तस्मै श्रीगुरवे नम:


 – वासुदेव प्रजापति

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं  दर्शितं  येन  तस्मै  श्रीगुरवे  नम।।

उस महान गुरु का अभिवादन! जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, चर व अचर सबमें विद्यमान है तथा जिसने उस अवस्था से साक्षात्कार करना सम्भव किया है।

गुरु सामान्य व्यक्ति नहीं है। वह ज्ञान का मूर्तरूप है। वह केवल अक्षर ज्ञान नहीं करवाता, अपितु व्यक्ति के जीवन को आलौकित कर देता है। गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर, आओ! हम सभी गुरुतत्त्व का पुण्यस्मरण करें।

गुरु ज्ञान दाता है

गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकारस्तेज उच्यते।

अन्धकार निरोधत्वात् गुरुरित्यभिधीयते।।

गुकार अर्थात् अंधकार और रुकार अर्थात् तेज। अत: गुरु वह तत्त्व है, जो जीवन में अंधकार (अज्ञान) को दूर कर ज्ञान रूपी प्रकाश भर देता है।

हम यह जानते हैं कि चर-अचर सब जीवों में वह परमात्म तत्त्व विद्यमान है। हमारी आत्मा स्वयं ज्ञान का भंडार है, परन्तु अज्ञान ने उस आत्मा को ढ़क रखा है। गुरु हमारी आत्मा को जो अज्ञान से ढ़की हुई है, उसे अनावृत्त कर देता है। और हमारे भीतर जो ज्ञान जन्मपूर्व से ही विद्यमान है उसे प्रकट कर देता है। ज्ञान का प्रकटीकरण गुरु कृपा से ही सम्भव है। इसीलिए हमारी संस्कृति में प्रत्येक मत-पंथ ने गुरु की बार बार महिमा गाई है।

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मिलितम् येन तस्मै श्रीगुरवे नम।।

अज्ञान रूपी अंधकार से जिनकी आँखें अंधी हो चुकी थीं, उन्हें ज्ञान रूपी अंजन की शलाका से जिसने खोल दिया उस गुरु को नमस्कार।

गुरु जीवन गढ़ता है

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है,गढ़िगढ़ि काढ़े खोट।

अंतर  हाथ  सहार  दै,  बाहर  बाहै  चोट।।

अर्थात् गुरु कुम्हार है और शिष्य कुंभ(घड़ा) है। गुरु कुम्हार की तरह शिष्य को घड़ते-घड़ते उसकी कमियाँ दूर करता जाता है।

यहाँ कुम्हार द्वारा घड़ा घड़ने की प्रक्रिया समझना उचित रहेगा। कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है। सबसे पहले वह मिट्टी को कूट-छान कर स्वच्छ करता है। फिर उसे अच्छी तरह गूँधता है। गूँधी हुई मिट्टी को चाक पर चढ़ता है। चाक घूमाकर उसे ऩिश्चित आकार देता है। आकार पाते ही वह उसे नीचे उतार देता है। नीचे उतारने के  बाद उसे अपनी गोद में रखकर एक हाथ में कपड़ा लेता है और दूसरे हाथ में चपटी लकड़ी लेता है। बाहर से लकड़ी की चोट मारता है और अन्दर चोट के नीचे कपड़े वाले हाथ से घड़े को सहारा देता है। ऊपर से चोट लगने पर भी घड़ा टूटता नहीं है, क्योंकि अन्दर कपड़े वाला हाथ उसे सहारा देता रहता है। इस प्रकार चोट पर चोट मार कर उसके सारे कोने मिटा दिये जाते हैं और उसे गोल घड़े का आकार दे दिया जाता है।

ठीक इसी प्रकार गुरु एक कुम्हार की भूमिका अपनाता है। गुरु वे सभी कार्य करता है, जिससे शिष्य के सभी दोष दूर होकर उसका जीवन मिट्टी के घड़े की भाँति सबकी तृषा मिटाने वाला बन जाता है।

गुरु पारस से बढ़कर है

गुरु पारस को अन्तरो,जानत है सब संत।

वह लोहा कंचन करे, ये करिलये महन्त।।

गुरु में और पारस में बहुत बड़ा अन्तर है, यह सभी सन्त लोग जानते हैं। पारस तो निर्जीव लोहे को सोना बनाता है, जबकि गुरु तो शिष्य को अपने समान ही महान बना देता है।

एक शिष्य दस दिनों के लिए गुरु सेवा में आया। गुरु सेवा के बाद वह पुन: घर लौटने ही वाला था कि एक दिन पहले ही उसकी एक टाँग टूट गई। वह बहुत दुखी हुआ। उसके मन में विचार आया, दस दिन तक गुरु की इतनी सेवा की किन्तु मिला क्या ऊपर से एक टाँग टूट गई।

सतगुरु तो सब जानते थे। उसके पास गये, कन्धे पर स्नेह का हाथ रखते हुए बोले, आज रात्रि भजन में तुम अवश्य आना। वह न चाहते हुए भी आया और बैठ गया। गुरु महाराज उसकी चेतना को ऊपर के मंडलों में ले गए। वहाँ उसने देखा कि जिस बस में वह बैठा है, उसका एक्सीडेन्ट हो गया है, और उस एक्सीडेन्ट में उसकी मृत्यु भी हो गई है। गुरुदेव ने उसकी चेतना को वह मृत शरीर भी दिखाया। उसे यह भी समझ में आया कि वह गुरुसेवा में था। इसलिए यह असम्भव भी सम्भव हुआ। सतगुरु ने उसके कर्म काटकर एक टाँग ही टूटने दी।

थोड़ी देर बाद उसकी चेतना पुन: नीचे लौटी तो उसका रो-रो कर बुरा हाल हुआ। वह बार-बार गुरुदेव के चरणों में गिर कर क्षमा याचना कर रहा था। मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, मुझे आप पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए था। सतगुरु कभी भी हमारा बाल भी बाँका नहीं होने देते। उसने यह जान लिया कि गुरु पारस से भी बढ़कर होते हैं।

बिना गुरु ज्ञान नहीं है

किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि श्रुतेन च।

दुर्लभाचित्तविश्रान्तिविना गुरु कृपां परम्।।

अर्थात् चित्त की परम शान्ति, बहुत ज्यादा बोलने से या करोड़ों शास्त्रों को सुनने से नहीं मिलती, वह तो गुरु ही दे सकते हैं। बिना गुरु के शान्ति मिलना सम्भव ही नहीं है।

हमारे समाज में भी यह पक्की मान्यता है कि गुरु बिन ज्ञान न होय गोपाला। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक सदगुरु तो होना ही चाहिए। जिसका कोई गुरु नहीं, वह तो निगुरा है, इसलिए उसका जीवन व्यर्थ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है –

गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।

जो  बिरंचि  संकर  सम  होई।।

भले ही कोई ब्रह्मा और शिव के समान क्यों न हो जाय, बिना गुरु के इस संसार रूपी समुद्र से पार होना सम्भव नहीं है। भारतीय समाज में गुरु तत्त्व की जैसी महिमा है, वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है। अन्यत्र वह गुरु है ही नहीं, वह तो मात्र टीच करने वाला टीचर है।

गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण हो!

चित्रंवटतरोर्मूले वृद्धाशिष्या गुरुर्युवा।

गुरोस्तुमौनंव्याख्यानं शिष्यास्तेछिन्नसंशया।।

अरे! यह कैसा आश्चर्य है। वट वृक्ष के नीचे गुरु और शिष्य दोनों बैठे हैं। सभी शिष्य तो वृद्ध हैं, जबकि गुरु युवा हैं। और गुरु मौन हैं, यह मौन ही उनका व्याख्यान है। इस मौन व्याख्यान से शिष्यों के सभी संशय दूर हो गये हैं।

आधुनिक तार्किकों को यह बात गले नहीं उतरेगी क्योंकि उनमें गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण है ही नहीं। जब गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण होता है, तब गुरु का मौन व्याख्यान भी शिष्यों में संक्रांत हो जाता है।

समर्पण का एक अनुपम दृष्टांत बताता हूँ। एक शिष्य ने गुरु के कहे हुए वाक्यों को पूर्ण सत्य माना, उनमें दृढ़ विश्वास किया और जीवनभर उसका पालन किया। एक बार शिष्य ने गुरु से कार्यवश दूसरे गाँव जाने की आज्ञा माँगी। गुरुजी ने कहा जाओ, परन्तु जब वापस आओगे तब एक बात तुमसे कहूँगा।

शिष्य दूसरे गाँव चला गया। पीछे गुरुदेव भगवान के धाम चले गये। जब वह लौटकर आ रहा था, उस समय लोग अन्त्येष्टि संस्कार के लिए गुरुदेव के पार्थिव शरीर को लेकर जा रहे थे। शिष्य को गुरु की वाणी पर पूर्ण विश्वास था। गुरु की वाणी कभी असत्य नहीं हो सकती। अत: शव को लौटाकर आश्रम ले आया। शिष्य ने प्रार्थना की, प्रभो! आपने ही कहा था, जब मैं लौटकर आऊँगा तब मुझे आप एक बात कहेंगे। अब कृपा करके वही बात कहिए। अपने विश्वासी शिष्य का विश्वास रखने के लिए गुरुदेव जीवित हो गये। और सब लोगों के सामने ही शिष्य से कहा, मेरी सेवा की तरह अन्य सन्तों की भी सेवा किया करो। शिष्य ने उनकी आज्ञा का आजीवन पालन किया। गुरु महाराज एक वर्ष तक जीवित रहकर उसकी सन्त सेवा देखते रहे, एक वर्ष बाद शरीर त्यागकर भगवान के धाम गये। ऐसी थी शिष्य की अनन्य गुरुनिष्ठा,जिसने मृत गुरु को पुनर्जीवित करवा दिया।

अत: भारतीय समाज में प्रत्येक साधु-सन्त ने गुरु महिमा गाई है। महात्मा कबीर ने गुरु महिमा में कहा है कि यदि मैं सम्पूर्ण धरती को कागज बना लूँ और सारे वनों की लेखनी बना लूँ, सातों समुद्रों की स्याही बना लूँ तब भी गुरु की महिमा लिखी नहीं जा सकती, इसलिए की गुरु की महिमा अनन्त है।

सब धरती कागज करुँ, लिखनी सब बनराय।

सात समुद्र की मसिकरुँ,गुरुगुण लिखान जाय।।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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