क्या है सीखने में अक्षमता (Learning Disability) और इसका विद्यार्थी पर क्या पड़ता है प्रभाव


 – विपिन राठी

पिछले कई दशकों में सीखने में अक्षमता” (Learning Disability) विषय पर काफी अध्ययन किया गया है लेकिन सामान्य जन में इस विषय को लेकर अभी और जानकारी व जागरुकता की आवश्यकता है। भारत में 13-14% बच्चे किसी न किसी प्रकार की सीखने की अक्षमता से ग्रस्त होते हैं। जिनमें मुख्यतः तीन अक्षमता ज्यादा पायी जाती है।

  1. डिस्लेक्सिया : डिस्लेक्सिया एक तंत्रिका तंत्र से संबन्धित समस्या है, यह एक बौद्धिक विकलांगता नहीं है। यह लिखित भाषा को पढ़ने और समझने की क्षमता को प्रभावित करती है और सभी बुद्धिमत्ता के लोगों में हो सकती है। यह समस्या मस्तिष्क में भाषा से सम्बन्धित हिस्से से जुड़ी है। इसका बच्चे की बौद्धिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। भारत में 2-18 प्रतिशत बच्चे इस सीखने की अक्षमता से प्रभावित हैं।
  2. डिस्कैलकुलिया : यह सीखने से जुड़ी एक विशिष्ट समस्या है। यह डिस्लेक्सिया का गणितीय प्रतिरूप है। यह भी मस्तिष्क से सम्बन्धित है। इससे प्रभावित बच्चे अंको के जोड़, घटाव, गुणा आदि को समझने में अक्षम होते हैं। समय-सारणी, पहाड़े, गणित की शब्दावली एवं प्रश्नों की भाषा, बहुपदीय समस्याओं को हल नहीं कर पाते। इसका बच्चे की बौद्धिकता से कोई संबन्ध नहीं है।
  3. डिसग्राफिया : सुसंगत रूप से न लिख पाने की अक्षमता है। यह भी न्यूरॉन्स से सम्बन्धित है। इससे ग्रसित बच्चा शब्द, वाक्य, पैराग्राफ लिखने में कठिनाई महसूस करता है। जिन बच्चों में डिसग्राफिया पाया जाता है उनकी लेखन प्रक्रिया कठिन और धीमी होती है। इस समस्या को पहचानना कठिन है।

सिखने की अक्षमता (Learning Disability) किस कारण से होती है, इसका कोई सीधा कारण अभी तक खोजा नहीं जा सका है लेकिन गर्भावस्था में सही पोषण नहीं मिलना, गर्भावस्था के दौरान माँ के द्वारा शराब, धूम्रपान या किसी भी प्रकार का नशा पैदा होने वाले शिशु में न्यूरोलोजिकल समस्या पैदा करता है। सिखने की अक्षमता (Learning Disability) की पहचान होना बच्चे के जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण है। सामान्यतः पहचान नहीं होने पर बच्चे के भविष्य एवं रोजगार के अवसर पर प्रभाव पड़ता है। किसी भी तरह की सीखने की अक्षमता बच्चों के आत्म सम्मान और आत्मविश्वास को कम करती है। जिससे तनाव, चिन्ता और दब्बूपन उत्पन्न होता है। अभिभावकों व अध्यापकों को इस विषय में जागरुक होना चाहिए।

अभिभावक व अध्यापक अगर जागरुक नहीं हैं तो बच्चा बड़े तनाव से घिर जाता है। अभिभावक समझते हैं कि पढ़ाई मुश्किल होने के कारण बच्चा सीख नहीं पा रहा। बच्चा घंटों पढ़ता रहता है, ट्यूशन भी पढ़ता है, विद्यालय में भी पूरा प्रयास करता है फिर भी परीक्षा परिणाम अपेक्षा से कम रहता है क्योंकि बच्चे की कठिनाई कोई नहीं समझ पाता है।

अभिभावकों एवं शिक्षकों को ‘सीखने में कठिनाई‘सीखने में अक्षमता का अन्तर स्पष्ट नहीं होना समस्या को बढ़ा देता है।

बच्चे को गणित, विज्ञान या जिस विषय में उसकी अक्षमता है उसकी जगह कोई दूसरा विषय जैसे – संगीत, खेल-कूद, चित्रकला आदि दिया जा सकता है। लेकिन माता-पिता यह स्वीकार नहीं कर पाते तथा बच्चे पर और अधिक दबाव बढ़ाते रहते हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ दिल्ली का एक आंकड़ा कहता है लगभग 35% बच्चे कक्षा 10 से पहले ही सीखने में अक्षमता के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं। सीखने में अक्षमता वाले 60% से अधिक बच्चों को कोई सहायता भी नहीं मिल पाती। शिक्षकों को प्रशिक्षण, विशेष शिक्षण सामग्री, बच्चे की व्यक्तिगत समस्या को ध्यान में रखकर योजना का अभाव जैसी अनेक चुनौतियां हमारे सामने हैं। जिसका नुकसान इन बच्चों की कम उत्पादकता के रूप में सामने आता है।

अधिकतम कक्षा 5 तक बच्चे की अधिकतम समस्याओं की पहचान हो जानी चाहिए व उसकी रेमेडियल कक्षाएं शुरू हो जानी चाहिए। ऐसे बच्चों को सिखाने में अधिक समय लगाना पड़ता है।

लर्निंग डिसएबिलिटी को पहचानने हेतु NIMHAS Battery-SLD  और WRAT Tools आदि उपलब्ध हैं। विद्यालय में या कई विद्यालयों हेतु एक मनोचिकित्सक या काउन्सलर नियुक्त करना चाहिए।

क्योंकि यह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है अतः वह क्रियाएं करवाना जिनका सीधा प्रभाव मस्तिष्क/न्यूरान्स पर पड़ता है। इससे समस्या के प्रभाव को कम किया जा सकता है। मुख्य रूप से भारतीय संगीत, योग एवं योग में प्राणायाम व ध्यान का लगातार अभ्यास अच्छे परिणाम प्रदान कर सकता है। अलबर्ट आइन्सटीन प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक, प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट वॉल्ट डिज्नी तथा प्रतिष्ठित रहस्य और थिलर लेखक अगाथा क्रिस्टी ये सब भी सीखने की अक्षमता से ग्रसित थे पर इनकी सफलता में ये समस्या आडे़ नहीं आयी।

विद्यालय में प्रधानाचार्य एवं शिक्षक, अभिभावकों व विशेषज्ञों के सहयोग से बच्चों की Learning Disability की पहचान करें। ऐसे बच्चों को प्यार से साथ लेकर ध्यान, संगीत, योग, नृत्य, चित्रकला आदि अनेक गतिविधियों के द्वारा सिखाने का प्रयास करें। ध्यान एवं योग में भी विशेष रूप से विभिन्न प्राणायाम लगातार अभ्यास करने पर परिणामकारी हो सकते हैं।

प्रत्येक बालक-बालिका आवश्यक रूप से कोई न कोई गुण व विशेष योग्यता अवश्य रखते हैं। उस पर कार्य कर उनको भविष्य निर्माण हेतु उनकी विशेष रुचि के क्षेत्र में अग्रसर होने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। समाज में अनेक ऐसे खिलाड़ी, राजनेता, व्यवसायी, संगीतकार, गीतकार व अनेक नये-नये क्षेत्रों में कार्य करने वाले कामयाब लोग हैं जिन्हें लिखने-पढ़ने, गणित या सीखने में कठिनाई रही होगी। वर्तमान समय में ऐसे अनेक विकल्प हैं जिनमें सिर्फ क्रियात्मक, सहयोगी भाव होना ही आवश्यक है। किताबी ज्ञान या पेन-पेपर टेस्ट से हटकर भी दुनिया है।

जिन विद्यार्थियों को किसी भी प्रकार की सीखने में अक्षमता हो उनके अभिभावक उनको वही विषय पढ़ने का व अधिकतम अंक लाने का दबाव न बनाएं बल्कि बालक की विशेष अभिरुचि पहचानकर उस पर कार्य करें। किसी भी प्रकार की सीखने की अक्षमता का अर्थ बौद्धिक अक्षमता नहीं है। बालक एक क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्र में बुद्धिमान हो सकता है।

21वीं सदी का विद्यार्थी रचनात्मक (Creative), महत्वपूर्ण चिन्तक (Critical Thinker), अपनी बात कहने एवं मिल कर कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। यह चारों गुण क्रिया, अनुभव एवं भाव आधारित शिक्षण विधियों द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं।

(लेखक सरस्वती विद्या मंदिर, नेहरु नगर गाज़ियाबाद में प्रधानाचार्य है।)

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