वर्ष प्रतिपदा और भारतीय काल गणना विज्ञान – भारतीय नव वर्ष विशेष


 – रवि कुमार

भारतीय चिंतन विश्व कल्याण के लिए है और विज्ञान आधारित है। भारतीय त्यौहार, परम्पराएं, विशेष अवसर मानव कल्याण की वैज्ञानिक दृष्टि लिए हुए है। वर्ष प्रतिपदा अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। भारत में विक्रमी संवत पंचांग अधिक प्रचलन में है। उसी के अनुसार वर्ष प्रतिपदा है। भारत के जितने भी पंचांग है चाहे सृष्टि संवत हो या युगादि सभी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होते है। यह गणना पूर्णतः वैज्ञानिक है। इस आलेख में हम भारतीय काल गणना विज्ञान के बारे में जानेंगे।

ज्योतिष में प्रयुक्त काल (समय) के विभिन्न प्रकार :

प्राण (असुकाल) – स्वस्थ मनुष्य सुखासन में बैठकर जितनी देर में श्वास लेता व छोड़ता है, उसे प्राण कहते हैं।

6 प्राण = 1 पल (1 विनाड़ी)
60 पल = 1 घडी (1 नाडी)
60 घडी = 1 नक्षत्र अहोरात्र (1 दिन रात)
अतः 1 दिन रात = 60 × 60 × 6 प्राण = 21600 प्राण
इसे यदि आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो
1 दिन रात = 24 घंटे = 24 × 60 × 60 = 86400 सेकण्ड्स
अतः 1 प्राण = 86400/21600 = 4 सेकण्ड्स

अतः  एक स्वस्थ मनुष्य को सुखासन  में बैठकर श्वास लेने और छोड़ने में 4 सेकण्ड्स लगते हैं।

प्राचीन काल में पल का प्रयोग तोलने की इकाई के रूप में भी किया जाता था। 1 पल = 4 तौला (जिस समय में एक विशेष प्रकार के छिद्र द्वारा घटिका यंत्र में चार तौले जल चढ़ता है उसे पल कहते हैं।)

जितने समय में मनुष्य की पलक गिरती है उसे निमेष कहते हैं।

18 निमेष = 1 काष्ठा
30 काष्ठा = 1 कला = 60 विकला
30 कला = 1 घटिका
2 घटिका = 60 कला = 1 मुहूर्त
30 मुहूर्त = 1 दिन
इस प्रकार १ नक्षत्र दिन = 30 × 2 × 30 × 30 × 18 = 972000 निमेष

उपरोक्त गणना सूर्य सिद्धांत से ली गयी है किन्तु स्कन्द पुराण में इसकी संरचना कुछ भिन्न मिलती है। स्कन्द पुराण के अनुसार –

15 निमेष = 1 काष्ठा
30 काष्ठा = 1 कला
30 कला = 1 मुहूर्त
30 मुहूर्त = 1 दिन रात

1 दिन रात = 30 × 30 × 30 × 15 = 40500 निमेष

यहाँ हम सूर्य सिद्धांत को ज्यादा प्रमाणित मानते हैं क्योंकि वो विशुद्ध ज्योतिष ग्रन्थ है और उसकी गणना भी ज्योतिषी द्वारा ही की गयी है।

1 दिन = 21600 प्राण = 86400 सेकण्ड्स = 972000 निमेष
1 प्राण = 972000/21600 = 45 निमेष
1 सेकंड = 972000/86400 = 11.25 निमेष

सौर मास, चन्द्र मास, नाक्षत्रमास और सावन मास – ये ही मास के चार भेद हैं। सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय ही सौरमास है। (सूर्य मंडल का केंद्र जिस समय एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उस समय दूसरी राशि की संक्रांति होती है। एक संक्रांति से दूसरी संक्राति के समय को सौर मास कहते हैं। १२ राशियों के हिसाब से 12 ही सौर मास होते हैं।) यह मास प्रायः तीस-एकतीस दिन का होता है । कभी कभी उनतीस और बत्तीस दिन का भी होता है।

चन्द्रमा की ह्र्वास वृद्धि वाले दो पक्षों का जो एक मास होता है, वही चन्द्र मास है। यह दो प्रकार का होता है – शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला ‘जमांत’ मास मुख्य चंद्रमास है । कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है । यह तिथि की ह्र्वास वृद्धि के अनुसार 29, 28, 27 एवं 30 दिनों का भी हो जाता है ।

सूर्य जब पृथ्वी के पास होता है (जनवरी के प्रारंभ में) तब उसकी कोणीय गति तीव्र होती है और जब पृथ्वी से दूर होता है (जुलाई के आरम्भ में) तब इसकी कोणीय गति मंद होती है। जब कोणीय गति तीव्र होती है तब वह एक राशि शीघ्र पार कर लेता है और सौर मास छोटा होता है, इसके विपरीत जब कोणीय गति मंद होती है तब सौर मास बड़ा होता है।

सौर मास का औसत मान = 30.44 औसत सौर दिन

तिथि – चन्द्रमा आकाश में चक्कर लगाता हुआ जिस समय सूर्य के बहुत पास पहुँच जाता है उस समय अमावस्या होती है। (जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बिलकुल मध्य में स्थित होता है तब वह सूर्य के निकटतम होता है।) अमावस्या के बाद चंद्रमा सूर्य से आगे पूर्व की ओर बढ़ता जाता है और जब 120 कला आगे हो जाता है तब पहली तिथि (प्रथमा) बीतती है। 120 से 240 कला का जब अंतर रहता है तब दूज रहती है। 240 से 260 तक जब चंद्रमा सूर्य से आगे रहता है तब तीज रहती है। इसी प्रकार जब अंतर 168˚-180˚ तक होता है तब पूर्णिमा होती है, 180˚-192˚ तक जब चंद्रमा आगे रहता है तब 16वीं तिथि (प्रतिपदा) होती है। 192˚- 204˚ तक दूज होती है इत्यादि। पूर्णिमा के बाद चंद्रमा सूर्यास्त से प्रतिदिन कोई 2 घडी (48 मिनट) पीछे निकालता है |

चन्द्र मासों के नाम इस प्रकार हैं – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष या मृगशिरा, पौष, माघ और फाल्गुन।

देवताओं का एक दिन – 

देवताओं का 1 दिन (दिव्य दिन) = 1 सौर वर्ष

दिव्य वर्ष – जैसे 360 सावन दिनों से एक सावन वर्ष की कल्पना की गयी है उसी प्रकार 360 दिव्य दिन का एक दिव्य वर्ष माना गया है। यानी 360 सौर वर्षों का देवताओं का एक वर्ष हुआ।

1200 दिव्य वर्ष = 1 चतुर्युग = 1200 × 360 = 432000 सौर वर्ष

चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। चतुर्युग के दसवें भाग का चार गुना सतयुग (40%), तीन गुना (30%) त्रेतायुग, दोगुना (20%) द्वापर युग और एक गुना (10%) कलियुग होता है |

अर्थात् 1 चतुर्युग (महायुग) = 4320000 सौर वर्ष

1 कलियुग = 432000 सौर वर्ष

1 द्वापर युग = 864600 सौर वर्ष

1 त्रेता युग = 1296000 सौर वर्ष

1 सतयुग = 1728000 सौर वर्ष

जैसे एक अहोरात्र में प्रातः और सांय दो संध्या होती हैं उसी प्रकार प्रत्येक युग के आदि में जो संध्या होती है उसे आदि संध्या और अंत में जो संध्या आती है उसे संध्यांश कहते हैं। प्रत्येक युग की दोनों संध्याएँ उसके छठे भाग के बराबर होती हैं इसलिए एक संध्या (संधिकाल) बारहवें भाग के सामान हुई। इसका तात्पर्य यह हुआ कि –

कलियुग की आदि व अंत संध्या =  3600 सौर वर्ष

द्वापर की आदि व अंत संध्या =  72000 सौर वर्ष

त्रेता युग की आदि व अंत संध्या = 108000 सौर वर्ष

सतयुग की आदि व अंत संध्या = 144000 सौर वर्ष

72 चतुर्युगों का एक मन्वंतर होता है, जिसके अंत में सतयुग के समान संध्या होती है। इसी संध्या में जलप्लव् होता है। संधि सहित 14 मन्वन्तरों का एक कल्प होता है, जिसके आदि में भी सतयुग के समान एक संध्या होती है, इसलिए एक कल्प में 14 मन्वंतर और 15 सतयुग के सामान संध्या हुई।

अर्थात् 1 चतुर्युग में 2 संध्या

1 मन्वंतर = 71 × 432000 = 30672000 सौर वर्ष

मन्वंतर के अंत की संध्या = सतयुग की अवधि = 1728000 सौर वर्ष

= 14 × 71 चतुर्युग + 15 सतयुग

= 994 चतुर्युग + (15 × 4)/10 चतुर्युग (चतुर्युग का 40%)

= 1000 चतुर्युग = 1000 × 12000 = 12000000 दिव्य वर्ष

= 1000 × 4320000 = 4320000000 सौर वर्ष

ऐसा मनुस्मृति में भी मिलता है किन्तु आर्यभट्ट की रचना आर्यभटीय के अनुसार

1 कल्प = 14 मनु (मन्वंतर)

1 मनु = 72 चतुर्युग

14 × 72 = 1008 चतुर्युग = 1 कल्प

जबकि सूर्य सिद्धांत से 1000 चतुर्युग = 1 कल्प

जो कि ब्रह्मा के 1 दिन के बराबर है। इतने ही समय की ब्रह्मा की एक रात भी होती है। एक ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष है। जितने में एक ब्रह्मा की आयु पूर्ण होती है, उतने में भगवान विष्णु का एक निमेष (पालक झपकने का समय) होता है। विष्णु के आगे भगवान शिव का काल है जोकि अनंत है।

इस समय ब्रह्मा की आधी आयु अर्थात् 50 वर्ष बीत चुके है, शेष आधी आयु का यह पहला कल्प है। इस कल्प के संध्या सहित 6 मनु बीत गए हैं और सातवें मनु वैवस्वत के 27 महायुग बीत गए हैं तथा अट्ठाईसवें महायुग का भी सतयुग बीत चुका है।

इस समय कलियुग के 5054 वर्ष बीते हैं।

बीते हुए 6 मन्वन्तरों के नाम हैं – (1) स्वायम्भुव (2) स्वारोचिष (3) औत्तमी  (4) तामस  (5) रैवत   (6) चाक्षुष। वर्तमान मन्वंतर का नाम वैवस्वत है। वर्तमान कल्प को श्वेत कल्प कहते हैं, इसीलिए हमारे संकल्प में कहते हैं –

“प्रवर्तमानस्याद्य ब्राह्मणों द्वितीय प्रहरार्धे श्री श्वेतवराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे ……………बौद्धावतारे वर्तमानेस्मिन वर्तमान संवत्सरे अमुकनाम वत्सरे अमुकायने अमुक ऋतु अमुकमासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे संयुक्त चन्द्रे …. ….. तिथौ ………”

एक सौर वर्ष में 12 सौर मास तथा 365.2585 मध्यम सावन दिन होते हैं परन्तु 12 चंद्रमास 354.36704 मध्यम सावन दिन का होता है, इसलिए 12 चंद्रमासों का एक वर्ष सौर वर्ष से 10.89170 मध्यम सावन दिन छोटा होता है। इसलिए कोई तैंतीस महीने में ये अंतर एक चंद्रमास के समान हो जाता है। जिस सौर वर्ष में यह अंतर 1 चंद्रमास के समान हो जाता है उस सौर वर्ष में 13 चंद्रमास होते हैं। उस मास को अर्धमास कहा जाता है।

मैटोनिक चक्र – मिटन ने 433 ई.पू. में देखा कि 235 चंद्रमास और 19 सौर वर्ष अर्थात् 19 x 12 = 228 सौर मासों में समय लगभग समान होता है, इनमें लगभग 1 घंटे का अंतर होता है |

19 सौर वर्ष = 19 × 365.25 = 6939.75 दिवस

235 चन्द्र मास = 235 × 29.531 = 6939.785 दिवस

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक 19 वर्ष में 228 सौर मास और लगभग 235 चन्द्र मास होते हैं अर्थात् 7 चन्द्र मास अधिक होते हैं। चन्द्र और सौर वर्षों का अगर समन्वय नहीं करे तब लगभग 32.5 सौर वर्षों में, 33.5 चन्द्र वर्ष हो जायेंगे। अगर केवल चन्द्र वर्ष से ही चलें तब अगर दीपावली नवम्बर में आती है तब 19 वर्षों में यह 7 मास पहले अर्थात् अप्रैल में आ जाएगी और इन धार्मिक त्यौहारों का ऋतुओं से कोई सम्बन्ध नहीं रह जायेगा। इसलिये भारतीय पंचांग में इसका ख्याल रखा जाता है |

राशिचक्र – सूर्य जिस मार्ग से चलता हुआ आकाश में प्रतीत होता है उसे कान्तिवृत्त कहते हैं। अगर इस कान्तिवृत्त को बारह भागों में बांटा जाये तो हर एक भाग को राशि कहते हैं अतः ऐसा वृत्त जिस पर नौ ग्रह घूमते हुए प्रतीत होते हैं (ज्योतिष में सूर्य को भी ग्रह ही माना गया है ) राशीचक्र कहलाता है। इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं की पृथ्वी के पूरे गोल परिपथ को बारह भागों में विभाजित कर उन भागों में पड़ने वाले आकाशीय पिंडों के प्रभाव के आधार पर पृथ्वी के मार्ग में बारह किमी के पत्थर काल्पनिक रूप से माने गए हैं।

उपरोक्त जानकारी संक्षिप्त है। आशा है भारतीय काल गणना विज्ञान को समझने के लिए सार्थक सिद्ध होगी।

 

 

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