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	<title>Sikh religion Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>Sikh religion Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Apr 2024 11:45:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Shiksa]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> ✍ सुखदेव वशिष्ठ विश्व में देश व धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले महापुरुष तो अनेक मिलेंगे परंतु अपनी तीन पीढ़ियों को इस पुनीत कार्य हेतु बलिदान करने&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/khalsa-panth-should-sing-in-the-entire-world-hindu-dharma-should-awaken/">सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> सुखदेव वशिष्ठ</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-7532" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/04/ret-300x157.jpeg" alt="" width="1424" height="745" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/04/ret-300x157.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/04/ret.jpeg 764w" sizes="(max-width: 1424px) 100vw, 1424px" /></p>
<p style="text-align: justify;">विश्व में देश व धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले महापुरुष तो अनेक मिलेंगे परंतु अपनी तीन पीढ़ियों को इस पुनीत कार्य हेतु बलिदान करने वाले विश्व में एकमेव महा-पुरुष गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज ही होंगे। दिल्ली के चाँदनी चौक के प्रसिद्ध गुरुद्वारे का तो नाम ही शीशगंज गुरुद्वारा इसीलिए पड़ा क्योंकि वहां मुगलों ने गुरु तेग बहादुर के शीश को धड़ से अलग कर दिया था। गुरु तेग बहादुर जी किसी भी कीमत पर धर्मांतरण को तैयार नहीं थे। घटना यह थी कि उनके पिता गुरू तेग़ बहादुर जी के पास कश्मीरी हिंदुओं का एक समूह आया और उनसे औरंगज़ेब के आदेश पर कश्मीर के मुग़ल सूबेदार इफ़्तिख़ार ख़ान के हिंदुओं को यातना दे कर मुसलमान बनाने के लिये बाध्य करने की शिकायत की। गुरु तेग़ बहादुर जी के मुंह से निकला, &#8220;धर्म किसी महापुरुष का बलिदान मांग रहा है।&#8221; बालक गोविन्द राय जी तुरन्त बोले, &#8220;आपसे बड़ा महापुरुष कौन है?&#8221; गुरू तेग़ बहादुर जी ने कश्मीरी हिंदुओं से कहा, &#8220;औरंगज़ेब से कहो अगर गुरु तेग़ बहादुर मुसलमान बन जायेंगे तो हम भी बन जायेंगे।&#8221; इस घोषणा के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी भ्रमण करते हुए दिल्ली पहुंचे, जहाँ उन्हें औरंगज़ेब द्वारा मुसलमान बनने के लिये कहा गया और न मानने पर शिष्यों सहित क़ैद कर लिया गया। उनके शिष्य भाई मति दास को आरे से चीरे जाने, भाई दयाल दास को खौलते हुए पानी में उबाले जाने जैसी कई सप्ताह तक भयानक यातना देने के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी का 11 नवम्बर 1675 को इस्लामी मुफ़्ती के आदेश पर सर काट दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्म के लिए अपने पिता के बलिदान होने के बाद 10 वर्ष की अवस्था में गुरु पद पर विराजे पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी आध्यात्मिक नेता, दूरदर्शी चिंतक, बृजभाषा के अद्भुत कवि, उद्भट योद्धा थे। 1699 ईसवीं में 33 वर्ष की आयु में बैसाखी के अवसर पर आनंदपुर साहब में आपने ख़ालसा पंथ की स्थापना की। धर्मरक्षा को ही जीवन मानने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी की रचना &#8216;उग्रदंती&#8217; में लिखित यह पंक्तियाँ ख़ालसा पंथ की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट करती हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सकल जगत में खालसा पंथ गाजे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में मुगल शासकों के निरन्तर बढ़ते आक्रमणों से देश और धर्म को बचाने के लिए सन् 1699 में बैसाखी के दिन गुरू गोविन्द सिंह ने अपने अनुयाइयों की एक विशाल सभा बुलाई जिसे सम्बोधित करते हुए उन्होंने हाथ में नंगी तलवार लेकर प्रश्न किया कि “है कोई, जो धर्म के लिए अपने प्राण दे सके?” उनकी इस प्रेरणादायक ललकार को सुनकर बारी-बारी से दयाराम खत्री (लाहौर), धर्मदास जाट (दिल्ली), मोहकत चंद धोबी (द्वारिका), हिम्मत सिंह रसोइया (जगन्नाथ पुरी) तथा साहब चंद नाई (बिहार) से अग्रसर हुए। फ़िर क्या था, सारा निश्तेज समाज ऊर्जावान होकर उठ खड़ा हुआ। उन्होंने यहीं पर जात-पात के भेदभाव में बिखरे हिन्दू समाज को संगठित कर खालसा के रूप में खड़ा किया और इस प्रकार 13 अप्रैल 1699 ई को पंजाब के आनन्दपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">खालसा के लक्षण पूछने पर दशमेश गुरू ने कहा कि खालसा वह है जिसने काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर काबू पा लिया हो तथा अभिमान, पर-स्त्री गमन, पर-निन्दा तथा मिथ्या विश्वासों के भ्रमजाल से सदा दूर रहता हो। जो दीन दु:खियों की सेवा व दुर्जन-दुष्टों का विनाश कर निरन्तर श्रद्धापूर्वक प्रभु नाम के जप में लीन रहता हो।</p>
<p style="text-align: justify;">खालसा को चरित्रवान व पराक्रमी बनाये रखने के लिए उन्होनें &#8216;पांच ककार&#8217; धारण करने के लिए कहा। ये हैं &#8211; 1. कृपाण 2. केश 3. कंघा, 4. कच्छा व 5. कड़ा। पौष शुक्ल सप्तमी को पटना साहिब में प्रकट हुए गुरू गोविन्द सिंह एक बड़े समाज सुधारक थे। सती प्रथा, कन्या वध, अस्पृश्यता (छूआ-छूत) इत्यादि सामाजिक बुराईयों से दूर समानता पर आधारित सामाजिक संरचना के वे पक्षधर थे। वीरता व पराक्रम में उनका मुकाबला नहीं था।</p>
<p style="text-align: justify;">औरंगजेब समर्थक, पंजाब के पर्वतीय नरेशों को, भंगाणी के युद्ध में पराजित किया और 1703 में उन्होंने चमकौर के युद्ध में केवल 40 सिखों की सहायता से मुगलों की विशाल सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। इसमें गुरू गोविन्द सिंह के दो बड़े पुत्रों अजीत सिंह व जुझार सिंह के साथ पांच प्यारों में से तीन प्यारे शहीद हो गये।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-7528" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/04/2019_12image_02_42_07985302501-300x200.jpg" alt="" width="1421" height="947" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/04/2019_12image_02_42_07985302501-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/04/2019_12image_02_42_07985302501.jpg 600w" sizes="(max-width: 1421px) 100vw, 1421px" /></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 1703 में सरहिन्द के नवाब वजीर खाँ ने उनके दो छोटे पुत्रों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को, इस्लाम स्वीकार न करने के कारण दीवार में जीवित चिनवा दिया। चारों पुत्रों और पत्नी की क्रूर हत्या होने के बावजूद भी गुरूजी एक महान योगी की तरह बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए, 1706 में उन्होंने खिदराना का युध्द लड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">वे महान योद्धा तो थे ही, संगीत, साहित्य व कला के क्षेत्र में भी उनकी गहरी रूचि थी। वे रचनाकार कवि भी थे। उनके द्वारा रचित दशम ग्रन्थ हैं जिसमें &#8211; जापुजी  साहब, अकाल स्तुति, विचित्र नाटक, चण्डी चरित्र, चण्डी दीवार, जफरनामा, चौबीस अवतार, ज्ञान प्रबोध आदि प्रमुख हैं। उनके दरबार में 52 कवि थे। उन्होंने अपने बाद श्रीगुरुग्रन्थ साहेब को गुरू मानने का आदेश देकर गुरुता गद्दी पर आसीन किया। सन् 1666 में पटना में जन्मे प्रकाश पुंज (गुरूजी) ने सन् 1708 में नांदेड़ में गोदावरी के तट पर देह त्याग कर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया। उनके द्वारा जलाई गई स्वतन्त्रता की ज्योति तथा अन्याय के विरुद्ध लड़ने की भावना आज भी विश्व के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। गऊ रक्षा के लिए उनका मत था &#8211; &#8220;यही दे हु आज्ञा तुरकन गहि खपाऊं, गऊ घात का दोख जगसों मिटाऊं।&#8221; उग्रदन्ती अर्थात्, हे मां भवानी, मुझे आशीर्वाद और आदेश दे कि धर्म विरोधी अत्याचारी तुर्कों को चुन-चुनकर समाप्त कर दूं और इस जगत से गौ हत्या का कलंक मिटा दूं। वे देवी दुर्गा भवानी के अनन्य उपासक थे। &#8216;खालसा&#8217; सृजन से पहले उन्होंने शक्ति यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उनकी इच्छा थी कि अर्थात, सारे जगत में खालसा पंथ की गूंज हो, हिन्दू धर्म का उत्थान हो तथा तुर्कों द्वारा पैदा की गई विपत्तियां समाप्त हों। अपने नाम के तीनों शब्द ‘गुरु’, ‘गोविन्द’ व ‘सिंह’ को शब्दश: चरितार्थ कर देश, धर्म, इतिहास, संस्कृति व स्वाभिमान की रक्षार्थ ज्ञान के भण्डार एक श्रेष्ठ गुरु, गोविन्द की राह के पथ प्रदर्शक तथा सिंह गर्जना के साथ शत्रुओं के छक्के छुडा देने वाले गुरू गोविन्द सिंह जी यदि नहीं होते तो मुगलों के अत्याचार के आगे विवश समस्त हिन्दू समाज शायद स्वाभिमान से मुगलों का सामना न कर पाता।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती पंजाब प्रांत के संपर्क प्रमुख है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/shri-guru-teg-bahadur-ji-400th-birthday-part-1/" target="_blank" rel="noopener">श्री गुरु तेगबहादुर जी – 400 साला प्रकाश वर्ष – 1</a></span></strong></p>
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		<title>श्री गुरु तेगबहादुर जी – 400 साला प्रकाश वर्ष – 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Nov 2021 04:44:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; इन्द्रजीत कौर नवीन नगर ‘चक्क नानकी’ की नींव 19 जून 1665 को रखकर नगर वासियों को भी उपदेश देकर गुरुजी अपने परिवार एवं अन्य श्रद्धालु सिखों सहित मालवे देश&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/shri-guru-teg-bahadur-ji-400th-birthday-part-2/">श्री गुरु तेगबहादुर जी – 400 साला प्रकाश वर्ष – 2</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; इन्द्रजीत कौर</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-4341" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gtb-gt-thumb-300x183.jpg" alt="" width="1061" height="647" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gtb-gt-thumb-300x183.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gtb-gt-thumb-768x468.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gtb-gt-thumb.jpg 820w" sizes="(max-width: 1061px) 100vw, 1061px" /></p>
<p><strong>नवीन नगर ‘चक्क नानकी’</strong> की नींव 19 जून 1665 को रखकर नगर वासियों को भी उपदेश देकर गुरुजी अपने परिवार एवं अन्य श्रद्धालु सिखों सहित मालवे देश की ओर चल पडे़।</p>
<p>गुरुजी गांवों में सिखी का नामदान देते हुए सैपफाबाद पहुंचे। इस स्थान को आजकल बहादुरगढ़ का किला कहते हैं। वह पीर भीखन शाह का श्रद्धालु बन गया और उनकी शिक्षा के कारण ही वह श्री गुरु नानकदेव जी हेतु भी बड़ी श्रद्धा रखता था।</p>
<p>जब श्री गुरु तेगबहादुर जी उसे मिलने हेतु सैपफाबाद पहुंचे तो नवाब सैपफ खां स्वयं गुरुजी के अभिनंदन हेतु बाहर आया। गुरुजी ने उसके बाग में डेरा लगाया। सैपफ खां ने गुरुजी की भरपूर सेवा की।</p>
<p>सैपफ खां ने गुरुजी की सवारी हेतु एक सुन्दर घोड़ा भेंट किया। माता गुजरी एवं माता नानकी जी की सवारी के लिए एक सुन्दर रथ बनवाया। गुरु जी उसके पास नौ दिन ठहरे। नवाब सैपफ खां हर समय गुरुजी के पास बैठा रहता और उनके साथ विचार-विमर्श करता रहता। भारत के भिन्न-भिन्न नगरों में होते हुए गुरुजी पटना पहुंचे, यहां उन्होंने अपने परिवार को टिका दिया।</p>
<p>अक्तूबर 1666 ई. को श्री गुरु तेगबहादुर जी ढाका की ओर रवाना हो गए। गुरु साहिब के कीर्त्तनिए एंव अन्य सिख आप जी के साथ गए। संगतों का कृतार्थ करते हुए आप ढाका शहर में पहुंच गए।</p>
<p>मसंद बलाकी दास ने गुरुजी हेतु एक सुन्दर पलंग बनवा कर रखा हुआ था। बलाकी दास गुरुजी को अपने घर ले गया और उस पलंग पर ही गुरुजी का आसन बनवाया। गुरुजी के दूसरे साथियों एवं गुरसिखों की एक अग मकान में रिहायश का प्रबंध कर दिया। बाकी दास की माता ने अपने हाथों से कातकर गुरुजी के लिए एक पौशाक तैयार की हुई थी। गुरुजी उनके घर ठहरे तो माता जी ने उन्हें यह पोशक अर्पण की। गुरुजी ने बडे़ सम्मान से उस पोशाक को पहना और माता जी को नाम दान दिया। गुरुजी काफी दिन भाई बलाकी दास के घर ठहरे।</p>
<p>एक बार बलाकी दास मसंद की माता जी ने गुरुजी से प्रार्थना की कि उन्होंने गुरु साहिब की एक तस्वीर कलाकार से बनवा कर अपने पास रखनी है। गुरुजी ने उसे समझाया कि गुरु मंत्र का जाप करने से ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है। लेकिन माता जी अपने हठ पर अडे़ रहे। बलाकी दास बड़ा प्रभावशाली व्यक्ति था, उसने एक योग्य कलाकार को तस्वीर बनाने हेतु बुलाया। कलाकार आकर तस्वीर बनाने लग गया। वह तस्वीर बनाता गया। गुरुजी के शरीर के समस्त अंग उसने ठीक-ठाक बना लिए, किन्तु जब गुरुजी के चेहरे की ओर देखता तो उसका ब्रश ही न चलता। वह गुरु साहिब के चेहरे का तेज-प्रताप ही न झेल सका। उसने भरसक प्रयास किए लेकिन ब्रश उसका साथ न देता। अंततः गुरु साहिब ने उसके हाथों से ब्रश पकड़ लिया और अपना चेहरा स्वयं बनाया। फिर वह तस्वीर गुरुजी ने अपने हाथों से माता जी को दे दी। माता जी वह तस्वीर प्राप्त करके बहुत प्रसन्न हुई।</p>
<p>इस तस्वीर के बारे में बताया जाता है कि जहां-जहां गुरु साहिब के ब्रश लगे, उतनी तस्वीर अभी भी उस तर चमकती है लेकिन शेष भाग बहुत फीका पड़ गया है।</p>
<p>जब गुरु जी की संतुष्टि हो गई कि रिहायशी मकान, दीवान हाल व अन्य विश्राम घर सुयोग्य बन गए हैं तो आपने एक हुक्मनामा लिख कर परिवार को आनंदपुर साहिब पहुंचने की हिदायत करके एक सिख को पटना साहिब भेज दिया।</p>
<p>यह भी पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/paati-bitiya-naam-4-guru-teg-bahadur-ji/" target="_blank" rel="noopener">पाती बिटिया के नाम-4 (वे अद्वितीय बलिदान)</a></strong></span></p>
<p>कुछ दिनों पश्चात् ही गुरु परिवार आनंदपुर जाने हेतु तैयार हो गया। जब सारा परिवार आनंदपुर पहुंचा तो उस समय दरबार लगा हुआ था और <strong>‘आसा दी वार’</strong> का कीर्तन हो रहा था। कीर्तन की समाप्ति के बाद गुरुजी स्वयं अपने साहिबजादे को लेने आए। उन्होंने बाला प्रीतम को अत्यंत प्रेम किया और दरबार हाल में अपने पास बैठा लिया। शेष परिवार भी कीर्तन हाल में ही विराज गया। सारी संगत बाला प्रीतम को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई। जब साहिबजादे बाला प्रीतम के आनंदपुर आने के बारे में अन्य संगतों को पता चला तो संगतें शुभ-कामनाएं देने हेतु गुरुघर पहुंचने लगीं। दूर-दूर के मसंद उपहार लेकर उपस्थित होने लगे। आनंदपुर साहिब में हर तरफ हर्षोल्लास का वातावरण हो गया।</p>
<p>उस समय दिल्ली के तख्त पर बैठा बादशाह औरंगजेब बड़ा कट्टरवादी एवं अत्याचारी था। उसने कश्मीर के सूबे को सख्त हिदायत की कि कश्मीर के पंडितों को मुसलमान धर्म धरण करने हेतु उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करे।</p>
<p>उस समय कश्मीरी पंडितों का मुख्य पंडित कृपा राम था। उसने समस्त ब्राह्मणों को यह सलाह दी कि श्री गुरु नानकदेव जी एक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जो किसी हाकिम, बादशाह अथवा जालिम से डरते नहीं थे। उनकी गद्दी अभी भी चलती है। श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी ने एक छोटी सी सेना से इन मुसलमान हाकिमों में भगदड़ मचा दी थी। आजकल उनकी गद्दी पर श्री गुरु तेगबहादुर साहिब बैठे हैं। सभी पंडित गुरुजी के दरबार में उपस्थित हुए।</p>
<p>गुरुजी उस समय अपने दीवान स्थान मंजी साहिब पर विराजमान थे। पंडितों ने उपस्थित होकर प्रार्थना की, “महाराजा! ताकत के नशे में चूर जालिम औरंगजेब हमें मुसलमान बनाना चाहता है। हमारी उसके अत्याचार से रक्षा करें।” गुरुजी अपनी इस सोच में ही लीन थे कि साहिबजादा गोबिंद राय जी वहां आ पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘पिताजी! क्या सोच रहे हो, यह लोग कौन हैं?’</p>
<p>साहिबदाजे की बात सुनकर गुरुजी बोले, “बेटा! यह कश्मीर के दुखी पंडित हैं। औरंगजेब एक अत्याचारी बादशाह है, वह इन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाना चाहता है। इनकी रक्षा हेतु किसी महापुरुष के बलिदान की आवश्यकता है। यदि यह मुसलमान बनना स्वीकार नहीं करेंगे तो इनका वध कर दिया जाएगा।”</p>
<p>अपने पिता से यह बात सुनकर साहिबजादों ने कहा<strong>, </strong><strong>“पिताजी! आप जी से अन्य कौन बड़ा महापुरुष है</strong><strong>, </strong><strong>जो इनकी रक्षा कर सके। आप जी इनकी किसी तरह भी सहायता करो।”</strong></p>
<p>अपने दिलेर पुत्र की यह बात सुनकर गुरुजी ने पंडितों से कहा, “जाकर अपने सूबे के हाकिम को कह दो, यदि वह हमारे धर्मिक नेता श्री गुरु तेगबहादुर जी को मुसलमान बना लेगा तो वह भी मुसलमान बन जाएंगे। हम तिलक जनेऊ को तो नहीं मानते लेकिन दुखियों की पुकार भी हम बर्दाश्त नहीं कर सकते।” गुरु साहिब के यह वचन सुनकर पंडित सहर्ष चले गए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4342" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/E0TKLpOXsAIHPww-300x194.jpg" alt="" width="1086" height="702" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/E0TKLpOXsAIHPww-300x194.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/E0TKLpOXsAIHPww.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 1086px) 100vw, 1086px" /></p>
<p>पंडितों के जाने के पश्चात् ही गुरु साहिब ने दिल्ली जाने की तैयारी कर ली। उन्होंने अपने साथ केवल छः सिख लिए। गुरुगद्दी उन्होंने (गुरु) गोबिंद राय को सौंप देने के लिए कहा। इस तरह सारे प्रबंध पूरे करके गुरु जी घोड़ों पर सवार होकर अपनी दिव्य यात्रा पर चल पडे़। आप जी प्रचार करते हुए आगरा पहुंचे। उन्होंने यहां एक बडे़ अनोखे ढंग से अपनी गिरफ़्तारी का कौतुक रचा।</p>
<p>उस बाग में एक लड़का भेड़-बकरियां चरा रहा था। उसे आप जी ने एक बहुमूल्य अंगूठी दी कि इसे गिरवी रखकर हमारे लिए इस दुशाले में दो सेर जलेबियां ले आए। लेकिन जब लड़का दो बहुमूल्य वस्तुएं लेकर हलवाई के पास गया तो हलवाई को सन्देह हो गया कि लड़का अवश्य कोई चोर है। चोरी का माल लेकर वह कोतवाली पुलिस के पास चला गया। जब पुलिस ने लड़के से पूछा तो उसने गुरुजी का ठिकाना बता दिया। इस तरह पुलिस ने गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया।</p>
<p>गुरुजी को किसी प्रकार का डर अथवा भय नहीं था। दिल्ली पहुंच कर उन्हें इस्लाम कबूल करने हेतु बहुत लालच दिखाए गए, लेकिन गुरुजी अपने निर्णय पर अड़िग रहे। उन्हें भयभीत करने हेतु भाई सतीदास को आरे से चीरा गया, भाई दयाले को पानी में उबाला गया व भाई सतीदास को रुई में लपेटकर जीवित जलाया गया। लेकिन गुरुजी पर इस्लाम का कोई असर न हुआ। अंत में उन्हें चांदनी चौक में समस्त लोगों सामने शहीद कर दिया गया।</p>
<p><strong><em>श्री गुरु तेगबहादुर जी की शिक्षाएं आज भी धर्म व समाज के कार्य के लिए हमें प्रेरणा देती है। एक गीत में कहा गया है – “धर्म के लिए जिए</em></strong><strong><em>, समाज के लिए जिए, ये धडकने ये श्वास हो पुण्यभूमि के लिए कर्मभूमि के लिए&#8230; ।”</em></strong></p>
<p>(लेखिका कैंब्रिज इंटरनेशनल फाउंडेशन स्कूल जालंधर में प्रवक्ता एवं विभाग प्रमुख है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/shri-guru-teg-bahadur-ji-400th-birthday-part-1/" target="_blank" rel="noopener">श्री गुरु तेगबहादुर जी – 400 साला प्रकाश वर्ष – 1</a></strong></span></p>
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