भरत सरिस को राम सनेही – 1


 – डॉ० हिम्मत सिंह सिन्हा

रामायण के सभी पात्रों में भगवान राम के स्नेह के सबसे श्रेष्ठ पात्र भाजन भरत हैं। भरत का सारा चरित्र भाई शब्द की समुचित व्याख्या है तथा उनका व्यक्तित्व भ्रातृत्व प्रेम की पराकाष्ठा है। वह त्याग, समर्पण और प्रेम की साक्षात् मूर्ति है। महाकवि तुलसी ने हमारे समक्ष भ्रातृ-प्रेम का एक ऐसा आदर्श उपस्थित किया जिसमें उन्होंने अपनी लेखनी से श्री भरत जी का भाई के प्रति दिव्य प्रेमादर्श व्यक्त हुआ है। राम जहाँ जाते है, जिसको मिलते हैं, वहां उसकी भरत से ही तुलना करते हैं। जब सुग्रीव से भेंट हुई और उसको राज्यसीन कर दिया तो सुग्रीव अपना वचन भूल गए। राम ने उसको भय दिखाकर बुलाया तो वह चरणों में गिरकर विनती करने लगा उन्होंने सुग्रीव से चारों दिशाओं में वानर समुदाय भेजकर जनकनन्दिनी की खोज की याद दिलाई। राम ने मुस्करा कर कहा, “तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमी भाई” (किष्किन्धा 20.4)। भरत का नाम सुनते ही सुग्रीव को विश्वास हो गया कि यह मैत्री अटल है।  हनुमान जी को भी राम की अनन्य भक्ति प्रदान करने हेतु उनकी तुलना भरत से ही की –

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई । ।  (हनुमान चलीसा)

विभीषण-शरणागति के समय राम सुग्रीव से कहते हैं – “भरत जैसा भाई एवं तुम जैसे मित्र कहीं भी नहीं।”

भरत सत्यनिष्ठा, बन्धुप्रीति, पितृ-मातृ भक्ति आदि सबका एकीकरण होकर मूर्तमान रूप थे। इसी कारण राम ने ह्रदय वात्सल्य से पुलकित होकर, “न, सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमा:” कहा अर्थात् भरत जैसा भाई जिसकी कोई उपमा ही नहीं है, कभी न हुआ है, न होगा।

बाल्यावस्था से ही भरत राम के प्रति आस्थावान तथा समर्पित रहे। एक समय लोक लोचन सुखदाता भगवान श्री राघवेन्द्र ने भ्राताओं तथा सखा परिकर के साथ सरयू के समुज्ज्वल तट पर कन्दुक क्रीडा का संकल्प किया। खेल में दो दलों का होना स्वभाविक ही था।  एक दल का नेतृत्व कर रहे थे स्वंय राघव। दुसरे दल का नेतृत्व किसे सौंपा जाये, यह एक समस्या थी। श्री लक्ष्मण जी उतावले हो रहे थे। वे स्वंय ही श्री राघवेन्द्र के निकट जाकर खड़े हो गये। किन्तु श्री भरत जी प्रभु के चरणकमलों की ओर दृष्टि किये शांत खड़े थे। श्री लक्ष्मण जी का प्रेम तो स्पष्ट था किन्तु श्री भरत जी स्वभाव से बड़े ही संकोची और गंभीर थे। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य तो राम-पद प्रेम ही था। वे क्रीडा-स्थल पर खड़े-खड़े मानो यही सोच रहे थे कि मैं तो प्रभु की क्रीडा का एक उपकरण मात्र हूँ। वे चाहे जैसा उपयोग करें, मुझे इससे क्या? और तब हम देखते हैं कि वह प्रतिद्वंदी दल का नेतृत्व करने को तत्पर हो गए।

राम-लखन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये ।

सरजुतीर सम सुखद भूमि-थल, गनि-गनि गोइयाँ बाँटि लये । । (गीतावली-45)

चारों भाई गेंद के खेल में रीझ गए। एक ओर से राम ने गेन्द फेंकी, वह भरत के पाले में चली गई। भरत ने और जोर से उसमें ठोकर मारी गेन्द पाले के बाहर चली गई। लक्ष्मण रोष में आकर कहने लगे, भैया क्या शक्ति-परिक्षण कर रहे हो। भरत ने बडे विनम्र भाव से कहा कि भैया राम से शक्ति-परिक्षण की बात तो भरत स्वप्न में भी नहीं सोच सकता। मैंने तो इसलिए इसको जोर से फेंका कि जिसको राम ने ठुकरा दिया, फेंक दिया, भरत तो उसको और जोर से ठुकरा देगा। लक्ष्मण भैया यह मेरा जीवन भर का बिरुद है। भरत के इस प्रण को सुनकर राम ने दोबारा गेंद भरत के पाले में नहीं फेंकी, ऐसे ही निस्तब्ध खड़े रह गए। आकाश में जो देवता खेल देख रहे थे, वे कहने लगे राम हार गए।  भरत जीत गए –

एक कहत भई हार राम जू की, एक कहत भइया भरते जये ।

हारे हरष होत हिय भरतहि, जिते सकुच सिर नयन नये ।।

भरत जी को खेल में हार जाने पर तो हर्ष होता है और जीतने पर संकोचवश उनके सर और नयन नीचे हो जाते हैं। अत: भगवान राम बार-बार उन्हीं को जीता देते हैं। खेल बड़ा ही आनन्दवर्धक रहा। और हुआ वही जो सदा से होता आया है। भक्त विजयी और भगवान पराजित। भैया भरत के जयकार से सरयूतट मुखरित हो उठा। सरयू का कल-कल निनाद भी मानो भरत की जय का ही उच्चारण कर रहा था। प्रभु की महती कृपा और स्नेह को देखकर श्री भरत जी तो लज्जित हो रहे थे, साथ ही प्रसन्न भी। यह उनके अगाध स्नेह का परिचायक है।  तुलसीदास जी बताते हैं –

भरत सरिस को राम सनेही, जगु जप राम राम जप जेही।

राम विवाह का समचार सुनकर जितने हर्ष मग्न भरत जी हुए, उतना शायद कोई और हुआ होगा। उन्होंने सारी माताओं को मिथिला में धनुष भंग करने तथा जानकी के स्वंयवर का समाचार सुनाया। सर्वत्र हर्ष फैल गया। राजमहल में सभी माताएँ चिंता ग्रस्त थीं। सुमित्रा कह रही थीं –

जबतें लै मुनि संग सिधाए, राम लखन के समाचार, सखि तब तें कछुअ न पाएँ ।

वह सोच मग्न है कि वन में बिना जूतियों के चलना पड़ रहा होगा, भूमि पर सोना पड़ेगा आदि।  हमारे बालक भी बड़े ही सुकुमार और संकोची हैं। ऐसी बातों को सोच-सोच कर वे दुःखी हो रही थीं तभी –

“तुलसी आइ भरत तेहि, औसर कही सुमंगल बानी ।। ”

अपने भाई के साथ पिताजी से सारे समाचार सुनकर प्रसन्नता मग्न माता के पास आए। खुशी से तन पुलकित हो रहा है। कौशल्या ने दौड़ कर गले लगाया और पूछने लगीं क्या समाचार है –

सानुज भरत भवन उठि धाए, कौसल्या लिये लाइ ह्रदय, बलि कहौ, कुछ है सुधि पाई । (गीतावली-102)

भरत ने कहा कि माता तिरहुत राज जनक जी ने अपने पुरोहित सतानन्द को मंगल पाती लेकर भेजा है –

जनक पाति लिखि भेजिए जी, राजा दसरथ जी के पास

हमरे घर सिया कुंवारी है और तुम्हरे घर श्री राम

आज सिया को मंगल हो, गाओ गाओ री मन चित लाए ।।

सतानन्द उपरोहित अपने तिरहुत नाथ पठाए

खेम कुशल रघुबीर लखन की ललित पत्रिका ल्याए ।

यों कहि सिथिल स्नेह बन्धु दोउ अंव अंक भर लीन्हे ।

यद्यपि राम ने धनुष भंग कर मुझे कृत कृत्य कर दिया है परन्तु जब तक कन्यादान, पाणिग्रहण तथा सप्त पदी सम्पन्न न हो तब तक सीता की संज्ञा कौमारिका की ही रहेगी। इसलिए शीघ्र बारात लेकर जनकपुर पधारें और सीता को पुत्रवधू रूप में स्वीकार करें राजा दशरथ ने बारात सजाई तो बारात के वाहन सजाने का कार्य श्री भरत जी को ही सौंपा गया।  “भरत सकल साहनी बुलाए” और बारात की अगवानी भी करने लगे। बारात जनकपुर पहुंच गयी। लम्बे समय के वियोग के पश्चात् भरत का अपने पूज्य भ्राता से मिलन हुआ।  दोनों आनन्द मग्न हो गए। भरत भरत जी की तीव्र इच्छा थी कि एक बार भैया राम के मुखचन्द्र का दर्शन कर लूँ परन्तु नेत्र तो भ्रातृ प्रेम, विनम्रता और सौशील्य के मारे से झुके हुए थे और मुख की ओर उठ नहीं पाते थे। एकटक राम के चरण कमल पर ही दृष्टि गड़ाए खड़े रह गए। विवाह सम्पन्न हुआ और मुदित मन सब अयोध्या लौट आए।

(लेखक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से प्रोफेसर सेवानिवृत है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान कुरुक्षेत्र में शोध निदेशक है।)

और पढ़ें : भरत सरिस को राम सनेही – 2

 

 

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