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	<title>Teacher Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<title>Teacher Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>भारतीय शिक्षा का दार्शनिक आधार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Jun 2022 10:43:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षा दर्शन]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; शिव कुमार शर्मा शिक्षा मनुष्य का परिष्कार करती है। शिक्षा ही उसके गुणों का संवर्द्धन कर देवत्व की ओर प्रेरित करती है। किन्तु शिक्षा के उद्देश्य उसके दर्शन से&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; शिव कुमार शर्मा</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-5501" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-22-at-6.53.44-PM-1-300x200.jpeg" alt="" width="1091" height="727" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-22-at-6.53.44-PM-1-300x200.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-22-at-6.53.44-PM-1.jpeg 600w" sizes="(max-width: 1091px) 100vw, 1091px" /></p>
<p>शिक्षा मनुष्य का परिष्कार करती है। शिक्षा ही उसके गुणों का संवर्द्धन कर देवत्व की ओर प्रेरित करती है। किन्तु शिक्षा के उद्देश्य उसके दर्शन से नियंत्रित होते हैं। शिक्षा साध्य है अथवा साधन इसको लेकर चिंतकों में मतभेद हैं।</p>
<p>भारतीय शिक्षा परम्परा प्राचीनतम है किन्तु कालक्रम में यह परम्परा विच्छिन्न हो गई। आज आवश्यकता है शिक्षा पर भारतीय मनीषियों के विचारों को जानने-समझने और शिक्षण पद्धति में उनका उपयोग कर भारत को विश्वगुरु के रूप में पुनः अभिषिक्त करने की।</p>
<p>भारतीय मनीषा में अनेक चिंतकों ने शिक्षा पर गहन विचार किया है। उन्होंने इसके उद्देश्य, स्वरूप और दिशा पर पर्याप्त विमर्श किया है।</p>
<p>भारतीय परम्परा में विद्या को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वेदांग के छः अंगों में शिक्षा भी सम्मिलित है। यहाँ उसका विस्तार करते हुए उच्चारण, व्याख्या, विधियों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। विद्या यहाँ परा व अपरा दो वर्गों में विभाजित है। भारतीय परम्परा इसे धर्म के दस लक्षणों में स्थान देती है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमनिद्रियनिग्रहः ।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकंधर्मलक्षणम् ।।</strong></p>
<p style="text-align: right;"> &#8211; मनुस्मृति</p>
<p>विष्णु पुराण में भी इसका उल्लेख है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>आयासायापरम् कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ।।</strong></p>
<p>&#8211; विष्णुपुराण  1/19/41</p>
<p>अनेक चिंतकों और रचनाकारों ने विद्या (आध्यात्मिक, श्रेष्ठ) एवं अविद्या (लौकिक) इसे दो रूपों में वर्गीकृत किया है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभुतिमउपासते ।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भुत्याम्रता : ।।</strong></p>
<p>अर्थात् जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वो गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। पर जो केवल विद्या में ही रत रहता है वह उससे भी गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। यहाँ शास्त्रकार का मन्तव्य विद्या के अनुप्रयोग को लेकर है। विद्या प्राप्ति के साथ ही विवेकसम्मत प्रयोग भी अभीष्ट है। यह चिंतन मनुष्य के लिए लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के ज्ञान को आवश्यक मानता है। इनमें से किसी एक के बिना वह अपूर्ण है और अपने दायित्वों का निर्वाह सम्यक् ढंग से नहीं कर सकेगा।</p>
<p><strong>दर्शन के संदर्भ में </strong></p>
<p>दर्शन का सामान्य अर्थ है देखना, जानना, ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’। जिसे देखा जाए अर्थात् सत्य का दर्शन किया जाए। दृश्यते यथार्थतत्त्वमनेन अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ तत्त्वों की अनुभूति हो। ज्ञान की अनेक शाखाओं में दर्शन विशिष्ट है। यह मूल की खोज करता है। वस्तुतः यह ज्ञान की वह शाखा है जिसके माध्यम से सत्य की प्राप्ति होती है।</p>
<p>हमारी संस्कृति अध्यात्म केन्द्रित है। परमतत्त्व की प्राप्ति ही हमारी साधना का उद्देश्य है। सभी दार्शनिक परम्पराओं में अद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि आत्मचिंतन और परमतत्त्व का अन्वेषण ही प्रमुख है। उन्होंने आत्मानुभूति को ही मुक्ति का मार्ग माना है। ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’ अंधकार से प्रकाश की ओर की यात्रा है, जिसमें अमृत जीवन ही काम्य है।</p>
<p>जीवन को उसके बृहत् परिप्रेक्ष्य (मात्र सांसारिक नहीं) में देखना ही उसका उद्देश्य है। इस परम्परा में प्रकृति और मनुष्य में साहचर्य एवं परस्पर पूरकता है जबकि भोगवाद इसके विपरीत है।</p>
<p>ये सांख्य, न्याय, वेदान्त, योग, वैशेषिक, मीमांसा छः आस्तिक दर्शन है।</p>
<p>किसी भी साध्य को बिना साधन के प्राप्त नहीं किया जा सकता है। दर्शन लक्ष्य की बात करता है और शिक्षा साधन की। शिक्षा के स्वरूप निर्धारण में दर्शन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य, पाठ्यक्रम, प्रविधियाँ, शिक्षक, विद्यार्थी के बहुस्तरीय संबंध निर्धारण में दर्शन की महत्त्वूपर्ण भूमिका है। भारतीय दर्शन के दो प्रकार के धारक हैं &#8211; आस्तिक और नास्तिक। वेद का मूलाधार मानने वाले आस्तिक हैं। जबकि नास्तिक वेद को प्रमाण नहीं मानते।</p>
<p>सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा प्रवर्तित है। यह द्वैतवादी दर्शन है। जिसमें प्रकृति और पुरुष दो मूल तत्त्व हैं। यहाँ ज्ञान के दो रूपों का उल्लेख किया गया है। पदार्थ और विवेक ज्ञान। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, इस ज्ञान की प्राप्ति के साधन हैं। महर्षि कपिल के अनुसार शिक्षा वह है जो मनुष्य को प्रकृति और पुरुष की भिन्नता का ज्ञान कराती है। ज्ञान प्राप्ति की इस यात्रा में ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहम्, बुद्धि और आत्मा उपकरण हैं।</p>
<p>न्याय दर्शन के प्रवर्तक महर्षि गौतम हैं। न्याय दर्शन के अनुसार, सृष्टि का निमित्त कारण ईश्वर है और आधार है पदार्थ। न्याय दर्शन में  ज्ञान को दो भागों में विभक्त किया गया है। अनुभवजन्य ज्ञान और स्मृतिजन्य ज्ञान। आधुनिक शब्दावली में यह ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान कहा जाता है। इसमें शिक्षा वह है जो मनुष्य को पदार्थ और आत्मतत्त्व के स्वरूप से साक्षात्कार कराती है। महर्षि गौतम ने शिक्षा के चार स्तर स्वीकार किए हैं।</p>
<p>(क) प्रमाता &#8211; ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी</p>
<p>(ख) प्रमेय &#8211; ज्ञान का विषय यानि पाठ्यचर्या</p>
<p>(ग) प्रमाण &#8211; ज्ञान प्राप्ति का उपकरण, साधन एवं विधियाँ</p>
<p>(ध) प्रमिति &#8211; यथार्थ ज्ञान। जिसे हम आउटकम कहते हैं अर्थात् शिक्षार्थी ने क्या सीखा उसे क्या उपलब्धि हुई।</p>
<p>न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान-तुलना एवं शब्द के माध्यम से शिक्षार्थी ज्ञान की प्राप्ति करता है।</p>
<p>महर्षि कणाद द्वारा प्रवर्तित वैशेषिक दर्शन गोचर जगत् को सत्य मानते हुए द्रव्य आदि पदार्थों के तत्त्वज्ञान से स्थायी कल्याण एवं मोक्ष में विश्वास करता है। पदार्थ ज्ञान से अज्ञान दूर होता है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।</p>
<p>आचार्य शंकर द्वारा प्रवर्तित वेदांत दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दर्शन है। इसे हम मेरुदंड भी कह सकते हैं। यह जीव और परमात्मा को अद्वैत मानता है। कालान्तर में इसका विस्तार हुआ और रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत तथा मध्वाचार्य कृत द्वैताद्वैत इसकी शाखाएँ बनीं। शंकर के ब्रह्मसूत्र के अनुसार ‘जगन्मिथ्या ब्रह्मसत्य’। वेदान्त का ब्रह्म कर्ता और भोक्ता दोनों भूमिकाओं में हैं, दोनो ही हैं। यहाँ ज्ञान को दो स्वरूपों में विभाजित किया गया है।</p>
<p>अपरा &#8211; लौकिक एवं व्यावहारिक ज्ञान</p>
<p>परा &#8211; आध्यात्मिक ज्ञान</p>
<p>विद्या वही जो मुक्त करे &#8211; ‘सा विद्या या विमुक्तये’</p>
<p>वेदांत परम्परा में ज्ञान के स्रोत हैं &#8211; प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। ज्ञान का लक्ष्य यहाँ इस रूप में वर्णित है -श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5502" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-22-at-6.53.44-PM-300x225.jpeg" alt="" width="1124" height="843" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-22-at-6.53.44-PM-300x225.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-22-at-6.53.44-PM.jpeg 400w" sizes="(max-width: 1124px) 100vw, 1124px" /></p>
<p>योगदर्शन &#8211; महर्षि पतंजलि द्वारा प्रवर्तित है। साधना और अभ्यास के माध्यम से इसमें ज्ञान प्राप्ति का प्रावधान है। योग का शाब्दिक अर्थ है- चित्तवृतियों का निरोध। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है ‘योगः कमसु कौशलम्’ चित्तवृतियों का निरोध इसलिए कि कर्मो में कुशलता प्राप्त की जा सके। ज्ञान योग, कर्म योग और राजयोग इसके तीन रूप बताए गए हैं। शिक्षा का अभिप्रेत यहाँ प्रकृति तत्त्व से ईश्वर तत्त्व की ओर जाना है। शिक्षा का लक्ष्य है- ‘परमानंद’ की प्राप्ति और उसका साक्षात्कार। योग दर्शन में ज्ञान प्राप्ति के जिन साधनों का उल्लेख है वे हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और योग। ज्ञान प्राप्ति की इस यात्रा के पड़ाव हैं &#8211; यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें प्रथम चार क्रियाएँ हैं, फिर तीन अवस्थाएँ हैं एवं अंतिम समाधि सम्प्राप्ति है। यह सिद्धावस्था है जिसमें वह साक्षात्कार करने के लिए सिद्ध हो जाता है। ये सभी स्थितियाँ परस्पर पूरक हैं।</p>
<p>उपनिषद् वेदों का विस्तार है, उनकी व्याख्या है। वस्तुतः उपनिषद् सिद्धांतों के अनुप्रयोग की दिशा में अगला पड़ाव है। उपनिषद् यानि प्राचीन गुरुकुलों में परम्परा में गुरु के निकट बैठकर ज्ञान प्राप्त करना।</p>
<p>ज्ञानयात्रा अत्यन्त कठिन है। ज्ञान मिल नहीं सकता, कोई किसी को दे नहीं सकता। ज्ञान अर्जित करना पड़ता है और यह स्वयं के प्रयास के द्वारा ही संभव है।</p>
<p>भारतीय परम्परा में पात्र और सुपात्र का उल्लेख मिलता है। वस्तुतः शिक्षा अपनी योग्यता और क्षमतानुसार वैयक्तिक रूप में ही ग्रहण की जा सकती है।</p>
<p>ज्ञान सुपात्र को ही प्रदान किया जाना चाहिए। कुपात्र को ज्ञान देने से उसके दुष्परिणाम के अनेक उदाहरण इतिहास में मिलते हैं।</p>
<p>मीमांसा दर्शन को वेदांत दर्शन के क्रम में देखने की परंपरा है। यह पूर्व मीमांसा कहा जाता है जबकि वेदान्त दर्शन को उत्तर मीमांसा की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। पूर्व मीमांसा में धर्म के विशद स्वरूप का विवेचन है जबकि उत्तर मीमांसा (वेदान्त) ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करता है। वह कैसा है?, क्या है आदि। वस्तुतः हम कह सकते हैं कि धर्म ज्ञान के परस्पर विरोधरहित वेदमंत्रों का विवेचन ही मीमांसा है।</p>
<p>वैदिक संस्कृत में वाक्यशास्त्र का प्रयोग मीमांसा के लिए ही किया जाता है। वहाँ कहा गया है कि वाक्यां द्वारा जिस बोध ज्ञान की प्राप्ति होती है उसे वाक्यार्थ बोध अथवा शब्द बोध कह सकते हैं।</p>
<p>व्याकरणशास्त्र में भी शब्द से अर्थ के बोध को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है -अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना। वाक्यार्थ, लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ (ध्वनि)</p>
<p>आधुनिक युग में अनेक चिंतकों -विचारकों ने शिक्षा पर विचार किया। उनको चिन्तन तत्कालीन परिस्थितियों में भारतीय शिक्षा की दशा और दिशा को प्रतिबिम्बित करने के साथ ही प्रेय मार्ग की ओर भी संकेत करता है। जहाँ शिक्षा भारतीय परम्पराओं से संबद्ध होने के साथ ही आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करने में समर्थ  है।</p>
<p>इस क्रम में आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द प्रमुख हैं। उन्होंने वेद-वेदांग को ज्ञान का स्रोत मानते हुए आर्य दर्शन प्रतिपादित किया। अपने शास्त्रार्थ के लिए प्रसिद्ध महर्षि दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में अपने विचारों को प्रस्तुत किया- ‘विद्या विलास मनसो धृतशील शिक्षा’।</p>
<p>आधुनिक भारतीय निर्माताओं में विवेकानन्द अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। भारतीय मनीषा का लोहा पश्चिम में मनवाने वालों में वे अग्रगण्य हैं। उन्होंने वेदान्त को नव्य वेदांत के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया। शंकराचार्य प्रणीत वेदान्त का वे आधुनिक विवेचन करते हैं। मनुष्य में अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर भारतीयता के नवजागरण कालीन व्याख्याकारों में प्रमुख हैं। कलाविद् का हृदय और चिंतक का मस्तिष्क दोनों एक साथ वहाँ उपस्थित हैं। वे विश्वबोध से युक्त उनकी दृष्टि में समस्त प्राणियों के प्रति एकात्मभाव है। टैगोर जीवन और सृष्टि के बीच समरसता की स्थापना हो जिससे समूची मानवता और विश्व के बीच की विषमताएँ दूर हो सकेगी।</p>
<p>भारतीय चिंतन में शिक्षा की अंतिम परिणति प्रकृति को संस्कृति की ओर ले जाना है विकृति की ओर नहीं। संस्कृति की ओर जो ले जाए वही शिक्षा है।</p>
<p>भारतीय दर्शन परम्परा भगवद् प्राप्ति और साक्षात्कार की बात करती है। यह ध्यान में रखना समीचीन होगा कि भारतीय षड्दर्शन सामानान्तर नहीं, क्रमानुगत हैं। सांख्य से उत्तर मीमांसा तक एक क्रम है, निरन्तरता है। इस निरन्तरता को क्रियारूप मे परिणत करने के लिए प्रमाण, व्यवस्था आदि शिक्षा उपलब्ध कराती है। परिणाम में यह शाश्वत की ओर ले जाती है। आज की भाषा कहें तो यही इसका ‘लर्निंग आउटकम’ है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/swami-vivekanandas-philosophy-of-education-and-national-policy-on-education/" target="_blank" rel="noopener">स्वामी विवेकानन्द का शिक्षा दर्शन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति</a></strong></span></p>
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		<title>मंत्र-साक्षात्कार का!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 May 2022 11:27:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर अनेक प्रख्यात, यशस्वी लोगों के चरित्र पढ़ने पर ज्ञात होता है कि जीवन के प्रारम्भिक कुछ वर्षों में उन्होंने बहुत संघर्ष और परिश्रम किया था। आज&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5233" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/2d60ae73-9657-4401-ab7e-8eea4e913879-300x199.webp" alt="" width="1052" height="698" /></p>
<p>अनेक प्रख्यात, यशस्वी लोगों के चरित्र पढ़ने पर ज्ञात होता है कि जीवन के प्रारम्भिक कुछ वर्षों में उन्होंने बहुत संघर्ष और परिश्रम किया था। आज उनका उत्कर्ष देखकर अनेक लोगों को उनके प्रति द्वेष अथवा ईर्ष्या भाव का अनुभव होता है। उनकी अमीरी पर गुस्सा आता है। परन्तु उनके संघर्ष, परिश्रम के दिनों को कोई समझ पाता है? किसी इमारत की नींव जिस प्रकार किसी को दृष्टिगत नहीं होती उसी प्रकार विविध क्षेत्रों में अपार यशस्वी होने वाले व्यक्तियों ने उनके प्रारंभिक जीवन में कितने कष्ट झेले हैं, कितना संघर्ष और परिश्रम किया है इससे सामान्य जन अनभिज्ञ, अनजान रहते हैं।</p>
<p>प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष आवश्यक है। घर पर निठल्ले बैठे रहने की अपेक्षा घर के बाहर निकलकर, पैसा प्राप्त न होते हुए भी, अनुभव प्राप्त होगा, इस दृष्टिकोण से कार्य करने वाले को सुयश अवश्य प्राप्त होता है।</p>
<p>“पर्वरी से मडगांव जाते हुए रास्ते में कौन सी नदियां हैं”? ये प्रश्न मैंने शिक्षक पद के लिये साक्षात्कार के लिये जा रही एक युवती से पूछा। वह बी.ए., बी.एड्. शिक्षित थी। पर्वरी की ही रहने वाली थी वह युवती! “मांडवी और अरब सागर” उसका उत्तर था! मैं हतप्रभ रह गया!</p>
<p>शालाओं का नया सत्र प्रारंभ होते ही शाला में शिक्षकों की आवश्यकता होती है। इस हेतु साक्षात्कार लिये जाते हैं। सैकड़ों डिग्रीधारी, उच्च शिक्षित उम्मीदवार साक्षात्कार हेतु आते हैं। एक संस्था से दूसरी संस्था में जाते हैं। हमारा आवेदन पत्र ही हमारे व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होता है। उम्मीदवार का आवेदन-पत्र साक्षात्कार लेने वाले के समक्ष पूर्व में ही पहुंच जाता है। शरीर रूप से उम्मीदवार बाद में उपस्थित होता है। अतः प्रथम प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण होता है। कुछ महत्वपूर्ण ध्यान में रखें तो सफलता प्राप्त होने में कोई संशय नहीं रह जायेगा &#8211;</p>
<ol>
<li>
<h5>अपने सभी प्रमाण-पत्र, अनुभव-पत्र, अन्य कागज़ महत्वपूर्ण होते हैं। कुछ उम्मीदवार ये सभी सामग्री प्लास्टिक की थैली में ठूंसकर साक्षात्कार के लिये आते हैं। साक्षात्कार के समय ये प्रमाण-पत्र थैली से बाहर निकालते समय कर्र-कर्र की अप्रिय आवाज़ उत्पन्न होती है। पंखे की हवा से कभी-कभी कागज़ बिखरने लगते हैं। ऐसे में उम्मीदवार घबरा जाता है। इसलिये एक अच्छे से फाइल-कवर में व्यवस्थित रूप से रखकर सभी प्रमाण-पत्र आदि संभलकर लाना अच्छा है। धारिका को देखकर ही स्वभाव का विशेषकर कार्य संस्कृति, प्रवृत्ति का दर्शन हो जाता है।</h5>
</li>
<li>
<h5>साक्षात्कार हेतु जाते समय पहनावा सादा किन्तु व्यवस्थित होना चाहिये। सौंदर्य प्रसाधनों का अनावश्यक उपयोग गुणवत्ता के लिये कारगर नहीं होता। शिक्षकों का पहनावा कैसा हो? कुछ शिक्षक बेढंगे परिधान में तो कुछ अत्यधिक चमक-दमक वाले परिधान में दिखाई देते हैं। किन्तु ऐसे कपड़े और महंगे सौंदर्य प्रसाधन उपयोग करने पर भी चेहरा निर्विकार! कक्षा में बच्चों के समक्ष जाते हुए चेहरा प्रसन्न दिखना महत्वपूर्ण है। चिड़चिड़ा अथवा तनावयुक्त चेहरा बच्चे पसंद नहीं करते।</h5>
</li>
<li>
<h5>जिस संस्था के लिये हम आवेदन दे रहे हैं, साक्षात्कार के लिये जा रहे हैं, उस संस्था के सम्बन्ध में कुछ जानकारी अवश्य रखें। प्रत्येक संस्था की कार्यपद्धति, कार्यसंस्कृति भिन्न-भिन्न प्रकार की रहती है।</h5>
</li>
<li>
<h5>‘मुझे अध्ययन में रुचि है’, ऐसा बहुसंख्य उम्मीदवार साक्षात्कार में कह देते हैं। परन्तु इस सम्बन्ध में गहराई से प्रश्न पूछने पर सत्य सामने आ जाता है? ‘गत सप्ताह में क्या पढ़ा’ ऐसा प्रश्न पूछने पर प्रायः उत्तर मिलता है- “गत सप्ताह समय नहीं मिल पाया” रोज के समाचार पत्र भी नहीं पढ़ते! ‘अग्रलेख क्या है?’ ‘संपादकीय दिखाओ’ कहने पर प्रथम पृष्ठ पर लिखी प्रमुख बात भी बताने वाले अनेक उम्मीदवार मिले। ये शायद आपको सत्य न लगे परन्तु होता है!</h5>
</li>
</ol>
<p>कभी मन करता है संपूर्ण साक्षात्कार का वीडियो रिकार्डिंग किया जाए। इससे उम्मीदवार की चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता दिखेगी और उम्मीदवार को भी अपने गुण-दोष देखने को मिल सकते हैं।</p>
<p>चयन के लिये अन्य आधार भी होते हैं। अनेक मुद्दे ध्यान में रखने पड़ते हैं। मान लीजिए हम पालक हैं और शिक्षकों ने हमारे बच्चों की गलतियों के बारे में शिकायत की, तो हमें कैसा अनुभव होगा? हम उन्हें तुरंत मान लेंगे क्या? निश्चित ही नहीं। हम बड़े कष्ट से बच्चों को पालपोस कर बड़ा करते हैं, शाला में अध्ययन हेतु भेजते हैं, इस कारण हम शिक्षकों से भी पालक के रूप में कुछ अपेक्षाएं रखते हैं। कौन सा पालक अपने बालक की हानि सहन करेगा? पालक के रूप में मेरी कुछ अपेक्षाएं होंगी, उसी प्रकार यदि मैं शिक्षक हूं तो मेरे से भी पालक की कुछ अपेक्षाएं होंगी। उनकी अपेक्षा पूर्ति करना भी मेरा कर्तव्य है, मेरी जिम्मेदारी है। इसी उद्देश्य से मुझे वेतन मिलता है।</p>
<p>साक्षात्कार के समय यह सभी बातें ध्यान में लायी जाती हैं। कुछ को वह समझ में आता है तो कुछ को खटकता भी है। हम बच्चों के लिये शाला संचालित करते हैं, किसी को नौकरी मिले इसलिये नहीं। हमारे सब क्रियाकलाप का केन्द्र बिन्दु विद्यार्थी होता है। उसके हित हेतु ही कार्य करते हैं। इसके विरोध में कोई समझौता नहीं।</p>
<p>साक्षात्कार में निश्चित प्रकार के प्रश्नों के उत्तर देने की आदत रखने वाले उम्मीदवारों का कुछ अलग प्रकार है ऐसा ध्यान में आता है। साक्षात्कार में असफलता मिलने पर भी स्वयं की गलती का आभास अवश्य हो जाता है। साक्षात्कार के द्वारा बहुत सीख मिली, ऐसी प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त हुईं।</p>
<p>साक्षात्कार देने वाले को जैसे अनुभव प्राप्त होते हैं वैसे ही साक्षात्कार लेने वाले को भी। अच्छा, समझदार, उम्मीदवार आने पर प्रसन्नता होती है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5234" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/maxresdefault-300x169.jpg" alt="" width="967" height="545" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/maxresdefault-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/maxresdefault-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/maxresdefault-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/maxresdefault.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 967px) 100vw, 967px" /></p>
<p>साक्षात्कार के लिये जाने हेतु क्या, कैसी तैयारी करनी चाहिये इस सम्बन्ध में “साक्षात्कार-तंत्र-मंत्र’ नामक कार्यशाला का आयोजन हमने किया था। प्रतिसाद अच्छा न मिला। खेद इस बात का हुआ जिस शाला में कार्यशाला चल रही थी उसी के मैदान पर अनेक युवा क्रिकेट खेल रहे थे। फिर भी किसी को भी इस कार्यशाला में आकर आयोजन का लाभ लेने की इच्छा नहीं हुई। इस प्रकार की गैर-जिम्मेदाराना वृत्ति, उदासीनता, मुझे सब कुछ आता है, मुझे किसी की जरूरत नहीं, ऐसी प्रवृत्ति हमारे युवाओं की हानि कर रही है।</p>
<p>डेल कार्नेगी ने एक बार एक ऑयल कम्पनी के एम्लॉयमेंट डायरेक्टर पॉल वाइन्टन से पूछा, “नौकरी हेतु आवेदन देने वाले लोग सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?” साठ हजार व्यक्तियों का साक्षात्कार लेने का अनुभव रखने वाले और इस विषय पर पुस्तक लिखने वाले पॉल वाइन्टन द्वारा मार्मिक उत्तर मिला, &#8211; “नौकरी के लिये आवेदन करने वाले लोग सबसे बड़ी गलती ये करते हैं कि वे स्वयं जो हैं उसे न दर्शाते हुए वे आपको खुश करने वाले उत्तर देते हैं। परन्तु इससे उन्हें कुछ लाभ नहीं मिलता। खुशामदी लोग किसी को भी पसंद नहीं आते।”</p>
<p>“Apply-Apply, no reply” की निराशाजनक स्थिति को टालना हो तो आज के स्पर्धा के युग में स्वेच्छाचार को त्याग कर अच्छी पूर्व तैयारी करनी चाहिये। अंत में यही कहना है- “Try your best, God will do the rest.”!</p>
<p>(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/what-is-learning-disabilities-and-how-does-it-affect-on-students/" target="_blank" rel="noopener">क्या है सीखने में अक्षमता (Learning Disability) और इसका विद्यार्थी पर क्या पड़ता है प्रभाव</a></strong></span></p>
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		<title>कोरोना चला स्कूल खुला</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 Apr 2022 04:39:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Corona]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था- “जब समस्या आती है तब हम जिस प्रकार विचार करते हैं वैसा ही विचार करके उस समस्या का निराकरण नहीं हो&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5163" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/art3-300x200.jpg" alt="" width="1253" height="835" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/art3-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/art3-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/art3.jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 1253px) 100vw, 1253px" /></p>
<p>अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था- “जब समस्या आती है तब हम जिस प्रकार विचार करते हैं वैसा ही विचार करके उस समस्या का निराकरण नहीं हो सकता।” इस बात का तात्पर्य यह है कि किसी समस्या का निराकरण करने के लिए हमें नई दिशा में नवीन पद्धति से विचार करना पड़ता है।</p>
<p>कोरोना की परिस्थिति के बाद शिक्षा के बारे में भी अलग प्रकार से विचार करना होगा। कोरोना के पहले और कोरोना के बाद शिक्षा पद्धति में बड़ा अंतर आ चुका है लेकिन इस बात का एहसास अभी भी अनेक लोगों को नहीं हो सका है। कोरोना के पहले जिस पद्धति का उपयोग शिक्षा प्रदान करने के लिए किया जाता रहा कोरोना के बाद स्कूल फिर से शुरू होने के बाद उसी पद्धति का उपयोग कर अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते।</p>
<p>स्कूल फिर से शुरू हो गए हैं, कुछ स्थानों पर शिक्षकों ने नवीनता, रचनात्मकता का उपयोग कर बच्चों का स्वागत किया, इस प्रकार के समाचार और छायाचित्र मीडिया के माध्यम से दिखाई पड़े हैं। ये एक सकारात्मक पहल है। पहला कदम बहुत अच्छे से उठाया गया है। प्रत्येक स्कूल को ये अवसर मिला था।</p>
<p>अंग्रेजी की एक कहावत है-  “सीक्रेट ऑफ एजुकेशन इज रिस्पेक्टिंग द चाइल्ड” बच्चों के लिए ये अहसास अत्यंत महत्वपूर्ण है कि उनके व्यक्तित्व का यथायोग्य सम्मान किया जा रहा है। मेरे स्कूल को मेरी आवश्यकता है। सीखने की मानसिकता की दृष्टि से ये अनुभूति अत्यंत आवश्यक है।</p>
<p>सीखने की मानसिकता तैयार करना पहली पायदान है। जिस प्रकार बीज बोने के लिए खेत की जमीन को तैयार करना होता है उसी तरह सीखने के लिए भी अनुकूल, योग्य और पोषक मानसिकता की आवश्यकता होती है। इस बात को ध्यान में ना रखते हुए जो कोई केवल अपना पाठ्यक्रम पूरा करने का प्रयत्न करता है वो केवल पत्थर पर बीज बोने का प्रयास करता है, इस बात को ध्यान में रखना चाहिए।</p>
<p>आज लगभग दो साल के बाद जब फिर से स्कूल शुरू हो रहे हैं तब इस परिस्थिति में यह आवश्यक है कि शिक्षक पहले विद्यार्थियों के मानस को समझे। इस महामारी का परिणाम अनेक परिवारों को भुगतना पड़ा है। किसी की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है तो किसी के परिवार में कोई व्यक्ति हमेशा के लिए बिछड़ कर चला गया है। किसी को अनेक दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा, तो किसी को अपने ही घर में परिजनों से दूर होकर रहना पड़ा। इन सारी बातों का बच्चों के कोमल मन पर घातक परिणाम हुआ है, इस बात को ध्यान में रखने की बड़ी आवश्यकता है।</p>
<p>वर्तमान में अपने पाठ्यक्रम को किसी तरह पूरा करने के स्थान पर आलस, उदासीनता, सुस्ती तथा सब चलता है की मानसिकता से बच्चों को बाहर निकालने का विचार करना होगा। स्कूलों में परामर्शदाता होते हैं लेकिन अब प्रत्येक शिक्षक को अपनी परामर्शदाता की भूमिका को बढ़ाना होगा। बच्चे निराशा, चिड़चिड़ापन आदि से किस तरह बाहर निकलेंगे इसका विचार करना होगा।</p>
<p>किसी भी विषय अथवा पाठ को पढ़ाने के पहले ये जानना जरूरी है कि बच्चों का मन किस तरह प्रफुल्लित होगा, उनके भीतर चेतना कैसे जागेगी, जिज्ञासा और इच्छा शक्ति कैसे बढ़ेगी इस बात को प्राथमिकता देना होगी।</p>
<p>एक चिंतक ने बड़ी महत्वपूर्ण बात कही है- “वन टीचर हु इज अटेम्प्टिंग विदाउट इंस्पायरिंग द पीपल विद डिजायर टू लर्न इज हैमरिंग ऑन कोल्ड आयरन।”</p>
<p>लोहे को किसी आकार में ढालने के पहले उसे भट्टी में तपाना पड़ता है, उसी तरह कुछ सिखाने के पहले बच्चों को प्रोत्साहित करना, प्रेरित करना आवश्यक होता है। विगत दो वर्ष की लंबी अवधि एक विचित्र परिस्थिति में बीती है, इस बात का ध्यान शिक्षकों को रखना होगा। यह एक बड़ी चुनौती है। बच्चों ने दो वर्ष के कार्यकाल में जो देखा, भुगता और अनुभूत किया है उसे व्यक्त करने का अवसर उन्हें मिलना चाहिए। मन के भीतर दबा के रखे गए भाव को प्रगट करना आवश्यक होता है। ये करते समय विविधता, कल्पनाशीलता नवीनता का प्रयोग करना होगा। परंपरागत प्रश्नों को पूछ कर और परिपाटी से चली आ रही शिक्षण पद्धति का उपयोग कर ये नहीं हो सकता।</p>
<p>कुछ शिक्षक दो साल के बाद बच्चों को अपने सामने प्रत्यक्ष उपस्थित पाकर पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए पीछे पड़ने वाले हैं। बैकलॉग को पूरा करने के लिए तीव्र गति से गाड़ी चलाने का प्रयत्न करने वाले हैं। दो साल की कसर किस तरह से पूरी की जाए इस बात को प्राथमिकता देने वाले हैं लेकिन ऐसे शिक्षकों को अपनी गति का ध्यान रखना होगा। विषय को पूरा करने की हठधर्मिता के सामने बच्चों के भीतर सीखने की रुचि ही समाप्त न हो जाय इस बात की सावधानी बरतना पड़ेगी।</p>
<p>शिक्षक किसी भी विषय को सिखाने के लिए कुल जितना समय, शक्ति व्यय करते है, परिश्रम करते हैं यदि वे उसका 25% समय, शक्ति और श्रम इस बात पर खर्च करेंगे कि “बच्चे सीखे कैसे” तो उनको अपेक्षित परिणाम अधिक प्राप्त होगा।</p>
<p>मार्क कॉलिंग ने कहा है- “वंस चिल्ड्रन लर्न हाउ टू लर्न नथिंग इज गोइंग टू नेरो देयर माइंड”।</p>
<p>पुस्तक ‘द वर्ल्ड इज फ्लैट’ के लेखक फ्राइड ने कहा है- “बीग अडॉप्टेबल इन ए फ्लैट वर्ल्ड नोइंग हाउ टू लर्न हाउ टू लर्न विल बी वन ऑफ द मोस्ट इंपोर्टेंट असेट्स एनी वर्कर विल हैव”।</p>
<p>पिछले दो सालों में ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने के अनेक प्रयोग हुए हैं। वास्तव में देखा जाए तो ये एक उत्तम और प्रभावी साधन है। कोरोना के कारण इसका प्रयोग किया गया लेकिन अपेक्षित परिणाम प्राप्त न हो सका। इस बात का दोष इस तकनीक अथवा पद्धति का नहीं है बल्कि इसका उपयोग करने वाले दोषी हैं और भविष्य में भी रहेंगे। इस पद्धति और तकनीक का लाभ लेने के लिए इस दिशा में अलग-अलग प्रयत्न और प्रयोग करना होंगे। प्रत्यक्ष पद्धति से शिक्षण शुरू होने के कारण ऑनलाइन पद्धति को पूरी तरह बंद करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसका प्रभावी ढंग से उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है इस दिशा में विचार शुरू करना होगा। तकनीक की विशेषता उसकी सीमाओं और उपयोगिता के बारे में शिक्षक, विद्यार्थी तथा पालकों को अधिक सजग, सतर्क और सुविज्ञ बनाना होगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5165" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Grade-11-and-12-exams-postponed-300x200.jpg" alt="" width="1296" height="864" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Grade-11-and-12-exams-postponed-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Grade-11-and-12-exams-postponed.jpg 675w" sizes="auto, (max-width: 1296px) 100vw, 1296px" /></p>
<p>ऑनलाइन और ऑफलाइन पद्धति का सही मिश्रण अगर जम जाता है तो सब को लाभ होगा। आज किसी भी विषय पर सर्वोत्तम और प्रभावी वीडियो उपलब्ध हो सकते हैं। शिक्षक इस प्रकार के वीडियो को देखकर स्वयं की कुशलता बढ़ा सकते हैं और विद्यार्थियों को उसका लाभ मिल सकता है। यदि शिक्षक अपने वीडियो तैयार कर अपलोड करते हैं तो विद्यार्थी भी उन्हें बार-बार देख कर अपनी उस विषय या पाठ के बारे में समझ को स्पष्ट कर सकते हैं। इसके लिए पालकों को भी इसके बारे में सारी बातें बता कर समझाना होगा।</p>
<p>स्कूल प्रबंधन को भी इस प्रकार की नई बातों पर ध्यान देना होगा। जिन स्कूलों के पास पर्याप्त स्थान उपलब्ध है वे अपना स्वयं का छोटा सा स्टूडियो बना सकते हैं। कम से कम स्थान और साधनों का उपयोग कर इस प्रकार का स्टूडियो तैयार किया जा सकता है। इस बात के लिए प्रबंधन की इच्छा शक्ति और कल्पना शक्ति की आवश्यकता है।</p>
<p>प्रत्येक स्कूल का अपने बच्चों के साथ जीवंत संपर्क होना आवश्यक है। नई शिक्षा नीति के अनुसार आने वाले समय में पालकों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होने वाली है। पालक एक बड़ी शक्ति है इस शक्ति का समुचित उपयोग करने वाली पाठशालाएं आगे बढ़ेगी।</p>
<p>पालको को नवीन तकनीक का महत्व, उपयोग और प्रभाव समझाना होंगे। नई तकनीक की सहायता से पाठशालाएं पालकों के साथ अपना संपर्क और संबंध अधिक सुदृढ़ कर सकते हैं। कक्षावार पालकों की ऑनलाइन बैठकों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। परिस्थिति की गंभीरता और आने वाले अवसरों के बारे में पालकों को जागरूक करना चाहिए।</p>
<p>व्यापक स्तर पर विद्यार्थियों का डाटा संकलित करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि डाटा आज का नया ईंधन है। डाटा अनेक दृष्टि से उपयोगी होता है। डाटा का सही पद्धति से विश्लेषण करने पर अनेक समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है।</p>
<p>पाठशाला, परिसर की स्वच्छता को महत्व दिया जाना चाहिए। शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच स्वास्थ्य के विषय में जागरूकता बढ़ाई जाना चाहिए। शिक्षकों को इस बात की सावधानी बरतना होगी कि विद्यार्थियों को केवल स्वच्छता और व्यायाम के बारे में भाषण न दे कर एक साथ मिल कर उस दिशा में प्रयत्न करते रहना होंगे।</p>
<p>ये बात सत्य है कि विगत दो वर्षों में बड़ी हानि हुई है लेकिन इसके साथ ही अनेक नए अवसर खुले हैं इस बात को भी ध्यान में रखना होगा। भविष्य में और नए अवसर खुलेंगे, हमें उनका लाभ लेने की तैयारी रखनी होगी।</p>
<p>इस आपात परिस्थिति से शासकीय अधिकारी और प्रशासकों को भी अनेक बातें सीखने जैसी है। अब वह समय आ गया है जब नए-नए क्षेत्रों की आवश्यकताओं, साधनों, मूलभूत सुविधाओं का नए तरीके से विचार करना होगा। परंपरागत विचार पद्धति तथा जीवन शैली से ऊपर उठना होगा। आने वाले समय में शिक्षण संस्थाओं को स्वायत्तता प्रदान करने का विचार चल रहा है लेकिन उसके लिए उन्हें अपनी पात्रता, योग्यता को बढ़ाने की तैयारी करने की आवश्यकता है। अभी तो अनेकों को अपनी स्वायत्तता को संभालकर कर रखना जम नहीं सका है। इस बात की जोख़िम तो है। भविष्य में शिक्षा क्षेत्र में अनेक बदलाव होने वाले हैं, उन बदलावों का हम स्वागत करें और शिक्षा पद्धति को नई दिशा प्रदान करें।</p>
<p>शरीर को श्रम की ओर, बुद्धि को मन तथा हृदय को भावनाओं की ओर मोड़ना सही मायनों में शिक्षा का उद्देश्य है। इस विचार का जतन करना होगा।</p>
<p>(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/coronas-epidemic-and-preparation-of-technological-proficient-acharyas/" target="_blank" rel="noopener">कोरोना की महामारी और तकनीक प्रवीण आचार्यों की तैयारी</a></strong></span></p>
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		<title>विद्यालय का संस्कारक्षम वातावरण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Jan 2022 10:55:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Satudent]]></category>
		<category><![CDATA[school environment]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; राणा प्रताप सिंह जिसके लिए प्रत्येक माता-पिता व शिशु तृषित नेत्रों से निहारते रहते हैं। बालक के विकास में वैयक्तिक प्रतिभा (वंश परम्परा की देन) के साथ उस वातावरण&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; राणा प्रताप सिंह</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4639" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/yogahall2-300x173.jpg" alt="" width="879" height="507" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/yogahall2-300x173.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/yogahall2-768x444.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/yogahall2.jpg 845w" sizes="auto, (max-width: 879px) 100vw, 879px" /></p>
<p>जिसके लिए प्रत्येक माता-पिता व शिशु तृषित नेत्रों से निहारते रहते हैं। बालक के विकास में वैयक्तिक प्रतिभा (वंश परम्परा की देन) के साथ उस वातावरण का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है, जिसमें वह पल्लवित व पोषित होता है। इसके तीन पक्ष हैं –</p>
<ol>
<li>विद्यालय 2. परिवार 3. समाज ।</li>
</ol>
<p>विद्यालय में छात्र-छात्राएं प्रतिदिन 5-6 घंटे रहती हैं। परिवारों व विभिन्न क्षेत्रों के बच्चों के मध्य उनका शेष 18-19 घंटे का समय व्यतीत होता हैं। इसी कारण विद्यालय को ‘<strong>सांस्कृतिक पुनर्जन्म का स्थान तथा भावी समाज का लघुस्वरूप</strong>’ भी कहा जाता हैं। माता-पिता भी शिशु को प्रवेश दिलाते समय अच्छे विद्यालय की खोज में रहते हैं। आचार्य परिवार भी विद्यालय का वातावरण संस्कारक्षम बनाने का प्रयास करता है। यह भी संम्भव है कि कार्य का श्रीगणेश करते समय प्रत्येक आचार्य में अध्यापन का कौशल प्रगट न हो पाया हो। अत: इस चरण से प्रारंभ करके भी व सफलता की दिशा में पग आगे बढ़ा सकते हैं? वह कैसे विकसित किये जा सकते हैं? यही आगे का विचारणीय पक्ष हैं।</p>
<p>संस्कारक्षम वातावरण के स्वरूप निम्नांकित हैं –</p>
<ol>
<li>भौतिक वातावरण</li>
<li>मनो-सामाजिक वातावरण</li>
<li>सांस्कृतिक वातावरण</li>
<li>शैक्षिक वातावरण</li>
<li>आध्यात्मिक वातावरण</li>
</ol>
<h3><strong>भौतिक वातावरण</strong></h3>
<p>विद्यालय के वातावरण में संस्कार क्षमता का विकास भौतिक वस्तुओं की व्यवस्था के आधार पर भी हो सकता है। भवन की रचना, भूखंड की विशालता तथा क्रीड़ा स्थल इन सब की उपलब्धता व साधन-सम्पन्नता पर निर्भर करते हैं। फिर भी कुछ बातों पर ध्यान रखा जा सकता हैं जैसे-</p>
<p><strong>1 स्वच्छता</strong> &#8211; वातावरण में भौतिक दृश्य की स्वच्छता यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। गंदगी भरा वातावरण मन पर दुष्परिणाम लाता है। स्नान करने व स्वच्छ वेश पहनने पर मन को सांत्वना मिलती है। अतः विद्यालय का परिसर, भवन, कमरे, फर्श, वेश, थैले, कापी व पुस्तिकाएँ इन सभी में स्वच्छता रखने के लिये मन में गंदगी के लिये चिढ़ तथा स्वच्छता के लिये परिश्रम करने की प्रेरणा सभी सहयोगियों में जगाना उपयोगी रहता हैं। इसके लिये प्रतियोगिताओं व पुरस्कारों का आयोजन तथा दायित्व को सौंपने का कार्य भी किया जा सकता है।</p>
<p><strong>2 व्यवस्थिता</strong> &#8211; स्वच्छता के साथ-साथ दूसरा अनन्य आश्रित बिंदु हैं व्यवस्थिता। बच्चों के वेश, थैले, उपकरण तथा कक्षा की मेज-कुर्सी साफ-सुथरी तो है परंतु यदि अव्यवस्थित रहीं, लेखन-पुस्तिकायें उत्तम रहीं परंतु वे विषय व कार्य के हिसाब से अस्तव्यस्त रहीं, कार्यक्रमों के आयोजन में अव्यवस्था रही तो मन पर परिणाम अच्छा न होगा। कक्षा पंचम की कापियां तृतीय में व गणित की विज्ञान में मिल गई तो परेशानी होगी। वेश स्वच्छ तो है परंतु उन पर प्रेस नहीं हुआ है तो आकर्षण कम होता है। अतः स्वच्छता के साथ-साथ व्यवस्थिता भी अत्यावश्यक है।</p>
<p><strong>3 सज्जा</strong> &#8211; स्वच्छता व व्यवस्थिता के बाद तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु है सज्जा। कमरों का नाम ध्रुव, प्रहलाद, शिवाजी, विवेकानंद हैं परंतु उन कक्षों की नाम के अनुरूप सज्जा चाहिये। भूगोल, इतिहास व विज्ञान कक्षों की सज्जा उसके अनुरूप हो, भवन परिसर व बरामदों की भी सज्जा व्यवस्था अपेक्षित संस्कारों की योजना के अनुरूप करने से परिणाम प्रभावी होते हैं।</p>
<p><strong>4 भवन</strong> &#8211; भवन निर्माण करवाते समय कमरों का आकार तो आवश्यकता के अनुरूप रखा ही जाता है परंतु भवन की रचना ऐसी चाहिये जिसमें आधुनिकता के साथ-साथ भारतीयता के स्वरूप का भी निखार होने लगे। विद्यालय का नाम है सरस्वती शिशु मंदिर। अतः मंदिर के पवित्रय की झलक मिले, मां सरस्वती के चित्र को आकर्षक व सम्मानपूर्ण स्थान मिले तो दृश्य प्रभावी रहेगा। वंदना स्थल का दृश्य पवित्र व भक्तिभाव पूर्ण चाहिये।</p>
<p><strong>5 उद्यान</strong> &#8211; विद्यालय-परिसर में उद्यान की रचना, क्यारियों व गमलों की व्यवस्था, उत्तम व आकर्षक पौधों को पनपाने का प्रयास किया जाये, आकर्षक रंग-बिरंगे पुष्पों का दृश्य निर्माण किया जा सके तो दृश्य अत्यंत प्रभावी बन जाता है। भूखंड बड़ा है तो छोटे-छोटे उद्यानों में घटना प्रधान मूर्तियां भी लगाई जा सकती हैं। इन कार्यों में बच्चों को जुटाकर उससे उनमें दायित्व का भाव जागेगा। परिसर के लिए आत्मीयता पनपेगी तथा वातावरण में शांति व्यवस्था पनप उठेगी। मंदिर के अभाव में मां शारदा व भारत-माता के चित्र की सज्जा, पुष्पहार व समुचित सम्मान की दैनिक व्यवस्था दृश्य को प्रभावी बना देती है।</p>
<p><strong>6 क्रीड़ा स्थल</strong> &#8211; भूखंड की व्यापकता को ध्यान में रखकर क्रीड़ा के उपकरणों को (बाह्य व आन्तरिक) जुटाकर बच्चों में उत्साह व आनन्द का माहौल पनपाया जा सकता है, बच्चों की आयु तथा बुद्धि-कौशल के अनुरूप क्रीड़ोपकरण जुटाना हितकर रहता है।</p>
<h3><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4640" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/school_200_11515485639-300x150.jpg" alt="" width="800" height="400" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/school_200_11515485639-300x150.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/school_200_11515485639.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" /></h3>
<h3><strong>मनो-सामाजिक वातावरण</strong></h3>
<p>विद्यालय के वातावरण को संस्कार क्षमता प्रदान करने के लिए मनो-सामाजिक परिस्थितियां पर ध्यान देना आवश्यक है । तनिक सी सतर्कता व सतत प्रयास द्वारा उसे प्राप्त किया जा सकता है, इसके कुछ बिंदु निम्नांकित है-</p>
<p><strong>1 शांति</strong> &#8211; विद्यालय में वातावरण की शांति एक प्रभावी तत्व है। कक्षाओं में सामूहिक उत्तरों को प्रोत्साहन, शोरगुल व परिसर में अत्यधिक भाग दौड़ से माहौल बिगड़ता हैं। कक्षाएं चल रही हैं, कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है परंतु दर्शकों व बच्चों में तन्मयता है, वातावरण में अनुशासन व निस्तब्धता है, तो स्वत: ही सभी संस्कारित हो उठते हैं। कक्षाओं में विषय प्रस्तुतीकरण करते समय अन्य कक्षाओं में विघ्न पड़ना अहितकर होगा। इस विषय का संबंध भवन व क्रीड़ास्थल की विशालता से कम अपितु आचार्यों की सतर्कता से अधिक होता है।</p>
<p><strong>2 पारिवारिक भाव</strong> &#8211; विद्यालय में छात्र-छात्राओं व आचार्यों की संख्या एक परिवार की संख्या से कहीं अधिक होती है। इसीलिए विद्यालय, छात्र व समाज के मध्य पुल का कार्य करता है। अतः वातावरण में पारिवारिक भाव की आत्मीयता पनपाना आवश्यक है। इसके लिये छात्र-छात्राओं को भैया-बहिन कहकर पुकारना चाहिये, उन्हें <strong>‘तुम’ व ‘तू’ कहकर बुलाने की जगह ‘आप’ कहकर सम्बोधित करना चाहिये।</strong> बच्चें के कानों में यदि उन्हें बेटा, बेटी, करो, लिखों, बोलो, उत्तर दो कहकर पुकारा गया तो वे भी बोला करेंगे <strong>“कहो बेटे क्या हाल है?” उससे कुसंस्कार पनपेंगे।</strong> अतः महत्व पारिवारिक भाव को देना चाहिये। इसी से <strong>“गुरुकूल”</strong> का शब्द सार्थक होगा। पारिवारिक भाव में स्नेह, संरक्षण, परहित कामना के साथ-साथ नि:संकोच पूर्वक काम करने का भाव निहित रहता है। अपने स्वजन, अपना काम यही प्रेरक व प्रभावी भाव हैं।</p>
<p><strong>3 दायित्व बोध &#8211; </strong>छात्र-छात्राओं में प्रबंध क्षमता व नेतृत्व कुशलता विकसित करने के लिये, उसकी रुचि व प्रतिभा के अनुरूप उन पर विश्वास रखकर उन्हें विभिन्न प्रकार के दायित्व सौंपे जा सकते हैं। आचार्य को इस कार्य में प्रेरणा का स्त्रोत व दिशाबोधक के रूप में कार्य करना चाहिये। इससे वातावरण में सक्रियता व दायित्व बोध प्रस्फुटित होता हुआ दिख पड़ेगा।</p>
<p><strong>4 श्रमनिष्ठा</strong> &#8211; व्यक्ति में जब कार्य के प्रति अपनत्व का भाव जागृत हो जाता है तो श्रमनिष्ठा का परिचय मिलने लगता है। चाहे स्वच्छता करनी हो या सज्जा, क्यारियाँ ठीक करनी हो या पौधे लगाना, प्रत्येक छोटे से छोटा कार्य यदि आचार्य स्वयं करने में संकोच नहीं करेंगे तो बच्चे उस कार्य में स्वत: ही सक्रिय होकर परिश्रम करने लगेंगे। उससे कार्य के प्रति हीनता के स्थान पर श्रमनिष्ठा का भाव पनप उठेगा।</p>
<p><strong>5 सहयोग (सामंजस्य व गुण ग्राहकर्ता)</strong> &#8211; जब आठ-दस लोग मिलकर एक स्थान पर कार्य करते हैं तब आलोचना प्रत्यालोचना यह सामान्य बात देखने को मिलती है। दूसरों में दोष देखने व प्रत्येक विफलता के लिये दूसरों को दोषी ठहराने का भाव आज राजनीतिज्ञों की देश को देन है। हम भूल जाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के कुछ गुण भी होते हैं व क्षमता भी। अतः उनके गुणों व क्षमता की चर्चा-वार्ता करके, स्वयं अपनी ओर से उन्हें सहायता प्रदान करके सहयोग का वातावरण बनाना अत्यंत प्रभावी कार्य होता है। इसी का विकास करना आवश्यक है।</p>
<p><strong>6 वाणी की मृदुलता</strong> &#8211; शिशु को केवल एक ही भाषा समझ में आती है। उसे पांडित्य प्रभावित नहीं करता है। स्नेह का भाव, वाणी की मधुरता, व्यवहार की आत्मीयता उसे आकर्षित करती है, उसमें समरसता पनपती है व उसे उत्साह प्रदान करती है। अत: पारस्परिक बोलचाल की भाषा में माधुर्य का प्रयोग आवश्यक है।</p>
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<h3><strong>सांस्कृतिक वातावरण</strong></h3>
<p>बच्चों में नैतिकता, चारित्र्य संपन्नता तथा अन्य गुणों की प्रधानता के जागरण में सांस्कृतिक वातावरण का दृश्य अत्यंत प्रभावी होता है। सरस्वती शिशु मंदिर योजना के अंतर्गत इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये विभिन्न प्रकार की कलाओं का उपयोग किया जाता है। उसके कुछ बिंदु निम्नांकित हैं &#8211;</p>
<p><strong>1 सज्जा</strong> – परिसर, बरामदे, कमरे, उद्यान आदि में सज्जा का स्वरूप ही संस्कारों को विकसित करता हैं। सज्जा में आधुनिकता का प्रयोग तो हो परंतु माहौल भारतीयता का चाहिये।</p>
<p><strong>2 उत्सव</strong> &#8211; शिशु मंदिर के कार्यक्रमों की रचना में साप्ताहिक शिशु सभायें, जयन्तियाँ, पर्व, उत्सव, वार्षिकोत्सव आदि मनाये जाते हैं। इन कार्यक्रमों में स्वच्छता, व्यवस्थितता व सज्जा से भी अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है कार्यक्रमों की विषयवस्तु, भाषा, अभिनय तथा प्रस्तुतीकरण की कला। गीतों व कविताओं में भक्ति (परिवार, देश व भगवान) स्वाभिमान, उत्साह व वीररस के भाव को जागृत किया जा सकता हैं। कथाओं में मनोरंजन को सर्वाधिक महत्व न देकर उद्देश्य को दिया जाता हैं। पाश्चात्य कला (जैसे नृत्य व संगीत) में मनोरंजन होता हैं परंतु भारतीय कला में साधना व भावना, पारस्परिक वार्ता (नाटक आदि) में विषयवस्तु व वाणी सर्तकता बरती गई तो कार्यक्रम रामायण, महाभारत व चाणक्य सीरियल की भांति प्रभावी बन सकता है। <strong>‘स्व’</strong> के जिस भाव को जागृत करना है उसी के अनुरूप विषय वस्तु का चयन करना हितकर रहता है।</p>
<p><strong>3 वन्दना, भोजन मंत्र, विसर्जन &#8211;</strong> वंदना के समय मां सरस्वती की तथा विसर्जन के समय भारत मां की आराधना की जाती हैं। वंदना के साथ-साथ गायत्री मंत्र, शांति पाठ, ब्रह्मनाद तथा ध्यान साधना भी होती है। विसर्जन के समय भूमि पूजन (चरण वंदन) होता हैं। मध्यावकाश के अवसर पर भोजन मंत्र व भोजन गीत कहने के बाद ही सामूहिक स्तर पर अल्पाहार किया जाता है। उससे सामाजिक समरसता का भाव विकसित होता हैं। सम्पत व विसर्जन में अनुशासन का भाव पनपता हैं तथा गणगीत के द्वारा वातावरण में समरसता व राष्ट्रभक्ति पनपती हैं।</p>
<p><strong>4 जयंती &#8211;</strong> महापुरुषों की जयन्तियों व पुण्य तिथियों के अवसर पर एक ओर जहां उनके चित्रों की साज- सज्जा होती हैं, उन्हें मान सम्मान दिया जाता हैं, वहीं दूसरी ओर उनके जीवन के प्रेरक प्रसंग व गौरवशाली गाथायें प्रस्तुत की जाती हैं। पुण्य तिथियों के अवसर, बलिदान के प्रसंगों द्वारा भक्ति जागृत होती है तथा भौगोलिक वर्णन व चित्रण द्वारा देश की माटी के प्रति स्वाभिमान पनप उठता है। इन पुण्य स्थलों को देखने की प्रेरणा पनपती हैं।</p>
<p>पर्वों के अवसर पर यज्ञ, पूजन (मकर संक्रांति, बसन्त पंचमी) तथा कुछ ऐसे भी कार्य किये जाते हैं। रक्षाबंधन पर राखी बांधना, होली पर हर्ष व उत्साह, व्यास पूर्णिमा पर समर्पण जिनसे सद्संस्कार व सामाजिक समरसता का भाव विकसित होता है।</p>
<p><strong>5 शिशु-सभा</strong> &#8211; शिशु सभा का आयोजन तो प्रति सप्ताह मध्यावकाश के उपरांत एक दिन किया जाता है। उनमें गीत, कहानी, नाटक, कव्वाली, नृत्य, भाषण, चुटकुले व आनन्द युक्त कार्यक्रम होते हैं उसका संचालन शिशु भारती के पदाधिकारी ही करते हैं। इससे माहौल अनुशासन पूर्ण तथा संस्कार प्रधान बनता है।</p>
<h3><strong>शैक्षिक वातावरण</strong></h3>
<p><strong>1 कथा कथन</strong> &#8211; भौतिक व सांस्कृतिक वातावरण के निर्माण में अपना सहयोग प्रदान करते-करते भैया बहिनों के मन में आचार्य परिवार के प्रति आत्मीयता का भाव पनप उठता हैं इसके परिणामस्वरूप कुछ न कुछ बच्चे प्रत्येक को घेर कर बैठते हैं, गप्प-शप्प मारते हैं। अपने स्वभाववश उनसे कहानियां सुनाने का आग्रह करते हैं। नवनियुक्त आचार्य में भले ही विषय के प्रतिपादन का कौशल न हो तो भी वह चुटकुले, हास्य, प्रसंग तथा लघुकथायें कहना प्रारंभ करते हैं। धीरे-धीरे वे कथा कहना सीख जाते हैं। कथा कथन की प्रतिभा पनपने का अर्थ हैं विषय प्रतिपादन की क्षमता का विकास।</p>
<p><strong>2 भाषा &#8211;</strong> बच्चे के साथ परस्पर चर्चा-वार्ता तो दिन-प्रतिदिन होती हैं ही, विषय के English Medium, विद्यालयों में वार्ता का आधार विदेशी भाषा होती हैं। इसके परिणामस्वरूप पाश्चात्यीकरण होता हैं। सरस्वती शिशु मंदिरों में वार्ता संस्कृतनिष्ठा व परिष्कृत हिंदी भाषा में होती है। इसका सुखद परिणाम होता है राष्ट्रभाषा के लिये स्वाभिमान व शुद्ध तथा परिष्कृत भाषा में चर्चा, वार्ता के अभ्यास (खिचड़ी भाषा नहीं) का जागरण। महत्व शुद्ध व उत्तम भाषा प्रयोग को दिया जाना आवश्यक है।</p>
<p><strong>3 उद्देश्य युक्त शिक्षण –</strong> भाषा, गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल का उद्देश्य के अनुरूप शिक्षण विधि अपनाने पर ज्ञानार्जन के साथ-साथ देश की माटी व अपने पूर्वजों (वैज्ञानिक, साहित्यकार, गणितज्ञ, स्वाधीनता संग्राम सेनानी आदि) के प्रति अपनत्व का भाव पनपता है।</p>
<p><strong>4 शैक्षणिक विधि &#8211;</strong> विषय को सरस, बोधगम्य बनाने की विधि का पालन करने पर वातावरण में आनंद, उत्साह, तन्मयता, एकाग्रता व जिज्ञासा का भाव पनप उठता हैं। बच्चों में क्रियाशीलता, भाव व्यक्त करने की क्षमता तथा वैचारिक विवेचन करने एवं उचित-अनुचित, योग्य-अयोग्य का निर्णय लेने की क्षमता का उनमें विकास होता है।</p>
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<h3><strong>आध्यात्मिक वातावरण</strong></h3>
<p>अध्यात्म भाव का अर्थ है सृष्टि के कण-कण के प्रति अपनत्व के भाव का विकास। निर्जीव वस्तुओं की अपेक्षा, निर्धन व उपेक्षित व्यक्तियों का तिरस्कार, अन्य परिवारों व जातियों के व्यक्तियों के प्रति परायापन यह पाप है, आत्मा, परमात्मा व विश्वात्मा का तिरस्कार है। अतः विद्यालय के वातावरण में आध्यात्मिक भाव का जागरण नितान्त आवश्यक है। सरस्वती शिशु मन्दिर योजना में इसकी उपलब्धि के अनेक साधन हैं। जैसे-</p>
<p><strong>1 ग्रामीण यात्रा &#8211;</strong> ग्रामीण, उपेक्षित बस्तियों तथा वनवासी क्षेत्रों में बच्चे इस यात्रा के अन्तर्गत ले जाये जाते हैं। निर्धनता व दयनीय स्थिति देखकर उनके हृदय में वेदना व सक्रिय सहयोग का भाव पनप उठता हैं। बाल स्वभाव के कारण वहाँ के बच्चे खेलते, कूदते व घूमते हैं। इससे सामाजिक समरसता जागृत होती हैं।</p>
<p><strong>2 वन्दना व पर्व &#8211;</strong> इनके आयोजन में देवभक्ति व जीवन की पवित्रता का विकास होता है।</p>
<p><strong>2 सामान्य ज्ञान यात्रा &#8211;</strong> इस यात्रा के अन्तर्गत विभिन्न कक्षाओं के भैया-बहिनों को कभी-कभी चिकित्सा केन्द्रों, संस्कार केन्द्रों पर भी ले जाया जाता है। उससे बच्चों के मन में दया, उदारता व सक्रिय योगदान का भाव विकसित होता हैं।</p>
<p><strong>2 देवदर्शन यात्रा</strong> &#8211; इस यात्रा से तीर्थ स्थान व पुण्य स्थलों के प्रति भक्ति पनपती है।</p>
<p>और पढ़ें : <strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-special-events-in-school/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 30 (विद्यालय में विशेष आयोजन)</a></span></strong></p>
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		<title>अद्वितीय गुरु &#8211; अतुलनीय शिष्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Nov 2021 11:30:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर हजारों विद्यालय चलते हैं। लाखों शिक्षक पढ़ाते हैं। करोड़ों छात्र पढ़ते हैं, लेकिन परिणाम समान नहीं निकलते। विद्यालय अच्छे शिक्षा परिणाम की इच्छा रखकर प्रयासरत रहता&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4243" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Photo-300x169.jpg" alt="" width="951" height="536" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Photo-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Photo-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Photo-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Photo.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 951px) 100vw, 951px" /></p>
<p>हजारों विद्यालय चलते हैं। लाखों शिक्षक पढ़ाते हैं। करोड़ों छात्र पढ़ते हैं, लेकिन परिणाम समान नहीं निकलते। विद्यालय अच्छे शिक्षा परिणाम की इच्छा रखकर प्रयासरत रहता है। प्रबंधन समिति अच्छी साधन सुविधा देने का प्रयत्न करती है। अभिभावक भी बच्चों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हो इसलिए कष्ट उठाते हैं, फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं दिखते। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। सफल शिक्षा के लिए विभिन्न कारक (factors) होते हैं।</p>
<p>इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है शिक्षक-विद्यार्थी केमिस्ट्री। भवन, साधन-सुविधा दिखते हैं। कक्षा में चलने वाली अध्ययन-अध्यापन प्रक्रिया भी दिखती है। न दिखने वाली परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात है शिक्षक-विद्यार्थी की मानसिकता, दोनों के बीच चलने वाली अंतक्रिया, और यही सबसे महत्वपूर्ण है। यह क्लिष्ट प्रक्रिया समझने में, समझाने में सरल नहीं है। सामान्यतः इसकी ओर ध्यान भी नहीं दिया जाता। किन्तु जो विद्यालय इसकी अधिक चिंता और चिंतन करते हैं, उन्हें अधिक अच्छे परिणाम मिलते हैं।</p>
<p>आचार्य विनोबा जी ने एक मौलिक सूत्र बताया है। शिक्षक, विद्यार्थी-परायण (oriented) और विद्यार्थी शिक्षक परायण होना चाहिए। प्रभावी अध्ययन-अध्यापन के लिए यह पहली आवश्यक शर्त है। सूरजमुखी (sunflower) और सूरज में जिस प्रकार का नाता होता है, उसी प्रकार का सम्बन्ध शिक्षक-विद्यार्थी के बीच हो। सूरज सवेरे उगता है तब सूरजमुखी (oriented towards Sun) होता है, और जैसे-जैसे सूरज ढलता है, वैसे ही फूल भी सूरज की ओर अपनी मुख की दिशा बदलता है। इसी प्रकार शिक्षक विद्यार्थी मुखी और विद्यार्थी शिक्षकमुखी बनें तो पढ़ना-पढ़ाना सरल होगा। दोनों के बीच ऐसा सम्बन्ध बने तो श्रेष्ठ परिणाम मिलेंगे।</p>
<p>एक और सुन्दर उदाहरण हम सब जानते हैं, वह है मोती का। कहते हैं कि स्वाति नक्षत्र के समय बरसात के पानी की एक बूंद यदि सीप में गिरती है तो मोती बनता है। इसके लिए स्वाति नक्षत्र का पानी चाहिए। उसी समय सीप का मुँह भी खुला होना चाहिए और पानी की बूंद सीप में अचूक गिरनी चाहिए। यह संयोग एक समय होना कठिन होता है। कभी स्वाति नक्षत्र का पानी होता है लेकिन सीप का मुँह खुला नहीं होता। कभी सीप का मुँह खुला होता है परन्तु स्वाति नक्षत्र में वर्षा ही नहीं होती। कभी-कभी स्वाति नक्षत्र में वर्षा भी होती है और सीप का मुँह भी खुला होता है लेकिन पानी की बूँद सीप में नहीं गिरती। शिक्षा प्रक्रिया में भी ऐसा ही होता है। शिक्षक बहुत कुछ देना चाहता है, लेकिन विद्यार्थी के मन के दरवाजे बंद रहते हैं। कभी विद्यार्थी ग्रहण करने की मनःस्थिति में होता है लेकिन शिक्षक की पूरी तैयारी नहीं होती।</p>
<p>और एक उदाहरण देखें। अपने घर के टीवी सेट का एंटीना घर की छत पर रहता है। कभी-कभी तेज हवा के कारण एंटीना की दिशा बदल जाती है। ऐसी स्थिति में टीवी पर चित्र नहीं दिखाई पड़ता। प्रक्षेपण तो निरन्तर हो रहा है लेकिन हमारे एंटीना की दिशा और स्थिति ठीक न होने के कारण चित्र स्पष्ट नहीं दिखता। बहुत बार कक्षा-कक्ष में भी ऐसी ही स्थिति होती है। शिक्षक प्रक्षेपण करता है लेकिन विद्यार्थी तक पहुंचने में बाधा आती है। शारीरिक बाधाओं से भी ज्यादा मानसिक बाधाएँ होती हैं। यह समझे बिना पढ़ना-पढ़ाना विफल है। पढ़ाने से पहले शिक्षक को कुछ बातें सुनिश्चित करनी पड़ेंगी। कक्षाकक्ष का वातावरण भयमुक्त, तनावमुक्त हो। तनाव या भय के वातावरण में पठन-पाठन प्रभावी नहीं हो सकता। आनंददायी वातावरण अच्छे अध्ययन-अध्यापन के लिए प्रथम आवश्यकता है। हमारे मस्तिष्क में डोपामाइन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसीन आदि केमिकल्स होते हैं। यह सब शिक्षक-विद्यार्थी को सीखने का वातावरण देने वाले हैं। आनंद-अध्ययन-अध्यापन और ये केमिकल्स एक-दूसरे पर निर्भर हैं, एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके बिना अध्यापन-अध्ययन प्रक्रिया शुष्क होती है। इससे अपेक्षित परिणाम नहीं आते।</p>
<p>आचार्य विनोबा भावे अध्यापन कार्य को ‘मातृधर्म मानने वाले का काम’ कहते हैं। माता अपने बालक के लिए जो-जो और जैसा करती है, वह अतुलनीय है। उसकी तुलना अन्य किसी से नहीं हो सकती। उसी प्रकार के और उच्च श्रेणी के कार्य की आचार्यों से भी अपेक्षा विनोबा जी करते हैं। जब तक बच्चा भूखा है, तब तक माँ को चैन नहीं। जब तक बालक सोता नहीं, तब तक माँ को नींद नहीं। बच्चे के सुख के लिए माँ कितने भी कष्ट उठाने को तैयार रहती है। अध्यापन कार्य में ‘मातृधर्म’ का यह अर्थ आचार्यों को समझना चाहिए।</p>
<p>एक बहुत सुंदर, लोकप्रिय भजन सब ने सुना होगा। ‘कौन कहता है भगवान आते नहीं, सोते नहीं, खेलते नहीं’ मीरा जैसे बुलाते नहीं, यशोदा जैसे सुलाते नहीं, शबरी जैसे खिलाते नहीं&#8212;-आदि। यही समस्या है। ऐसी मनःस्थिति, मनोभाव रखना आसान नहीं, लेकिन उसके बिना सारे प्रयास व्यर्थ हैं। शिक्षक की एक बार ऐसी मनःस्थिति बन गई तो फिर आगे की सारी प्रक्रिया सरल बन सकती है।</p>
<p>चंपक (चंपा का फूल) का एक कवि ने सुंदर वर्णन किया है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>चंपक तुझमें तीन गुण &#8211; रूप</strong><strong>, </strong><strong>रंग और बास।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अवगुण तुझमें एक है भ्रमर न आवे पास।</strong></p>
<p>भ्रमर (भौंरा) चंपक की ओर आकृष्ट नहीं होता क्योंकि चंपक में ‘मधु’ नहीं। उसी प्रकार शिक्षक के पास ज्ञान, विद्वता, रूप, शैक्षिक गुणवत्ता उच्च कोटि की हो, लेकिन छात्र और अपने अध्यापन कार्य के प्रति प्यार, लगाव नहीं तो उस ज्ञान, विद्वता और शैक्षिक गुणवत्ता का भी अपेक्षित परिणाम नहीं होता।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4244" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/027-300x191.jpg" alt="" width="1026" height="653" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/027-300x191.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/027-768x489.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/027.jpg 820w" sizes="auto, (max-width: 1026px) 100vw, 1026px" /></p>
<p>शिक्षक को बालकों को प्रेरणा देने की कला ज्ञात होनी चाहिए। शिक्षक को प्रेरक (motivator) बनना चाहिए। होरेसमन कहते हैं, “A teacher, who is attempting to teach without inspiring the pupil with a desire to learn, is hammering on cold iron.” लोहे को यदि कुछ आकार देना है तो पहले लोहा आग की भट्ठी में डालना पड़ता है। जब तक वह लोहा भट्ठी में तपकर लाल नहीं होता, तब तक उसको आकार देना संभव नहीं। ठंडे लोहे को आप आकार नहीं दे सकते। उसी प्रकार जब तक शिक्षक बालक के मन में सीखने की इच्छा नहीं निर्माण कर सकता, तब तक अध्ययन-अध्यापन प्रक्रिया सफल नहीं बन सकती।</p>
<p>अल्बर्ट आइंस्टाइन अध्यापन को एक श्रेष्ठ कला मानते हैं। वे कहते हैं, “It is the supreme art of the teacher to awaken joy in creative expression and knowledge.”</p>
<p>एक बार एक भारतीय प्रतिनिधि ने अमेरिका के अध्यक्ष जॉन केनेडी से प्रश्न पूछा, अमेरिका में इतनी समृद्धि कैसे दिखती है? तब जॉन केनेडी ने उत्तर दिया, अमेरिका का हर शिक्षक उसके सामने बैठे हुए विद्यार्थी को अमेरिका का भविष्य में होने वाला राष्ट्रपति है, इस रूप में देखता, सोचता है। “Every teacher in America looks at every student of America as a future President of America.”</p>
<p>हमारे सामने कक्षाकक्ष में बैठे हुए बालकों को हम किस दृष्टि से देखते हैं और उनके बारे में क्या, कैसे सोचते हैं, यह बुनियादी प्रश्न है।</p>
<p>डॉ॰ मारिया मोंटेसरी भगवान से प्रार्थना करती हैं, प्रभो! बाल-जीवन के रहस्यों को समझने में हमारी सहायता करो, जिससे कि हम बालक के स्वरूप को जान सकें, उसे प्यार कर सकें और तुम्हारे नीति-नियमों के अनुसार एवं तुम्हारे दिव्य संकल्प के अनुकूल उसकी सेवा कर सकें।</p>
<p>महाकवि कालिदास ने शिक्षक के बारे में कहा है –</p>
<p><strong>क्लिष्टा क्रिया कस्य चिदात्मसंस्था</strong><strong>,</strong><strong> संक्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता।</strong></p>
<p><strong>यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां, धुरि प्रतिष्ठा पायितव्य एव ।।</strong></p>
<p>कुछ शिक्षकों के पास विद्वता, ज्ञान का धन होता है। लेकिन वह प्रभावी ढंग से संप्रेषित नहीं कर सकते। अच्छे शिक्षक के पास ज्ञान भी होना चाहिए और वह देने की कला भी होनी चाहिए। शिक्षक का मन, मानस, मनोभाव, दृष्टि जितनी महत्वपूर्ण है, वैसी ही छात्र की मानसिकता, दृष्टि भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितानुआश्रयति।</strong></p>
<p><strong>तस्य दिवाकर किरणैर्नलिनीदलमिव विकास्यते बुद्धिः ।।</strong></p>
<p>जो अध्ययन करता है, लिखता है, निरीक्षण करता है, प्रश्न पूछता है, पण्डितों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि, सूर्य किरणों से कमल पुष्प दल जैसे खिलते हैं, फूलते हैं, उसी तरह विकसित होती है।</p>
<p>सामान्यतः अनेक छात्र कक्षा में आकर केवल बैठते हैं। वे Passive रहते हैं। एक शिक्षाविद् ने लिखा, “In every class about 60%, or even more of class is spent on quietly listening to the teacher or taking massive notes.”  ऐसे निष्क्रिय छात्र कक्षा में केवल बैठे रहते हैं। ज्ञान और श्रद्धा शिक्षा की दो आँखें हैं। बहुसंख्य छात्रें की यह दोनों आँखें बंद रहती हैं तो शिक्षा कैसे संभव होगी? <strong>‘</strong><strong>श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्’</strong> विद्यालयों की दीवारों पर लिखा जाता है। क्या हमारे हर छात्र का हृदय श्रद्धा से भरा है, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। जब तक श्रद्धा मन में नहीं होगी, तब तक अपेक्षित सफलता नहीं मिलेगी। ‘प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन सेवया’ यह भी हम भलीभांति जानते हैं। विनय के बिना शिक्षा पाना कठिन है। क्या हमारे विद्यालय का हर बालक विनयशील है, ऐसा हम कह सकते हैं? और उस दृष्टि से हमारे प्रयास क्या हैं, यह प्रश्न भी अपने आप से पूछना पड़ेगा।</p>
<p>गुरुशुश्रूषया विद्या &#8211; गुरु की सेवा से ही विद्या मिलती है। वर्तमान समय में बच्चों से आचार्य की शारीरिक सेवा की अपेक्षा नहीं रख सकते। गुरु की सेवा का व्याप बढ़ाकर दीन, दुखी, दलित, शोषितों की सेवा का पाठ भी आवश्यक है। अॅरिस्टॉटल हृदय की शिक्षा की बात कहते हैं।</p>
<p>ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता। वह तो अंदर छिपा हुआ है। विनोबाजी कहते हैं, शिक्षण का कार्य कोई स्वतंत्र तत्व उत्पन्न करना नहीं है। सुप्त को जागृत करना है। स्वामी विवेकानन्द जी भी यही बात कहते हैं, शिक्षा बाहर से बच्चों के मस्तिष्क में ठूँसना नहीं है। छात्रों में यह विश्वास जैसे-जैसे विकसित होगा, उसी मात्र में उनके मन में शिक्षा के प्रति आकर्षण-प्रेम बढ़ता जाएगा। जो विद्यालय इस दिशा में, यह उद्देश्य सामने रखकर प्रयासरत रहेगा, उस विद्यालय को स्वाभाविक रूप से अधिक सफलता मिलेगी।</p>
<p>हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर, ये दो शब्द आज बार-बार सुनने को मिलते हैं। भवन, साधन-सामग्री, विविध प्रकार के उपकरण यह सब हार्डवेयर हैं जो आवश्यक हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है सॉफ्रटवेयर, जो दिखता तो नहीं, लेकिन उसके बिना कुछ भी संभव नहीं। साधनों से साधना श्रेष्ठ है। साधनों की होड़ में साधना न भूलें। शिक्षक-शिक्षार्थी की यह केमिस्ट्री अच्छी तरह से समझें और उसके पीछे लगें तो सफलता भी हमारे पीछे लगेगी।</p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/national-education-policy-and-teacher/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षक</a></strong></span></p>
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		<title>શિક્ષકનો અભિગમ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Jul 2020 04:51:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ગુજરાતી]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Gurjrati]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Teacher]]></category>
		<category><![CDATA[Teacher Education]]></category>
		<category><![CDATA[Teacher Traning]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; ભાણદેવજી • એ દિવસોમાં હું શ્રી અરવિંદ આશ્રમ, પોંડિચેરીમાં રહેતો હતો. નિત્યના ક્રમ પ્રમાણે સાંજના ભોજન પછી સમુદ્રકિનારે ફરવા ગયો હતો. એકલો જ કિનારે કિનારે ટહેલતો હતો. રાત્રિના પ્રારંભનો&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong> &#8211; ભાણદેવજી </strong><strong>•</strong></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-1742" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/728429-teachers1-300x169.jpg" alt="" width="911" height="513" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/728429-teachers1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/728429-teachers1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/728429-teachers1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/728429-teachers1.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 911px) 100vw, 911px" /></p>
<p><strong>એ દિવસોમાં હું શ્રી અરવિંદ આશ્રમ</strong><strong>, </strong><strong>પોંડિચેરીમાં રહેતો હતો. નિત્યના ક્રમ પ્રમાણે સાંજના ભોજન પછી સમુદ્રકિનારે ફરવા ગયો હતો. એકલો જ કિનારે કિનારે ટહેલતો હતો. રાત્રિના પ્રારંભનો સમય હતો. અંધારું થઈ ગયું હતું. આકાશમાં તારાઓ ટમટમી રહ્યા હતા. મોજાંઓનો ગંભીર નાદ સંભળાતો હતો. આહ્લાદક વાતાવરણ હતું. અચાનક મારી નજર એક બાળક પર પડી. તેણે લીલી ચડ્ડી પહેરી હતી. હું સમજી ગયો : આશ્રમની શાળાનો વિદ્યાર્થી છે. આશ્રમની પ્રાથમિક શાળાના વિદ્યાર્થીઓ લીલી ચડ્ડી પહેરે છે. તેમનું </strong><strong>GREEN GROUP </strong><strong>કહેવાય છે. બાળકની ઉંમર દશેક વર્ષની હશે. બાળક સમુદ્રનાં મોજાં સાથે રમવામાં મશગૂલ છે. થોડી વાર સમુદ્રના પાણીની અંદર જાય છે. મોજું આવતાં દોડીને બહાર નીકળે છે. ફરી અંદર જાય છે. બાળકની આ જોખમી રમત જોઈને મને ધ્રાસ્કો પડ્યો. અરે ! આ બાળક શું કરી રહ્યો છે ! પોંડિચેરીનો દરિયો જોખમી ગણાય છે. અંધારું છે. બાળક નાનો છે. મોજાંની સાથેની આ રમત જોખમી છે. મારો શિક્ષકનો જીવ ! હું બૂમ પાડી ઊઠ્યો</strong><strong>, “</strong><strong>અરે બેટા ! આ તું શું કરી રહ્યો છે </strong><strong>? </strong><strong>મોજું ખેંચી જશે તો </strong><strong>? </strong><strong>બહાર નીકળી જા. એકલો દરિયાકિનારે ફરી કદી આવીશ નહીં.</strong><strong>”</strong></p>
<p><strong>આ બાળક સાથે મારે કશો પ્રત્યક્ષ પરિચય નથી પણ મને બધા વિદ્યાર્થીઓ મારા વિદ્યાર્થીઓ લાગે છે ! એક પ્રેમાળ માતાને બધાં બાળકો પોતાના પુત્રો લાગે છે !</strong></p>
<p><strong>બાળક ખસિયાણો પડી ગયો. તુરત પાણીમાંથી બહાર નીકળી આવ્યો. તેના બન્ને પગ લગભગ આખા જ ભીના હતા. તેની લીલી ચટ્ટીનો થોડો ભાગ પણ ભીનો થયો હતો. બાળકની નજીક જઈને હું ફરીથી બોલ્યો</strong><strong>, “</strong><strong>બેટા ! આ રીતે મોજાં સાથે આવી રમત ન કરાય. મોજું અંદર ખેંચી જાય તો શું થાય </strong><strong>? </strong><strong>રમવા માટે અહીં બીજી રમતો ઓછી છે કે તું આવી રમત રમે છે </strong><strong>? </strong><strong>ફરીથી ક્યારેય અહીં દરિયાકિનારે એકલો ન આવતો.</strong><strong>” </strong><strong>બાળક કંઈ બોલ્યો નહીં. ચૂપચાપ છાત્રાલય તરફ ચાલ્યો ગયો.</strong></p>
<p><strong>મને લાગ્યું કે પ્રકરણ અહીં પૂરું થયું. પણ પ્રકરણ હવે શરૂ થાય છે. બાળકના ગયા પછી તુરત અંધારામાંથી એક વ્યક્તિ મારી પાસે આવી. તે આશ્રમની શાળાના શિક્ષક અને ગૃહપતિ હતા. શાંત અને સ્વસ્થભાવે મારી પાસે ઊભા રહ્યા. અંધારામાં પણ અમારી આંખો મળી. થોડા વધુ નજીક આવીને બોલ્યા</strong><strong>, “</strong><strong>આપે જે કર્યું તે ઠીક કર્યું છે અને સદૂભાવથી કર્યું છે</strong><strong>, </strong><strong>પણ આપ એવી છાપ લઈને ન જશો કે એ બાળકની સંભાળ લેનાર અહીં કોઈ નથી. હું એ બાળકનો શિક્ષક છું અને બાળકની રમત છુપાઈને જોઈ રહ્યો હતો. માત્ર સલામતીની દૃષ્ટિએ જોઈએ તો તમારું વલણ બરાબર છે</strong><strong>, </strong><strong>પરંતુ જીવનમાં સલામતી જ સર્વસ્વ નથી. સલામતી આવશ્યક છે પણ સલામતી સિવાય પણ જીવનમાં બીજું ઘણું છે અને તે પણ મૂલ્યવાન છે. ઘણું અધિક મૂલ્યવાન છે. જો આપણે માત્ર સલામતીનો જ વિચાર કરતા રહીએ તો જીવનનાં ઘણાં મૂલ્યવાન તત્ત્વોથી વંચિત રહી જઈશું.</strong></p>
<p><strong>સલામતી જ જોઈએ તો પીંજરાનો પોપટ મુક્ત પંખી કરતાં વધુ સલામત છે</strong><strong>, </strong><strong>પણ તેની પાસે ઉડ્ડયનની સ્વતંત્રતા નથી અને લાંબે ગાળે તે ઉડ્ડયનની ક્ષમતા પણ ગુમાવી બેસશે ! અને જ્યાં ઉડ્ડયનની સ્વતંત્રતા નથી ત્યાં વિકાસ ક્યાં છે </strong><strong>? </strong><strong>અને વિકાસહીન જીવનમાં જીવન જ ક્યાં છે </strong><strong>? </strong><strong>વિકાસ માટે આપણે જોખમ ઉઠાવવું પડશે. એ બાળક જે અનુભવી રહ્યો હતો તેનું પણ મૂલ્ય છે. જુઓ આ અંધકાર ! આ આકાશ ! આ તારાઓ ! આ સમુદ્ર ! આ મોજાંઓ ! આ રેતી ! અને તેમની સાથે બાળકની મુક્ત અને નિર્ભય રમત ! એક બાળક માટે આ એક અનેરો અનુભવ છે. બાળક </strong><strong>આવા રોમાંચક અનુભવોમાંથી તૃપ્ત થઈને બહાર આવે તે એના જીવનવિકાસનો ભાગ છે. બાળકની સંવેદનશીલતાના વિકાસની પ્રક્રિયાનો એ ભાગ છે. બાળકની જ્ઞાનેન્દ્રિયો</strong><strong>, </strong><strong>તેના ચિત્તની સંવેદનક્ષમતા</strong><strong>, </strong><strong>તેનો સૌંદર્યબોધ </strong><strong>– </strong><strong>આ બધાનો સમુચિત અને સમતોલ વિકાસ થવો જોઈએ. આમ</strong><strong>, </strong><strong>બૌદ્ધિક વિકાસ પર્યાપ્ત નથી</strong><strong>, </strong><strong>હૃદયનો વિકાસ પણ થવો જોઈએ.</strong></p>
<p><strong>બાળક છાત્રાલયમાંથી સમુદ્ર તરફ દોડતો આવ્યો એટલે તુરત જ હું તેની પાછળ-પાછળ દોડતો આવ્યો છું. મેં તેને આ જોખમી પણ રોમાંચક રમતમાંથી રોક્યો નહીં</strong><strong>, </strong><strong>કારણ કે મારે તેને આ અનુભવમાંથી પસાર થવા દેવો હતો. હું પોતે સારો તરવૈયો છું અને આ જોખમ વિશે જાગૃત છું. મુશ્કેલી ઊભી થાત તો જાનના જોખમે પણ હું તેને બચાવી લેત. મારી હાજરીને લીધે તે સલામત હતો. છાત્રાલયમાં ગયા પછી</strong><strong>, </strong><strong>હું તેને આ રીતે એકલો ન રમવા સમજાવીશ પણ ખરો</strong><strong>, </strong><strong>પણ આ વખતે તો મારે તેને આ મૂલ્યવાન અનુભવમાંથી પસાર થવા દેવો હતો અને એટલે જ મેં તેને રોક્યો નહીં. છતાં આપના સદૂભાવ માટે આભારી છું.</strong><strong>”</strong></p>
<p><strong>મારા ચિત્તમાં જાણે પ્રકાશ ફેલાઈ ગયો. મન જાણે ઘડીભર તો સ્તબ્ધ બની ગયું ! મારું મસ્તક મનોમન એક શિક્ષકના</strong><strong>, </strong><strong>સાચા શિક્ષકનાં ચરણોમાં ઢળી પડ્યું. મનમાં ને મનમાં </strong><strong>“</strong><strong>ધન્ય ! ધન્ય !ના ઉદ્દગારો નીકળી પડ્યા.</strong></p>
<p><strong>તે શિક્ષક શાંત અને તટસ્થભાવે છાત્રાલય તરફ ગયા અને હું એ મુગ્ધાવસ્થામાં જ મારા નિવાસસ્થાને પાછો ફર્યો.</strong></p>
<p><strong>એક બીજો પ્રસંગ છે. વિદ્યાર્થીઓ અને મિત્રો સાથે વારંવાર હિમાલય જવાનું બને. એક વાર એક મિત્રને કહ્યું</strong><strong>, “</strong><strong>આ વખતે તમે હિમાલય આવો.</strong><strong>”</strong></p>
<p><strong>“</strong><strong>આવવાની ઇચ્છા તો ખૂબ છે પણ બા રજા ન આપે.</strong><strong>”</strong></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-1743 alignleft" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/teacher-students-2-273x300.jpg" alt="" width="403" height="443" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/teacher-students-2-273x300.jpg 273w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/teacher-students-2.jpg 432w" sizes="auto, (max-width: 403px) 100vw, 403px" /></p>
<p><strong>મિત્ર શિક્ષક છે. ઉંમર ૨૮ વર્ષ છે. શરીર સારું છે. આર્થિક મુશ્કેલી નથી. પણ હિમાલય જવાની બા </strong><strong>‘</strong><strong>ના</strong><strong>’ </strong><strong>કહે છે. શા માટે </strong><strong>? </strong><strong>એક જ દીકરો છે. હિમાલય જવાનું જોખમ કેમ લેવાય </strong><strong>? </strong><strong>એકલા</strong> <strong>જવાનું નથી. અમે દશબાર જણ સાથે છીએ પણ બાનો જીવ ચાલતો નથી.</strong></p>
<p><strong>તો શું સલામતીના કોચલામાં પુરાઈને જ જીવવું </strong><strong>? </strong><strong>સલામતીનો વિચાર જ ન કરવો એમ નહીં. એક વર્ષનો બાળક છરીથી રમતો હોય</strong><strong>, </strong><strong>તો તેના હાથમાંથી છરી ન લઈ લેવી એમ નહીં</strong><strong>, </strong><strong>પણ સલામતી જીવનના વિકાસને જ રૂંધી નાખે તે સલામતી આપણને ક્યાં લઈ જશે </strong><strong>? </strong><strong>આપણે સૌ બાળક માટે</strong><strong>, </strong><strong>વિદ્યાર્થી માટે કે આપણા પોતાના માટે સતત સલામતી જ શોધતા રહીએ તો આપણે પીંજરાના પોપટ જેવા પંગુ ન બની જઈએ </strong><strong>? </strong><strong>ડૂબી જવાની બીકે તરતાં જ ન શીખવું</strong><strong>, </strong><strong>આ કેવી મનોદશા </strong><strong>? </strong><strong>એવાં ડઝનબંધ માતા-પિતાને હું ઓળખું છું</strong><strong>, </strong><strong>જેઓ સંતાન ડૂબી જશે એવી બીકથી એમને તરતાં શીખવા જ જવા દેતા નથી. તરતાં શીખવું એ તો એક દૃષ્ટાંતરૂપ ઘટના તરીકે છે</strong><strong>, </strong><strong>પરંતુ માતાપિતા અને શિક્ષકોનો આ અભિગમ બાળકના સમગ્ર જીવનવિકાસ પર અસર કરે જ છે. માતાપિતા પણ બાળકોના શિક્ષકો જ છે</strong><strong>, </strong><strong>આદ્યશિક્ષકો છે.</strong></p>
<p><strong>શું વિદ્યાર્થીઓને પરીક્ષા માટે તૈયાર કરી દેવા એટલામાં જ શિક્ષકની જવાબદારી પૂરી થઈ જાય છે </strong><strong>? </strong><strong>અને સંતાનોને સારાં કપડાં સિવડાવી દેવાં, તેમના માટે ટ્યુશનની વ્યવસ્થા ગોઠવી દેવી અને ઘરમાં રંગીન ટી.વી. વસાવી દેવું</strong><strong>, </strong><strong>એટલાથી જ માતાપિતાની જવાબદારી પૂરી થઈ જાય છે </strong><strong>?</strong></p>
<p><strong>જે સલામતી આપણા અને આપણાં સંતાનો-વિદ્યાર્થીઓના જીવનવિકાસને રૂંધે</strong><strong>, </strong><strong>તે સલામતીના કોચલાને ભેદવાની જરૂર નથી </strong><strong>?</strong></p>
<p><strong>વનમાં વિહરતા વનરાજ કરતાં પ્રાણીઘરના પીંજરામાં બેઠેલું સસલું વધારે સલામત છે</strong><strong>, </strong><strong>પણ તે સલામતીનું મૂલ્ય બે કોડીથી વધારે નથી.</strong></p>
<p><strong>સ્પાર્ટામાં નવજાત શિશુને પહાડ પરથી ગબડાવવામાં આવતું. ગબડતાં-ગબડતાં નીચે આવ્યા પછી પણ જો તે જીવતું હોય તો જ જીવવાને પાત્ર ગણાતું અને મૃત્યુ પામે તો તેવા માયકાંગલા બાળક વિના અમે ચલાવી લેશું</strong><strong>, </strong><strong>એમ માની કોઈ તેના મૃત્યુનો શોક પણ ન કરતું !</strong></p>
<p><strong> </strong><strong>(‘શિક્ષકનું દર્શન</strong><strong>’ </strong><strong>પુસ્તકમાંથી સાભાર)</strong></p>
<p>વધુ વાંચો : <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-role-of-teacher-in-21st-century/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">The role of Teacher in 21st century</a></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>The role of Teacher in 21st century</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Apr 2019 10:42:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[21th century]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Teacher]]></category>
		<category><![CDATA[Teacher Traning]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211;  Tapan Kumar In the fast changing world of the early 21st century concept of public education, school education is also changing. As part of the changes the role of&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211;  Tapan Kumar</p>
<p>In the fast changing world of the early 21<sup>st</sup> century concept of public education, school education is also changing. As part of the changes the role of schools and education will also be different both in the educational system and the society.</p>
<p>Schools are being charged with a growing range of responsibilities. Their role is seen as central in helping societies adapt to profound social, economic and cultural changes. Their capacity to fulfill these expectations however depends crucially on their own ability to manag<img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-288" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/95805-300x200.jpg" alt="The role of Teacher in 21st century" width="1049" height="699" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/95805-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/95805-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/95805.jpg 999w" sizes="auto, (max-width: 1049px) 100vw, 1049px" />e change and in particular on whether teachers are able to develop positive and effective strategies to meet the needs of tomorrows schools. Without change, there is a danger that technological and other developments will make schools and teachers seem increasingly irrelevant, especially to younger generation. Teacher professionalism should not obstruct the change but be redefined to become part of it. The professionalism of the 21<sup>st</sup> century must include expertise, openness, use of technology and the capacity to adapt and collaborate continuously with in schools and networks that are learning organizations.</p>
<p>If we aim to have a closer look at the characteristic features of the changes, we have to examine what they are. Schools used to be a source of knowledge, a place where children are educated more or less without parental control. Schools used to prepare students for exams. Thus teaching was mostly exam preparation or exam training, especially in the final year.</p>
<blockquote><p>           The need of a generation of teachers who aim to develop learners instead of teaching them, who help their students to become independent (learning to learn), who provide students with motivation and interest for lifelong learning and urge them to become autonomous learners, is essential in  the education of future days.</p></blockquote>
<p>Together with the changes, new expectations appeared towards our schools. Now days it is not merely a place for exam preparation only. Schools need to teach their learners how to gain information, how the select them, synthesis them and use them. This happens so quickly that students learn how to use internet together with their teachers. Parents are involved in decision making so they take part in the life of the school. It is no longer enough to send the children to school in the morning and pick them up in afternoon. Parents have to a view of what is happening in the educational institutions. Exam preparation though is still important but the concept of “Learning to Learn” has slowly become a very important element of teacher’s job.</p>
<p>The changes that took place in schools have changed the role of teachers too. In the past teachers used to be the major source of knowledge, the leader and the educator of their student’s school life. Teachers would organize after school activities. They used to be the a<img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-289" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/cbse_660_070712025458_647_011917122653-300x187.jpg" alt="The role of Teacher in 21st century" width="517" height="322" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/cbse_660_070712025458_647_011917122653-300x187.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/04/cbse_660_070712025458_647_011917122653.jpg 647w" sizes="auto, (max-width: 517px) 100vw, 517px" />uthority in the class and often took over the role of parents. Now a day’s teacher provides information and shows their students how to tackle them. Although they are still considered to be kind of leader in the class, they can be thought of as more like a facilitator in the learning process. They are supporters rather than educators and also advisor towards parents.</p>
<p>Even the teaching process is supposed to be changing in the changing society/societal expectations. First of all, teachers now a days are no longer lecturers, they are facilitators. Their main task is to set goals and organize the learning process accordingly. Though we have a set syllabus in front of the teachers but teachers should cultivate the habit of going beyond it and in the light of national curriculum and national expectations, they have to develop a local curriculum as well. They have the independence to choose the teaching materials, make up a plan of their own and facilitate the learning process of their student so that they can perform well, both at exams and in life. Curriculum design is a task where teachers have to be prepared for, although the present generation of teachers has been growing into making of syllabus only.</p>
<p>Another difference between the past and the present teachers is represented by the technical background they need to be able to use and handle effectively (Computer, Power Point, and Projectors etc.) instead of teaching chalk face, they need to be an information technology expert.</p>
<p>One of the biggest challenges for teachers is that their role in school management affairs has also changed. The school needs them as individuals, who can make decisions and cope with the stress of the changing world. At the same time they need to be able to work in teams, cooperate with colleagues and parents, they have to be PR experts and need to do all these things for a modest monthly income.</p>
<p>All these changes have a common root. They show that it is not enough for teachers to be masters of their profession; they also have to be the artist of it. But what is the difference between a master and an artist? How can a teacher be both? What are the characteristic features of good and bad teaching? Various studies and resources have come up with the importance of content knowledge (subject syllabus), pedagogic content knowledge (how to adapt content to the learners), and general pedagogic knowledge (eg. Classroom management), curriculum knowledge, contextual knowledge (the context of teaching – society expectations) and process knowledge (learning skills, observation skills etc.). Among the characteristic features, cooperation, flexibility and the ability to relate learners appear rather important.</p>
<p>Generally the teachers show priority to content knowledge (their subject) over the general characteristic features like empathy on creativity, openness. Some teacher thinks that content knowledge is far more important and relevant then pedagogy knowledge or methodology. But it is to be noted that the future teachers needs to be more open towards the need of the learners, they should be innovative and creative. He must be more efficient in touching the hearts. Various soft skills and competencies which seem to be fairly important in the present as future education do not really appear in priority among the needs of the practicing teachers. Teacher must feel that convertible and renewable content knowledge; open and pedagogically well trained teachers are the key figures of the future education.</p>
<p>In my personal view teacher education rather than teacher training needs to be changed. The need of a generation of teachers who aim to develop learners instead of teaching them, who help their students to become independent (learning to learn), who provide students with motivation and interest for lifelong learning and urge them to become autonomous learners, is essential in the education of future days.</p>
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