विश्व पटल पर हिन्दी के बढ़ते चरण


–  प्रोफेसर बाबूराम

किसी भी राष्ट्र की अस्मिता उसकी भाषा से होती है। भाषा संस्कृति को प्रभावित करती है और संस्कृति व दर्शन से प्रभावित भी होती है। हिन्दी इसका अपवाद नहीं है। भारतीय राष्ट्रीयता की पहचान भी हिन्दी भाषा से है। ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी भाषा का स्रोत वैदिक साहित्य, संस्कृत साहित्य, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाएं हैं। राजनीतिक कारणों से हिन्दी भाषा में अरबी-फारसी की धाराएं भी एकाकार हो गई हैं। भारत में अंग्रेजी राज के कारण यूरोपीय भाषाओं की शब्दावली हिन्दी में आत्मसात हो गई है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी की लोकप्रियता और भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। संसार भर में लगभग 6000 भाषाएं, जनपदीय बोलियाँ, लोकभाषाएँ और प्रान्तीय भाषाएँ बोली जाती हैं। उनमें ‘हिन्दी’ से हिन्दुई, हिन्दवी, रेख्ता, उर्दू, हिन्दुस्तानी, दक्खिनी, खड़ी बोली और हिंगलिश तक बदलते स्वरूपों में हिन्दी अनेक उतार-चढ़ाव झेलती हुई उत्तरोत्तर विकसित हुई। हिन्दी जनभाषा, सम्पर्कभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सोपानों को पार करके अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बनने की ओर अग्रसर है। विश्व पटल पर हिन्दी को नई दृष्टि मिल रही है।

वर्तमान दौर में भाषाओं और संस्कृतियों के सम्मुख उनके अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो रहा है, जिसके फलस्वरूप विश्व की अनेक बोलियां विलुप्त हो रही है। अब भाषाओं को रोजी-रोटी से जोड़कर, देखा एवं परखा जाने लगा है। इस चुनौती पर हिन्दी को भी खरा उतरना है। वैज्ञानिक आविष्कारों, तकनीकी का विकास, वैश्वीकरण, उदारीकरण, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, विश्व बाजारवाद, मीडिया, अनुवाद, विज्ञापन, कम्प्यूटर नेटवर्क, जनसंचार, वाणिज्य-व्यापार, फिल्म उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी के कारण मानवता की एकता, विश्व शांति और वैश्विक सांस्कृतिक एकता में हिन्दी की भूमिका बड़ी सहायक सिद्ध हो रही है। 21वीं सदी में हिन्दी भाषा विश्व की सर्वाधिक प्रचलित भाषाओं की प्रतियोगिता में प्रवेश कर गई है तथा प्रयोजनमूलक और रोजगारोन्मुख (जॉब ओरियेन्टेड) होने से हिन्दी में रोजगार की अपार सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर होती है। अनेक देशों में प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में हिन्दी की लोकप्रियता निरंतर जारी है। सोशल मीडिया में हिन्दी की भूमिका बड़ी तेजी से बढ़ रही है। इसी उपयोगिता के कारण हिन्दी के क्षेत्र में निरंतर वृद्धि हो रही है।

भारतीय धर्म, संस्कृति, संगीत, साहित्य और साधना की अवधारणा वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात् विश्व एक परिवार है। हिन्दी की भूमिका इसी पथ पर गतिमान है। भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में हिन्दी की पताका फहरा रही है। युवा पीढ़ी को वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए हिन्दी की भूमिका लोकप्रिय भाषा के रूप में सिद्ध हो रही है। यह निर्विवाद कहा जा सकता है। संसार में हिन्दी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। हिन्दी के विकास और विस्तार के लिए केवल भारतीय ही नहीं बल्कि प्रवासी भारतीय साहित्यकार और अन्य देशों के हिन्दी प्रेमी विद्वान भी बड़े जागरूक और कार्यरत है।

संसार के लगभग 175 देशों में हिन्दी का पठन-पाठन, लेखन और शोधकार्य बड़ी तेजी से हो रहा है, जो विश्व पटल पर हिन्दी भाषा के बढ़ते चरणों का परिचायक है। साधु-संतों तीर्थ यात्रियों, पर्यटकों और व्यापारियों ने हिन्दी भाषा के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। आधुनिक काल में विश्व के अनेक देशों में विश्व हिन्दी दिवस, विश्व हिन्दी-सम्मेलन और विश्व पुस्तक मेले हिन्दी के प्रसार के शुभ लक्षण हैं।

भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रारम्भिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना भी इसके विस्तार का सूचक है। इस तथ्य की पुष्टि अनेक शिक्षाविदों, महर्षि दयानन्द सरस्वती, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, पंडित मदन मोहन मालवीय, स्वामी विवेकानन्द, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, गणेश शंकर विद्यार्थी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती, दत्तोपंत ठेंगड़ी ने की है। हिन्दी के वैश्विक स्वरूप को देखकर विदेशी साहित्यकारों में रूस के प्रमुख साहित्यकार एवं ‘श्रीरामचरितमानस’ के पद्यानुवाद करने वाले सर्वोच्च सम्मान ऑर्डर आफ लेनिन प्राप्त वारान्निको की मान्यता अनुसार जो लोग हिन्दी को कठिन मानते हैं, वे हिन्दी से परिचित ही नहीं हैं। योरोपीय विद्वान रेवरेंड फादर डॉ. कामिल बुल्के हिन्दी प्रेम के कारण वैल्जियम की नागरिकता त्याग कर भारत के नागरिक बने तथा जीवन पर्यन्त भारत में रहे। यही हिन्दी का वैश्विक प्रभाव है।

वस्तुतः हिन्दी का विस्तार अपनी आंतरिक शक्ति, गुणवत्ता, सरलता एवं लोकप्रियता से विश्व पटल पर हो रहा है। हिन्दी भाषा समस्त भारतीय भाषाओं एवं अन्तर्राष्ट्रीय भाषाओं के साथ जुड़कर भारत की राष्ट्रीय सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का प्रबल माध्यम बनकर संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.) की भाषाओं में अपना स्थान ग्रहण करेगी, तो विश्व पटल पर अपने उचित और गौरवपूर्ण पद पर आसीन होगी। विश्व पटल पर हिन्दी भाषा का भविष्य बड़ा उज्ज्वल है।

(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय भिवानी, हरियाणा में प्रोफेसर है और हिंदी विभाग के अध्यक्ष है।)

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