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	<title>समाज और शिक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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		<title>शिक्षकों, घर जाओ!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Dec 2025 04:31:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप बेतकेकर शीर्षक पढ़कर नाराज हो गये न आप? हमें ‘घर जाओ’ कहने वाले आप कौन? क्या अधिकार है आपको हमें घर भेजने का? यही सवाल आपके मन में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9147" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/School-300x157.jpg" alt="" width="1724" height="902" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/School-300x157.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/School-768x401.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/School.jpg 1024w" sizes="(max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;">शीर्षक पढ़कर नाराज हो गये न आप? हमें ‘घर जाओ’ कहने वाले आप कौन? क्या अधिकार है आपको हमें घर भेजने का? यही सवाल आपके मन में उभरे होंगे न?</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षकों को ‘घर जाओ’ कहने वाला मैं कौन हूँ? मुझे नहीं है वह अधिकार। मैं ऐसा कहना भी नहीं चाहता। मुझे केवल यही सुझाव देने की इच्छा है कि विद्यार्थियों के घर जाओ। शिक्षकों को विद्यार्थी के घर जाने की कल्पना शायद अनेक बन्धु-बहनों को पसन्द नहीं आयेगी। ऊपरी तौर पर देखा जाये ये एक अतिरिक्त कार्य होगा। कुछ शिक्षकों को यह कार्य निम्न दर्जे का लगेगा। किन्तु शांति से, गंभीरता से, गहराई से विचार किया जाए तो यह ‘एक्सट्रा’ कार्य नहीं, वरन् उपयुक्त, महत्वपूर्ण और शिक्षक का परिश्रम कम करने वाला काम सिद्ध होगा, कक्षा व्यवस्थापन में सहायक सिद्ध होगा। किन्तु इस हेतु तुरंत कुछ प्रतिक्रिया न देते हुए, बिना पूर्वाग्रह के, निष्पाप-निस्वार्थ मन से, इस योजना को कार्यान्वित करने के विषय में सोचें। परिश्रम का दिखावा मात्रा न रहे।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ विद्यालयों के शिक्षक विद्यालय के वार्षिक नियोजन के अनुसार विद्यार्थियों के घर जाकर पालकों से भेंट करते हैं। सभी शिक्षक इस प्रकार ‘गृहभेंट’ की भावना को समझते हैं, ऐसा नहीं है। कुछ तो केवल ‘औपचारिक’ कार्य मानकर जाते हैं। उस प्रकार की भेंट निष्पफल रहती है। गृहभेंट किसलिये?</p>
<p style="text-align: justify;">‘शिक्षक राम को गणित पढ़ाते हैं’ इस वाक्य में मुख्य चार शब्द हैं। प्रत्येक शब्द महत्वपूर्ण है किन्तु ‘राम’ सबसे महत्वपूर्ण है। ‘राम’, अर्थात् विद्यार्थी को ठीक से समझे बिना सीखना प्रभावी नहीं रहेगा। यदि विद्यार्थी को ठीक से, सभी दृष्टि से समझा जाये तब ‘गणित’ भी कठिन नहीं, ‘पढ़ाना’ भी कठिन नहीं। अर्थात्, उस विद्यार्थी का भावजगत ठीक से समझना ये है प्रथम पायदान! उस विद्यार्थी की सामाजिक, आर्थिक, कौटुंबिक, सांस्कृतिक पार्श्वभूमि समझने पर ही आगे के कदम सही दिशा और गति पकडे़ंगे। इस कार्य हेतु ‘गृहभेंट’ आवश्यक। जब विद्यार्थी और शिक्षक के बीच निकटता निर्मित हो जाती है तब अध्यापन प्रक्रिया में गति आने लगती है। कितना ही शैतान, मस्ती करने वाला, अनुशासनहीन विद्यार्थी हो, शिक्षक के उसके घर जाने से उसकी अनुशासनहीनता में कुछ हद तक कमी आती है। कक्षा नियंत्राण की समस्या भी शिक्षक के लिए अपेक्षाकृत हल हो जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चे लगभग छः घण्टे विद्यालय में रहते हैं। शेष अठारह घंटे का समय घर के लिये रहता है। कुछ समय ट्यूशन्स, खेल आदि के लिये निकाल दिया जाये, फिर भी अधिकतर समय घर के लिये ही बचता है। घर के अंदर के वातावरण, परिस्थिति आदि का प्रभाव भी विचारणीय है। उसका व्यवहार, चाल-चलन, बोलना, ग्रहणशीलता, संस्कार, पढ़ाई, आरोग्य आदि सभी बातों पर प्रभाव रहता है घर के वातावरण का। पैनी नज़र रखने वाले शिक्षक को अनेक बातें संज्ञान में आ जाती हैं। तदनुसार शिक्षक के लिये विद्यार्थी, उसके माता-पिता-पालकगण आदि को कुछ मार्गदर्शन करना, महत्वपूर्ण सूचनाएं देना आसान हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षकों की एक बैठक में एक शिक्षक ने पूछा – “हम लोग विद्यार्थी के घर जा कर करें भी क्या?” करने के लिये तो बहुत कुछ है। जैसे-जैसे एक-एक पग आगे चलते हैं, आगे की राह अपने आप प्रशस्त होने लगती है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण बात जो विद्यार्थी के घर जाने पर ध्यान रखनी है, कि विद्यार्थी की किसी भी प्रकार की शिकायत माता-पिता-पालक को नहीं करनी है। प्रथम बार की भेंट में तो बिल्कुल नहीं। हां, यदि विद्यार्थी के सम्बन्ध में कोई अच्छी और सकारात्मक बात हो तो अवश्य बताएं। ध्यान रहे, हमें दीवार नहीं बनानी है, पुल निर्मित करना है।</p>
<p style="text-align: justify;">“Be quick of eyes and slow of tongue” ऐसा कहा जाता है। घर और घर के अंदर रहने वाले व्यक्तियों का निरीक्षण अच्छे से होना चाहिये। निरीक्षण किस बात का? इसकी सूची लम्बी हो सकती है। यह शिक्षक की व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">घर में प्रवेश करते समय होने वाले आदरातिथ्य की पद्धति से ही घर के बारे में पर्याप्त परिचय मिल जाता है। साफ सफाई और व्यवहार व्यवस्थित है अथवा नहीं ये भी मालूम हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">एक शिक्षक एक विद्यार्थी के घर गये तब ज्ञात हुआ कि उसके घर विद्युत कनेक्शन नहीं है। तब विद्यार्थी कैसे पढ़ाई करता होगा? समस्या हल करने हेतु शिक्षक ने पड़ोसी से विनती की, जिस पर पड़ोसी ने उस दसवीं कक्षा के विद्यार्थी के घर एक महीने के लिये अपने घर से विद्युत की व्यवस्था की।</p>
<p style="text-align: justify;">मैं एक बार पर्रा नामक स्थान के एक विद्यार्थी के घर गया। ‘घर’ क्या कहें, एक झोंपड़ी ही थी। घर में अत्यंत गरीबी। पिता स्वर्गवासी, माताजी बीमार, बहन मजदूरी करती थी। चारों ओर से घर की दीवारें घासफूंस से बनी हुई। वह दृश्य मन को अस्वस्थ कर गया। मन में संकल्प किया कि इस विद्यार्थी के लिये बेहतर घर की व्यवस्था करना है। दूसरे ही दिन सहकारी शिक्षकों के साथ बैठ कर योजना बनाई, सर्वमान्य हुई। सामग्री, पैसा आदि की व्यवस्था की और ग्रीष्मावकाश में कुछ शिक्षक और विद्यार्थियों ने स्वयं मेहनत कर उस विद्यार्थी के लिए एक छोटा मकान निर्मित कर दिया। हम सभी को हर्ष हुआ और आत्मविश्वास में दुगुनी वृद्धि अनुभव की।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9136" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/hover_224072008-300x169.jpg" alt="" width="1729" height="974" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/hover_224072008-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/hover_224072008.jpg 480w" sizes="(max-width: 1729px) 100vw, 1729px" /></p>
<p style="text-align: justify;">विद्यार्थी के अध्ययन का स्थान अवश्य परखें। उससे भी उसके अध्ययन के बारे में कुछ कल्पना मिल सकती है। पढ़ाई का समय कौन सा है, कितने समय तक पढ़ाई करता है, अभ्यास की पद्धति कैसी है? पढ़ाई करने के लिये विद्यार्थी को याद दिलानी पड़ती है या वह स्वयं याद रखता है? कौन से विषय में रुचि है? कौन से में नहीं है, आदि बातें सामान्य चर्चा के चलते जान सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">घर में मनोरंजन के साधन कौन से हैं? कितना समय मनोरंजन में बिताता है? किस प्रकार के कार्यक्रम देखे अथवा सुने जाते हैं? घर की दीवारों पर लगे चित्र, फोटो, प्रतिमाएं, कैलेंडर्स भी बहुत कुछ कह देते हैं। परिवारजनों को पढ़ने में रुचि है क्या? कौन से समाचार पत्र, मासिक, पुस्तकें आदि पढ़ते हैं? कभी पुस्तकें खरीदते हैं अथवा नहीं? चर्चा करते समय शिक्षक भी कुछ अच्छी पुस्तकें, मासिक पत्रिकाओं के विषय में सुझाव दे सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चों के स्वास्थ्य के सम्बन्ध में कुछ शिकायतें, समस्याएं हो सकती हैं। इस कारण भी एकाग्रता, पढ़ाई पर विपरीत प्रभाव होता है। कुछ बच्चे बहुत खेलते हैं तो कुछ घर से निकलते ही नहीं। खेल, व्यायाम, शारीरिक कसरत, ये सभी पढ़ाई जितना ही महत्वपूर्ण और आवश्यक है। अनेक पालकगण इससे अनभिज्ञ होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">निरोगी, सुदृढ़ शरीर के साथ निर्मल मन होना भी आवश्यक है। बुद्धि के साथ भावनाएं भी महत्वपूर्ण हैं। घर पर सायंकालीन प्रार्थना, ईशवंदन की पद्धति है क्या? रात्रि भोजन परिवारजन एक साथ करते हैं क्या?</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल कम ही बच्चे घरेलू कार्य में माता-पिता को सहयोग करते दिखते हैं। विशेषकर दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को छोटा सा कार्य करने के लिये भी नहीं कहा जाता। केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करने वाले ये बच्चे परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करते हैं किन्तु व्यवहार ज्ञान में पिछड़ जाते हैं। पालकों की भ्रमपूर्ण कल्पनाएं शिक्षक चतुराई से निराकृत कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">“सोलहवें साल तक स्वावलम्बी शिक्षा और उम्र के सोलहवें वर्ष पश्चात स्वावलंबन के साथ शिक्षा” ऐसा आचार्य विनोबा भावे कहते हैं। यह ‘स्वावलंबन’ घर से ही प्रारंभ होना चाहिये। स्वयं के छोटे-छोटे कार्य विद्यार्थी स्वयं करते हैं क्या? बिस्तर बिछाना, प्रातः उठाकर रखना, कपड़े धोना, इस्त्री करना, अपने भोजन की थाली स्वयं उठाकर रखना आदि छोटी-छोटी बातों में से ही जीवन की तैयारी होती है। यह है जीवन की शिक्षा।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ परिवारों के स्वयं के व्यवसाय होते हैं, खेती इत्यादि होती है, क्या उनके बच्चे उनके कार्य में सहयोग करते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल परिवारों में बच्चों को ‘पॉकेटमनी’ देते हैं। उसको बच्चे विविध प्रकार से उपयोग करते हैं। कभी-कभी उस से भी जटिल समस्याएं निर्मित होती हैं। विभिन्न व्यसनों की लत लगती है। जीवन शैली बिगड़ जाती है। अतः पॉकेटमनी के बारे में, उसके खर्च के बारे में गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘गृहभेंट’ के समय सर्वेक्षण जैसी किसी प्रकार की प्रश्नावली तैयार करना आवश्यक नहीं है। शिक्षक का कौशल गृहभेंट के उद्देश्य को सपफल बनाता है। मन के किसी कोने में ऊपर वर्णित बिन्दु स्थित रहते हैं, उस बारे में अनौपचारिक चर्चा के दौरान उनका स्पर्श कर विद्यार्थी की एक प्रोफाइल तैयार हो सकती है। इस प्रोफाइल की सहायता से शिक्षक को विद्यार्थी को समझने में आसानी होगी। विद्यार्थी को सही प्रकार से समझने पर उसे गणित, भाषा, अंग्रेज़ी आदि पढ़ाने का मार्ग प्रशस्त होगा – “Accurate diagnosis is half the cure” कहते हैं। रोग का, बीमारी का, समस्या का, प्रश्नों का ‘मूल’ समझ में आने पर उसके उपचार में समय और श्रम खर्च नहीं होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ये ‘मूल’ समझने के लिये ही गृहभेंट आवश्यक है। ये सफल हुई तो शिक्षक के समय की और शक्ति की बचत होगी और कार्य करने का संतोष प्राप्त होगा। सभी शिक्षकों को ये संतोष, समाधान, तृप्ति, आनन्द प्राप्त हो यही इच्छा और प्रार्थना।</p>
<p style="text-align: justify;">अब नाराजगी तो दूर हो गई न?</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/teachers-stop-teaching/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षकों, पढ़ाना बंद करो</a></strong></p>
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