<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>teachers Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
	<atom:link href="https://rashtriyashiksha.com/tag/teachers/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://rashtriyashiksha.com/tag/teachers/</link>
	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
	<lastBuildDate>Thu, 21 Aug 2025 01:44:55 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	

<image>
	<url>https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/cropped-Logo-Hindi-32x32.png</url>
	<title>teachers Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
	<link>https://rashtriyashiksha.com/tag/teachers/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/role-of-teacher-in-nation-making/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/role-of-teacher-in-nation-making/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 11:24:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[हम सरस्वती पुत्र]]></category>
		<category><![CDATA[Countary]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Indain Education]]></category>
		<category><![CDATA[Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[shikshak]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8780</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8211; दिलीप बेतकेकर कार्य सभी महत्वपूर्ण तथा मूल्यवान ही होते हैं, कोई भी कार्य निम्न स्तर का नहीं। फिर भी शिक्षक का कार्य अनोखा है। चीनी भाषा की एक कहावत&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/role-of-teacher-in-nation-making/">राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-8789" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Teacghers-300x171.jpg" alt="" width="1467" height="836" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Teacghers-300x171.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Teacghers.jpg 740w" sizes="(max-width: 1467px) 100vw, 1467px" /></p>
<p style="text-align: justify;">कार्य सभी महत्वपूर्ण तथा मूल्यवान ही होते हैं, कोई भी कार्य निम्न स्तर का नहीं। फिर भी शिक्षक का कार्य अनोखा है। चीनी भाषा की एक कहावत है, जिसका अर्थ है, “आपको यदि एक दो साल के लिये व्यवस्था करनी है तो अनाज बीज दो, दस-पन्द्रह साल की व्यवस्था बनानी है तो वृक्षारोपण करो। किन्तु यदि सौ वर्ष की व्यवस्था करनी है तो मनुष्य की निर्मित करो।” कितनी अर्थपूर्ण है कहावत।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मनुष्य’ निर्मिति का कार्य शिक्षक करता है। उसे करना चाहिए ऐसी अपेक्षा की जाती है। “भारत के भविष्य का निर्माण कक्षाओं में आकार ले रहा है” इस आशय का मौलिक विधान, जिम्मेदारी और संज्ञान लेते हुए, ‘कोठारी शिक्षा आयोग’ द्वारा किया गया है। देशभर के हज़ारों विद्यालय, महाविद्यालय के शिक्षार्थी कल के उज्ज्वल भारत के निर्माता होने चाहिये, ऐसी आशा-अपेक्षा सभी शिक्षा आयोगों द्वारा की गई है।</p>
<p style="text-align: justify;">पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ कलाम की अपेक्षा थी कि सभी विद्यार्थी विकसित भारत का स्वप्न देखें। दिवास्वप्न नहीं, कवि कल्पना नहीं, वरन् एक शास्त्राज्ञ का स्वप्न। इसे साकार करना होगा। ‘भारत 2020’ नामक ग्रंथ में उन्होंने, अत्यंत तर्कयुक्त पद्धति से, ‘विकसित भारत’ निर्मित होने हेतु अपने पास उपलब्ध साधन सामग्री, मानवशक्ति, नैसर्गिक संपत्ति आदि का किस प्रकार उपयोग करें इस विषय पर विस्तृत चर्चा की है।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी उपलब्ध संपत्तियों में प्रथम स्थान है ‘मानवशक्ति’ का। विशेषकर ‘युवाशक्ति’ को देश का महत्वपूर्ण और लाभकारी अंग माना गया है। इस शक्ति का द्विधारी तलवार के समान उपयोग हो सकता है। ये शक्ति नक्सलवाद आत्मसात कर विध्वंसक बन सकती है, या आज के चलनानुसार भोग-विलासवादी प्रवृत्ति का शिकार होकर नष्ट हो सकती है, और यही शक्ति अपने बुद्धि-कौशल्य और जीवन-मूल्यों के सहारे भारत को अधिक बलशाली बना सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह युवाशक्ति अनुपयोगी नहीं है। उस शक्ति का सदुपयोग होना और इस हेतु जो भी करने योग्य हो उसे करने को तैयार रहना, इस जिम्मेदारी को निर्वहन करने हेतु ईश्वर ने शिक्षक को कार्य सौंप दिया है। परमेश्वर द्वारा सौंपी गई है, इसीलिये यह भूमिका श्रद्धापूर्वक, भक्तिपूर्वक, निष्ठा से, आखिरी पल तक निभाने हेतु हम शिक्षक तैयार हैं अथवा नहीं यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।</p>
<p style="text-align: justify;"> ‘भारत 2020’ में डॉक्टर कलाम शिक्षकों के लिये कहते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“आप शिक्षक हैं इसलिये भावी पीढ़ियों को अच्छे से गढ़ने की महत्वपूर्ण और कठिन जिम्मेदारी आपकी है यह ध्यान रखें। कुछ समय पूर्व हमारे समाज में शिक्षक वंदनीय समझे जाते थे। दुर्भाग्य से वर्तमान में स्थिति में परिवर्तन आया है। शिक्षक को महत्वहीन समझा जा रहा है। अत्यंत विचित्र सी परिस्थिति में उन्हें अपने कार्य करने पड़ रहे हैं। हमें इस बात की कल्पना है। शिक्षकों की समस्याएं हल होनी चाहिए। फिर भी हम शिक्षकों को विनयपूर्वक दो बातें बताने के इच्छुक हैं। एक, अपने विद्यार्थियों के मन पर विकसित भारत का चित्र अंकित करें और दूसरा यह कि अपने ज्ञान भंडार को शिक्षक अद्यतन तथा परिपूर्ण रखें। आपकी प्रतिभा आपके विद्यार्थियों में सही अंकित होती है। इसलिये आपका ज्ञान अद्यतन, तब आपके विद्यार्थियों का ज्ञान भी अद्यतन, ये ध्यान रखें &#8211; आपका ज्ञान विद्यार्थियों तक पहुंचाएं, किन्तु अपने किसी नैराश्य की छाया उन पर न पड़े इस बात का ध्यान रखें। बच्चों को भव्य-दिव्य विचार मन में लाने और अच्छे स्वप्न देखने की आदत डालें। अपने पास के हुनर और कुशलता को सदैव आधुनिक रखने के लिये उन्हें प्रेरित करें।”</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षकों के लिए डॉ॰ कलाम की एक और विनती &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>“प्रत्येक माह में से कुछ दिन सुरक्षित रखें उन कामों के लिये जो रोजमर्रा के कामों से भिन्न हों और कुछ अन्य प्रकार के हों। कुछ ऐसे कार्य करें जिससे समाज का भला हो</strong><strong>, गरीबों का दुःखहरण हो, और जिनसे स्वयं को संतोष हो, जिस कार्य के लिये गर्व की अनुभूति हो।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करके परीक्षा हेतु विद्यार्थी को तैयार कर अपना कार्य समाप्त हो गया ऐसा शिक्षक को नहीं समझना चाहिए। आजकल के माता-पिता-पालक बच्चे के कैरियर का ही विचार करते हैं। बच्चे के समक्ष डॉलर दिखने लगते हैं। केवल बुद्धि को ही केन्द्र बिन्दु मानकर न चलें, उसकी भावनाओं की ओर भी ध्यान दें। ‘बुद्धिमत्ता गुणांक’ (I.Q.) का जमाना अब पीछे छूट गया है, अब भावनात्मकता (E.Q.) को भी नज़र अंदाज नहीं कर सकते। इसलिये शिक्षक को भी इस ओर ध्यान देना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">युवाओं के लिये अनेक अवसर दिखते हैं परन्तु उन अवसरों का सही उपयोग करने हेतु दो महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है। प्रथम तो वह अवसर कैसा है यह देखना, उसको अच्छे से जानना। किसी अवसर के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से जानकारी न होने से गलत निर्णय होने की संभावना रहती है। केवल आंख से दिखना पर्याप्त नहीं है, पैनी दृष्टि से अवसर को परखना चाहिये। यह दृष्टि विकसित करने का कार्य शिक्षक कर सकता है। दूसरी बात अवसर प्राप्त होने पर धैर्य और साहस के साथ उस अवसर का उपयोग कर लेना चाहिये। इस हेतु जुझारू प्रवृत्ति होना आवश्यक है। अवसर तो पर्याप्त मिलेंगे, किन्तु जुझारू प्रवृत्ति हो तब अवसर का सही उपयोग हो पायेगा, अन्यथा अवसर मिलने पर भी निष्फल रहेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">बदलती जीवन शैली के कारण, भोग-विलासी संस्कृति के कारण, आज समाज में अनेक समस्याएं निर्मित हुई हैं। रोज समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है। व्यसनाधीनता में वृद्धि हो रही है। देश सम्पन्न हुआ, बलशाली हुआ, किन्तु सामाजिक स्वास्थ्य में गिरावट हुई तो ये संपन्नता अधिक समय तक टिकने वाली नहीं। इसलिये अनेक विकसित देशों की स्थिति देखते हुए हमें भी सावधान रहकर उपाय योजना समय रहते करना चाहिये। बढ़ती व्यसनाधीनता और भोगविलासी प्रवृत्ति के चंगुल में युवाशक्ति न फंसे इस हेतु शिक्षक को उन्हें जागृत करने की भूमिका निभानी पड़ेगी। सामाजिक आरोग्य के रक्षक के रूप में शिक्षक को ही आगे आना पड़ेगा।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-8790" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/T-2-300x200.jpg" alt="" width="1721" height="1147" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/T-2-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/T-2.jpg 740w" sizes="(max-width: 1721px) 100vw, 1721px" /></p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक को तीन के प्रति प्रतिबद्धताओं का पालन करना पड़ता है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">(1) विद्यार्थी, (2) ज्ञान, (3) समाज। आचार्य विनोबा जी ने सुंदर शब्दों में कहा है – <strong>“विद्यार्थी शिक्षक परायण हों</strong><strong>, शिक्षक विद्यार्थी परायण हों, दोनों ज्ञान परायण हों, और ज्ञान सेवा परायण हो।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">‘शिक्षक विद्यार्थी परायण हों’, अर्थात् शिक्षक का विद्यार्थी से स्वयं के पुत्र समान प्रेम रहे। वह केवल शिष्यों को पढ़ाने वाला शिक्षक न रहे। उसे विद्यार्थी का शिक्षक होना चाहिये। दोनों को ही ज्ञान पिपासु होना चाहिये। ध्यान ये रहे कि शिक्षक को भी निरंतर अध्ययनरत रहना आवश्यक है। बीस-पच्चीस साल पूर्व प्राप्त उपाधि से संतुष्ट न रहते हुए नया-नया ज्ञान प्राप्त करते रहना चाहिये। शिक्षक को सदैव ‘Update’ और ‘Upgrade’ शब्द आंखों के समक्ष रखने होंगे। जो कुछ पढ़ना था वह दस-पन्द्रह वर्ष पूर्व पढ़ लिया, अब क्या पढ़ें? इस प्रकार की उदासीन, पराभूत, पलायनवादी, नकारात्मक प्रवृत्ति को छोड़ना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">ये सब ज्ञान प्राप्ति किसलिये? स्वयं के विकास और उन्नति के लिये तो है ही, परन्तु ये ज्ञान समाज के लिये, राष्ट्र के लिये भी उपयोग करना आवश्यक है। इस प्रकार का समाज के लिये कर्तव्य बोध स्वयं के साथ विद्यार्थी में भी अंकुरित करें, ये शिक्षक का कर्तव्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय समाज को प्रबुद्ध समाज के रूप में देखा जाता है। यहां की बौद्धिक संपदा दुनिया के किसी भी देश की अपेक्षा कम नहीं है। डॉ॰ माशेलकर, डॉ॰ गोवारीकर, डॉ॰ काकोडकर, डॉ॰ विजय भाटकर आदि बुद्धिमान व्यक्ति हैं और सकारात्मक दृष्टि के धनी स्वयं तो सक्रिय हैं ही और अन्य को भी प्रेरणा देते हैं। ये सभी जो भी बात अच्छी हो उसकी जानकारी प्राप्त कर देश की प्रगति के लिये उसका कैसे उपयोग किया जा सकेगा उन बिन्दुओं पर गंभीरता से अध्ययन करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अपने शास्त्राज्ञ, तंत्राज्ञ, ध्येयपूर्वक बहुत कार्य करते हैं। इन्हें जिस प्रकार के युवा, मानवशक्ति चाहिए तदनुसार उन्हें तैयार कर देने का कार्य शिक्षक को करना चाहिये। जरूरी नहीं कि सभी शिक्षक वुफशल और तज्ञ होंगे ही। किन्तु बढ़ती उम्र के साथ विद्यार्थी के पास विविध क्षेत्रों में पदार्पण करते हुए कुछ कौशल्य और जीवन-मूल्य भी हों जिनके द्वारा उच्च स्तर के शास्त्राज्ञ और तंत्राज्ञों को सहारा मिल सके। अतः ऐसा कार्य तो प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर तक के शिक्षकों को करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">अन्य किसी कार्य की अपेक्षा मानसिकता से सम्बन्धित कार्य करना अधिक कठिन और महत्वपूर्ण है। सवा सौ करोड़ देशवासी होते हुए भी अपेक्षा अनुसार मानवशक्ति उपलब्ध नहीं है यह यथार्थ है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘यदि हमें सौ युवक मिल जायें तो देश के चित्र को सुंदर रूप में परिवर्तित कर दिखाऊंगा’ अर्थात् जिस प्रकार के मनुष्य आवश्यक हैं उतनी संख्या में उपलब्ध नहीं होते हैं। इसीलिये ऐसे व्यक्तियों का गढ़न करना आवश्यक है। डॉ॰ कलाम द्वारा वर्णित ‘विकसित भारत’ के स्वप्न को साकार करने हेतु ऐसे मेहनती, जुझारू, देश को ही ईश्वर मानने वाले, राष्ट्रभक्त नवयुवकों की आवश्यकता है और इस प्रकार के युवकों का गढ़न कारखाने में नहीं, वरन् विद्यालयों की कक्षाओं में होता है और उनका गढ़न करने वाला होता है ‘शिक्षक’, एक श्रेष्ठ शिल्पकार।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक अपने आपको दीन न समझे। स्वयं को देखते हुए, “Blessed is he who has found his work” ऐसी स्वानंदी भावना से देखें और राष्ट्रनिर्माण के पुनीत कार्य के लिये परमेश्वर ने हमें शिक्षक बनने का अवसर दिया है इसको कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करें।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-teacher-is-the-teacher-as-well-as-the-builder-of-the-nation/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षक राष्ट्र निर्माता बनें !</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/role-of-teacher-in-nation-making/">राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/role-of-teacher-in-nation-making/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>21वीं शताब्दी का शिक्षक</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 31 Aug 2024 03:37:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Adhyapak]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[school]]></category>
		<category><![CDATA[Sctudent]]></category>
		<category><![CDATA[Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[shikshak]]></category>
		<category><![CDATA[student]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<category><![CDATA[vidyalaya]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=7931</guid>

					<description><![CDATA[<p> ✍ किशन वीर सिंह शाक्य 21वीं शताब्दी का शिक्षक हमारी कल्पना में कुछ विशेष है क्योंकि 21वीं शताब्दी में हमारे लिए करने के लिए अनेक कार्य शेष हैं। भारत एक&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher/">21वीं शताब्दी का शिक्षक</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> किशन वीर सिंह शाक्य</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-7933" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Teacher-Training-Support-300x156.jpg" alt="" width="1281" height="666" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Teacher-Training-Support-300x156.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Teacher-Training-Support-768x400.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Teacher-Training-Support.jpg 960w" sizes="(max-width: 1281px) 100vw, 1281px" /></p>
<p style="text-align: justify;">21वीं शताब्दी का शिक्षक हमारी कल्पना में कुछ विशेष है क्योंकि 21वीं शताब्दी में हमारे लिए करने के लिए अनेक कार्य शेष हैं। भारत एक विविधताओं वाला विशाल देश है जहां 25 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों के लिए विज्ञान एवं तकनीकी ने ज्ञान के असंख्य द्वार खोले हैं। 21वीं शताब्दी का शिक्षक परम्परा के अनुसार पुस्तकों से ही शिक्षण नहीं कर सकता, अपितु शिक्षण के अद्यतन प्रयोगों को करने की महती आवश्यकता हो गयी है। विद्यार्थियों में अपार क्षमताएँ एवं योग्यताएँ विद्यमान है। हमें उनको समुचित अवसर प्रदान करना है। आज छात्र छात्राओं की इच्छाएं एवं महत्वाकांक्षाएं आकाश से भी ऊँची है और शिक्षक अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता के धरातल पर खड़ा है। अतः 21वीं शताब्दी के शिक्षक का व्यक्तित्व कैसा हो? इसका चिन्तन आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>शिक्षक जाने शिक्षा का मर्म। शिक्षक माने शिक्षण का धर्म।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शिक्षक छात्र को समझायें कम</strong><strong>, समझे ज्यादा। शिक्षक जाने भारत की मर्यादा।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शिक्षक विश्व को एक गाँव समझे। </strong><strong>21वीं शताब्दी की मांगे समझें।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शिक्षक कक्षा को परिवार बनायें। शिक्षक नित नूतन प्रयोग करायें।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रत्येक छात्र की पृथक योजना बनायें। शिक्षक स्वयं उदाहरण बनें।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उचित तकनीकी को अवश्य चुनें।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(1) शिक्षा </strong></p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>“Education is what remains when you forget what you have been target.” -Albert Einstein</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">जो कुछ पढ़ा है या पढ़ाया गया है उस सब को भूल जाने पर जो शेष बचे वह शिक्षा है। इस शेष फल में जो बचता है वह शिक्षक का अनुभव, शिक्षक की विधि, व्यवहार, प्यार, भावना प्रयोग और संवेदनाएं जिन्होंने बच्चे को कुछ बनाया है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li>2. “The Soul of the education is the education of soul.” -Ravindra Nath Tagore</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा की आत्मा, आत्मा की शिक्षा है नव छात्र में अपना जो कुछ है वह सब परम पिता की चेतना है। इसका सही आभास शिक्षक ही करा सकता है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="3">
<li>“While educating the minds of the youths. We should not forget to educate their hearts.” -Dalai Lama</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">जब हृदय पढ़ाना होता है तब साधन कम शिक्षक की साधना ही अधिक कार्य करती है, शिक्षक बिना कुछ बोले ही हृदय से हृदय की बात कर लेता है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="4">
<li>“What you think you become, what you feel, you attract, what you imagine you learn.” -Lord Budha</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">अर्थात् Imagination is education जब शिक्षक छात्रों की कल्पनाशीलता, प्रश्नों का उत्तर देने, प्रश्न करने की स्वतन्त्रता देता है तब सही शिक्षा प्राप्त होती है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="5">
<li>“I am not a teacher. But an awakener.” -Robert Frost</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">जब शिक्षक जागरूकता लाने वाला हो जाता है तब वह व्यक्तित्व के विकास के लिए सभी आवश्यक बातें सिखाता है। इसके बाद जीवन में न अभाव रहता है और न तनाव।</p>
<p style="text-align: justify;">महापुरुषों के प्रेरक वाक्यों के माध्यम से मैंने शिक्षा का वास्तविक अर्थ बताने का प्रयास किया है। प्रत्येक शिक्षक इस प्रकार की चार-पाँच परिभाषाओं को अपने जीवन का अंग बनाएं तो शिक्षण में आनन्द आयेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(2) शिक्षक एक धर्म</strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्म का अर्थ है स्वभाव अर्थात् जीवन जीने की कला। शिक्षक अपने स्वभाव से सीखता है, सिखाता है तब ही राष्ट्र निर्माता कहलाता है। आचार्य चाणक्य ने कहा है-</p>
<p style="text-align: justify;">“Teaching is the training of country and love of nation.” -Acharya Chanakya</p>
<p style="text-align: justify;">जब आचार्य चाणक्य की यह शिक्षा एक शिक्षक को समझ में आ जाती है तो उसका प्रत्येक कार्य राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाता है। शिक्षक ज्ञान का दाता नहीं निर्माता है अतः वह ज्ञान से नवीन ज्ञान बनाने की प्रक्रिया अपनाता हैं जब शिक्षण स्वभाव बन जाता है तो सेवा शर्तें नहीं केवल पढ़ाने की शर्त शेष रह जाती है। अपने देश में अनेक शिक्षक हुए हैं जिन्होंने शिक्षण धर्म को पूरे जीवन निभाया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>3) छात्राओं को समझाएं कम, समझें अधिक</strong></p>
<p style="text-align: justify;">21वीं शताब्दी का छात्र अप्रतिम क्षमता का धनी है, उसको समझकर वर्तमान का शिक्षक अपनी समझ बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए शिक्षण संस्थाओं में छात्रों की उपस्थिति कम हो रही है। यदि हम प्रत्येक छात्र को समझकर उसकी प्रतिभा के अनुसार केवल दो-तीन मिनट की प्रस्तुति कक्षा-कक्ष में ही करा जाएं तो सुनाने वाले आयेंगे, सुनने वाले भी आयेंगे। उपस्थिति शत-प्रतिशत हो जाएगी। जब हम छात्र को वहीं परम्परागत पढ़ायेंगे तो छात्र अनुपस्थिति की नयी परम्परा बनायेंगे ही। छात्रों को समझने के लिए शिक्षक को जागरूकता का केन्द्र बनना पड़ेगा। समझने के लिए व्यक्तिगत वार्ता, व्यक्तिगत सहयोग, सहज स्नेह आदि को प्रयोग में लाना चाहिए। शिक्षक का जीवन नियमों का नहीं अपितु जीवन में नियम हों। जब छात्रों को अधिगम में बराबर का भागीदार बनायेंगे तो शिक्षार्थी शिक्षक को और शिक्षक शिक्षार्थी को समझ पायेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>4) शिक्षक जाने भारत की भाषा और ज्ञान परम्परा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">NEP 2020 के विजन का पहल वाक्य ही इस ओर स्पष्ट संकेत करता है। “NEP 2020 incision an education system rooted in Bhartiya ethos, contributes nation Bharat sustainably into an equitable vibrant knowledge society by providing quality education to all.”</p>
<p style="text-align: justify;">जब शिक्षक जीवंत ज्ञान से सभी को पूरित कर एक सतत् भारतीय ज्ञान को शिक्षा के माध्यम से पहुँचाने का कार्य करेंगे तो प्रत्येक विषय में प्रत्येक पाठ के लिए भारतीय ज्ञान सन्दर्भों का संकलन सम्पन्न करेंगे और उसे समयानुकूल बनाकर कक्षा में प्रस्तुत करेंगे। भारत ज्ञान भारत की भाषाओं में हमारे छात्रों को भास्कर भगवान की तरह छात्रों को भास्वित करेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>5) शिक्षक भारत को ज्ञान का वैश्विक केन्द्र बनाएं</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत को Global Super knowledge power बनाने का दृष्टिकोण दिया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विश्व की सूचनाओं और आवश्यकताओं से परिचित होकर शिक्षक Atal Innovation Mission जैसे नवाचारी अभियानों के माध्यम से छात्रों को विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभाओं को दिखाने का अवसर प्रदान करें। वैश्विक ज्ञान के लिए केन्द्र एवं राज्य स्तर पर ATL के माध्यम अनेक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती है। इन नवाचारी, वैज्ञानिक, गणितीय ज्ञान पर आधारित विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए छात्रों को तैयार करना।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>6) 21वीं शताब्दी के कौशल अपनाएं </strong></p>
<p style="text-align: justify;">विश्व स्तर पर सभी छात्रों एवं शिक्षकों को सीखने के लिए अधिगम कौशलों का विकास किया गया है जिनके प्रयोग से हम अच्छा सीख सकते हैं –</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>Collaboration 2. Creativity 3. Critical Thinking 4. Communication</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">इन चार कौशलों को कक्षाकक्ष का अंग बनाकर शिक्षक अपने शिक्षक को प्रभावी बना सकते हैं। इन कौशलों को व्यवहार में लाने के लिए शिक्षक एवं शिक्षार्थी को कुछ नया करने का अवसर मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>7) मेरा विद्यालय मेरा परिवार </strong></p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक अपने विद्यालय को अपना परिवार, अपनी कक्षा को अपना घर और अपने विद्यार्थी को अपना पुत्र/पुत्री समझेंगे तो घर, परिवार, स्वच्छ, व्यवस्थित, संस्कारित तथा ज्ञान से सम्पन्न होगा ही। परस्पर स्नेह, आत्मीय सम्बन्ध, मन की बात कहने का वातावरण और साहस प्रदान करेंगे। हमारे छात्रों को तनाव, दबाव अथवा अवसाद जैसी कोई समस्या नहीं होगी। सब सभी का सम्मान करेंगे और नये ज्ञान का सृजन करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>8) शिक्षक नित नूतन नवाचार करें</strong></p>
<p style="text-align: justify;">The teacher of yesterday and the teacher of today will not be the teacher of tomorrow. यह बात 21वीं शताब्दी के शिक्षक पर पूर्णतया प्रभावी है। शिक्षक प्रतिदिन निर्धारित पाठों को पढ़ाता है किन्तु सत्र बदल गया, समय बदल गया, शिक्षक का तन-मन बदल गया तो फिर पढ़ाने का ढ़ंग क्यों नहीं बदलना चाहिए। यह हो सकता है कि पाठ्यक्रम, पुस्तकें और विद्यालय पूर्ववत् हों किन्तु शिक्षक, शिक्षार्थी और समय तो प्रतिपल बदलते है। शिक्षक वर्तमान चुनौतियों को स्वीकार करते हुए प्रतिदिन नये उत्साह के साथ नये प्रश्नों का निर्माण करें। छात्रों की क्षमताओं को बढ़ाने वाले प्रयोग करें। प्रत्येक छात्र को किसी न किसी गतिविधि से जोड़े तो कक्षा शिक्षण में आनन्द आयेगा ही।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>9) प्रत्येक छात्र की पृथक योजना बनायें</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मा. दीनानाथ बत्रा ने कहा है &#8211; “We do not teach a class but many classes in a class.” अर्थात् प्रत्येक छात्र स्वयं में एक संस्था है। उसकी अपनी प्रतिभा है। छात्र की प्रतिभा के अनुसार कम से कम एक दो परियोजना पृथक रूप से बनाएं और बनवाएं। Innovative pedagogical plan में शिक्षक छात्रों को उनकी रूचि के अनुसार नवाचार करने का अवसर देते है। इस प्रक्रिया में छात्रों को आत्म सम्मान और आत्म विश्वास की भावना आज की चुनौतियों का सामना सफलता पूर्वक कर लेते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-7934" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/01-IMG_20230821_150744-MK_and_U-Special_educa.width-1400-300x213.jpg" alt="" width="1361" height="966" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/01-IMG_20230821_150744-MK_and_U-Special_educa.width-1400-300x213.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/01-IMG_20230821_150744-MK_and_U-Special_educa.width-1400-1024x726.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/01-IMG_20230821_150744-MK_and_U-Special_educa.width-1400-768x545.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/01-IMG_20230821_150744-MK_and_U-Special_educa.width-1400.jpg 1400w" sizes="auto, (max-width: 1361px) 100vw, 1361px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>10) शिक्षक स्वयं उदाहरण बनें</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किसी ने कहा है &#8211; “Integrity is not a quality, it is the way of living.” सत्यनिष्ठा कोई गुण नहीं है यह जीवन जीने का एक ढ़ंग है। वर्तमान शिक्षक के जीवन में सद्गुण स्वाभाविक रूप से दिखायी दे। समय पालन, समर्पण, स्नेह, वक्तृता, प्रतिबद्धता, सहनशीलता, सदाशयता, सहयोग और सहकार आदि गुण आज के शिक्षक जीवन के अभिन्न अंग होंगे तो विद्यार्थी आदर्श बन जायेंगे। विद्यार्थी शिक्षक के ज्ञान को तो भूल भी जाते हैं, किन्तु अपने शिक्षक के गुणों का अनुकरण करना नहीं भूलते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(</strong><strong>11) आधुनिक तकनीकी का उचित प्रयोग करें</strong></p>
<p style="text-align: justify;">चार Learning skills के साथ ही तीन literacy को भी 21वीं शताब्दी के शिक्षक को परिभाषित किया गया हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>Information 2. Media 3. Technology.</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">वर्तमान शिक्षक के पास सूचनाओं का भण्डार है। शिक्षक को शिक्षण सम्बन्धी प्रयोगों की सूचनाओं को संकलित करना चाहिए। उनके आधार पर शिक्षण एवं व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिए। हम जो भी अच्छा करते हैं उसको संचार के माध्यम से समाज को देना चाहिए। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में तकनीकी का भरपूर प्रयोग करना चाहिए। तकनीकी का प्रयोग उचित कार्यों के लिए उचित मात्रा में उचित तरीके से करना चाहिए। इसके विषय में समय-समय पर अपने शिक्षार्थियों को भी अवगत कराना चाहिए। साक्षरता के कौशलों का प्रयोग करने पर शिक्षक और शिक्षा की स्थिति में सकारात्मक सुधार अवश्य होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">उक्त एकादश बिन्दु संकेतों से 21वीं शताब्दी का शिक्षक अपने एकादश बिन्दु और बना सकेंगे तथा समाज एवं राष्ट्र के कार्य के लिए स्वयं को समर्पित कर सकेंगे। वर्तमान शताब्दी बहुत तेजी से सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है। शिक्षक सतत् व्यापक लक्ष्यों की पूर्ति में शिक्षा के लक्ष्य को निश्चित रूप 2030 तक प्राप्त करने में सफल होंगे। इसके लिए सतत् प्रयास, स्व प्रेरणा से युक्त होकर शिक्षक अपने जीवन को सार्थक बना सकेंगे। श्री रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है – “जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है।” शिक्षक का अन्तिम ध्येय मात्र शिक्षण नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास की निम्न चौपाई 21वीं शताब्दी के शिक्षक के लिए पूर्ण प्रासंगिक है। शिक्षक इसके भाव को समझकर कक्षा शिक्षण में अपनायें।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>गुरु गृह पढ़न गए रघुराई</strong><strong>, अलप काल विद्या सब आई।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विद्या विनय निपुण गुण शीला</strong><strong>, खेलमहिं खेल सकल नृप लीला।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य है और विद्या भारती के अखिल भारतीय मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/teacher-is-the-architect-of-the-nation-and-the-conductor-of-knowledge-tradition/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्र शिल्पी और ज्ञान परंपरा का संवाहक है शिक्षक</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher/">21वीं शताब्दी का शिक्षक</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>गुरु आश्रम की ओर</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/towards-guru-ashram/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/towards-guru-ashram/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2023 04:21:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Guru Purnima]]></category>
		<category><![CDATA[Shishya]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<category><![CDATA[गुरु]]></category>
		<category><![CDATA[गुरु पूर्णिमा]]></category>
		<category><![CDATA[शिष्य]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=6797</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#x270d; गोपाल माहेश्वरी प्रातःकाल पाँच बजने को थे कि घर में खटर-पटर की आवाजों से गौरव की नींद टूट गई। उसे पता था दादा जी- दादी जी जल्दी जागते हैं&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/towards-guru-ashram/">गुरु आश्रम की ओर</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6798" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/guru-shishya_630dcc382daa0-300x169.jpg" alt="" width="1727" height="973" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/guru-shishya_630dcc382daa0-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/guru-shishya_630dcc382daa0-768x434.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/guru-shishya_630dcc382daa0.jpg 797w" sizes="auto, (max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<p style="text-align: justify;">प्रातःकाल पाँच बजने को थे कि घर में खटर-पटर की आवाजों से गौरव की नींद टूट गई। उसे पता था दादा जी- दादी जी जल्दी जागते हैं लेकिन आज तो सारा घर ही उनके साथ जागा-सा लग रहा था। उसने चादर से मुँह निकाला तो देखा न दादी बिस्तर पर थी न दादाजी, फिर भी उसका मन उठने का न हुआ। “गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती &#8230;.” श्लोक की ध्वनि स्नानघर से आ रही थी, मतलब दादाजी नहा रहे हैं। और “जाग जाग जमुना महारानी दुनिया दर्शन आई जी, जाग जाग हरि की पटरानी दुनिया दर्शन आई जी।।” मधुर प्रभाती के स्वर दादी के कंठ से फूटकर पूजा घर से आ रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">“दादी जी! देखो पिता जी बगीचे से कितने सारे फूल लाए हैं, मैं नहा ली हूँ इनकी माला बना दूँ?” गरिमा का स्वर सुनकर गौरव सोचने लगा “अरे चिड़िया से पहले ये मुनिया जाग गई और नहा भी ली!!” फिर जैसे अपने आप को टोका “अरे! जाग जा गौरव! आज अवश्य कोई विशेष बात है जो सारा घर अभी से तैयार हो गया है। उठ नहीं तो तू ही  रह जाएगा फसड्डी।” तभी माँ उधर आई और उसे चादर ओढ़े पर हाथ पैर हिलाते देख बोली “जागो मोहन प्यारे!” गौरव को माँ लाड़ से मोहन प्यारे कह कर ही उठाती थी। वह चटपट उठ बैठा। पहले धरती माता को फिर सामने लगे गोवर्द्धनधारी श्रीकृष्ण जी के चित्र को प्रणाम किया। दादा जी नहा कर आ गए थे, धोती बाँध रहे थे, उन्हें, फिर दादी जी और माता पिता को प्रणाम किया। छोटी बहिन गरिमा ने उसे हाथ जोड़कर “जय श्रीकृष्ण” कहा, उसे जय श्रीकृष्ण कह कर उत्तर दिया और फटाफट नहा-धोकर तैयार होने निकल पड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">थोड़ी देर बाद घर के सामने एक ताँगा रुका। हर में अब ताँगे नाममात्र को ही बचे थे पर घर में कार होने पर भी इस परिवार के लोग कभी कभी ताँगे की सवारी ही मँगवा लेते थे। द्वार पर ताँगा तो विशेष हर्षमय आश्चर्य का कारण बन गया था गौरव के लिए। माँ ने फल-फूल मिठाई से भरी डलियाएँ रखीं। गौरव ताँगेवाले के पास आगे बैठा शेष परिवार पीछे।</p>
<p style="text-align: justify;">‘सद्गुरुदेव भगवान की जय’ के घोष के साथ ताँगा चल पड़ा। घोड़े की लयबद्ध टापों और घुँघरुओं की आवाज से सूर्योदय के कुछ पूर्व का वातावरण अद्भुत अनुभव करा रहा था। शीतल पवन, फूलों की सुगंध चिड़ियों की चहचहाहट और पूरब में देखते ही देखते गहराता केसरिया प्रकाश। कुछ ही देर में वे नगर के बाहर आ पहुँचे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">अब उचित समय था कि गौरव अपना आज के आयोजन प्रयोजन संबंधित अज्ञान दूर करे। हमारे देश में उपनिषदों  की परंपरा ऐसे ही बनी होगी। किसी ने जिज्ञासावश किसी योग्य व्यक्ति से कुछ पूछा और उस व्यक्ति ने उसका वास्तविक समाधान किया तो किसी उपनिषद् का जन्म हुआ। मुझे लगता है जिज्ञासाभरे बचपन और समाधानकर्ता दादा-दादी का संवाद भी एक अलिखित अनाम उपनिषद् ही है जो सदियों से रचा जा रहा है निरंतर आज भी। क्या नाम दें इसे? बालोपनिषद्?</p>
<p style="text-align: justify;">आज भी एक ऐसा ही संवाद होने वाला था।</p>
<p style="text-align: justify;">“दादा जी! आज कहाँ जा रहे हैं हम सब?” पीछे मुँह घुमाकर प्रथम प्रश्न पूछा गया।</p>
<p style="text-align: justify;">“गुरु आश्रम।” उत्तर संक्षिप्त पर पूरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">“क्यों? आज क्या है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“आज है गुरुपूर्णिमा। हम गुरुदेव के दर्शन करने जा रहे हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">“गुरुपूर्णिमा यानि?”</p>
<p style="text-align: justify;">“भगवान वेदव्यास की जयंती। आषाढ़ी पूर्णिमा।”</p>
<p style="text-align: justify;">“भैया! आप पीछे आ जाओ न? आपकी और दादा जी की गर्दन दुखने लगेगी ऐसे बातें करोगे तो।” गरिमा के स्वर में भोले-सा अपनापन सुझाव बन फूट पड़ा था।</p>
<p style="text-align: justify;">“हाँ, दोनों भाई-बहन यहाँ बैठो मैं आगे बैठ जाता हूँ।” पिता जी ने कहा तो जैसे घोडा़ भी समझ गया हो, वह रुका, बच्चों को ऐसा ही लगा जबकि कमाल ताँगे वाले के हाथों की लगाम का था। गौरव पीछे आ गया।</p>
<p style="text-align: justify;">“गुरु यानि क्या?” प्रश्नोत्तरी आगे बढ़ी।</p>
<p style="text-align: justify;">“गुरु यानि मार्गदर्शक।”</p>
<p style="text-align: justify;">“ …” गौरव मौन होकर सोचने लगा। दादा जी जान गए कि उसे ठीक से समझ में नहीं आया है।</p>
<p style="text-align: justify;">“क्या करना क्या नहीं, कोई काम करने की सही विधि क्या है? उसके परिणाम अपने लिए और दूसरों के लिए कैसे हैं? यह सब कई बार हमें नहीं मालूम होता। हमारा स्वार्थ, मोह, घमंड कई बातें हैं जो हमें सच्चाई से भटका देती है तब जो हमें सच बताए, समझाए और कोई गलती हो रही हो तो सुधारे वह गुरु कहलाता है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“हमें सड़क पर संकेतक लगे दिखते हैं कौनसा रास्ता कहाँ जाता है बताते हैं, तो वे गुरु हैं क्या?” गौरव की तर्कग्रंथि जाग्रत हो रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">“क्या वे हमें यह बता सकते हैं कि हमारा उस रास्ते पर जाना ठीक है या नहीं?”</p>
<p style="text-align: justify;">“कभी कभी यह संकेत भी मिल जाते हैं। आगे खतरनाक मोड़ है, रास्ता बंद है, परिवर्तित मार्ग आदि।”</p>
<p style="text-align: justify;">“और फिर भी कोई उन्हें देखकर अनदेखा कर जाए तो?”</p>
<p style="text-align: justify;">“तब गलती ऐसा करने वाले की होगी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“ये संकेतक सूचनाएँ है। शास्त्रों में भी ऐसी कई अच्छाई बुराई संबंधित बातें लिखी हैं, पर कोई जाने, न जाने, जानकर भी माने, न माने, यहीं गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है बेटे! “दादा जी समझा रहे थे। सामने कोई सूचनापट लिखा दिखा पर उसे किसी ने नहीं पढा। तभी सुनसान रास्ते पर बढ़ते ताँगे वाले को एक गाँव वाले ने टोका।” इधर नहीं आगे बड़ा गड्ढा है उधर से निकल जाओ।”</p>
<p style="text-align: justify;">ताँगे वाला हँसा “अरे! रहने दे भाई! नया ज्ञान। बहुत बार गया हूँ इधर से।”</p>
<p style="text-align: justify;">“जमीन घँस गई है सड़क की। नहीं जाने दूँगा देखते नहीं घर-गृहस्थी के लोग बैठे हैं ताँगे में।” वह दोनों हाथ फैलाए ताँगे के आगे ही खड़ा हो गया। ताँगे का रास्ता बदलना ही पड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">“इस समय यह गाँव वाला गुरु की भूमिका में है ऐसा ही जीवन में भी होता रहता है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“इस गाँव वाले का काम तो मेरा गूगल-गुरु भी कर सकता है।” गौरव ने मोबाइल पर गूगल मेप खोला। सचमुच पहले वाला रास्ता बंद था।”</p>
<p style="text-align: justify;">“गूगल दिखा रहा है पर रोक सकता है क्या? गाँव वाले ने रोक दिया। देखो बेटे! गूगल, गुरु नहीं हो सकता।”</p>
<p style="text-align: justify;">“ज्ञान का भंडार है यह दादाजी! इतना ज्ञान किसी भी मनुष्य के पास नहीं हो सकता।” गौरव ने समझा यह तर्क दादा जी को निरुत्तर कर देगा, पर यह भ्रम भी टूट गया जब वे बोले “ज्ञान और सूचना में अंतर है। सूचना सचेत कर सकती है पर ज्ञान बोध कराता है। गूगल सबको समान रूप से अच्छी-बुरी, उपयोगी-अनुपयोगी जानकारियाँ बता देता है लेकिन उन जानकारियों, सूचनाओं को हितकारी अहितकारी, अभली बुरी इस, उपयोगकर्ता को  क्या बताना, कितनी बताना, कैसे बताना या उसे छुपा लेना, बताने न बताने का जानने वाले पर प्रभाव-दुष्प्रभाव यह सब विवेक, उस यंत्र के पास नहीं है इससे हमारा मस्तिष्क अनावश्यक जानकारियों से भी भरा रहता है। गुरु यह सब विचार करता है। ज्ञान देने के पहले पात्रता निर्माण करता है बढ़ाता है। इसलिए गूगल को गुरु मानने की भूल मत करना।”</p>
<p style="text-align: justify;">“इसलिए जीवन में गुरु बनाना बहुत जरूरी है नहीं तो मुक्ति नहीं होती, समझा कुछ? “अब दादी का मौन टूटा था वह पोते के सिर पर हाथ घुमाते हुए स्नेह से बोलीं।</p>
<p style="text-align: justify;">“मुक्ति क्या दादी?” गरिमा ने पूछ लिया जानना तो गौरव को भी था।</p>
<p style="text-align: justify;">अब बच्चों को क्या उत्तर देना इस प्रश्न का यह दादा जी जानते थे इसलिए दादी की ओर से वे बोल पड़े “मुक्ति यानि हम किसी बात को न जाने की उलझन से छूट जाएँ और उसे जान लें यही समझ लो तुम अभी। “दादी-दादा जी की ओर कृतज्ञता से देख रही थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6799" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/short-story-300x169.png" alt="" width="1717" height="967" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/short-story-300x169.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/short-story-1024x576.png 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/short-story-768x432.png 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/short-story-1536x864.png 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/short-story-2048x1152.png 2048w" sizes="auto, (max-width: 1717px) 100vw, 1717px" /></p>
<p style="text-align: justify;">“तो गौरव! गुरु बनाओगे या गूगल से ही काम चलाओगे?” पिता जी ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">“मुझे गुरु बनाने की क्या आवश्यकता? मैं नहीं बनाऊँगा।” गौरव ने गंभीर मुद्रा बनाकर कहा तो सब अवाक् रह गए। माँ का मुख क्रोध से तमतमा उठा “क्या उद्दंडता है यह गौरव! थप्पड़ खाओगे?”</p>
<p style="text-align: justify;">गौरव मुस्कुरा उठा “मैं गुरु नहीं बनाऊँगा क्योंकि मेरे गुरुदेव तो मेरे सामने बैठे हैं, मेरे दादा जी।”</p>
<p style="text-align: justify;">सब लोग खिलखिला उठे। ताँगा रुक गया। सामने  गुरु आश्रम सामने था।</p>
<p style="text-align: justify;">“आप मेरे गुरु हैं ही पर आपको भी किसी गुरु की आवश्यकता है दादा जी?” गौरव ने उतरते उतरते पूछ लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">“यह सच है बेटा कि बचपन में हमारे माता-पिता, घर-परिवार के बड़े, अनुभवी लोग भी गुरु की भूमिका में होते हैं। माँ तो जीवन की प्रथम गुरु होती ही है फिर बड़े होने के साथ साथ विद्यालय के शिक्षक भी यह भूमिका निर्वाह करने लगते हैं। और बड़े होने पर हमारे कामकाज के क्षेत्र में कई लोग कुछ न कुछ सिखाते हैं और कामकाज के क्षेत्र के बाहर भी कई लोग मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं। एक प्रकार से इन सबमें गुरुतत्व है। जिससे भी जीवन में कुछ भी आगे बढ़ने की दृष्टि मिले वे सब गुरुरूप हैं भगवान दत्तात्रेय ने ऐसे ही चौबीस गुरु बनाए थे उनमें तो कीट पतंगे पशु-पक्षी तक भी हैं फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या? “दादा जी ने समझाया।</p>
<p style="text-align: justify;">“पर आपके गुरु के बारे में नहीं बताया आपने।” गौरव ने जिज्ञासा की।</p>
<p style="text-align: justify;">“अभी मैंने जो बताए वे संसार का ज्ञान देने वाले लोग हैं। अभिभावक, शिक्षक, मार्गदर्शक, आचार्य आदि नामों से पुकारकर हम इनसे श्रद्धापूर्वक बहुत कुछ जानते समझते सीखते है लेकिन जिसे सही अर्थों में गुरु कहते हैं वह इन सबसे श्रेष्ठ होता है वह हमें अध्यात्म का ज्ञान कराता है। हमारे और सारे संसार में एक ही परमात्मा है इसलिए सब हमारे जैसे ही हैं कोई दूसरा नहीं ऐसा अनुभव करवाने वाला ही गुरु है। हम आश्रम में ऐसे ही महात्मा के दर्शन सत्संग को आए हैं। जलता हुआ दीपक ही दूसरे दीपक को जला सकता है ऐसे ही वही सच्चा गुरु हो सकता है जो स्वयं अध्यात्म ज्ञान से पूर्ण हो। बड़े भाग्य से ही ऐसे पहुँचे हुए महापुरुष मिल पाते हैं। ऐसे गुरु भगवान से भी बड़े होते हैं क्योंकि वे ही हमें भगवान का दर्शन भी करा सकते हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">आश्रम में एक आम के वृक्ष के नीचे भगवा लंगोटी लगाए अत्यंत तेजस्वी महात्मा बैठे थे। दादा जी ने सपरिवार साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया। गौरव का मन उठने का हो ही नहीं रहा था। महात्मा जी ने उसके मस्तक पर हाथ स्पर्श कर उसे उठा लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">आश्रम में बने पंडाल में कोई प्रवचनकर्ता कह रहे थे &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>तीन लोक नौ खंड में गुरुसे बड़ा न कोय।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कर्ता करे न करि सकै</strong><strong>, </strong><strong>गुरू करे सो होय।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/namaskar-to-the-forest-god/" target="_blank" rel="noopener">नमस्ते वन देवता</a></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/towards-guru-ashram/">गुरु आश्रम की ओर</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/towards-guru-ashram/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>राष्ट्र शिल्पी और ज्ञान परंपरा का संवाहक है शिक्षक</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/teacher-is-the-architect-of-the-nation-and-the-conductor-of-knowledge-tradition/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/teacher-is-the-architect-of-the-nation-and-the-conductor-of-knowledge-tradition/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Dec 2022 07:17:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya Shikisha]]></category>
		<category><![CDATA[Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[shikshak]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=6064</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#x270d; डॉ. रवीन्द्र नाथ तिवारी शिक्षक का स्थान समाज में अनादिकाल से ही पूजनीय रहा है। शिक्षा का प्रमुख आधार शिक्षक ही होता है। शिक्षक विद्यार्थी के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/teacher-is-the-architect-of-the-nation-and-the-conductor-of-knowledge-tradition/">राष्ट्र शिल्पी और ज्ञान परंपरा का संवाहक है शिक्षक</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> डॉ. रवीन्द्र नाथ तिवारी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6080" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/WBTET-1200-300x167.jpg" alt="" width="1597" height="889" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/WBTET-1200-300x167.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/WBTET-1200-1024x569.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/WBTET-1200-768x427.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/WBTET-1200.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1597px) 100vw, 1597px" /></p>
<p>शिक्षक का स्थान समाज में अनादिकाल से ही पूजनीय रहा है। शिक्षा का प्रमुख आधार शिक्षक ही होता है। शिक्षक विद्यार्थी के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास कर समाज में सम्मानजनक स्थान पर स्थापित करने हेतु अनवरत प्रयासरत रहता है। राष्ट्र के समग्र विकास के साथ-साथ नागरिकों को सही दिशा एवं मार्गदर्शन देने तथा उनको गढ़ने का कार्य शिक्षक ही करता है। शिक्षक विद्यार्थी को उसकी क्षमतानुसार सही दिशा देने के साथ-साथ कल्याणकर्ता भी होता है तथा अपने विद्यार्थियों की कमजोरियों को दूर करते हुए उसे शिखर तक पहुँचाता है जहाँ वह पूर्णता प्राप्त कर सके। विद्यार्थी जब पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो जीवन पथ पर अग्रसर होने में आने वाली समस्याओं का आसानी से सामना करने में सक्षम हो जाता है। इस प्रकार शिक्षक किसी भी देश या राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है।</p>
<p>भारत में प्रत्येक वर्ष देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन की भारतीय सनातन संस्कृति के मूल तत्व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ एवं ’लोक कल्याण’ में अटूट निष्ठा थी। वह समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उन्होंने ब्रिटेन के एडिनवरा विश्वविद्यालय में अपने भाषण में कहा था कि “मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का सम्पूर्ण लक्ष्य, मानव जाति की मुक्ति तभी संभव है, जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शांति की स्थापना का प्रयत्न हो।” महर्षि अरविन्द ने शिक्षक के बारे में कहा था कि <strong>“शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुरमाली होते हैं</strong><strong>, </strong><strong>वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में परिवर्तित करते हैं। राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक ही होते हैं।” </strong>स्वामी विवेकानन्द के अनुसार<strong> “किसी भी राष्ट्र का विकास वहाँ की शिक्षा के अनुपात में होता है जो शिक्षा जीवन संघर्ष के अनुरूप चरित्रवान</strong><strong>, </strong><strong>दयालु और साहसी नहीं बना सके वह शिक्षा नहीं हो सकती। शिक्षा चरित्र</strong><strong>, </strong><strong>मन एवं कर्म को मजबूत और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है।”</strong> प्रत्येक बालक में जन्मजात कुछ मूल प्रवृत्तियाँ अन्तर्निहित होती हैं, शिक्षक उन मूल प्रवृत्तियों को परिमार्जित एवं परिष्कृत कर बालक को सही दिशा में ले जाने हेतु प्रयास कर उन्हें आवश्यकतानुसार नियंत्रित करने का भी कार्य करता है। शिक्षक, बालक को समाज तथा राष्ट्र की सेवा की दिशा की ओर प्रेरित करने का कार्य करता है। वह विद्यार्थियों को इस योग्य बनाता है कि शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वे परिवार, समाज तथा देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन भली भाँति कर सके।</p>
<p>शिक्षक, विद्यार्थी का आदर्श होता है तथा वह अपनी शिक्षा के द्वारा विद्यार्थियों में आदर्श गुणों का विकास कर आदर्श नागरिक बनने की दिशा में सतत् प्रयास करता है। बालक के चरित्र निर्माण और उनमें नैतिक मूल्यों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षक द्वारा दी गयी शिक्षा ही शिक्षार्थी के सर्वांगीण विकास का मूल आधार होती है। शिक्षकों द्वारा प्रारंभ से ही पाठ्यक्रम के साथ ही साथ जीवन मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती है। शिक्षा ही हमें ज्ञान, विनम्रता, व्यवहारकुशलता और योग्यता प्रदान करती है। देश की संस्कृति और गौरवशाली इतिहास का सही अर्थों में संवाहक शिक्षक ही होता है। वह जिस प्रकार से अपने विचारों को विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत करता है, विद्यार्थी तदनुरूप चिंतन और उसका क्रियान्वयन करते हैं। प्रत्येक नागरिक राष्ट्र निर्माण में सहायक होता है और एक शिक्षक अपने पुरुषार्थ से विद्यार्थियों के अन्तर्मन में राष्ट्रप्रेम की भावना को पिरोकर उन्हें श्रेष्ठ नागरिक बनाकर अपने राष्ट्र निर्माण के दायित्वों का निर्वहन करता है। आचार्य चाणक्य ने कहा है- <strong>“शिक्षक कभी साधारण नहीं होता</strong><strong>, </strong><strong>प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।”</strong></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6082" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/bihar_6th_phase_teacher_recruitment_for_stet_2019_candidates_1625240246-300x169.webp" alt="" width="1457" height="821" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/bihar_6th_phase_teacher_recruitment_for_stet_2019_candidates_1625240246-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/bihar_6th_phase_teacher_recruitment_for_stet_2019_candidates_1625240246.webp 640w" sizes="auto, (max-width: 1457px) 100vw, 1457px" /></p>
<p>वर्तमान परिदृश्य में भारतीय शिक्षा जगत में कई चुनौतियां हैं, यथा- शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण, शिक्षकों की कमी और योग्य शिक्षक का चुनाव आदि। भारतीय परिवेश को ध्यान मे रखकर शिक्षा एवं अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान किये जाने चाहिए ताकि सामान्य शिक्षा एवं अध्यापक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाई जा सके। आज के समय में युवा और छात्र समुदाय भी एक गहरे संघर्ष में हैं। उसके जीवन की चुनौतियां काफी कठिन हैं। बढ़ती स्पर्धा, निजी क्षेत्रों की कार्यस्थितियां, सामाजिक तनाव और कठिन होती पढ़ाई जैसी युवाओं के लिए कई चुनौतियां हैं। इसका समाधान शिक्षक के पास है और शिक्षक ही इन समस्त चुनौतियां के लिए युवाओं को तैयार कर सकता है। <strong>भारत केंद्रित शिक्षा हेतु सात प्रमुख तत्व हैं- </strong><strong>1.</strong><strong>सही इतिहास दृष्टि</strong><strong>; 2.</strong><strong>स्वतन्त्रता का सही इतिहास</strong><strong>; 3.</strong><strong>कला</strong><strong>, </strong><strong>साहित्य व विज्ञान में भारतीय परम्परा का ज्ञान</strong><strong>; 4.</strong><strong>शिक्षा में भारतीय मूल्य</strong><strong>; 5.</strong><strong>सबको समान शिक्षा</strong><strong>; 6.</strong><strong>संस्कृत शिक्षा का प्रसार तथा </strong><strong>7.</strong><strong>स्वदेशी के भाव का जागरण।</strong> इस सप्त सूत्रों के माध्यम से विद्यार्थियों और सम्पूर्ण समाज जागरण का कार्य शिक्षक ही कर सकता है।</p>
<p>आधुनिक परिवेश में समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जो अवमूल्यन दृष्टिगोचर हो रहा है, निश्चित रूप से इस हेतु समाज के समस्त जनमानस के साथ-साथ प्रचलित शिक्षा प्रणाली भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। आज के मशीनी युग एवं उपभोक्तावादी जीवन में अध्यात्म में कमी, संस्कारों में कमी, शिक्षक के प्रति सम्मान में अपेक्षाकृत कमी, मूल्यों का क्षरण, बच्चों में बढ़ता तनाव एवं अवसाद, हिंसा की प्रवृत्ति आदि चिंता का विषय है। निश्चित रूप से इन समस्याओं के निराकरण एवं निदान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की प्रमुख भूमिका हो सकती है। आजादी के अमृतकाल के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के समग्र विकास हेतु जो लक्ष्य तय किया है उसमें शिक्षा और शिक्षक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। स्वावलंबी भारत अभियान, आत्मनिर्भर भारत अभियान तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में शिक्षकों की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण है। आलय, विद्यालय और देवालय के माध्यम से होने वाले व्यक्ति निर्माण कार्य के पुरोधा एवं कर्ता-धर्ता क्रमशः माता-पिता, शिक्षक और संत हैं। शिक्षा के माध्यम से ही संस्कार प्रसारित होने से ही राष्ट्र निर्माण होता है तथा इस प्रसारण का सबसे प्रभावी माध्यम केवल शिक्षक ही है। शिक्षा को मुक्तकरी, युक्तकरी, अर्थकरी तथा युगानुकूल बनाने में शिक्षक की भूमिका प्रभावकारी हो सकती है।</p>
<p>(लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष है एवं भारतीय शिक्षण मण्डल महाकौशल प्रान्त अनुसंधान प्रकोष्ठ के प्रान्त प्रमुख हैं।)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-teacher-is-the-student-not-the-class-or-subject/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षक कक्षा या विषय के नहीं, विद्यार्थी के!</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/teacher-is-the-architect-of-the-nation-and-the-conductor-of-knowledge-tradition/">राष्ट्र शिल्पी और ज्ञान परंपरा का संवाहक है शिक्षक</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/teacher-is-the-architect-of-the-nation-and-the-conductor-of-knowledge-tradition/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कोविड पश्चात् शिक्षा – विद्यालय व अभिभावकों की भूमिका</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/role-of-school-and-parents-in-post-covid-education/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/role-of-school-and-parents-in-post-covid-education/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Apr 2022 06:41:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Corona]]></category>
		<category><![CDATA[Covid]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[school]]></category>
		<category><![CDATA[student]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=5196</guid>

					<description><![CDATA[<p> &#8211; विजय नड्डा विद्यालय प्रारम्भ होते ही सुनसान पड़े विद्यालय परिसर बच्चों की किलकारियों से फिर से गूंजने लगे हैं। विद्यालय प्रारम्भ होने से बच्चों, अभिभावकों तथा विद्यालयों ने राहत&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/role-of-school-and-parents-in-post-covid-education/">कोविड पश्चात् शिक्षा – विद्यालय व अभिभावकों की भूमिका</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; विजय नड्डा</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5200" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-300x200.jpg" alt="" width="1298" height="865" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/1627203939_rajasthan-school-reopening-1200x800-1.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1298px) 100vw, 1298px" /></p>
<p>विद्यालय प्रारम्भ होते ही सुनसान पड़े विद्यालय परिसर बच्चों की किलकारियों से फिर से गूंजने लगे हैं। विद्यालय प्रारम्भ होने से बच्चों, अभिभावकों तथा विद्यालयों ने राहत की सांस ली है। ज्ञात इतिहास में शायद ही ऐसा कोई कालखंड रहा हो जब दो वर्ष तक शिक्षा का औपचारिक प्रवाह रुका हो। बच्चे घरों की चारदीवारी में सहमे से स्वयं को कैद अनुभव करते थे। बदली हुई परिस्थिति से बच्चे सबसे जल्दी सामंजस्य बैठा लेते हैं इसलिए उन्होंने तो अपनी दुनिया घर व गलियों में बसा ली थी। बच्चों के भविष्य को लेकर अभिभावकों की चिंता तथा विद्यालयों प्रबंधन की परेशानी चरम पर थी। गैरसरकारी विद्यालयों में सेवारत आचार्य व अन्य कर्मचारी अपनी जीविका पर मंडराए संकट से घबरा कर धैर्य खो रहे थे। देर से ही सही लेकिन सब कुछ सामान्य होने पर सब ने राहत की सांस ली है। बच्चों के शोर शराबे तथा बेमतलब की भागदौड़ से सभी के चेहरे पर मुस्कराहट देखी जा सकती है।</p>
<p><strong>लर्निंग गैप्स को करना होगा कवर</strong></p>
<p>दो वर्ष तक औपचारिक पढ़ाई का रूक जाना अपने आप में एक बड़ी घटना है। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित नन्हें-मुन्ने बच्चों की पढ़ाई हुई है। वैसे तो ऊपर से सब कुछ सामान्य दिखता है, कक्षाकक्ष की पढ़ाई भी शुरू हो गई है लेकिन शिक्षाविद बच्चों में आए लर्निंग गेप के कारण हुए लर्निंग लॉस को लेकर चिंतिंत हैं। इस चिंता को वे लोग ही समझ पा रहे हैं जिन्होंने शिक्षा को पूजा या साधना माना है। विद्या भारती के अधिकारी व आचार्य लगभग एक  वर्ष से इस विषय पर कार्य कर रहे हैं। लर्निंग गेप को कवर करने के लिए प्रत्येक विषय के कक्षानुसार ब्रिज कोर्स बनाए जा रहे हैं। विद्या भारती के विद्यालयों में अवकाश में विशेष कक्षाओं तथा शेष समय में अतिरिक्त कक्षाओं की योजना की जा रही है। लर्निंग गेप को कवर करना अत्यंत आवश्यक है। यह नहीं हो पाने पर बच्चे के जीवन में यह लॉस हमेशा कमी बन कर दस्तक देता रहेगा।</p>
<p><strong>ऑनलाइन शिक्षा को रखना होगा साथ</strong></p>
<p>आपदा अवसर लेकर भी आती है। कम से कम शिक्षा जगत ने तो इस कहावत को ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ चरितार्थ किया है। कल तक ईमेल देखने व करने में असहाय हमारे आचार्य अब आत्मविश्वास पूर्वक ऑनलाइन कक्षाओं का प्रभावी ढंग से संचालन कर रहे हैं। कोविड संकट के कारण ही सही लेकिन आभासी दुनिया में शिक्षकों के प्रवेश ने स्वयं उनके विकास की अनन्त संभावनाएं खोल दी हैं। कोविड से पूर्व बहुत सारे शिक्षक स्वयं को डिजिटली अशिक्षित मानते थे। वे अपने फोन पर कुछ करने के लिए अपने छात्रों पर पूर्णतः निर्भर से थे। बच्चे घर में माता-पिता तथा विद्यालय में आचार्यों की इस बेबसी का खूब आनंद लेते थे। कोविड की इस आपदा में आचार्यों को डिजिटली साक्षर किया है। आवश्यकता है कि औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ हो जाने पर भी शिक्षक ऑनलाइन शिक्षा का दामन न छोड़ें। आचार्य व छात्रों को समझना होगा कि गूगल गुरु का विकल्प नहीं हो सकता है लेकिन गूगल व गुरू की जुगलबंदी गुरू को शक्तिशाली अवश्य बना सकती है।</p>
<p><strong>कोविड पश्चात छात्र मन को भी समझना होगा</strong></p>
<p>कोविड के पश्चात शिक्षा प्रारम्भ होने पर अधिकांश विद्यालय व अभिभावक पढ़ाई को लेकर बच्चों पर पिल गए हैं। सबको लग रहा है कि दो वर्षों की सारी पढ़ाई छः महीनों में ही छात्रों पर उड़ेल दें। इस सारी परिस्थिति में सबको समझना होगा कि जब तक छात्र स्वयं पढ़ने की आवश्यकता अनुभव नहीं करेगा तब तक सबके प्रयास न केवल विफल होंगे बल्कि छात्र के मन मे आक्रोश, गुस्सा व निराशा बढ़ा कर समस्या को और गम्भीर बना देंगे। स्थिति कमोवेश ऐसी ही बन जाएगी- मर्ज बढ़ता ही गया ज्यूँ ज्यूँ दवा की&#8230;। पढ़ाई का आग्रह बढ़ाने से पहले बच्चे के मन को सहज करना होगा। इस परिस्थिति में आचार्यों व अभिभावकों को धैर्य व कुशलता से काम लेना होगा। प्यार, दुलार तथा तकनीकी कुशलता को माध्यम बनाना होगा। विद्यालयों को बड़े स्तर पर खेलों व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा। प्रतिदिन खेल का कालांश तथा जहां खेल के मैदान नहीं है वहां योग कक्षा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की मात्रा बढ़ानी होगी। पढ़ाई से भी पहले छात्र के चेहरे पर हंसी लाना सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए। शिक्षाविदों के इस निष्कर्ष को आचार्य, अभिभावकों तथा विद्यलयों को समझना होगा कि प्रसन्न मन से छात्र शीघ्र सीखता तथा याद रखता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5201" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/atoz_parentengagement-300x151.jpg" alt="" width="1206" height="607" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/atoz_parentengagement-300x151.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/atoz_parentengagement.jpg 360w" sizes="auto, (max-width: 1206px) 100vw, 1206px" /></p>
<p><strong>विद्यालय पर श्रद्धा व विश्वास बनाना आवश्यक</strong></p>
<p>कोविड के इन तीन वर्षों ने रिश्तों को भी आइना दिखाया है। मानव जाति पर आए उस भयंकर संकट में जहां एक ओर अनजान लोगों ने मदद का हाथ बढ़ाया है वहीं बहुत जगह अपने भी मुंह मोड़ते देखे गए हैं। कोविड के भयंकर दौर में लोग केवल ऑक्सीजन के लिए भाग दौड़ करते नहीं दिखे बल्कि अनेक जगह पर मानवता खुद भी वेंटिलेटर पर देखी गई है। बहुत जगह विद्यालयों के प्रति अभिभावकों का रवैया चिंताजनक दिखाई दिया। जो संस्था हमारे बालकों के जीवन को आकार देती है उसके प्रति बच्चों के मन में श्रद्धा व विश्वास पैदा करना अत्यंत आवश्यक है। विद्यालय व छात्र के रिश्ते को बाजार के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। छात्र के मन में विद्यालय व आचार्यों के प्रति श्रद्धा निर्माण करना आज की प्रथम आवश्यकता है। ध्यान रखें! आज विद्यालय के प्रति बच्चे के मन में श्रद्धा कम हुई तो कल हमारा नम्बर लगना निश्चित है। अनेक गैरसरकारी विद्यालयों में शिक्षकों को आंशिक वेतन ही मिला है। सरकार ने भी शिक्षकों का हाथ पकड़ने के बजाए एक प्रकार से अभिभावकों को फीस न देने के लिए ही उकसाया है। कोविड की इस त्रासदी में सरकार ने समाज के लगभग सब वर्गों की सहायता की, पैकेज दिए लेकिन गैरसरकारी विद्यालय, उन में सेवारत लाखों आचार्य व अन्य स्टाफ उपेक्षित हो गए। शिक्षा जगत के लिए सरकार का रवैया &#8216;हुए तुम दोस्त जिनके दुश्मन की उन्हें जरूरत क्या&#8217;, जैसा रहा। ऐसे में समाज को अपने आचार्य परिवार की चिंता करनी होगी। अभिभावकों को अन्य आवश्यक खर्चों की श्रेणी में डाल कर पिछली फीस स्वयं हो कर जमा करानी चाहिए।  याद रखें! हंसता, मुस्कराता व प्रसन्न आचार्य ही पूरे मनोयोग से हमारे बच्चे के जीवन को संवार सकता है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-right-time-for-radical-change-in-the-model-of-bharatiya-education-pre-and-post-corona/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षा के मॉडल में आमूलचूल परिवर्तन का सही समय : कोरोना पूर्व एवं पश्चात्</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/role-of-school-and-parents-in-post-covid-education/">कोविड पश्चात् शिक्षा – विद्यालय व अभिभावकों की भूमिका</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/role-of-school-and-parents-in-post-covid-education/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 54 (पठनीय विषयों का सांस्कृतिक स्वरूप)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-nature-of-readable-subjects/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-nature-of-readable-subjects/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Mar 2022 06:41:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=5080</guid>

					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति &#160; भारतीय ज्ञानधारा का मूल अधिष्ठान अध्यात्म है। अध्यात्म जब नियम व व्यवस्था में रूपान्तरित होता है, तब वह धर्म का स्वरूप धारण करता है। जब वह&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-nature-of-readable-subjects/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 54 (पठनीय विषयों का सांस्कृतिक स्वरूप)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5090 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-07-at-10.38.59-300x161.jpeg" alt="" width="571" height="306" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-07-at-10.38.59-300x161.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-07-at-10.38.59.jpeg 745w" sizes="auto, (max-width: 571px) 100vw, 571px" /></p>
<p>भारतीय ज्ञानधारा का मूल अधिष्ठान अध्यात्म है। अध्यात्म जब नियम व व्यवस्था में रूपान्तरित होता है, तब वह धर्म का स्वरूप धारण करता है। जब वह व्यवहार की शैली में उतरता है, तब संस्कृति बनता है। हमारे देश में, प्रत्येक घर में, विद्यालय में जो विचारों का आदान-प्रदान होता है, सब प्रकार के कार्यक्रमों में औपचारिक या अनौपचारिक पद्धति से जो ज्ञानधारा प्रवाहित होती है, उसका स्वरूप सांस्कृतिक होना चाहिए। यदि उसका स्वरूप भौतिक है तो वह भारतीय नहीं है और उसका स्वरूप सांस्कृतिक है तो वह भारतीय है। ऐसा स्पष्ट विभाजन हम कर सकते हैं।</p>
<p>दूसरा समझने का बिन्दु यह है कि सांस्कृतिक स्वरूप, भौतिक स्वरूप का विरोधी नहीं है। वह भौतिक स्वरूप के लिए भी अधिष्ठान है। सांस्कृतिक स्वरूप भौतिक स्वरूप से ऊपर है। इसी परिप्रेक्ष्य में आज हम पठनीय विषयों के सांस्कृतिक स्वरूप को समझेंगे।</p>
<p><strong>विषयों का वरीयता क्रम</strong></p>
<p>समग्र विकास की हमारी संकल्पना के अनुसार सभी विषयों का वरीयता क्रम निर्धारित होना चाहिए। यह क्रम ऐसा बनता है-</p>
<p>१. परमेष्ठी से सम्बन्धित विषय प्रथम क्रम में आयेंगे। ये विषय हैं- अध्यात्म शास्त्र, धर्म शास्त्र, तात्त्विक शास्त्र और संस्कृति।</p>
<p>२. दूसरे क्रम पर सृष्टि से सम्बन्धित विषय &#8211; भौतिक विज्ञान (इसमें रसायन विज्ञान, जीवन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, खगोल, भूगोल और विज्ञान के अन्य विषयों का समावेश होगा।), इनके साथ पर्यावरण व सृष्टि विज्ञान भी आयेंगे।</p>
<p>३. तीसरे क्रम पर समष्टि से सम्बन्धित विषय आयेंगे। यह क्षेत्र सबसे व्यापक है, इसमें सभी सामाजिक शास्त्र जैसे- समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, वाणिज्यशास्त्र, उत्पादनशास्त्र (सभी प्रकार की कारीगरी के शास्त्र, तंत्रज्ञान और कृषि कार्यों का समावेश होता है।) इनसे सम्बन्धित विषय-उपविषय अनेक हो सकते हैं।</p>
<p>४. व्यष्टि से सम्बन्धित विषय चौथे क्रम पर आयेंगे। इनमें योग, शारीरिक, मनोविज्ञान, आहारशास्त्र, गणित, संगीत, साहित्य आदि विषयों का समावेश होगा।</p>
<p>इस प्रकार व्यापकता के आधार पर विषयों की वरीयता निर्धारित होती है। वरीयता में जो विषय जितना ऊपर होता है, उसे उतनी ही छोटी आयु से पढ़ाना प्रारम्भ करना चाहिए। और पढ़ाते समय भी विषयों के परस्पर सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए पढ़ाना चाहिए।</p>
<p>अब हम कुछ विषयों का सांस्कृतिक स्वरूप जानेंगे &#8211;</p>
<p><strong>अध्यात्म</strong><strong>,धर्म, संस्कृति एवं तत्त्वज्ञान</strong></p>
<p>ये सभी आधारभूत विषय हैं। इन चारों विषयों को अन्य सभी विषयों का अधिष्ठान मानकर पढ़ाना चाहिए। अर्थात् शेष सभी विषय इनके प्रकाश में ही पढ़ाए जाने चाहिए। जब ऐसा होगा, तभी यह सांस्कृतिक स्वरूप माना जाएगा। समझने के लिए भाषा हो या भौतिक विज्ञान हो, अर्थशास्त्र हो या राज्यशास्त्र हो, तंत्रशास्त्र हो या संगणक हो, इन सभी विषयों का स्वरूप अध्यात्म के अविरोधी होगा और इनके खुलासे अध्यात्म के सिद्धांतों के अनुसार दिए जाएंगे, तभी इनका स्वरूप सांस्कृतिक कहलाएगा। यदि अन्य विषयों को विज्ञान के प्रकाश में पढ़ाया जायेगा तो उनका स्वरूप भौतिक कहलाएगा।</p>
<p>उदाहरण के लिए उत्पादन शास्त्र में यंत्र आधारित उद्योग होने चाहिए या नहीं। अथवा यंत्रों का उपयोग कितना करना चाहिए, यह निश्चित करते समय पहले यह देखा जाएगा कि इस सम्बन्ध में धर्म और अध्यात्म क्या कहते हैं। यदि इनकी सम्मति है तो करना चाहिए, अन्यथा त्याग देना चाहिए। ऐसे ही आहारशास्त्र हेतु धर्म, संस्कार, प्रदूषण व आरोगयशास्त्र का पहले विचार करना चाहिए। व्यक्ति की दिनचर्या का निर्धारण करते समय धर्म क्या कहता है, पहले इसका विचार करना चाहिए।</p>
<p>अध्यात्म, धर्म व संस्कृति का स्वतन्त्र रूप से भी अध्ययन आवश्यक है। चिन्तन के स्तर पर अध्यात्म शास्त्र का अध्ययन, व्यवस्था के स्तर पर धर्म शास्त्र का अध्ययन और व्यवहार के स्तर पर संस्कृति का अध्ययन शिशु अवस्था से लेकर उच्च शिक्षा तक सर्वत्र अनिवार्य होना चाहिए।</p>
<p><strong>आत्मतत्त्व की संकल्पना</strong></p>
<p>आत्मतत्त्व की संकल्पना केवल भारत में है। इस संकल्पना के स्रोत से समस्त ज्ञानधारा प्रवाहित हुई है। इसके आधार पर जीवनदृष्टि बनी है। हम यह भी कह सकते हैं कि भारतीय जीवनदृष्टि और आत्मतत्त्व की संकल्पना एक दूसरे में ओतप्रोत है। आत्मतत्त्व अनुभूति का विषय है। आत्मतत्त्व के समान ही अनुभूति भी भारत की विशेषता है। हमने अनुभूति प्राप्त नहीं की है, फिर भी हम अनुभूति का अस्तित्व स्वीकार करके चलते हैं। इस अनुभूति को बौद्धिक स्तर पर लाने के लिए तत्त्वज्ञान का विषय बना है। अनेक बार हम अंग्रेजी शब्द फिलोसॉफी का अनुवाद दर्शन करते हैं, जो उचित नहीं है। फिलोसॉफी के स्तर का शब्द तत्त्वज्ञान हो सकता है, दर्शन नहीं। आत्मतत्त्व की भांति दर्शन और अनुभूति शब्दों का अंग्रेजी अनुवाद नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>अध्यात्मशास्त्र हमें प्रमाण देता है</strong></p>
<p>अध्यात्मशास्त्र हमें प्रमाण व्यवस्था देता है। प्रमाण के लिए हम बौद्धिक स्तर पर उतरते हैं, और शास्त्रों की रचना करते हैं। अनुभूति आधारित शास्त्रों को ही हम प्रमाण मानते हैं। आज न तो हम अनुभूति करते हैं और न शास्त्रों का सूक्ष्म अध्ययन ही करते हैं और न उन्हें युगानुकूल पद्धति से समझते हैं। इसलिए हमारे शास्त्रों पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगाए जाते हैं। अतः जो विद्वान भारतीयता के पक्षधर हैं, उनके लिए अनुभूति के शास्त्रों का गहन अध्ययन और अनुसंधान का विशाल क्षेत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।</p>
<p>इसी प्रकार आज धर्म को विवाद का विषय बना दिया गया है। प्रथम तो धर्म को विवाद से मुक्त करने की आवश्यकता है। फिर उसे बौद्धिक जगत में प्रस्थापित करने की आवश्यकता है। यह भी अध्ययन और अनुसंधान का विषय है। धर्म का ही कृति रूप संस्कृति है। भारतीय जीवनशैली ही हमारी संस्कृति है। जबकि हम केवल सौन्दर्य को, नृत्यादि को, कला-कृतियों को और मात्र मनोरंजन को ही संस्कृति मान रहे हैं। सरकार का सांस्कृतिक मंत्रालय और विश्वविद्यालय दोनों संस्कृति को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रख रहे हैं। इस मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है। आज अध्यात्म के अभाव में संस्कृति मात्र मनोरंजन में कैद हो गई है। हमें उसे भी कैद से मुक्त करवाना है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5089 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-07-at-10.38.58-300x143.jpeg" alt="" width="577" height="275" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-07-at-10.38.58-300x143.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-07-at-10.38.58.jpeg 700w" sizes="auto, (max-width: 577px) 100vw, 577px" /></p>
<p><strong>वैश्विकता के सन्दर्भ में इनका अध्ययन</strong></p>
<p>अध्यात्म, धर्म, संस्कृति एवं तत्त्वज्ञान जैसे विषयों पर आज वैश्विकता का साया पड़ा हुआ है। इसलिए हमें वैश्विकता को भी सांस्कृतिक अर्थ में समझने की आवश्यकता है। भारत प्रारम्भ से ही सांस्कृतिक वैश्विकता का पक्षधर रहा है। अतः वैश्विकता के भारतीय अर्थ को प्रस्थापित करने से ही इन विषयों के साथ न्याय होगा।</p>
<p>आज अधिकांश लोग यह मानते हैं कि ये चारों विषय अत्यधिक गंभीर व कठिन हैं। इसलिए इन विषयों को छोटी आयु में नहीं पढ़ाया जा सकता। क्योंकि उच्च शिक्षा के कुछ ही छात्र इन विषयों को समझ पाते हैं। परन्तु यह मानकर चलना उचित नहीं है। इन विषयों को पढ़ने से पूर्व इनके संस्कार करने होंगे। इन विषयों को आचार के रूप में पालन करवाना होगा। तत्पश्चात इन विषयों को विचार के स्तर पर लाना होगा। आचार और विचार को आध्यात्मिक बनाने के बाद इनके बारे में शास्त्रीय पद्धति से पढ़ना होगा। ये सब किए बिना सीधे शास्त्र पढ़ने से कोई लाभ नहीं मिलेगा।</p>
<p>आत्मतत्त्व, ईश्वर, धर्म, सम्प्रदाय, संस्कृति, सभ्यता और कर्मकाण्ड जैसे विषयों के बारे में तुलनात्मक अध्ययन करना, देश-विदेश में इन क्षेत्रों में क्या चल रहा है, उसका आकलन करना। इनकी क्या समस्या है, उसे पहचानना, उनका निराकरण कैसे हो सकता है, इसका ज्ञानात्मक विचार करना। यह सब इन विषयों के अन्तर्गत आता है।</p>
<p><strong>हमें अपनी त्रुटि को सुधारना है</strong></p>
<p>आधारभूत विषयों के सम्बन्ध में सारभूत बात यही है कि हमने इन विषयों की घोर उपेक्षा की है, और पाश्चात्य विद्वानों ने इनको गलत समझा है। आज भी पाश्चात्य विद्वान हमारे शास्त्र ग्रंथों का ग़लत अर्थ प्रस्तुत करते हैं और उन्हें अधिकृत मनवाने का आग्रह करते हैं। आश्चर्य तो तब होता है, जब हमारे ही विश्वविद्यालयों के अध्ययन मंडल पाश्चात्य ग्रंथों को अधिकृत मान लेते हैं। मेक्समूलर के समय से शुरु हुई यह परम्परा आज भी यथावत है। हमें इस गलत परम्परा से मुक्त होने की आवश्यकता है। इस गलत परम्परा से मुक्त होने के लिए हमें इन विषयों का गहन अध्ययन और अनुसंधान करना होगा।</p>
<p>भारत की पहचान आध्यात्मिक देश की है। भारतीय समाज धर्मनिष्ठ है, भारत की संस्कृति सर्वसमावेशी है। इस बात को ज्ञानात्मक दृष्टि से समझकर, गहन अध्ययन और अनुसंधान कर, पठनीय विषयों को सांस्कृतिक स्वरूप में लाकर उन्हें शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित कर सकते हैं और शिक्षा को पुनः भारतीय बना सकते हैं।</p>
<p><strong>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)</strong></p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-form-of-language/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 54 (‘भाषा’ का सांस्कृतिक स्वरूप भाग एक)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-nature-of-readable-subjects/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 54 (पठनीय विषयों का सांस्कृतिक स्वरूप)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-nature-of-readable-subjects/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
