अमर बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा

 – डॉ कुलदीप मेहंदीरत्ता

अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध भारत देश के विभिन्न भौगोलिक प्रदेशों में और सामाजिक वर्गों ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न किये गये। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद तो यह संघर्ष की ज्वाला और अधिक फ़ैल गयी। विभिन्न नायकों के नेतृत्व में देश के अनेक भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध शांतिपूर्ण तथा सशस्त्र संघर्ष छेड़े गये। ऐसे ही एक बड़े संघर्ष के नायक थे बिरसा मुंडा, जिन्हें बिहार, झारखण्ड और छोटा नागपुर क्षेत्र के लोग, विशेषकर हमारे वनवासी भाई-बहन भगवान बिरसा मुंडा कह कर बुलाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में बिरसा मुंडा का नाम देश के स्वतंत्रता सेनानियों की प्रथम पंक्ति में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है।

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को उलीहातु में हुआ था। बचपन से ही बिरसा पढ़ाई में तेज थे, स्थानीय शिक्षक जयपाल नाग ने सुझाव दिया कि बालक बिरसा को चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में प्रवेश ले लेना चाहिए। लेकिन विडम्बना यह थी कि स्कूल में प्रवेश के लिए ईसाई धर्म में परिवर्तित होना अनिवार्य था।  कुछ समय तक अध्ययन करने के बाद, उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया और वैष्णव भक्त आनंद पांडे के सम्पर्क में आने पर वर्ष 1895 में महज 20 साल के युवा बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म त्याग दिया और हिंदू धार्मिक शिक्षाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त किया और रामायण और महाभारत के साथ-साथ पुराने शास्त्रों का अध्ययन किया।

बिरसा ने जनेऊ धारण किया, वे वैष्णव बन गए और तुलसी के पवित्र पौधे की पूजा करनी प्रारम्भ की और गोहत्या वर्जित घोषित कर मांसाहार का त्याग कर दिया। बिरसा मुंडा वास्तव में अपने समय से कहीं आगे की सोच रखने वाले दूरदर्शी व्यक्तित्व थे। प्रगतिशील दृष्टि वाले बिरसा अपने वनवासी समाज में सुधार करना चाहते थे और इसलिए उन्होंने जादू-टोने और अंधविश्वासों का विरोध कर अपने समाज को जागृत किया और इसके बजाय ईश्वर में विश्वास रखना और नियमित प्रार्थना के महत्व पर जोर दिया, शराब आदि नशीले पदार्थों के त्याग, नैतिक आचार संहिता के पालन और अच्छे चरित्र के निर्माण पर बहुत बल दिया।

बिरसा मुंडा के आत्म-विश्वास, आध्यात्म व सत्य आधारित वक्तृत्व-शक्ति, नैतिकता पूर्ण जीवन, वनवासी समाज के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की व्यग्रता और निरंतर प्रवास ने उन्हें वनवासी समुदायों में एक चमत्कृत व्यक्तित्व के रूप में स्थापित कर दिया। उनके दैवीय-आध्यात्मिक व्यक्तित्व के कारण वनवासी समुदायों में उन्हें भगवान के रूप में पूजा जाने लगा। उनके द्वारा किये गये चमत्कारों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में वनवासी उनके अनुयायी बन गये। भगवान बिरसा ने एक नये पंथ का सृजन किया जिसे बिरसाइत पंथ कहा जाता है। बड़ी संख्या में मुंडा, उरांव और खारिया वनवासी लोगों ने इस पंथ को स्वीकार किया।

अंग्रेजों द्वारा वनवासी समुदायों का आर्थिक शोषण, बिरसा मुंडा के लिए असहनीय था। यह सर्वविदित है कि अंग्रेजों ने पूरे भारत में भूमि हडपने के लिए छल-बल का सहारा लिया। लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति इसका एक सटीक उदाहरण है। मुंडा वनवासी 2000 से अधिक वर्षों से छोटानागपुर पठार के क्षेत्र में निवास कर रही थी। लगान, वनवासी सरदारों, जमींदारों और दलालों के कारण अंग्रेजों के शासन काल में वनवासियों को उनकी सदियों से चली आ रही भूमि से बेदखल किया जाने लगा। ब्रिटिश राज के खिलाफ उनका आह्वान ‘अबुआ राज सेतेर जना, महारानी राज तुंदु जना’ (रानी का राज्य समाप्त होने दो और हमारा राज्य स्थापित किया जाए) था, जिसे आज भी झारखण्ड, ओड़िसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और बिहार के वनवासी क्षेत्रों में याद किया जाता है।

ईसाई धर्म प्रचारकों के विरुद्ध बिरसा मुंडा ने बिगुल बजाया। स्वामी दयानंद की भांति उन्होंने भी वनवासियों को अपने धर्म में वापिस लौटने का आह्वान किया। बिरसा मुंडा इस बात से भली-भांति परिचित थे कि अगर कोई वनवासी धर्म परिवर्तन करता है तो न केवल अपनी सभ्यता-संस्कृति में एक व्यक्ति कम होता है बल्कि आनेवाले समय में धर्म परिवर्तित व्यक्ति एक विरोधी के रूप में समाज के समक्ष एक चुनौती प्रस्तुत करता है। ईसाई धर्म के प्रभाव में बिरसा मुंडा ने वनवासी इतिहास तथा कला-संस्कृति के होने वाले ह्रास के सम्बन्ध में वनवासियों को जागरूक करने का अभियान चलाया। उन्होंने ने केवल स्वयं हिन्दू धरम के आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया बल्कि वनवासी समुदायों को भी इन ग्रन्थों को पढने और अपनी मूल संस्कृति को सहेजने की प्रेरणा दी।

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सूदखोर महाजन और जमींदार, तत्कालीन समाज के बहुत बड़े शत्रु बन कर उभरे। इन्होने अंग्रेज अधिकारियों के साथ हाथ मिलाकर वनवासी समाज का शोषण करने के नये-नये तरीके खोज लिए। सीधे-साधे और सरल स्वभाव के वनवासियों ने शोषकों के विरुद्ध बिरसा के नेतृत्व में ‘उलगुलान’ (उथल-पुथल, संघर्ष) किया। उनके इस संघर्ष के पीछे दो प्रमुख लक्ष्य माने जाते हैं। पहला वे वनवासी समुदायों के लिए जल, जमीन और जंगल जैसे संसाधनों की रक्षा करना चाहते थे, दूसरे वे अपने धर्म और संस्कृति की मर्यादा को बना कर रखना चाहते थे। ये बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए सशस्त्र संघर्ष का ही प्रभाव था कि 1908 में अंग्रेजों को 1908 का छोटानागपुर काश्त – कारी अधिनियम बनाना ही पड़ा।

सशस्त्र संघर्ष को दबाने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने बिरसा की गिरफ्तारी के लिए 500 रुपये का इनाम घोषित किया। इसके बाद ब्रिटिश सेनाओं ने ‘दुमारी पहाड़ी’ पर एकत्र हुए मुंडा योद्धाओं पर भारी हमला किया और ‘जलियान वाला बाग’ की तरह अंधाधुंध गोलीबारी की और सैंकड़ों वनवासियों की हत्या कर दी। बिरसा मुंडा यहाँ से सिंहभूम की पहाड़ियों की ओर निकल गये। लेकिन तीन मार्च 1900 को बिरसा को चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल में अपने लगभग 460 गुरिल्ला साथियों के साथ सोते समय गिरफ्तार किया गया था। इनमें से एक को मृत्युदंड दिया गया, 39 को आजीवन कारावास और 23 लोगों को 14 साल की जेल की सजा सुनाई गई। अंग्रेजों के अनुसार बिरसा मुंडा की मौत 9 जून 1900 को हैजे के कारण हुई थी जब वे रांची जेल में बंद थे। लेकिन यह आशंका निरंतर व्यक्त की जाती रही है कि अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर देकर मार दिया। इस प्रकार इस वनवासी महानायक के जीवन-चक्र का समापन मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में हो गया।

बिरसा मुंडा की स्मृति में बिरसा मुंडा एयरपोर्ट रांची, बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सिंदरी, बिरसा मुंडा वनवासी छात्रावास, सिधो कान्हो बिरसा विश्वविद्यालय पुरुलिया, और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची जैसे संस्थान स्थापित किये गये। बिरसा मुंडा देश के पहले वनवासी नेता हैं जिनका चित्र 16 अक्तूबर 1989 को संसद भवन में लगाया गया। उन पर 15 नवंबर 1989 को विशेष डाक टिकट जारी किया गया और 28 अगस्त 1998 को संसद भवन के परिसर में राष्ट्रपति के द्वारा उनकी मूर्ति का अनावरण किया गया। अपने सम्बोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री नारायणन ने बिरसा मुंडा को वनवासी सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और आर्थिक अधिकारों के आरंभिक संरक्षक कहा। राष्ट्रपति ने बिरसा मुंडा को विदेशी सत्ता और दासता के आगे कभी न झुकने वाले योद्धा के रूप में याद करते हुए एक असाधारण लोकनायक बताया। उनके योगदान को स्वीकार करते हुए झारखण्ड राज्य का गठन भी वर्ष 2000 में भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर किया गया था। 9 जून को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उनके आदर्शों को ध्यान कर उनके पद-चिह्नों पर चलने का प्रयास करना उन्हें वास्तविक श्रद्धांजलि है।

(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी (हरियाणा) में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)

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