कहना क्यों नहीं मानते.….आज के बच्चे

 – सुषमा यदुवंशी

आजकल यह शिकायत आम माता-पिता को है कि हमारे बच्चे कहना नहीं मानते। कभी-कभी उन्हें शिकायत के चलते बहुत चिढ़ होने लगती है। वह दुखी परेशान होते हैं इसकी वजह से कभी कभी उनको हताशा निराशा घेर लेती है। समझ में नहीं आता है क्या करें कैसे समझाएं। बच्चों को जब देखो शैतानी, उठापटक, तोड़फोड़, थोड़ी देर भी चुपचाप एक जगह बैठे नहीं रहते हैं। उन्हें कुछ याद करने को कहो, पाठ तैयार करने के लिए कहो तो नहीं कर पाते हैं। जो हालत घर में है वही हालत स्कूल में भी है।

अभी कोविड-19 तो सभी माता-पिता को समझ आ गया होगा कि एक शिक्षक कैसे कक्षा में 25-30 बच्चों को एक साथ नियंत्रित करके पढ़ाते होंगे। वहीं दूसरी ओर अध्यापक परेशान रहते हैं, घर शिकायत भेजते हैं कि आपका बच्चा पढ़ाते समय एकाग्रता से नहीं सुनता, उल्टे दूसरों की तन्मयता को तोड़ता है, कक्षा में साथियों से खूब लड़ाई करता है, रोज-रोज शिकायतों से माता-पिता की परेशानियां चौगुनी हो जाती है। कभी-कभी शैतानी सीमा इतनी पार हो जाती है कि बीमारी का स्वरूप ले लेती है। जिसे विशेषज्ञों ने अटेंशन डिफिसिट डिसऑर्डर जिसका हिंदी में अनुवाद उपेक्षा-असंतुलन या ऐड का नाम दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यह बीमारी केवल विदेशों के बच्चों में पाई जाती थी।

भारत में इसका प्रतिशत बिल्कुल भी नहीं था। किन्तु अब भारत में भी यह समस्याएं गंभीर रूप धारण कर चुकी हैं। इसका कारण हमारे भारत में सिर्फ यही है कि संयुक्त परिवार अब नहीं रहे। बच्चे ही नहीं माता-पिता दोनों अपने अपने कार्यों में सवेरे से लगे रहते हैं। जो नौकरी पेशा दंपत्ति हैं उन्हें तो और भी फुर्सत नहीं है। वह दूसरों के भरोसे अपने बच्चों को छोड़कर अपने कार्यस्थल पर चले जाते हैं। जिसके कारण बच्चा अकेलापन महसूस करता है। वह जब सवेरे जागने को रहता है तब माता-पिता काम को निकल जाते हैं और रात को जब लौटते हैं तो बच्चा फिर सोता मिलता है। वही धनाढ्य वर्गों में मां पिताजी को व्यवसाय, पार्टी से समय नहीं बचता कि वह समय दे पाए। वर्तमान में तो मध्यम वर्ग में भी यह बीमारी घर कर चुकी है। किटी-पार्टी, मोबाइल और टीवी ने बच्चों का बचपना ही छीन लिया है। उनका अपने माता-पिता, परिवारजनों के साथ संवाद नगण्य है।

सर्वेक्षण के अनुसार करोड़ों बच्चे इस बीमारी की विकृति से ग्रस्त हो चुके हैं क्योंकि कुछ अपने अज्ञान और कुछ अपनी व्यस्तता के कारण ध्यान नहीं दे पाते हैं। इसलिए लाखों बच्चे बड़े होकर असामाजिक हो जाते हैं। जब माता-पिता समाधान की खोज में इधर-उधर भटकते रहते हैं और उचित समाधान ना मिलने पर आपस में लड़ लेते हैं। इस लड़ाई से भी बच्चों की गतिविधियों में गति आ जाती है। माता-पिता की इस असमर्थता उन्हें पहले से अधिक शैतानी करने के लिए उत्सुक करती हैं।

यह कोई काल्पनिक कथन नहीं मनोवैज्ञानिक तथ्य है जिसे विश्व भर के बाल मनोवैज्ञानिकों ने अपने कई प्रयोगों से प्रमाणित किया है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आज की भागती दौड़ती हमारी सामाजिक दिनचर्या ने बच्चों को हमसे दूर कर दिया है। भावनात्मक पोषण, सही देखरेख, सकारात्मक संवाद के अभाव में बच्चे कुछ ज्यादा ही सुनी-अनसुनी करने लगे हैं। उनकी गतिविधियां कुछ ज्यादा ही शैतानियां में शामिल हो गई है।

मनोचिकित्सकों का मानना है कि प्राथमिक तौर पर इसके तीन लक्षण है पहला एकाग्रहीनता, दूसरा अति सक्रियता एवं तीसरा कभी भी काम को करने के लिए मजबूर हो जाना। इन तीन मुख्य लक्षणों के अलावा इस उपेक्षा से उनका मनअसंतुलन बीमारी से ग्रसित हो जाता है। बच्चों में चित्त का बिखराव, मन का अस्थिर हो जाना जिसके कारण कभी-कभी वे गंभीर अपराध भी कर बैठते हैं जैसा कि हम अनेक बार देख चुके हैं कि बच्चों ने गोलियां चला दी, किसी को चाकू मार दिया वगैरह साथ ही अपने को हीन समझना। लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाले कार्य करना, ख्याली पुलाव बनाना, मिलजुल कर ना रहने की प्रवृत्ति, अति कमजोर याददाश्त, धैर्य की कमी दूसरों को परेशान करने वाला व्यवहार एवं चोरी करने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जब परिवार समाज इन बच्चों को संभाल नहीं पाता है और छोड़ देता है तो यह बच्चे अक्सर पढ़ाई करना छोड़ देते हैं। कभी-कभी अवसाद से गंभीर बीमार पड़ जाते हैं। उस समय नियंत्रण करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

हाल ही में शोध अनुसंधान में दो बातें पता चली है कि शुरुआती कारणों में भ्रूण अवस्था या बचपन में संक्रमण के दिमाग को होने वाले मामूली नुकसान से ऐसा हो जाता है। मैं स्वयं इस बात को स्वीकार करती हूं कि करीब 22 वर्षों से शिक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रही हूं और करीब 15 वर्ष पूर्व वर्ष जब मैंने शिशु वाटिका जिसे किंडर गार्डन भी कहा जाता है, खोला, तब के बच्चे और आज के बच्चों में बहुत परिवर्तन आया है।

पहले जब प्ले ग्रुप, नर्सरी के बच्चे आते थे तो वे खिलौने अपने सीने से लगाकर बहुत ही प्रेम से रखते थे कि कहीं वह टूट ना जाए किंतु वर्तमान में बच्चों को जब मैं देखती तो बहुत पीड़ा होती है। यह नन्हें-नन्हें कोमल मन के बच्चे इन खिलौनों को इस तरह से तोड़ते मरोड़ते हैं कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते। एक दिन में सारे खिलौने – किसी का हाथ टूटा है, किसी का पहिया टूटा है, किसी की नाक टूटी है, किसी का मुंह टूटा है। सॉफ्ट टॉयज को तो आप सोच नहीं सकते हो क्या दुर्गति होती होगी।

इस अवस्था को देखकर मुझे यही लगता है कि जब बच्चा मां के गर्भ में पलता है तो आसपास के वातावरण का पूरा का पूरा बच्चा ग्रहण करता है। वैसे भी हमने अभिमन्यु के चक्रव्यू की कहानी तो सुनी ही है और विज्ञान ने भी साबित कर ही दिया है। आज पुंसवन संस्कार एवं गर्भ संस्कार भी आधुनिक माताओं को सिखाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर जब बच्चों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति की जाती है तब यह अटेंशन डिफिसिट डिसऑर्डर जिसका शाब्दिक अर्थ यही है कि देखरेख की कमी से होने वाली व्याधि।

माता-पिता या अभिभावक आजकल बच्चों पर जरूरत से ज्यादा डॉक्टर, इंजीनियर, टॉपर बनने पर मजबूर कर रहे हैं जिससे उनका बचपन भी छिना जा रहा है। आश्चर्य तब होता है जब डेढ़ साल का बच्चा लेकर आते हैं और कहते हैं कि इसका एडमिशन करवाना है तो मुझे मन ही मन बहुत क्षोभ होता है। फिर अभिभावकों को समझा कर यह कहना पड़ता है कि थोड़ा बड़ा हो जाने दीजिए। उसको घर का वातावरण दीजिए, फिर वह उसे हमारे पास लाइए। उसे आपके स्पर्श की जरूरत है। उसे आपके परिवार की आवश्यकता है। उसे स्नेह की आवश्यकता है। वह पूरा कार्य घर में ही सीख जाएगा। उसे बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

जैसा कि हम जानते ही हैं कि बच्चा स्वभाव से ऐसा होता है कि उसे हम जिस कार्य के लिए करने को मना करेंगे वही करता है और वही कार्य करने से वह छोटी छोटी चीजों से सीखता है। उदाहरण – जैसे घर के मंदिर में दिया जल रहा है। हमें पता है कि वह जाएगा, छुएगा तो जल जाएगा, हम उसे मना करते हैं तो वहां जाता ही है, जाने दीजिए, थोड़ा सा चटका लगेगा, उसको अपने आप समझ में आएगा। अगली बार आप कहोगे तो भी वह नहीं जाएगा। अर्थात उसको सही गलत की पहचान भी होगी। लेकिन उसे अपने सामने ही रखना होगा। उसकी अवस्था इस लायक नहीं होती है कि वह अकेले यह सब सीख पाए।

वर्तमान की दूसरी अन्य समस्या टीवी और मोबाइल भी है। माता-पिता को लगता है मेरी एक ही संतान या दो संतान है, इन्हें थोड़ी सी भी चोट नहीं लगना चाहिए। बाहर नहीं खेलने जाने देते। उसका मानसिक विकास तो होता है लेकिन शारीरिक विकास रुक जाता है। घंटो हाथ में रिमोट या वीडियो गेम खेलता बच्चा मानसिक रूप से तो बलवान हो जाता है किंतु शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है। कई बार तो ज्यादा टीवी या मोबाइल या वीडियो गेम खेलने से भी कई गंभीर बीमारियों से बच्चे ग्रसित हो गए हैं। यह भी हमें सोचना होगा।

वहीं दूसरी ओर माता-पिता बच्चों पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगते हैं। उनकी हर जायज नाजायज मांग पूरी करते हैं या उनको इतना ज्यादा अपनी निगरानी में रखते हैं कि बच्चों का स्वतंत्र विकास बाधित हो जाता है। प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक हुए हैं प्रोफेसर हॉस्टन। उनका कहना है कि बच्चों का पालन पोषण करने में एक माली जैसी कुशलता चाहिए। उन्हें इतना अनदेखा भी ना करें कि आवश्यक खाद-पानी भी ना मिल सके और ज्यादा अतिरेक देखरेख भी ना करें कि उन्हें स्वाभाविक रूप से मिलने वाली हवा और प्रकाश भी अवरुद्ध हो जाए।

बच्चे आपकी हर बात ध्यान से सुने और उसका पालन करें एवं शरारत व शैतानी कम करें। इसके लिए माता-पिता को कुछ बिंदुओं को जरूर अपनाना चाहिए। पहला, आप बच्चों के लिए स्वयं रोल मॉडल बने। स्वयं ऐसे कार्य कभी ना करें जिनके लिए आप उन्हें रोकते हैं। दूसरा, बच्चों की हर जायज नाजायज मांग पूरी करने के बजाय धीरे-धीरे उन्हें सही गलत का बोध कराएं। तीसरा, जीवन के सभी व्यवहारिक ज्ञान जैसे दूसरों से व्यवहार, उठने बैठने का तरीका, चलने दौड़ने का तरीका, शिष्टाचार के सामान्य ज्ञान के बारे में उन्हें धीरे- धीरे पर थोड़ा- थोड़ा रोज बताएं, सिखाएं। चौथी बात, छोटी-छोटी बातों पर झड़प के नहीं, वह भी अनजान लोगों के सामने किसी भी कीमत पर अपमानित ना करें। पांचवी बात, अच्छे काम करने के लिए प्रोत्साहित, प्रशंसा भी करें।

उनकी कलात्मक-रचनात्मक प्रतिभा को भी विकसित करने का अवसर दें। उन्हें किताबी कीड़ा बनने से रोके। उन्हें अगर अपनी मातृभाषा या हिंदी में समझता है तो उसे अंग्रेजी का बोझ ना डालें। वह पढ़ने में थोड़ा सा कमजोर है तो पढ़ाई इतनी ही करवाएं जितना वह गृहण कर सके। उसके पसंद का कोर्स करवाएं जिससे वह जितना सीखेगा उतना उसे लाभ होगा। कक्षा में कुछ समझ नहीं आएगा तो कुंठित होगा, वह धीरे-धीरे पीछे होता चला जाएगा। इसलिए उसके मानसिक ग्रहिता के हिसाब से उसे किस माध्यम में पढ़ाना है वह भी सोचे।

चंडीगढ़ के एक मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ का कहना है कि बच्चे आपकी बात माने, इसके लिए जरूरी है कि आप अपने प्रति बच्चों में विश्वास की जगह दें। उन्हें उनके प्रति अपने प्रेम से आश्वस्त करें। अनुभवी चिकत्सकों का कहना है कि शैतानी और शरारत की अति को कोई गंभीर रोग मान कर घबरा जाना तो ठीक नहीं है, पर इसके प्रति लापरवाही करना भी उचित नहीं है।

बच्चों की शैतानी व शरारत में उपयोग होने वाली ऊर्जा को यदि रचनात्मक गतिविधियों में बदला जा सके तो उनकी प्रतिभा में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी हो सकती है। बस इसके लिए इतना भर जरूरी है कि बच्चों के प्रति उनकी सही देखरेख के प्रति हमेशा जागरूक रहें और उनकी जीवन शक्ति को रचनात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करें। लगातार धैर्य पूर्वक प्यार और सद्भाव से ऐसा करने पर बच्चे शरारत छोड़कर हमारी हर शिकायत को दूर कर सृजन प्रयोजन में लगने लगेंगे। उन्हें यह भी समझ आएगा कि हम सही कर रहे हैं या गलत। यह निर्णय क्षमता लेने में उन्हें बहुत मदद मिलेगी।

बच्चों को आपसे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, आपका थोड़ा स्नेह, आपका थोड़ा सा समय, आपका थोड़ा सा सानिध्य, दादी नानी का सानिध्य जिससे उनके किस्से कहानियों को सुनकर आत्मसात कर वे स्वयं परिवार, समाज, राष्ट्र  के एक जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।

(लेखिका शिक्षाविद् और समाजसेविका है।)

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