेजर राजेश अधिकारी की एक वर्ष पहले ही शादी हुई थी। शाम के समय युद्ध क्षेत्र में मेजर राजेश अधिकारी के घर से आया हुआ खत पहुंचा। लेकिन मेजर राजेश अधिकारी ने खत पढ़ने से यह कहकर मना कर दिया कि पहले दुश्मनों को निपटा आता हूं और खत सुबह पढ़ लूंगा। रात भर युद्ध में डटे रहने के बाद तोलोलिंग पर मेजर राजेश अधिकारी और उनकी टीम ने कब्जा तो जमा लिया लेकिन खत पढ़ने के लिए वह जीवित न रह सके। मेजर राजेश सिंह अधिकारी की वीरता कार्य के लिए सरकार ने उन्हें गैलेंट्री सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>कैप्टन दीपक गुलेरिया</strong><strong>:</strong> कारगिल युद्ध में हिमाचल प्रदेश से 52 सूरमाओं ने अपनी जान दी। कैप्टन विक्रम बत्रा, सौरव कालिया के अलावा कई वीरों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। इन्हीं में से एक थे हिमाचल के मंडी जिले के सरकाघाट से कैप्टन दीपक गुलेरिया। उन्होंने महज 29 साल की उम्र में अपने प्राणों की आहुति दे दी। उन्हें उनके इस बलिदान के लिए गैलेंट्री अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।</p>
<p><strong>कैप्टन अनुज नैय्यर</strong><strong>:</strong> शहीद अनुज जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में थे। 7 जुलाई 1999 को वह टाइगर हिल पर दुश्मनों का दांत खट्टे करते हुए शहीद हुए। कैप्टन अनुज की वीरता को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।</p>
<p><strong>कैप्टन एन केंगुर्सू</strong><strong>:</strong> शहीद केंगुर्सू राजपूताना राइफल्स के बटालियन में थे। वह कारगिल युद्ध के दौरान लोन हिल्स पर 28 जून 1999 को दुश्मनों को पटखनी देते हुए शहीद हो गए थे। युद्ध के मैदान में दुश्मनों को खदेड़ देने वाले इस योद्धा को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>लेफ्टिनेंट शींग क्लिफोर्ड नोंग्रुम</strong> &#8211; शहीद नोंग्रुम जम्मू कश्मीर लाइट इनफेंट्री की 12वीं बटालियन में थे। वह वीरगति को 1 जुलाई 1999 को प्राप्त हुए। वह उस समय शहीद हुए जब कारगिल युद्ध के दौरान प्वांइट 4812 को कब्जा कर रहे थे। नोंगुर्म को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।</p>
<p><strong>मेजर पदमपानी आचार्य</strong><strong>:</strong> शहीद आचार्य राजपूताना राइफल्स की बटालियन में थे। 28 जून 1999 को लोन हिल्स पर दुश्मनों के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गए थे। सरकार ने कारगिल हिल पर उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया था।</p>
<p><strong>कर्नल सोनम वांगचुक</strong><strong>:</strong> वांगचुक लद्दाख स्काउट रेजिमेंट में अधिकारी थे। कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए वांगचुक कॉरवट ला टॉप पर वीरता से लड़े और युद्ध ख़त्म होने पर वापस लौटे। उन्हें बाद में महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।</p>
<p><strong>मेजर विवेक गुप्ता</strong><strong>:</strong> शहीद गुप्ता राजपूताना राइफल्स की सेकेंड बटालियन में थे। 12 जून 1999 को द्रास सेक्टर में एक महत्वपूर्ण पोस्ट पर कब्जा किए जाने के दौरान वह वीरगति को प्राप्त हुए थे। कारगिल युद्ध में उनकी वीरता को देखते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>कैप्टन मनोज कुमार पांडे</strong><strong>:</strong> शहीद मनोज गोरखा राइफल्स के फर्स्ट बटालियन में थे। वह ऑपरेशन विजय के महानायक थे। उन्होंने 11 जून को बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। वहीं उनके ही नेतृत्व में सेना की टुकड़ी ने जॉबर टॉप और खालुबर टॉप पर सेना ने वापस कब्जा किया था। वह दिन तीन जुलाई 1999 का था। पांडेय ने अपनी चोटों की परवाह किए बिना तिरंगा लहराया और परमवीर चक्र से सम्मानित किए गए।</p>
<p><strong>नायक दिगेंद्र कुमार</strong><strong>:</strong> शहीद दिगेंद्र राजपूताना राइफल्स के सेकेंड बटालियन में थे। उनकी कारगिल युद्ध में अदम्य साहस के लिए सरकार ने 15 अगस्त 1999 को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। ये जिंदा वापस लौटे थे।</p>
<p><strong>राइफल मैन संजय कुमार</strong><strong>:</strong> शहीद संजय 13-जम्मू और कश्मीर राइफल्स में थे। वह स्काउट टीम के लीडर थे और उन्होंने फ्लैट टॉप को अपनी छोटी टुकड़ी के साथ कब्जा किया। वह एक जाबांज योद्धा थे उन्होंने दुश्मनों की गोली सीने पर खाई थी। गोली लगने के बाद भी वह दुश्मनों का दांत खट्टा किया। छोटी सी टुकड़ी के साथ उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया, इसके बाद राइफल मैन कुमार को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। ये जिंदा वापस लौटे थे।</p>
<p><strong>ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव</strong><strong>:</strong> शहीद योगेंद्र कमांडो प्लाटून को गाइड करने वाले ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव थे। जिन्होंने एक चक्र के साथ टाइगर हिल पर एक स्ट्रैटजी बना कर बंकर पर हमला किया। वह अपनी पलटन के लिए रस्सी का रास्ता बनाते थे। 4 जुलाई को उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस के लिए योगेंद्र को सरकार ने परमवीर चक्र से सम्मानित किया। ये जिंदा वापस लौटे थे।</p>
<p><strong>कैप्टन विक्रम बत्रा</strong><strong>:</strong> कैप्टन बत्रा वही हैं, जिन्होंने कारगिल के प्वांइट 4875 पर तिरंगा फहराते हुए कहा था यह दिल मांगे मोर। विक्रम 13वीं जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में थे। विक्रम तोलोलिंग पर पाकिस्तानियों द्वारा बनाए गए बंकर पर न केवल कब्जा किया बल्कि गोलियों की परवाह किए बिना ही अपने सैनिकों को बचाने के लिए 7 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों से सीधे भिड़ गए। आज उस चोटी को बत्रा टॉप से जाना जाता है। सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र देकर सम्मानित किया।</p>
<p><strong>कैप्टन विजयंत थापर</strong><strong>:</strong> मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विजयंत थापर ने शहादत से पहले 13 जून 1999 को तोलोलिंग की पहाड़ियों पर जीत का झंडा फहराया था। ये महत्वपूर्ण जीत करगिल की जंग के दौरान भारत के हक में एक निर्णायक लड़ाई साबित हुई। तोलोलिंग की जीत के बाद 28 जून को कैप्टन विजयंत थापर को थ्री-पिंपल्स नाम की पहाड़ी को पाकिस्तानियों के कब्जे से आज़ाद कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बेहद मुश्किल हालात में लड़ी गई इस जंग में कैप्टन विजयंत ने दुश्मनों के खिलाफ बेमिसाल बहादुरी दिखाई और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर अमर हो गए।</p>
<p><strong>हवलदार डोला राम</strong><strong>:</strong> कारगिल युद्ध के शहीद हवलदार डोला राम का जन्म 17 जनवरी, 1965 को कुल्लू जिला के नित्थर क्षेत्र के गाव शकरोली में हुआ था। दसवीं की परीक्षा के बाद विद्यार्थी जीवन से ही उनमें देश सेवा का जज्बा था। वह 5 अगस्त 1985 को प्रथम पैराशूटर रेजिमेंट में भर्ती हुए। तीन जुलाई, 1999 को कारगिल के द्रास सेक्टर में मुठभेड़ में अंतिम सास तक बहादुरी से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए। ऑपरेशन रक्षक में सम्मिलित डोला राम ने द्रास सेक्टर में जीवन बलिदान किया था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1767" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Kargil-War-300x178.jpg" alt="Kargil-War" width="903" height="536" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Kargil-War-300x178.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Kargil-War.jpg 700w" sizes="auto, (max-width: 903px) 100vw, 903px" /></p>
<blockquote>
<p style="text-align: left;"><strong><em>‘कारगिल के हीरो’ की श्रंखला लम्बी है, उसमें से कुछ नामों का उल्लेख यहाँ किया गया है</em></strong><strong><em>।</em></strong><strong><em> जो विद्यार्थी विद्यालयों में पढ़ रहे है और महाविद्यालयों में पढ़ रहे है, वे सभी कारगिल युद्ध के बाद जन्मे है</em></strong><strong><em>।</em></strong><strong><em> इसलिए आवश्यक है कि अपने देश के लिए अदम्य साहस व वीरता का परिचय देने वाले सैनिकों के जीवन से परिचय करवाया जाए</em></strong><strong><em>।</em></strong><strong><em> ताकि वे उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर भारत के नव निर्माण में अपना योगदान दे सके</em></strong><strong><em>।</em></strong><strong><em>   </em></strong></p>
</blockquote>
<p>(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/bharat-tell-your-children-the-stories-of-tukaram-omleye-26-11-special/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">अपने बच्चों को तुकाराम ओम्बले की कहानियाँ सुनाना भारत! 26/11 विशेष</a></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/tell-the-stories-of-hero-of-kargil-war-to-children/">बच्चों को सुनाएँ ‘कारगिल के हीरो’ की कहानियां</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>अभिभावक अपने बच्चों के लिए कैसे खोजें उचित विद्यालय?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Feb 2020 06:43:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; विजय नड्डा फरवरी आते आते अपने बच्चों को अच्छे विद्यालय में दाखिल कराने को लेकर अभिभावकों की धड़कन बढ़नी शुरू हो जाती है। अभिभावक अपने स्वप्न के विद्यालय में&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; विजय नड्डा</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1068" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/girl-students-l-300x167.jpg" alt="" width="898" height="500" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/girl-students-l-300x167.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/girl-students-l.jpg 759w" sizes="auto, (max-width: 898px) 100vw, 898px" /></p>
<p>फरवरी आते आते अपने बच्चों को अच्छे विद्यालय में दाखिल कराने को लेकर अभिभावकों की धड़कन बढ़नी शुरू हो जाती है। अभिभावक अपने स्वप्न के विद्यालय में बच्चे के प्रवेश के लिए सारे संभव नैतिक-अनैतिक माध्यमों का प्रयोग करने को भी उद्यत रहते हैं। बच्चे को उनकी पसंद के विद्यालय में प्रवेश मिल पाएगा या नहीं यही चिंता उन्हें खाए जाती है। ऐसा लगता है जैसे कि अपनी कल्पना के विद्यालय में बच्चे के प्रवेश मात्र से उन्होंने बच्चे का उज्ज्वल भविष्य सुरक्षित कर लिया। जबकि सब जानते हैं कि जीवन में सफलता बहुत आगे की बात होती है और वह कई अन्य बातों पर भी निर्भर करती है।</p>
<p>आज प्रायः हर अभिभावक अपने बच्चों के लिए सर्वोत्तम विद्यालय खोजने में परेशान दिखाई देता है। इसके साथ ही आज विद्यालय भी अच्छे बच्चों और अभिभावकों की तलाश में परेशान दीखते हैं। दोनों को एक दूसरे से पर्याप्त शिकायतें रहती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपना विश्लेषण न करने के कारण दोनों परस्पर एक दूसरे की कमियां निकालते रहते हैं। और इस कारण दोनों की ही तलाश कभी पूरी नहीं होती। और इस कारण दोनों से सन्तुष्टि कोसों दूर रहती है। इस निराशा, खीज और असन्तुष्टि का बड़ा कारण आप अच्छा या सर्वश्रेष्ठ विद्यालय या योग्य अभिभावक मानते किसको हैं, इस प्रश्न के उत्तर में छिपी है। अभिभावक विद्या मन्दिर में क्या तलाशें इस विषय पर चिंतन करेंगे।</p>
<p><strong>अभिभावक क्या ढूंढें विद्या मन्दिर में :</strong> अभिभावक के रूप में अपने बच्चे के लिए सबसे बढ़िया विद्यालय खोजना हर व्यक्ति की चाहत होना स्वाभावविक है। लेकिन अच्छे विद्यालय का आधार क्या रहता है और क्या रहना चाहिए, यह यक्ष प्रश्न है। आज शिक्षा जगत में बाज़ारवाद खुलकर खेलता देखा जा सकता है। शिक्षा क्षेत्र में बड़े घराने उतर आ जाने से यह गलाकाट प्रतियोगिता अपने पूरे उफान पर है। अधिकांश अभिभावक विद्यालयों की चकाचौन्ध में खो जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह सारा मायाजाल उनकी जेब से गए या जाने वाले पैसे का चमत्कार है। इससे भी बड़ी बात बच्चे की शिक्षा के स्तर का एसी बस, कमरे आदि से खास सम्बद्ध नहीं है।</p>
<p>अभिभावक होने के नाते बच्चे की सुख सुविधा को लेकर चिंता करना ठीक है लेकिन इसके साथ ही हमें विचार करना होगा कि बच्चे को अंदर से मजबूत बनाना है या छईमुई बना कर जीवन संग्राम के लिए तैयार करना है। हमें अपनी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था जहां राजा और रंक सभी के बच्चे गुरुकुल में समान सुविधाओं में समान शिक्षा प्राप्त करते थे। <strong>हमें याद रखना होगा कि जीवन माँ की गोद की तरह मुलायम नहीं है। इसे सफलतापूर्वक पार करने के लिए बालक को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से मजबूत होना आवश्यक है।</strong></p>
<p>दुःख का विषय है कि छात्र के विकास के इस महत्वपूर्ण पक्ष की ओर न विद्यालय का और न ही अभिभावकों का ध्यान प्राथमिकता है। घर और स्कूल सब जगह पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई! छाई रहती है। अभिभावकों को इस तथ्य को विस्मरण नहीं करना चाहिए कि <strong>स्वस्थ शरीर और मन में ही बच्चे का भविष्य सुखद और सुरक्षित है।</strong></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1067" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/unnamed-300x172.jpg" alt="" width="898" height="515" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/unnamed-300x172.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/unnamed.jpg 512w" sizes="auto, (max-width: 898px) 100vw, 898px" /></p>
<p><strong>शिक्षा के साथ संस्कारक्षम वातावरण हो प्राथमिकता : </strong>आज अधिकांश अभिभावक और विद्यालय बच्चों को गणित, विज्ञान या अंग्रेजी को रटाने को ही शिक्षा समझने लगे हैं। जबकि प्रायः सभी शिक्षा शास्त्री मानते हैं कि बच्चे में <strong>शिक्षा के प्रति लगाव</strong><strong>, खेल, व्यायाम तथा नैतिक मूल्य</strong> पैदा हो जाने के बाद उचित समय पर इन विषयों में विद्यार्थी स्वयं प्रगति कर लेता है। छात्र का व्यक्तित्व विकास विद्यालयों और अभिभावकों की प्राथमिकता होनी चाहिए।  इसके बिना अगर बालक औपचारिक अध्ययन से बड़ा अधिकारी बन भी गया तो समाज और परिवार के लिए सरदर्द ही बनेगा।</p>
<p>हमें ध्यान में आया होगा कि जो लोग भ्रष्टाचार, आतंकवाद में लिप्त पाए गए वे अपने शैक्षिक कैरियर में तो सबसे आगे ही थे। घर या विद्यालयों में सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास न होने के कारण कम या अधिक डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी व्यक्तिगत जीवन में स्वार्थी एवं नैतिक मूल्यों से दूर होते हैं।</p>
<p>जिन माता पिता ने कभी बालक के अच्छे अंक प्राप्त कर सफलता के शिखर छूने पर मिठाई बांटी होती है वही जब वृद्ध आश्रम की ओर रुख करते हैं तो उनके मन पर क्या बीतती होगी? आखिर इसमें दोष किसका है? यहां तो <strong><em>‘बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से आएं’</em></strong> कहावत ठीक बैठती है। केवल कलियुग, आधुनिक वातावरण को दोष देकर समस्या का हल नहीं मिल सकता।</p>
<blockquote><p><strong>हमें याद रखना होगा कि अपने शिशु के लिए विद्यालय का चयन और वृद्व आश्रम में अपने कमरे की बुकिंग</strong><strong> का सीधा सम्बद्ध है। इसलिए औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त भारतीय संस्कार, बच्चों में देश समाज के प्रति संवेदना तथा कुछ करने का जज्बा पैदा करने में प्रयासरत विद्यालय को ही अपने बच्चे के लिए चुनना चाहिए। इसके लिए हमें अपने बच्चों के लिए सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित विद्यालय या भारतीय संस्कृति को आधार बना कर शिक्षा देने को कटिबद्ध निजी विद्यालयों को प्राथमिकता देनी होगी। </strong></p></blockquote>
<p>याद रखें कि अपने बच्चे के लिए अच्छे विद्यालय का चयन बच्चे के साथ-साथ हमारे अपने सुखद भविष्य का आधार बनने वाला है। ऊंचीं फीस, बाहरी चकाचौन्ध में बहने वाले हमारे अभिभावकों को अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन का अपने बेटे के प्रिंसिपल को लिखा पत्र अवश्य पढ़ लेना चाहिए।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री है।)</p>
<p>और पढ़ें: <a href="https://rashtriyashiksha.com/ideal-student/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">विद्यार्थी जीवन एक आदर्श जीवन कैसे बने?</a></p>
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		<title>बड़े लक्ष्य के लिए आगे आते छोटे-छोटे हाथ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Jan 2020 12:05:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
		<category><![CDATA[सेवा शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्र निर्माण]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षा और सहयोग]]></category>
		<category><![CDATA[सकारात्मक बदलाव]]></category>
		<category><![CDATA[समर्पण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; विजय नड्डा &#160; जिस उम्र में बच्चे टॉफी, ब्रांडेड कपड़े एवम् पॉकेट मनी के लिए घर में तूफान मचाते दिखते हैं उसी उम्र में अपने समवयस्क गरीब बच्चों के लिए&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; विजय नड्डा</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>जिस उम्र में बच्चे टॉफी, ब्रांडेड कपड़े एवम् पॉकेट मनी के लिए घर में तूफान मचाते दिखते हैं उसी उम्र में अपने समवयस्क गरीब बच्चों के लिए शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अपनी जेब से पैसे देने के अद्भुत कार्यक्रम का नाम है – <strong>“समर्पण”</strong>। यह किन्ही एक दो बच्चों का जोश में आकर गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए अपने पॉकेट मनी से कुछ राशि दान देने की कोई आकस्मिक घटना विशेष नहीं है बल्कि प्रतिवर्ष बसन्त पंचमी के दिन पंजाब में लगभग 40,000 बच्चे इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं।</p>
<p>बच्चों को प्रेरणा मिलती है विद्या भारती के अधिकारीयों, आचार्यों एवं विद्या मन्दिर प्रबन्ध समिति के सदस्यों से जो स्वयं भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं। नई पीढ़ी को लेकर निराशाभरी बातें करने वालों की जानकारी हेतु बता दें कि यह चित्रण किसी देवलोक में घटित होने वाली घटना का नहीं है बल्कि सम्पूर्ण देश में विद्या भारती द्वारा संचालित लगभग 13000 विद्यालयों में प्रतिवर्ष का स्थायी आयोजन है। विकास के लिए केवल सरकार की ओर ताकते न रह कर अपना थोड़ा ही क्यों न हो उस हेतु अपना सहयोग देने का संस्कार बाल मन पर अंकित करने का सफल प्रयास है समर्पण।</p>
<p>आज जम्मू-कश्मीर, उत्तराखण्ड व देश के पूर्वोत्तर में इसी समर्पण राशि से अनेक विद्या मन्दिर खड़े हो चुके हैं। अनेक विद्या मन्दिर निर्माणाधीन हैं। आखिर बच्चों से कितनी धनराशि एकत्र हो जाती होगी? आपका क्या अनुमान है? आपको जानकर सुखद आश्चर्य एवम् आनन्द होगा कि प्रतिवर्ष पंजाब के हमारे ये नन्हें- मुन्ने लगभग 50 लाख रूपये का सहयोग अपने हमउम्र गरीब बच्चों के लिए एकत्र करते हैं। बून्द- बून्द घड़ा भरने या गिलहरी जैसे योगदान से इतना बड़ा कार्य हो जाता है, यह बहुत लोगों की कल्पना से बाहर है।</p>
<p style="text-align: center;">समाज के प्रति अपनत्व एवं दर्द – <strong>“देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें”</strong></p>
<p>इस भाव को बाल मन में अंकित करने का सफल प्रयास एवम् प्रयोग है समर्पण कार्यक्रम। कई बार अनेक सुझाव आते हैं कि बच्चों से दस-बीस रूपये लेने के बजाए बड़े उद्योगपतियों से मांगने पर ज्यादा बड़ी राशि प्राप्त हो सकती हैं। इस बात में वजन होने के बाद भी हमारे अधिकारी समाज से सहयोग इकठ्ठा करने के लिए प्रेरित करने के बाद भी बच्चों से सहयोग मांगने पर पूरा आग्रह बनाए रखते हैं। क्योंकि इस सहयोग राशि में राशि से ज्यादा बाल मन में देश व समाज के प्रति दर्द एवं अपनत्व उत्पन्न कर गरीब वर्ग के लिए कुछ करने का व्यवहारिक प्रशिक्षण देना है।</p>
<p>विद्या भारती का सुविचारित मत है कि आज अगर हमारे पूंजीपतियों, नेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों के मन में यह दर्द पैदा हो जाए तो देश का आर्थिक दृश्य बदलते देर नहीं लगेगी। हमारे विद्या मन्दिरों में औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त छात्र के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए अनेक प्रयोग और उपक्रम लिए जाते हैं। वर्तमान समय में समाज शास्त्री नई पीढ़ी में इन्हीं गुणों की आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं। हमारे विद्या मन्दिरों से शिक्षा प्राप्त हमारे पूर्व छात्र समाज जीवन में अपने इन्हीं गुणों व व्यवहार से अलग पहचान एवं सम्मान प्राप्त करते हैं।</p>
<p><strong>अभिनव प्रयोग है “समर्पण”</strong> – स्वामी विवेकानन्द कहते थे, “जीवन में अपना हाथ ऊपर अर्थात् देने की मुद्रा में रहना चाहिए।” जैसा हम सोचते हैं, इच्छा करते हैं ईश्वर हमें वैसी स्थिति में पहुंचा देते हैं। जब हम <strong>‘वसुधैव कुटुम्बकम’</strong> का उद्घोष कर सम्पूर्ण विश्व के लिए जीते थे तब हम विश्व गुरु थे। हमारे यहां सोने और चांदी का धुंआ निकलता था। इसके विपरीत जबसे हमने मैं&#8230;मैं<br />
का राग अलापना शुरू किया और सब जगह से लेने के लिए हाथ पसारने शुरू कर दिए तो हम भिखारी जैसी अवस्था में पहुंच गए। हमें हजारों वर्षों की गुलामी और घोर गरीबी की यातना झेलनी पड़ी।</p>
<p>आज यद्यपि हम स्वतंत्र हो गए हैं लेकिन मानसिकता में स्वाभिमान और दूसरों के लिए जीने का स्वभाव नहीं बना। इसके परिणामस्वरूप आज भी 40-50 करोड़ देशवासी भयंकर गरीबी का सामना करने को बेबस हैं। करोड़ों बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। हमारे यहां विकास का प्रारूप भी कुछ ऐसा विचित्र-सा है कि प्रतिवर्ष करोड़पतियों की संख्या एवं झुग्गी झोपड़ियों की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज हो रही है। हमारे देश में एशिया के सबसे ज्यादा दौलतमंद धन्नासेठ हैं। एक बार हमारे मन में सम्पूर्ण समाज के प्रति अपनापन और प्रत्येक देशवासी के प्रति ममत्व उत्पन्न हो जाए तो झुग्गी झोंपड़ी मुक्त भारत बनते देर नहीं लगेगी। <strong><em>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा प्राप्त विद्या भारती नई पीढ़ी के बाल मन में ऐसे ही श्रेष्ठ संस्कार पैदा करने के लिए प्रयासरत है।</em></strong> इसी प्रयास में प्रमुख कार्यक्रम है समर्पण।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-990" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/57503440_743788429348932_7910359496055062528_n-768x532-300x208.jpg" alt="शिक्षा और सहयोग" width="899" height="623" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/57503440_743788429348932_7910359496055062528_n-768x532-300x208.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/57503440_743788429348932_7910359496055062528_n-768x532.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 899px) 100vw, 899px" /><br />
<strong>कैसे करते हैं समर्पण</strong> – विद्या मन्दिरों में समर्पण को लेकर अनेक प्रकार के प्रयोग किए जाते हैं। समर्पण से कुछ दिन पूर्व आचार्य कक्षाओं में समर्पण का महत्व एवं पद्धति को लेकर चर्चा करते हैं। कार्यक्रम वाले दिन बच्चे माँ सरस्वती के चित्र के आगे प्रणाम कर अपनी सहयोग राशि भेंट करते हैं। कार्यक्रम संस्कार एवं भावप्रद रहे इसके लिए विद्यालय में उत्सव जैसा माहौल बनाया जाता है।</p>
<p>लेने की तो होड़ समाज में सर्वदूर देखी जाती है लेकिन समाज के लिए देने को उत्सव में बदलने का प्रयास किया जाता है। देशभक्ति के गीत, समाज के आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को कैसी परिस्थितयों से जूझना पड़ता उसका सचित्र व सजीव चित्रण के लिए फ़िल्म व लघु चित्रपट भी दिखाए जाते हैं। बच्चा समर्पण वाले दिन माता-पिता से मांग कर धन राशि न लाकर वर्ष भर संग्रह करे, ऐसा आग्रह किया जाता है। बच्चे अपने गली-मोहल्ले व गाँव में भी संग्रह करते हैं।</p>
<p>समाज के लिए मांगने का भी अपना एक संस्कार एवं आनन्द रहता है। इस कार्यक्रम से यह संस्कार बाल मन में अंकित हो जाता है। समर्पण कार्यक्रम में आचार्य एवं प्रबन्ध समिति के सदस्य भी उत्साहपूर्वक सहभाग करते हैं। प्रतिवर्ष समर्पण कार्यक्रम करने के कारण अब तो बच्चे व उनके अभिभावक उत्सुकतापूर्वक बसन्त पंचमी की प्रतीक्षा करते हैं। प्रत्येक विद्यार्थी समर्पण करते समय यही गुनगुनाता रहता है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ढूंढे से भी न दर्शन हों दीन दुखी के यहां कभी।<br />
अन्न वस्त्र गुह्यआत्म ज्ञान के भरे रहें भण्डार सभी।।</strong></p>
<p>(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/teachers-of-vidya-bharti-who-is-awakening-education-in-inaccessible-tribal-areas/">हम यहाँ बैठे है तो एकल विद्यालय के कारण बैठे है।</a></p>
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		<title>सांस्कृतिक नेतृत्व तैयार करने का अभिनव प्रयोग है वेदविज्ञान गुरुकुलम्</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Aug 2019 11:43:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-539 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m-300x197.jpg" alt="" width="896" height="588" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m-300x197.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m-768x503.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m.jpg 835w" sizes="auto, (max-width: 896px) 100vw, 896px" />&#8211; विजय नड्डा</p>
<p>स्वास्थ्य लाभ हेतु दो सप्ताह के लिए &#8216;प्रशांत कुटीर&#8217; बंगलोर  में रहना हुआ । प्रशांत कुटीर में शुक्रवार को छुट्टी जैसा माहौल रहता है । शुक्रवार को कहीं आस-पास घूमने की योजना बना ही रहे थे कि श्री श्रीनिवास मूर्ति जी का चेन्नलहल्ली आने का आग्रह ध्यान आया । बस फिर क्या था! चेन्नलहल्ली जाने का कार्यक्रम बन गया । सौभाग्य से गुरुकुल की आत्मा और वर्तमान में प्रशांत कुटीरम में स्थित स्वामी विवेकानन्द विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ रामचंद भट्ट जी की कार में ही गुरुकुल तक की यात्रा करने का सुअवसर मिल गया । और इस कारण उनके साथ गुरुकुल और गुरुकुल के सम्बद्ध में उनकी कल्पना को लेकर कुछ चर्चा-वार्ता भी हो गयी । वेद विज्ञान गुरुकुलम् प्रकल्प और वहां का प्राकृतिक दृश्य देख कर मन आनंदित हो गया । प्राचीन गुरुकुल का दृश्य ही आँखों के सामने साकार दिख जाता है यहां! देश की समस्याओं का रोना-धोना, उनके लिए नेताओं या प्रशासनिक अधिकारियों को दोषी ठहरा कर अपना आक्रोश निकाल लेना एक बात है । यह आज सहजक्रम है भी लेकिन भारत के सुखद भविष्य के लिए अपने आप को बीज में  बोने वाले, अपना रक्त-पसीना बहाने वाले विरले ही होते हैं । ऐसे ही देवदुर्लभ लोग यहां पर साधनारत हैं ।</p>
<p><strong>प्रकृति की गोद में बसा है आश्रम-</strong> बंगलोर से लगभग 50 किलोमीटर दूर चेन्नलहल्ली गांव में मेट्रो सिटी की भागदौड़ व आपाधापी से दूर एकांत में नए भारत और सम्पूर्ण विश्व के लिए सांस्कृतिक नेतृत्व गढ़ने का एक अभिनव प्रयोग चल रहा है । सम्पूर्ण भारत से लगभग 35 युवक यहां स्वयं को अध्यात्म और संस्कृति में रंग रहे हैं । बारह शिक्षक इन्हें अनेक विषयों में पारंगत कर रहे हैं । जनसेवा ट्रस्ट बंगलोर द्वारा प्रचार प्रसिद्धि से दूर धैर्यपूर्वक यह साहसिक प्रयोग लगभग दो दशकों से अर्थात सन् 1997 से चल रहा है । साहसिक प्रयोग इस अर्थ में है कि यहां औपचारिक पढ़ाई, परीक्षा व प्रमाण पत्र आदि कुछ भी नहीं  । इसके साथ ही भविष्य में रोजी-रोटी की भी कोई गारन्टी नहीं रहती है । अर्थात् यहां अध्ययन केवल और केवल आत्मविकास के लिए चलता है जीविका मात्र के लिए कतई नहीं । यह अलग बात है कि अगर आत्मविकास हो गया तो रोजी रोटी तो क्या सारी सृष्टि पीछे दौड़ पड़ती है । हाँ इतना धैर्य और आत्म्विश्वास अवश्य चाहिए । गुरुकुलम् में व्याकरण और वेदांत का सात वर्षीय कोर्स चलता है । हमारे प्राचीन शास्त्र वेद, गीता, रामायण, पुराणों व उपनिषद का पठन और कण्ठस्थीकरण चलता है । ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़, छोटे-2 से कुटियानुमे कमरे तथा संन्यासी वेश में छात्र कुल मिलाकर प्राचीन गुरुकुल का दृश्य आँखों के सामने साकार हो जाता है । इस परिसर में वेदविज्ञान गुरुकुलम् के अतिरिक्त औपचारिक शिक्षा दे रहे दो अन्य शिक्षण संस्थाएं एक हाई स्कूल तथा जमा दो का आवासीय विद्यालय भी चल रहे हैं । यह ट्रस्ट आधुनिक मैत्रयी व गार्गी तैयार करने के लिए लड़कियों के लिए ऐसा ही गुरुकुल &#8216;मैत्रयी&#8217; नाम से मंगलोर के पास चला रहा है ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-540 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-300x214.jpg" alt="" width="831" height="593" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-300x214.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-768x549.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-1024x732.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4.jpg 1199w" sizes="auto, (max-width: 831px) 100vw, 831px" /></p>
<p><strong>आधुनिक चाणक्य कुलपति डॉ. रामचन्द भट्ट :</strong> किसी भी प्रकल्प या संस्था की सफलता उसके पीछे किसी व्यक्ति की साधना और दूरदृष्टि रहती है । ऐसे ही आधुनिक चाणक्य दिखते हैं डॉ. रामचंद्र भट्ट । अनेक भाषाओं के ज्ञाता, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मानप्राप्त डॉ. रामचंद्र भट्ट जनसेवा ट्रस्ट द्वारा चलाये जा रहे शिक्षण संस्थाओं के प्रमुख हैं । कुछ समय पहले ही प्रशांत कुटीरम् में चल रहे स्वामी विवेकानन्द शिक्षण एवम् अनुसन्धान विश्वविद्यालय के उपकुलपति बनाये गए हैं । लेकिन विश्वविद्यालय में इनका कार्यालय किसी ऑफिस जैसा नहीं बल्कि कार्यालय से अधिक क्लास रूम ही अधिक लगता है । बात करने पर बोले कि आज कुलपति का काम अकादमिक (शैक्षिणक) से अधिक फाइल क्लियर करना ही अधिक हो गया है । वास्तव में यह कार्य रजिस्ट्रार का होता है । उपकुलपति होने के बाद भी ये पढाने में ही अधिक समय लगाते हैं । साधारण सी कार में ये प्रतिदिन गुरुकुल से ही यहां आते हैं । और गुरुकुल में भी ये एक साधारण से कमरे में रहते हैं । सज्जनता और सादगी की इस मूर्ति को मिलकर मन में विचार आया कि हमारे शिक्षा जगत को पद से नहीं बल्कि अपने चरित्र और व्यवहार से प्रेरणा देने वाले महानुभाव कब बिभूषित करेंगे? आपकी प्रेरणा का स्रोत क्या है? यह पूछने पर बोले कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूँ । देश व समाज की निश्वार्थ व पूरे मन से सेवा की प्रेरणा संघ से ही मिली है ।</p>
<p><strong>कठोर शिक्षण से निखरते हैं युवा :</strong> गुजरात के सोमनाथ से कर्मेश व हरियाणा से कमल ने उत्साहपूर्वक सारे परिसर में घुमाया । उन्होंने बताया कि आश्रम में कठोर दिनचर्या का पालन करना होता है । सुबह चार बजे जगने से लेकर रात दस बजे तक अनेक विषयों का औपचारिक एवम् अनोपचारिक शिक्षण चलता है । आधुनिक जगत से जोड़ने के लिए कम्प्यूटर,  इंग्लिश के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान के विषयों का शिक्षण तथा टीवी पर समाचार दिखाने की व्यवस्था रहती है । शाम को शारीरिक, मानसिक विकास तथा राष्ट्रभक्ति के भाव जागरण के लिए संघ की शाखा भी लगती है । यहां कक्षाएं कमरे से लेकर किसी पेड़ के नीचे सब जगह चलती रहती हैं । पहले तीन साल छात्रों को सब शास्त्रों का अध्ययन करना होता है । इसके बाद वेदांत और व्याकरण ऐसे दो विभाग रहते हैं जिनमें छात्र को कोई एक विभाग अपने लिए चुनना होता है । वर्ष के अंत में देश के प्रमुख विद्वान व शंकराचार्य इनकी मौखिक और लिखित परीक्षा लेते हैं । इस प्रकार इन्हें अगली कक्षा में प्रवेश मिलता है ।</p>
<p><strong>हमारी आध्यात्मिक जगत की चुनौतियों का सटीक उत्तर :</strong>  आज अधिकांश साधु-सन्त करोड़ों देशवासियों की श्रद्धा-आस्था का केंद्र होने के बाद भी नई पीढ़ी के अनेक प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते हैं । कारण युवा भावावेश में संन्यास तो ले लेते हैं लेकिन संन्यासी जीवन के महान उद्देश्य के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए कठोर साधना, योग्य वातावरण और प्रेरक शिक्षक नहीं मिल पाते हैं । हमारे बहुत से सन्तों और मठ मन्दिर प्रमुखों का अपनी संस्कृति, धर्मग्रथों का ज्ञान और उस स्तर का व्यवहार आज की युवा पीढ़ी को आकर्षित और प्रेरित नहीं कर पा रहा है । वेदविज्ञान गुरुकुलम हमारे अध्यात्म जगत की आज की बड़ी जरूरत को पूरा का एक लघु ही क्यों न हो लेकिन एक ठोस प्रयास है ।</p>
<p><strong>तैयार हो रहा है आधुनिक एवं शास्त्र पारंगत नेतृत्व :</strong> डॉ. रामचन्द भट्ट के अनुसार यह संस्थान अभी तक 60 से अधिक सांस्कृतिक राजदूत तैयार कर समाज में भेज चुका है । ये स्नातक किसी न किसी मठ या संस्था का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं । यह संस्थान दसवीं पास विद्यार्थी को अपने यहां प्रवेश देता है । इनका रहना, खाना और पढ़ाई सब नि:शुल्क रहता है । आज जब युवा पीढ़ी में सब तरफ करियर और पैकेज का भूत सवार दिखाई देता है ऐसे में इन युवाओं का अपने आप को इस साधना को समर्पित कर देना अत्यंत साहस का कार्य है । यद्यपि आधुनिक संन्यासी इन युवाओं की संख्या काफी कम है तो भी अँधेरे में छोटा ही क्यों न हो एक प्रकाश पुंज का कार्य तो हो ही रहा है । आवश्यकता है कि ऐसे संस्थान हर राज्य में कम से कम एक तो हों । माता-पिताओं को अपने बच्चों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए । आखिर विश्व का नेतृत्व करने के लिए अपनी संस्कृति का केवल अभिमान ही नहीं तो ज्ञान और आचरण से ओतप्रोत युवाओं की जरूरत तो रहेगी ही न ! जब तक सब राज्यों में ऐसे संस्थान नहीं खुलते तब तक वहीं युवकों को जाकर शिक्षण लेकर जीवन सार्थक करना चाहिए । गुरुकुल में पंजाब, हिमाचल और जम्मूकश्मीर की अनुपस्थिति जरूर खटकी । आशा है हमारे युवा भी अध्यात्म और संस्कृति की इस बहती गंगा में डुबकी लगाने गुरुकुल में अवश्य दस्तक देंगे ।</p>
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