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	<title>Ramesh Dutt Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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		<title>साहस का पुतला &#8211; रमेशदत्त</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2023 04:11:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल बलिदानी]]></category>
		<category><![CDATA[Bal Balidani]]></category>
		<category><![CDATA[Ramesh Dutt]]></category>
		<category><![CDATA[रमेशदत्त]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; गोपाल माहेश्वरी खिल रहा हो फूल जीवन का उसे माँ को चढ़ा दो, जब तिरंगा थामना हो काम छोड़ो कर बढ़ा दो। प्रयागराज युगों-युगों से भारतीयों के लिए पावनता&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6795" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/Ramesh-Dutt-Malviy-300x226.jpg" alt="" width="1726" height="1300" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/Ramesh-Dutt-Malviy-300x226.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/Ramesh-Dutt-Malviy.jpg 569w" sizes="(max-width: 1726px) 100vw, 1726px" /></p>
<p style="text-align: center;"><strong>खिल रहा हो फूल जीवन का उसे माँ को चढ़ा दो</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जब तिरंगा थामना हो काम छोड़ो कर बढ़ा दो।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">प्रयागराज युगों-युगों से भारतीयों के लिए पावनता का प्रतीक और श्रद्धा का केन्द्र रहा है। यह तीर्थराज उस दिन और भी पवित्र हो गया जब 27 फरवरी, 1931 को महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद ने स्वतंत्रता के यज्ञ में अपनी आत्माहुति दी। यह स्थान चर्चित इसलिए भी रहा कि ‘आनंद भवन’ जो पं॰ मोतीलाल नेहरू का निवास था, यहाँ स्थित आजादी के दूसरे दौर की लड़ाई में गतिविधियाँ का केन्द्र बना। दोनों एक ही ध्येय के लिए लड़ रहे दो विपरीताभासी विचारों के पारस्परिक मतभेदों के शोचनीय बिन्दु थे। कहा जाता है अगर ‘आनन्द भवन’ में संरक्षण मिल जाता तो आजाद अंग्रेजों के हाथ न आ पाते। खैर, यहाँ यह चर्चा प्रासंगिक न लगेगी लेकिन यह खेद तो इसे जानने वाले हर भारतीय को रहेगा कि ‘संगम’ के लिये विश्वविख्यात नगर में आजाद का बलिदान एक ऐसी घटना थी जो संभवतः टाली जा सकती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">खैर, यह कहानी फिर कभी। आज तो आप इसी नगर में रहने वाले वैद्य भानुदत्त जी के सुपुत्र रमेशदत्त मालवीय की वह वीर गाथा सुनें जिससे आपमें देशभक्ति का सागर लहरा उठे।</p>
<p style="text-align: justify;">गाँधी जी ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ छेड़ चुके थे। उनके कहने पर देश प्राण तक देने को तैयार था। वैद्यजी अपने घर में उस दिन पटना में बड़े नेताओं के बन्दी हो जाने पर छात्रों द्वारा आन्दोलन का बीड़ा उठा लेने की उत्साहकारी बातें कह-सुन रहे थे। चर्चारत इस मण्डली की बातों में पुलिस के निर्मम अत्याचारों की बातें सुन कर किशोर अवस्था में पग रख रहा 16 वर्षीय रमेश व्याकुल हो उठा। संभवतः साधारण बच्चा ऐसी भीषण घटनाएँ सुनकर डर से दुबक जाता पर रमेश इसके विपरीत ऐसे में अपना कर्त्तव्य खोज रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">शाला के साथी मिले तो मानो वह हृदय से ललकार उठा “पटना में हमारे सात साथी, हम जैसे विद्यार्थी तिरंगे का मान रखते बलिदान हो गए, क्या हमें कुछ नहीं करना चाहिए?” स्वतंत्रता पाने की आग तो बच्चे-बच्चे में जाग उठी थी। अधिक क्या सोचना था? तुरंत एक तिरंगा जुटाया, देशभक्ति और अंग्रेज विरोध के नारों वाली तख्तियाँ बन गईं और लक्ष्य तय हुआ ‘इलाहाबाद न्यायालय’ पर तिरंगा फहराने का। मौखिक प्रचार तंत्र सक्रिय ही था। कानों-कान योजना कई छात्रों तक फैल गई। रमेश के नेतृत्त्व में अगले दिन निकलने वाला तिरंगा मार्च छात्रा सेना का संचलन बन गया। छोटी सी टोली गोमुख की गंगा जैसी निकली और देखते ही देखता गंगा जैसा ही विशाल रूप ग्रहण कर लिया। पुलिस ने कान फड़पफड़ाए, चौकी-पहरे बढ़ाए, न्यायालय को छावनी बना डाला। वही चेतावनी “लौट जाओ”। वही उत्तर “हम लौटने नहीं आए हैं?” यह संवाद तो लगभग ऐसे ही शब्दों में पूरे देश में हर जगह दुहराए जा रहे थे। आगे की घटना भी जैसे पूर्वलिखित नाटिका हो, वैसी ही थी। पहले धमकियाँ, फिर लाठियाँ, फिर गोलियाँ। रमेश झण्डा लिए न्यायालय की ओर लपका। उसके शरीर पर अनगिनत लाठियाँ बरस उठीं, पर वह सिपाहियों को चीर कर आगे बढ़ता गया। उसे न रोक पाने से झल्लाई पुलिस ने पीछे से गोलियाँ चला दीं। वह लड़खड़ाया लेकिन लक्ष्य प्राप्त होने तक कोई भी प्रयास शेष न छोड़ने वाला वह साहस का पुतला तिरंगा फहराए बिना तो आज मौत से भी न रुकने वाला था। उसने जब अनुभव किया कि आगे बढ़ने में शरीर साथ नहीं दे रहा है तो पूरी ताकत से तिरंगा न्यायालय की ओर उछाल दिया। अंतिम प्रयत्न तक हार न मानने वाले की सहायता को भगवान भी विवश हो जाते हैं, उसने सुना था पर आज सत्य होते भी दिख गया। झण्डा न्यायालय की दीवार से टिक कर सीध खड़ा हो गया। ‘वन्देमातरम्’ का महाघोष एवं लक्ष्य की सफलता का सन्देश दिशा-दिशा में फैल रहा था। बाल बलिदानी रमेशदत्त अपने तिरंगे को देखते हुए ऐसा ध्यानस्थ था कि पुलिस ने विक्षिप्तों की तरह उस पर और कितने डण्डे बरसाए, उसे भान ही न रहा। वह तो अनंत पथ पर जा चुका था, संभवतः ईश्वर से एक जन्म और माँगने कि अपनी भारत माता को मुक्त देख सके। ईश्वर ने अवश्य सुना होगा। अवश्य सुना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/seven-lovers-of-freedom/" target="_blank" rel="noopener">स्वतंत्रता के सात दीवाने</a></span></strong></p>
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