कब आयेंगे शिक्षा के अच्छे दिन?


 – अवनीश भटनागर

प्रख्यात रूसी साहित्यकार लियो टॉल्सटॉय (1828-1910) ने लिखा है, “शिक्षाशास्त्र बहुत कुछ आधुनिक चिकित्साशास्त्र जैसा है, जो हमें बताता है कि प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करते हुए भी स्वस्थ कैसे रहा जा सकता है। ऐसे ही शिक्षाशास्त्र इसका विज्ञान है कि स्वयं भ्रष्ट जीवन बिताते हुए, बच्चों पर अच्छा प्रभाव कैसे डाला जाये? आज के समय दोनों ही ऐसे कपटपूर्ण और खोखले विज्ञान हैं, जो अपना उद्देश्य कभी नही प्राप्त करते।”

शिक्षकों-शिक्षाविदों-अधिकारियों-नीतिनिर्माताओं और अभिभावकों के लिए एक बात विचारणीय है। जिस बच्चे को हम घर में, सड़क पर, पार्क में मस्ती व कुतूहल से भरपूर, आँखों में और होठों पर मुस्कान लिए, हरेक वस्तु में कुछ न कुछ खोजने-सीखने का प्रयास करते पाते हैं, वही बच्चा स्कूल में थका-ऊबा हुआ, भयभीत, दब्बू और दयनीय क्यों दिखाई देता है? सिखने के लिए बच्चों में सर्वाधिक क्षमताएँ होनी चाहियें – सूझ-बूझ, उत्सुकता, कल्पनाशीलता और सृजनात्मक की, किन्तु यही क्षमताएँ क्यों स्कूल के वातावरण में कल्पना और समझ से परे केवल शब्दों-वाक्यों और कुछ घिसी-पिटी बातों को रटने तक सीमित हो जाती हैं?

कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बाल्यावस्था में ही विद्यालय जाना बन्द कर दिया था क्योंकि उन्हें विद्यालय-पढ़ाई-शिक्षकों में आकर्षण नहीं अनुभव होता था। वही अनुभूति बड़ा होने पर उनसे लिखवाती है, “the school should talk and the walls should sing.” विद्यालय की सफलता का मापदण्ड भौतिक संसाधन, व्यवस्थाएँ, अनुशासन, परीक्षा परिणाम से भी अधिक ‘छात्र का उसके प्रति आकर्षण’ नहीं होना चाहिए क्या? कैसे बन सकते हैं विद्यालय ऐसे आकर्षणयुक्त? साज सज्जा से? अच्छा बगीचा? सेन्ट्रली एयरकण्डीशन्ड होने से? खेल का मैदान? कौन सा कारण सर्वाधिक प्रमुख है? विद्यालय किनके लिए? सहज उत्तर है छात्रों के लिए। किन्तु विद्यालय के सम्बन्ध में योजना बनाते समय छात्रों की रुचि, क्षमता आदि का ध्यान कितना रखा जाता है? फिर वे क्यों और कैसे अनुभव करें ऐसा आकर्षण कि छुट्टी के दिन भी विद्यालय आना चाहें?

विद्यालय में छात्रों के सर्वाधिक निकट रहने वाले, उन्हें शिक्षा देने वाले, छात्रों के व्यक्तित्व को अपने स्पर्श से समुचित दिशा देने वाले, शिक्षक हैं। कैसी होनी चाहिए उनकी मानसिक तैयारी ? दुर्योग से, कैरियर के रूप में शिक्षक बनना आज के युवा वर्ग की प्राथमिकता सूची में शायद सबसे नीचे है। अन्य जॉब्स खोज कर असफल हुए, थके हुए तन और हारे हुए मन से शिक्षक की ‘नौकरी’ स्वीकार करने वाले शिक्षकों से किसका भला होने वाला है – शिक्षा का, छात्र का, विद्यालय का, या स्वयं शिक्षक का? गुरु का ‘गौरव’ तो ‘गुरुत्व’ के गुणों से प्राप्त होगा न? उसकी कितनी तैयारी है आज शिक्षकों में? इस आलेख का शीर्षक थोड़ा ‘पिंचिग’ है, किन्तु इसी बात की ओर संकेत करता है।

सर्वाधिक महत्त्व का प्रश्न है कि हम इस देश को किस प्रकार की अगली पीढ़ी देने जा रहे हैं? पाठ्यक्रम, पढ़ाई, गृहकार्य, कोचिंग-ट्यूशन, तोता-रटन्त के भरोसे परीक्षा-प्रति-परीक्षा को पास कर अंक सूची-डिग्री लेकर जॉब मार्केट की लाइन में लगने वाली? अच्छा जॉब यानि भारी पे-पैकेज और विदेश में जाकर बस जाने को जीवन की सफलता मानने वाली? ‘मेरी सुख-सुविधा पूरी होनी चाहिए, बाकी परिवार-समाज-देश से मुझे क्या’ का विचार रखने वाली? एक ओर माता-पिता-परिवार की अपेक्षाएँ, मित्रों-सहपाठियों से आगे निकलने मात्र की स्पर्धा और उसमें सफल न हो पाने पर कुण्ठा के मानस से ग्रस्त? अपनी निजता-स्वार्थ में मग्न, आत्मकेन्द्रित, सुकुमार, जीवन की चुनौतियों का सामना करने में विफल होकर जीवन समाप्त करने जैसा कदम उठाने वाली?

प्रश्न यह भी है कि कौन सोचे? इन प्रश्नों में रुचि? किसके पास है इतनी फुरसत? ये प्रश्न किसके लिए प्राथमिकता का विषय हैं? सामान्यतः लोकतंत्र के इस वातावरण में सबका उत्तर है – सरकार ठीक करे इस स्थिति को। संसद का काम है नीति बनाना। अभी तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति की चर्चा भी चल रही है तो अच्छा समय है – सरकार जो चाहे नीति ला सकती है।

डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी ‘राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन का इतिहास’ की प्रस्तावना में एक प्रश्न उठाते हैं – “क्या बेहतर होगा – सरकार शिक्षा को बदले या शिक्षा क्षेत्र के लोग सरकार में बैठे हुए नीति-निर्माताओं की सोच को बदले?”

शिक्षा में सुधार होना चाहिए, बदलाव आना चाहिए, शिक्षा रोजगारपरक होनी चाहिए, शिक्षा जीवन-मूल्य सिखाने वाली होनी चाहिए, शिक्षा राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सक्षम होनी चाहिए – ये सब ‘अच्छी-अच्छी’ बाते कहते तो सब है, किन्तु करेगा कौन? कब? कैसे? – इसका उत्तर यदि किसी के पास है तो वह है ‘शिक्षक बदलेगा तो शिक्षा बदलेगी।’ एक नहीं हजारों उदाहरण मिल जाते हैं अपने देश में जहाँ किसी एक ‘शिक्षक’ ने अपने विद्यालय को आधार बनाकर पूरे समाज के लिए प्रतिमान खड़ा कर दिया।

कहा गया है, “किसी देश का 25 वर्ष बाद परिदृश्य कैसा होगा, यह उस देश की शिक्षा तय करती है। जैसी शिक्षा, वैसा देश। जैसा शिक्षक, वैसी शिक्षा।” क्या हम शिक्षक, शिक्षा के भी अच्छे दिन लाने का वादा इस देश, समाज और स्वयं से कर सकते हैं?

(लेखक शिक्षाविद है और विभिन्न विषयों के जानकार है।)

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