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	<title>IKS Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<title>IKS Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>कानन करउँ जनम भर बासू!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Sep 2026 03:17:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रामचरितमानस]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; डॉ. अखिलेश कृतज्ञ भारतीय परिवार की संरचना में त्याग की अद्भुत भूमिका है। मनुष्य त्याग से देवता बन सकता है। जिस घर में त्याग का भाव समाहित होता है,&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; डॉ. अखिलेश कृतज्ञ</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय परिवार की संरचना में त्याग की अद्भुत भूमिका है। मनुष्य त्याग से देवता बन सकता है। जिस घर में त्याग का भाव समाहित होता है, वह घर मंदिर बन जाता है। त्यागशील मनुष्य प्रेरणा-स्रोत बन जाता है। समाज का पथ प्रदर्शक भी। गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ पारिवारिक मूल्यों की अनमोल थाती है। राम का राज्याभिषेक होने वाला है। मन्थरा कैकेयी की बुद्धि फेर देती है। रानी कैकेयी राजा दशरथ से अपने दो वर (पूर्व में दिए गए) माँगती हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तापस वेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">‘भरत का राजतिलक और राम को चौदह वर्ष का वनवास’ की बात सुनकर राजा दशरथ अवाक रह गए। सहम गए। कुछ कहते नहीं बना। कहाँ तो अगले दिन ज्येष्ठ पुत्र राम का राज्याभिषेक और कहाँ अब चौदह वर्ष का वनवास! मंगल समाचार के बीच अमंगल बात! पूरी अयोध्या में खुशी के मंगल गीत गाए जा रहे हैं, उसी के बीच कैकेयी के वर, विशेषकर राम को चौदह वर्ष का वनवास, सभी को व्याकुल कर देता है। सभी के मुख दु:ख के इस समाचार से सूख जाते हैं। पर, राम के मुख पर दु:ख की छाया तक नहीं। प्रसन्नवदन हैं राम। यह राम की त्यागशीलता का उदाहरण है। अपने परिवार की प्रतिष्ठा के लिए। अपने पिता की वचन प्रतिज्ञा के लिए। ऐसा नहीं है कि वे अपने छोटे भाई भरत के स्वभाव और आचरण को नहीं जानते हैं। जानते हैं। बखूबी पहचानते भी हैं। उन्हें पता है कि किसी भी क़ीमत पर भरत राज्याभिषेक को नहीं स्वीकारेंगे। पर, उन्हें अपने पिता द्वारा दिया गया माता कैकेयी का वचन निभाना है। वचन पालन का मूल्य समाज में प्रतिष्ठित करना है। इसके लिए राम अपने जीवन का बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकते हैं। प्रसन्नचित्त होकर राम माता कैकेयी से कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“सुनु जननि सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तुलसी के राम तनिक भी व्याकुल नहीं हैं। वे अपने माता-पिता के वचनों की पालना में स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। वे अपने छोटे भाई के राजतिलक से उल्लसित हैं, ख़ुश हैं, प्रसन्न हैं। आज के समय में ऐसा उदाहरण दुर्लभ है। आज के भौतिक युग में कई स्थानों पर आपस में भाई-भाई एक दूसरे की परवाह करने से पल्ला झाड़ लेते हैं। सुख-दु:ख में सहभागी होने के लिए मान-मनौव्वल जारी है। पैतृक संपति से बँटवारे के नाम पर कई बार तलवारें खींच जाती हैं। बोलचाल बंद हो जाती है। आँगन में दीवार खड़ी हो जाती है। बने-बनाये मकान की दीवार टूट जाती है। जिस पर अपनी संपत्ति में से हिस्सा देना, पूरी सत्ता सौंप देना, पूरा राजपाट सौंप देना, वर्तमान में दुर्लभ है, लेकिन असंभव नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय समाज त्यागशील समाज है। परिवार इसके केंद्र में है। पारिवारिक मूल्य और संस्कार मनुष्य निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं। राम त्याग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। परिवार की एकता के लिए। परिवार में प्रेम और भाईचारे को बनाये रखने के लिए। एक बड़े भाई द्वारा अपने छोटे भाई के लिए अपनी सम्पूर्ण पैतृक सम्पत्ति का परित्याग। राजपाट से मुक्ति। अपने छोटे भाई को राजकाज सौंपना। बिना किसी लाभ-लालच-स्वार्थ के। वचन पालन की मर्यादा। यह त्याग और वचन पालन आज प्रासंगिक है। राम माता कैकेयी के वर की पालना करते हुए अपने छोटे भाई भरत के लिए ख़ुशी-ख़ुशी राज्य सौंपने की घोषणा करते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जौं न जाऊँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह त्याग भारतीय परंपरा और साधना का हिस्सा है। माता-पिता की आज्ञा राम के लिए सर्वोपरि है। राम को वनवास मिल गया। किंचित मात्र भी दुखी नहीं हैं। जो भी मिला, उसमें श्रेष्ठतम तलाशने का भाव राम सिखाते हैं। यह भाव जब मनुष्य मात्र में उत्पन्न या समाहित होता है तो वह किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं होता है। देखिए, राम को मिला है वनवास और उसे वे किस तरह लेते हैं। दुःख को सुख में ढालने की कला। दुःख में सुख खोजने की दृष्टि। यह भारत की परंपरा में है। राम वन जाने से पूर्व अपनी माता कौसल्या से आज्ञा लेने जाते हैं और कहते हैं कि पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है। भाव यह है कि मुझे कोई बड़ा कार्य करने के लिए अयोध्या से भी बड़े (क्षेत्रफल के आधार पर) वन राज्य का राजा बना दिया है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">दुनिया के इतिहास में सम्भवतः ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि कल जिस व्यक्ति का राज्याभिषेक होने वाला है, उसे चौदह वर्ष का वनवास मिल जाए। उसके बाद भी वह व्यक्ति उस वनवास को सहर्ष स्वीकार ले। यह भारत के समाज की त्यागशीलता है। जो परिवार के संस्कार से व्यक्ति-व्यक्ति में अपना स्थान बनाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">राम, सीता और लक्ष्मण वन को चले गए। भरत अयोध्या लौटते हैं। पूरा प्रकरण भरत को पता चलता है। वे अधीर हो जाते हैं। स्वयं को और अपनी माता कैकेयी को खूब कोसते हैं। गुरु वशिष्ठ की आज्ञानुसार अपने पिता दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया को संपन्न करते हैं। इसके पश्चात् जब अपने पिता के वचनस्वरूप राजतिलक को ग्रहण करने की बारी आई। तब गुरु वशिष्ठ के वचन, मंत्रियों के अनुमोदन और माता कौसल्या की कोमल वाणी को सुनकर भरत विनती करते हुए कहते हैं कि मुझे श्रीराम जी के पास जाने की आज्ञा दीजिए, इसी में मेरा हित है। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“जाऊँ राम पहिं आयसु देहु। एकहिं आँक मोर हित एहू।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मोहि नृप करि भल आपन चहहु। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अद्भुत है यह भातृप्रेम। राम का भरत के प्रति। भरत का राम के प्रति। त्याग की भावना से यह प्रेम अपने निश्छल स्वरूप में प्रकाशित होता है। भरत अपने बड़े भाई श्रीराम जी को अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी करते हैं। अयोध्यावासियों सहित गुरु वशिष्ठ, माता कौसल्या, कैकेयी, शत्रुध्न आदि के साथ वन गमन करते हैं। वन जाते समय ही भरत के मन में अपने बड़े भाई राम का राजतिलक करने की भावना प्रबल रहती है। भरत अपने मंत्रियों से कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“कहेहु लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>बेगि चलहु सुनि सचिव जोहरे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ऐसी त्यागशीलता और भातृप्रेम के संस्कार परिवार के माध्यम से समाज में पल्लवित-पुष्पित होते हैं, तो भारत का परिवार बोध और अधिक गहरा होता जाता है। वन मार्ग में भरत नंगे पैर चल रहे हैं। अपने बड़े भाई राम के बिना अयोध्या सूनी है। राम बिना कैसा राज और कैसी अयोध्या? राजतिलक की बात तो सोच ही नहीं सकते भरत। रास्ते में स्त्री-पुरुष भरत को देख रहे हैं। मार्ग में एक स्त्री भरत के शील, स्नेह और स्वभाव की सराहना करते हुए कहती है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“चलत पयादे खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राम भी अपने छोटे भाई भरत पर गर्व करते हैं। उनकी त्यागशीलता से परिचित हैं। उनका भातृप्रेम विशाल है। राम कहते हैं कि भरत को कभी भी राजमद (सत्ता का अहंकार) हो ही नहीं सकता। अपने छोटे भाई पर इतना अटूट विश्वास आज प्रासंगिक है। यह विश्वास पूरे परिवार को जोड़े रखता है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">चित्रकूट में भरत-राम मिलाप होता है। गुरु वशिष्ठ राम के राज्याभिषेक को सभी के लिए सुखदायक बताते हैं। उसके लिए उपाय भी सुझाते हैं – भरत-शत्रुघ्न वन में रहें और राम, लक्ष्मण और सीता अयोध्या लौट आएँ। भरत का भातृप्रेम देखिए, त्याग देखिए। गुरु वशिष्ठ के इस सुझाव पर वे जन्मभर वन में वास करने को तैयार हैं। बस, बड़े भाई राम अयोध्या लौट जाएँ। इससे बड़ा सुख उन्हें अपने जीवन में और कुछ नहीं लगता &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कानन करऊँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासु।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भरत के लिए जीवन का एक ही सुख। बड़े भाई राम का अयोध्या वापस लौट आना। राम द्वारा अयोध्या का राजकाज संभालना। बड़े भाई राम का राजा बनना। उसके लिए वह स्वयं आजीवन वन में रहने को तैयार। परिवार की एकता व ख़ुशी के लिए अपने जीवन की सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं का परित्याग करना पड़े, तो उसके लिए भी तत्पर हैं भरत। भातृप्रेम में सबकुछ न्यौछावर करने की ज़िद और भावना के अद्भुत उदाहरण हैं भरत। ‘रामचरितमानस’ में माता कैकेयी ने दो वचन माँगे थे- राम को चौदह वर्ष वनवास और भरत को राजगद्दी। भरत इन दोनों वचनों के लिए स्वयं को दोषी मानते हैं और इस दोष से मुक्ति के लिए बड़ा-से-बड़ा त्याग करने को तैयार हैं। इसके लिए उन्हें प्रत्येक शर्त मंजूर है। अपने बड़े भाई राम के राजतिलक के लिए, अयोध्या वापसी के लिए भरत पूरा जीवन वन में रहने को तैयार हैं – ‘कानन करऊँ जनम भरि बासू।’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-story-of-ram-originated-from-the-shri-ram-janmabhoomi-movement/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-8 (श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी राम कथा)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक मिजोरम विश्वविद्यालय आइजोल में हिंदी विभाग में सहायक आचार्य है।)</p>
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		<title>पंचमुख से पंच परिवर्तन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Sep 2026 02:55:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Panch Parivartan]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी पूरा पूजा घर मोगरे के ताजे फूलों की सुगन्ध से महक रहा था। एक सुंदर सिंहासन पर शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी की उज्ज्वल प्रतिमाएँ विराजमान&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">पूरा पूजा घर मोगरे के ताजे फूलों की सुगन्ध से महक रहा था। एक सुंदर सिंहासन पर शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी की उज्ज्वल प्रतिमाएँ विराजमान थी। पं.अभिनव शुक्ल मंद्र गंभीर स्वरों में मंत्रोच्चारण कर रहे थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था। ऊँची-पूरी सुगठित गौरांग देह जिस पर सफेद धोती और वैसा ही उत्तरीय ओढ़े वक्ष पर रुद्राक्ष माला धारण किए शुभ्र चमकदार दाढ़ी-मूंछों और कांधे तक लंबे बाल एक अद्भुत आकर्षण रखते थे। मस्तक पर सुंदर सा भस्म त्रिपुण्ड्र उनमें किसी प्राचीन ऋषि जैसी आभा प्रकट कर रहा था। इस समय उन्हें देखकर कौन कह सकता था कि वे पर्यावरण विषय के जाने-माने प्राध्यापक हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रीष्मावकाश होने से उनकी नातिन पल्लवी और नाती सौरभ भी आए हुए थे। अपने ममेरे भाई बहिन साधना, लता और पुष्प से उनकी जोड़ी खूब बैठती थी। पूजा घर से आरती की घंटी बज उठी तो घर के सभी सदस्य अपने हाथों के काम तत्काल छोड़कर पूजा घर की ओर चल पड़े। अभिनव जी की पत्नी तुलजा अपनी पंचानवे वर्षीय बूढ़ी सास को व्हीलचेयर पर ले आई।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी ने ताली बजाते हुए आरती गाई, पुष्पांजलि अर्पित की और प्रसाद के लिए हथेली फैला दीं। प्रसाद लेकर अभिनव जी ने अपनी माँ के चरण छुए फिर सब छोटों ने अपने से बड़ों के चरण छुए। समवयस्क बच्चों में आपस में पैर छूने छुलवाने का यह संस्कार बड़ा विनोद उत्पन्न करता था।</p>
<p style="text-align: justify;">अब सभी एक साथ अल्पाहार करने बैठे। यह समय एक प्रकार से परिवार की मुक्त चर्चा का समय होता था। गरमागरम हलुआ और दो तीन तरह के पापड़ का अल्पाहार करते हुए चर्चा चल पड़ी।</p>
<p style="text-align: justify;">पल्लवी ने पूछा “नानाजी! हमारे विद्यालय में सब बच्चों को एक पुस्तक दी गई है ‘पंच परिवर्तन’। आचार्य जी ने इसके संबंध में हमें समझाया भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे वाह! क्या तुम वह पुस्तक साथ लाई हो? क्या विषय है उसका? पंच परिवर्तन क्या हैं?”</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि अभिनव जी पहले से जानते थे कि पंच परिवर्तन से क्या तात्पर्य है लेकिन विषय बच्चों ने कितना समझा यह जानने का सुंदर अवसर जानकर वे अनजान बन रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">पंच परिवर्तन यानि पांच ऐसे कर्तव्य या कहिये महत्वपूर्ण बिन्दु जिन पर आज हमें सबसे अधिक ध्यान देना आवश्यक है। इनकी उपेक्षा की तो हम पर और सब पर भी इसका बुरा प्रभाव होगा।”</p>
<p style="text-align: justify;">“अच्छा!! और वह भला कैसे?” अभिनव जी बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">“वह ऐसे कि इन पांच बातों का संबंध हमारे स्वयं से है हमारे परिवार, समाज, देश और सारी धरती से भी है।” सौरभ ने भी चर्चा में सम्मिलित होते हुए कहा। वे दोनों ही सरस्वती शिशु मंदिर के छात्र थे और दोनों को यह पुस्तक मिली थी।</p>
<p style="text-align: justify;">“ऐसे क्या विषय हैं?” पुष्प ने जिज्ञासा प्रकट की।</p>
<p style="text-align: justify;">“पहला है पर्यावरण संरक्षण दूसरा परिवार प्रबोधन।” पल्लवी ने कहा तो सौरभ ने टोका।</p>
<p style="text-align: justify;">“गलत ,गलत। पहला है स्व का बोध फिर सामाजिक समरसता फिर पर्यावरण।”</p>
<p style="text-align: justify;">“वैसे पुस्तक में तीसरे क्रम पर नागरिक कर्तव्य है भाई!” पल्लवी ने उसे टोका।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी अभिनव जी उठे और अपने कक्ष से एक पुस्तक उठा लाए। मुस्कुराते हुए बच्चों को दिखाते हुए पूछा “वह यही पुस्तक है क्या?”</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे! यह आपके पास भी है? हम तो समझे थे यह हम शिशु मंदिर के बच्चों के लिए ही है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“हाँ हाँ, यह हमने भी पढ़ी है।” पुष्प और साधना एक-साथ चहककर बोल पड़े। अब उनका यह संकोच छूमंतर हो गया था कि पल्लवी और सौरभ किसी ऐसे विषय पर बात कर रहे हैं जिसे वे नहीं जानते।</p>
<p style="text-align: justify;">अब अभिनव जी ने समझाना आरंभ किया “देखो इन विषयों में कोई पहले दूसरे चौथे पांचवें नहीं है। तुमने पूजा घर में देखा न, गणेश जी को केन्द्र में बैठा दो तो गणेश पंचायतन और दुर्गा जी को बैठा दो तो देवी पंचायतन। ऐसा ही बाकी देवताओं के लिए भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चों के हाव-भाव से लगा कि विषय अधिक स्पष्ट नहीं हुआ। वे भी पक्के शिक्षक थे। हार कैसे मानते तत्काल प्रयोग बदला। बोले लता तुम उठो यहाँ खड़ी रहो, पल्लवी इसके पास फिर सौरभ फिर पुष्प और साधना। चलो अब सब अपने पास वाले के हाथ पकड़ लो और घेरा बना लो फिर एक-साथ&#8230;..”</p>
<p style="text-align: justify;">“उपविश” बच्चों ने ही कह दिया और खिलखिलाते हुए हँसकर बैठ गए। अभिनव जी भी अब बच्चे ही बन गए थे जैसे वे उनके बीच बैठ गए और बोले अच्छा अब मैं जो क्रम कहूँ वह बच्चा मुझे छुए। सही निकला तो दो आम पुरस्कार मिलेगा और गलती हुई तो एक ही। ठीक है?” उन्होंने सामने पानी भरे बड़े भगौने में डूब रहे देसी आमों की ओर अंगुली दिखाकर कहा। बच्चों के हर्षनाद से घर गूंज उठा।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिनव जी बोले “तीन”</p>
<p style="text-align: justify;">पल्लवी ने उन्हें छुआ और पुष्पा ने भी।</p>
<p style="text-align: justify;">“दोनों सही जाओ दो दो आम ले लो।” यह कैसे दादाजी लता ने आपत्ति ली।</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे! गलत हुआ क्या? बैठो बैठो वापस बैठो।” बच्चे बैठ गए तो उन्होंने साधना से आरंभ किया “एक दो तीन। हुई न पल्लवी तीसरी?”</p>
<p style="text-align: justify;">“फिर पुष्प कैसे तीसरा हुआ?” सौरभ रूठे स्वर में बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिनव जी ने पल्लवी से गिनना आरंभ किया “एक, दो, यह पुष्प तीन।”</p>
<p style="text-align: justify;">“ऐसे तो सभी तीसरे हैं।” पल्लवी बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">“और सभी पहले या दूसरे, चौथे, पांचवें भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“यही तो पंच परिवर्तन भी ऐसे ही तो हैं।” अभिनव जी ठहाका लगाकर बोले।” अच्छा चलो पहले आम सभा हो जाए फिर आम सभा करेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">“मतलब?” लता ने चौंककर कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“मतलब आम चूसते चूसते बातें करेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">“जो अधिक बात बताएगा उसे अधिक आम &#8230;” सौरभ उत्साह से बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">“नहीं सबसे कम आम मिलेंगे!” साधना बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे! ऐसा कैसे?” पुष्प ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे, जो जितनी देर बोलेगा उतनी देर आम कैसे चूसेगा?” पल्लवी ने सोचकर बताया।</p>
<p style="text-align: justify;">“तब कोई बोलेगा ही क्यों?” सौरभ ने हाथ हिलाकर कर कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“पास आओ एक रहस्य है” पाँचों के सिर पलभर भिड़े फिर एक सामूहिक ठहाके साथ अलग हुए। तय हुआ कि दादाजी अधिक बोलेंगे हम बात शुरू कर रस लेते हुए सुनेंगे तो आम के आम और गुठलियों के दाम।</p>
<p style="text-align: justify;">बाल योजना को सफल बनाने में सहयोग देते हुए अभिनव जी ने कहना आरंभ किया “देखो जैसे हमने नागरिक कर्तव्य बोध लिया तो एक अच्छे नागरिक को अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, अपने राष्ट्र का बोध होना चाहिए यानि स्व का बोध। फिर वही संस्कृति बताती है कि प्रकृति को माता मानो उसकी सेवा करो राष्ट्र की प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा नागरिक कर्तव्य है ही। समाज में ऊँच-नीच का भाव समाप्त हों सब एकात्म हों समरस हों यह संविधान भी कहता है और संस्कृति तो समझाती ही है तो सामाजिक समरसता भी नागरिक कर्तव्य है तथा कर्तव्य पालन की पहली पाठशाला और कार्यशाला भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“और सामाजिक समरसता से आरंभ करें तो।” अंगुलियों और अंगूठे से ऊपर नीचे से पकड़े दूसरे हाथ से घुमा घुमाकर नया आम घुलाते हुए सौरभ ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">“समरसता अपने को और अपनों को एक समान अनुभव करने से होती है अर्थात् स्व का बोध व्यापक होकर समरसता में बदलता है। यह बन्धु भाव आरंभ तो पारिवारिक संस्कार से ही होता है और जब सारे नागरिक परस्पर बन्धुभाव से एकात्म होते हैं तो अधिकारों से कर्तव्य प्रथम का भाव नागरिक कर्तव्य की धुरी बनता है। यह समरसता सामाजिकता से और व्यापक होकर आध्यात्मिकता बन जाती है तब पर्यावरण से समरसता भी सहज ही स्थापित हो जाती न? अभिनव जी रुके।</p>
<p style="text-align: justify;">अब साधना ने जिज्ञासा की “मानो हमने आरंभ परिवार प्रबोधन से करना हो?”</p>
<p style="text-align: justify;">“करना ही होगा शेष चारों परिवर्तन परिवार से ही समाज में प्रभावी हो सकते हैं। परिवार समाज की पहली इकाई जो है?”</p>
<p style="text-align: justify;">अभी कुछ आम शेष थे। पेट भर रहा था पर मन नहीं, इसलिए लता बोली “दादाजी! मुझे तो यह बताइए कि स्व का बोध क्या और वह कैसे इन सबसे जुड़ा है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“स्व का बोध यानि अपने को जानना। क्या क्या अपना है यह पहचानना। हमारे आचार, विचार, संस्कार, परंपरा, इतिहास, भाषा, वेश, भोजन पद्धति, शास्त्र, जीवन पद्धति ये अनेक बातें स्व के बोध के रूप में समाहित हैं। इनसे परिवार का, समाज का, राष्ट्रीयता का और संपूर्ण सृष्टि को देखने और उससे व्यवहार का बोध होता है। स्व का बोध होगा तो स्मरण रहेगा कि सारे आम स्वयं ही चट कर जाएं या दादाजी-नानाजी को, या सामने न होते हुए भी हमारे लिए दूसरे कामों में लगे मामा-मामी या माँ पिताजी या बड़ी दादी-नानी और घर में अनाज बीनने आई पड़ौस की मौसियाँ भी इन्हें पा सकें..” अभिनव जी मुस्कुराए तो बच्चे खिसिया गए। वे समझ गए दादाजी-नानाजी से चालाकी छुपी नहीं हमारी। सबके हाथ आम लिए उनकी ओर बढ़ गए।</p>
<p style="text-align: justify;">“ये आम आपने ही तो दिए हैं हमें।” पल्लवी ने दृष्टि झुकाकर कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“जैसे प्रकृति ने हमें सब दिया है। उदास न होओ बच्चों ये तुम्हारे ही लिए हैं।” वे आगे कहने लगे “हमारे राष्ट्र गीत वंदेमातरम् और राष्ट्र गीत में भी भारत की प्रकृति का उल्लेख है। सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम् य फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्, अथवा विंध्य हिमाचल यमुना गंगा, उच्छल जलधि तरंग में।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए इस प्रकृति की रक्षा, पोषण, संरक्षण, संवर्धन हमारा संविधान में भी उल्लिखित नागरिक कर्तव्य है। यह प्रकृति केवल हमारे नहीं अपितु हमारे समान करोड़ों प्रजाति के जीवों के लिए भी है, इसलिए निजी स्वार्थ के लिए ही उसे उपयोग कर अन्य प्राणियों को उससे वंचित करना यह समरसता भाव के विरुद्ध है और यह शोषण, संवेदना और ममता भरा दोहन बने हम प्रकृति माता का प्रसाद मान कर न्यूनतम संसाधन का उपयोग करें, अधिकतम बाकी लोगों के लिए भी बचने दें, यह एक अच्छे हिन्दू परिवार की पहचान हैं जो कि परिवार प्रबोधन से साध्य है। इस प्रकार ‘माताभूमिःपुत्रोऽहम् पृथिव्या:’ का सांस्कृतिक बोध, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का भाव, ‘सर्वभूत हितेरताः’ का सेवाभाव और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म:’ जैसा स्व का व्यापक भाव स्व का ही व्यापक बोध है। इसलिए पाँचों विषय एकात्म हैं जैसे पंचमुखी शिव या पंचमुखी हनुमान या&#8230;” वे केलेंडर पर छपे पंचमुखी शिव और हनुमान का चित्र बताते हुए बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">“बताओ बताओ और कोई उदाहरण?” अभिनव जी ने प्रोत्साहित किया।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चे सोचने लगे फिर लता उठी और अंदर के कमरे से गायत्री माता का चित्र लाकर बोली “पंचमुखी गायत्री माता।”</p>
<p style="text-align: justify;">“बहुत बढ़िया। पर अब मेरा पुरस्कार?” आमों का खाली हो चुका बर्तन देखते हुए अभिनव जी बोले तो बच्चे एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">“आम तो समाप्त।” सौरभ उदास होकर बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिनव जी बच्चों को उत्साहित रखना चाहते थे बोले “आम समाप्त पर गुठलियां तो हैं न आओ इन्हें बाहर बो देते हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">सभी गुठलियां बटोरकर बाहर चल दिए मोहित महार के खेत के पास खाली भूमि थी अभिनव जी ने बालमंडली के साथ वहाँ गुठलियां बो दीं।</p>
<p style="text-align: justify;">उधर से गुजरते हुए ठाकुर दादा ने उन्हें देखा तो बोले “बच्चो! इन्हें सींचना भी है। मेरे कुएं से पानी ले लेना।”</p>
<p style="text-align: justify;">“पाय लागीं दादाजी! पर हम तो छुट्टी खत्म होते ही लौट जाएँगे।” सौरभ ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“तो मोहित का बेटा राजीव सींचेगा, हम लोग पौधे पेड़ बनने तक देखभाल कर लेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">तभी मोहित महार वहाँ आ गए। सबने आपस में यथायोग्य राम-राम की।</p>
<p style="text-align: justify;">ठाकुर दादा ने हँसकर कहा “क्यों मोहित तुम्हारे आम तो सबको खिलाओगे न?”</p>
<p style="text-align: justify;">“आम मेरे नहीं भगवान के हैं हाँ मैं उनकी रखवाली करूंगा जिससे पक जाने के बाद ही सबमें बंट सके।”</p>
<p style="text-align: justify;">सभी की सामूहिक हँसी ने जैसे इस सामुहिक निर्णय पर मुहर लगा दी थी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/panch-parivartan-is-the-basic-foundation-of-developed-bharat/" target="_blank" rel="noopener">पंच परिवर्तन विकसित भारत का मूल आधार</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-41 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत &#8211; २)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2026 02:35:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ केवल दक्षिण भारत में रोमन साम्राज्य के 6000 से अधिक सिक्के मिले हैं। यह सिक्के सोने या चांदी के है। प्रमुखता से यह सिक्के, सीजर ऑगस्टस और&#8230; </p>
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<p style="text-align: justify;">केवल दक्षिण भारत में रोमन साम्राज्य के 6000 से अधिक सिक्के मिले हैं। यह सिक्के सोने या चांदी के है। प्रमुखता से यह सिक्के, सीजर ऑगस्टस और टिबेरुस (Tiberius) इन राजाओं के कालखंड के है। अर्थात, ईसा पूर्व 100-200 वर्ष से लेकर सन् 100 तक के ये सिक्के हैं। मजेदार बात यह है, कि इटली को छोड़ दे, तो विश्व में सबसे अधिक प्राचीन रोमन सिक्के अपने भारत में ही मिले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी कालखंड में भारत के व्यापार का एक और जबरदस्त प्रमाण मिला है, इटली के पोंपेई (Pompeii) इस शहर में। नेपल्स शहर के पास बसे हुए इस छोटे से शहर की एक विशेषता है। पहली शताब्दी में, सन् 79 में, इस शहर के निकट माउंट वेसुविअस में ज्वालामुखी का प्रचंड विस्फोट हुआ। उसमें से निकले लावारस में यह शहर पूरी तरह दब गया। अगले अनेक वर्ष, यह इस मलबे में 15 से 20 फीट अंदर दबा रहा। इसकी खोज हुई, सोलहवीं शताब्दी में। और आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में इसका उत्खनन प्रारंभ हुआ। 1960 तक यह शहर लगभग पूरा मलबे से बाहर निकल सका। इतने वर्ष मलबे में दबने के बाद भी, दबी हुई वस्तुएं अच्छी स्थिति में मिली।</p>
<p style="text-align: justify;">इस उत्खनन में उन्हें एक देवी की मूर्ति मिली। ईसा पूर्व 200 वर्ष (अर्थात आज से 2200 वर्ष पूर्व) यह प्रतिमा तैयार हुई होगी। हाथी के दांतों की यह प्रतिमा, पूर्णतया भारतीय है। अक्टूबर 1938 में यह देवी की प्रतिमा खोज निकाली Amedeo Maiuri नाम के इटालियन पुरातत्व विशेषज्ञ ने। प्रारंभ में यह प्रतिमा देवी लक्ष्मी की मानी गई। विश्व में यह प्रतिमा ‘पोंपेई लक्ष्मी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। परंतु बाद में अध्ययन के बाद यह माना गया कि यह प्रतिमा लक्ष्मी की नहीं, किसी यक्षिणी की है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह प्रतिमा मथुरा में तैयार की गई होगी ऐसा एक मत है। अन्य मतानुसार महाराष्ट्र के जालना जिले के भोकरदन में यह मूर्ति तैयार हुई होगी। क्योंकि ऐसी ही एक मूर्ति वहां भी मिली है। इस मूर्ति के साथ ही, सातवाहन कालखंड का, राजा वशिष्ठिपुत्र पुलुमवी (पहली शताब्दी) का सिक्का मिला है। यह सातवाहनों के सागरी व्यापार का प्रमाण है।</p>
<p style="text-align: justify;">इटली की पोंपेई लक्ष्मी कि ईसा पूर्व 200 वर्ष की मूर्ति, यह भारत-रोमन साम्राज्य में होने वाले व्यापार का जबरदस्त प्रमाण तो है ही, परंतु इसी मूर्ति के कालखंड के आसपास, भारत-रोमन व्यापार का और एक मजबूत प्रमाण मिला है, भारत में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में..!</p>
<p style="text-align: justify;">‘पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रिरियन सी’ इस प्राचीन प्रवास वर्णन में उल्लेख होने के कारण, कोल्हापुर शहर के पश्चिम दिशा में, पंचगंगा नदी के तट पर, सन 1877 में सर्वप्रथम उत्खनन किया गया। आगे चलकर सन 1945-46 में, डेक्कन कॉलेज, पुणे के माध्यम से पुरातत्ववेत्ता हसमुख सांकलिया और मोरेश्वर दीक्षित के नेतृत्व में विस्तृत उत्खनन हुआ। यह भाग ब्रह्मपुरी नाम से जाना जाता था। इस उत्खनन में उनको अनेक वस्तुएं मिली। उसमें ग्रीको रोमन रचना की भी वस्तुएं थी। इसके अलावा इसमें उन्हें ‘पोसायडन’ इस ग्रीको रोमन समुद्र देवता की ब्रांझ की मूर्ति मिली। यह मूर्ति लगभग 7 इंच की है। पहली शताब्दी में, ग्रीस के अलेक्जेंड्रिया में यह मूर्ति तैयार की गई होगी। ब्रह्मपुरी के परिसर में उस समय सातवाहनों का साम्राज्य था। इस पोसायडन मूर्ति के साथ-साथ, अनेक रोमन सिक्के भी मिले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इन सब प्रमाणों से वैज्ञानिकों ने यह अनुमान निकला की, इस ब्रह्मपुरी (आज का कोल्हापुर) में, ग्रीक व्यापारियों की रहने की बस्ती (बसाहट) होगी। यह ग्रीक व्यापारी, उनके पोसायडन इस समुद्र देवता को हमेशा साथ लेकर प्रवास करते होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के रोमन-ग्रीक इन देशों के साथ प्राचीन व्यापार के और कितने स्पष्ट प्रमाण चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;">‘कोल्हापुर पोसायडन’ यह मूर्ति और एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है। रोम और ग्रीस के साथ व्यापार के लिए उपयोग में आने वाला ‘मसाला मार्ग’ (स्पाइस रूट, समुद्री मार्ग) यह केवल भारत के दक्षिण में, विशेष रूप से केरल के बंदरगाहों तक, सीमित नहीं था, तो कोकण और गुजरात से भी सीधे समुद्र मार्ग से यूरोपीय देशों के साथ व्यापार होता था।</p>
<p style="text-align: justify;">सन् 2023 में भारत में G20 का समिट हुआ। इसकी अध्यक्षता भारत ने की थी। इस समिट में एक आर्थिक कॅरिडॉर की संकल्पना रखी गई। यह संकल्पना संबंधित देशों के साथ-साथ अन्य देशों को भी पसंद आई। ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप’ ऐसा यह आर्थिक कॅरिडॉर (India &#8211; Middle East &#8211; Europe Economic Corridor &#8211; IMEEC) होने वाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के संदर्भ में गहन अध्ययन करने वाले विलियम डार्लिंपल ने इस संकल्पना का स्वागत किया है। उनका कहना है कि, ‘लगभग 2000 वर्ष पूर्व, यही भारत का सही और महत्वपूर्ण व्यापारी मार्ग था’। डार्लिंपल के कहने के अनुसार, ‘सिल्क रुट यह एक तरह से नई संकल्पना है। सिल्क रुट या सिल्क रोड यह संकल्पना सर्वप्रथम उन्नीसवी शताब्दी में, जर्मन भूगोल वैज्ञानिक, ‘फार्मिंग &#8211; बोन &#8211; रिश्टोफेन’ ने सबके सामने  रखी। वह अंग्रेजी साहित्य और भाषा में सन् 1930 से शामिल हुई। लेकिन विगत 20/25 वर्षों में सही मायने में यह शब्द जनमानस में लोकप्रिय हुआ’।</p>
<p style="text-align: justify;">वस्तुस्थिति यह है कि उस कालखंड में, सबसे जल्दी गति का, सबसे सस्ता और तुलनात्मक रुप से सबसे सुरक्षित व्यापारी मार्ग, यह मसाला मार्ग था, जो बीच समंदर से जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">पहली शताब्दी के आसपास, रोमन साम्राज्य के ‘प्लिनी द एल्डर’ (गायस प्लिनियस सेकुंडस &#8211; वर्ष 23 से 79) ने भारत समेत अनेक देशों में बहुत प्रवास किया। उसने लिखकर रखा है-</p>
<p style="text-align: justify;">“हमारी रोमन महिलाओं को क्या हुआ है? भारतीय वस्त्रों और हीरे-माणिक से बने हुए गहनों की ओर, वह इतनी ज्यादा आकर्षित क्यों होती है? यह महिलाएं रोमन ऊनी वस्त्र पहनकर खुश नहीं रह सकती क्या? इससे यह हो रहा है कि भारत की निर्यात प्रचंड मात्रा मे होने के कारण, भारतीय माल के बदले में हमें उतना ही (अर्थात, भरपूर) सोना देना पड़ रहा है। हमारा सब सोना भारत में जा रहा है।”</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे व्यापार करने की क्षमता पर प्लिनी जैसे इतिहासकार ने इतने स्पष्ट रूप से लिख कर रखा है। पर हमारा दुर्भाग्य की ‘भारत का वैश्विक व्यापार में इतना मजबूत स्थान था’ यह हमें किसी ने, कभी सिखाया ही नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">डार्लिंपल के अनुसार, यूरोप के साथ व्यापार करते समय भारतीय बहुत महंगी या कीमती वस्तुएं आयात नहीं करते थे। ओलिव ऑयल, वाइन जैसी वस्तुएं आयात होती थी। लेकिन यूरोपीय देशों का इससे उल्टा था। वह अत्यंत महंगी वस्तुएं आयात करते थे। हीरे, माणिक, मोती के गहने, मसाले, सूती वस्त्र, नील&#8230;. अर्थात, इस व्यापार में भारत हमेशा ‘जमा’ वाली स्थिति (ट्रेड सरप्लस) में रहता था, और यूरोपीय देशों का ‘ट्रेड डिफिसिट’ रहता था। इसलिए भारत में हजारों की संख्या में प्राचीन रोमन सिक्के मिले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रिरियन सी’ इस पुस्तक में भडोच का उल्लेख आता है। उस समय वहां ‘नहपान’ नाम का शक राजा राज्य करता था। भडोच से नील, हांथीदात की वस्तुएं, गहने, सूती कपड़ा, सूती वस्त्र, रेशीम, लॅपिसलझुली (रत्न), काली मिर्च आदी मौल्यवान वस्तूएं रोम में निर्यात होती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र के शुर्पारक (आज के नालासोपारा), कल्याण, चौल आदि बंदरगाहों में ग्रीक जहाज आते थे, ऐसा उल्लेख इस पुस्तक में आया है।</p>
<p style="text-align: justify;">मुख्यतः भारत के पश्चिमी किनारे से इजिप्त और यूरोप के साथ होने वाला व्यापार हमने देखा। उसके कारण भारत में आई हुई प्रचंड समृद्धि भी हमने देखी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-ranked-highest-in-trade-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-40 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत – १)</a></strong></span></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-40 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत &#8211; १)</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Sep 2026 02:04:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ प्रोफेसर अंगस मेडिसन के नाम का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में हुआ है। प्रोफेसर मेडिसन (1926-2010) मूलतः ब्रिटिश थे, लेकिन वह अनेक वर्षों तक नीदरलैंड के&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p style="text-align: justify;">प्रोफेसर अंगस मेडिसन के नाम का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में हुआ है। प्रोफेसर मेडिसन (1926-2010) मूलतः ब्रिटिश थे, लेकिन वह अनेक वर्षों तक नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रमुख रहे। दुनिया उनको जानती है, उनके अर्थशास्त्र के इतिहास के संदर्भ में किए हुए शोध के लिए। अंगस मेडिसिन ने अनेक वर्ष, अथक परिश्रम करके दुनिया का आर्थिक इतिहास तैयार किया। पूरे विश्व में मान्यता मिली है, ऐसी उनकी अनेक पुस्तकें है। उनमें से ‘द वर्ल्ड इकोनॉमी: ए मिलेनियल पर्स्पेक्टीव्ह’ यह पुस्तक बहुत प्रसिद्ध है। इसमें उन्होंने आंकड़े देकर, किस शताब्दी में दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में और व्यापार में कौन से देश आगे थे, और कौन से देश पीछे, इसका विस्तार से वर्णन किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रोफेसर अंगस मेडिसन के आंकड़े ईसा के जन्म से प्रारंभ होते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार पहली सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 33% से अधिक था। अर्थात विश्व के कुल व्यापार का एक तिहाई व्यापार हम कर रहे थे। अगले हजार-डेढ़ हजार वर्ष, वैश्विक व्यापार में अपना सर्वोच्च स्थान अबाधित था। मुस्लिम आक्रांताओं ने किए हुए अत्याचारों के कारण, और बाद में अंग्रेजों ने ध्वस्त की हुई व्यवस्थाओं के कारण, वैश्विक व्यापार में हमारी हिस्सेदारी कम होती गई।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ईसा पूर्व कालखंड का अध्ययन किया, तो साधारणतः दो हजार से ढाई हजार वर्ष, हम वैश्विक व्यापार में निर्विवाद रूप से सर्वोच्च स्थान पर थे। हमारा निर्यात जबरदस्त था।</p>
<p style="text-align: justify;">इसका दूसरा अर्थ यह है, कि हमारे जहाज भारत में तैयार हुआ माल लेकर दुनिया के हर कोने में जाते थे, व्यापार करते थे और भारत में समृद्धि, संपन्नता लाते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन हम सबको बचपन में शाला में क्या पढ़ाया गया? ‘भारत की खोज’ वास्को डी गामा ने सन 1498 में की। ऐसा विकृत इतिहास हमने पढ़ा। यह हमारा दुर्भाग्य है..!</p>
<p style="text-align: justify;">हजारों वर्ष पहले हम नौकायन क्षेत्र में अत्यंत प्रगत थे। उस समय के अत्याधुनिक जहाज हम बनाते थे। हमने तैयार किए हुए जहाज, हम अन्य देशों को बेचते भी थे। हमारा समुद्र का दिशा-ज्ञान बहुत अच्छा था। लगभग सवा दो हजार वर्ष पूर्व, भारतीय नाविक जिस ‘दिशा दर्शक’ (मरीन कंपास) का उपयोग करते थे, वह उपलब्ध है। उसे ‘मच्छ यंत्र’ कहते थे। ऐसे ही दिशा की अचूकता नापने के लिए, दो बिंदुओं के बीच के कोण का मूल्य निकालना होता है। यह काम करने वाला यंत्र, वर्तमान में सेक्सटंट (Sextant) कहलाता है। हमारे नविक ऐसे यंत्र का उपयोग करते थे। इसका नाम था, ‘वृत्त शंख भाग’।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर, व्यापार के लिए हमारे उद्योगपति, व्यापारी और नाविकों ने दुनिया भर में संचार किया। विश्व में अनेक स्थानों पर पहली बार हमारे व्यापारी गए हैं। प्राचीन भारत के व्यापार के संदर्भ में कई लोगों ने लिखकर रखा है। उसमें पश्चिमात्य प्रवासी प्रमुखता से है।</p>
<p style="text-align: justify;">सिझर ऑगस्टस, (ईसा पूर्व 63 वर्ष &#8211; वर्ष 14) इस प्रसिद्ध राजा के राज्य शासन में ‘स्ट्राबो’ नाम का ग्रीक इतिहासकार था। उसने उस समय बहुत प्रवास किया। स्ट्राबो ने लिखकर रखा है कि, ‘सीजर ऑगस्टस के समय भारत का रोम से बहुत व्यापार होता था। उस कालखंड में लगभग 120 जहाज प्रतिवर्ष भारतीय माल लेकर केवल रोम साम्राज्य में, इजिप्त होते हुए, जाते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">इजिप्त में उस समय दो प्रमुख बंदरगाह थे। मायोस हार्मोस (Mayos Hormos) और बेरेनिके (Berenike / Berenice)। इनमें से बेरेनिके का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में आया है। बेरेनिके इजिप्त का प्राचीन बंदरगाह था। टोलेमी (द्वितीय) ने अपनी मां की स्मृति में इसको बनवाया था। नब्बे के दशक में यहां उत्खनन प्रारंभ हुआ। अनेक देश और अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर यह उत्खनन कर रहे हैं। विश्व के सभी उत्खननों में यह सबसे बड़ी परियोजना है। यहां अभी भी उत्खनन चल रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">लगभग 20 वर्ष पहले, इस उत्खनन में 8 किलो काली मिर्च, भारतीय बाटिक प्रिंट के वस्त्र ऐसी अनेक वस्तुएं, एक बड़े लकड़ी के बक्से में मिली थी। इस सशक्त प्रमाण के मिलने से, ‘भारत का यूरोप से व्यापार करने का मसाला मार्ग (Spice Route &#8211; समुद्री मार्ग) था’, यह सिद्ध हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">कोरोना के बाद प्रारंभ हुए उत्खनन में, मार्च 2022 में, बेरेनिके में बुद्ध की एक मूर्ति मिली। आधुनिक तकनीकी का उपयोग करते हुए उस मूर्ति की आयु निकाली गई। वह वर्ष 90 से वर्ष 140 (पहले और दूसरे शताब्दी के मध्य) इस कालखंड की निकली। इसी स्थान पर संस्कृत में लिखा हुआ एक शिलालेख मिला है, जो तत्कालीन रोमन सम्राट ‘फिलिप द अरब’ (वर्ष 204 से 249। इसमे सम्राट पद का कालखंड है &#8211; वर्ष 244 से 249, अर्थात तीसरी सदी) को संबोधित करते हुए लिखा है। साथ ही यहां सातवाहन राजवंश के सिक्के मिले हैं, जो दूसरे सदी के है।</p>
<p style="text-align: justify;">दक्षिण भारत में पुडुचेरी (पांडिचेरी) के पास एक बंदरगाह है, अरिकामेडू (Arikamedu)। इसका प्राचीन नाम है पोदुके (Poduke)। यहां नब्बे के दशक में उत्खनन प्रारंभ हुआ, और भारत रोम व्यापार के अनेक प्रमाण मिले। रोमन शैली में बने हुए सोने के मणी, कांच सामान, दिए और अनगिनत रोमन सिक्के मिले। आरिकामेडू भारत के दक्षिण-पूर्व दिशा में है। इसका अर्थ, यहां से भी रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार होता था। भारतीय जहाज श्रीलंका होते हुए हिंद महासागर में जाते थे, और वहां से इजिप्त की दिशा में प्रस्थान करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के दक्षिण-पश्चिम के बंदरगाहों से भारत-रोमन व्यापार के अनेक प्रमाण मिले हैं। तुलना में यह मार्ग छोटा और आसान था। श्रीलंका को चक्कर मार कर भारत के पूर्व तट पर जाने की आवश्यकता नहीं थी। इसमें एक प्रमुख जगह है, पट्टनम। केरल के एर्नाकुलम जिले का एक छोटा सा गांव। कोचीन से 25 किलोमीटर उत्तर दिशा में।</p>
<p style="text-align: justify;">सन 2007 में जब यहां उत्खनन प्रारंभ हुआ तब से भारत-रोमन व्यापार के अनेक प्रमाण मिलने लगे। कुछ इतिहासकार इस जगह को प्राचीन काल का मुझिरिस शहर मानते हैं, तो कुछ इतिहासकार केरल के त्रिशूर जिले के कोंडुगल्लूर गांव को मुझिरिस मानते हैं। इस मुझिरिस का इतना महत्व क्यों है? रोमन साम्राज्य के कालखंड में, अर्थात पहली शताब्दी में, लिखे गए ‘पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ ( एरिथ्रियन समुद्र में भ्रमण) इस पुस्तक में मुझिरिस का भारत-रोमन व्यापार में एक महत्वपूर्ण केंद्र होने का उल्लेख आया है। भारत-रोमन व्यापार के मसाला मार्ग का मुझिरिस यह एक आवश्यक बंदरगाह था।</p>
<p style="text-align: justify;">महत्वपूर्ण व्यापारिक व्यवहार (बही खाता) लिखकर रखने के लिए इजिप्त में पेपरस (या पपाईरस) नाम के मोटे कागज का उपयोग किया जाता था। केरल में दूसरे सदी के प्रारंभ के कुछ कागज मिले हैं, जिन्हें ‘मुझिरिस पेपिरस’ नाम से जाना जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह ‘मुझिरिस पेपिरस’ यानी अलेक्जेंड्रिया में रहने वाले एक रोमन इजिप्शियन व्यापारी के, भारत से किए गए व्यापार का लेखा जोखा है। उस व्यापारी का एक जहाज मुझिरिस से इटली आने वाला था, उसका नाम था ‘हर्मापोलन’। इस जहाज में काली मिर्च और अन्य मसाले थे, जो यह व्यापारी भारत से आयात करता था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस सामान की क्या कीमत होगी? विलियम डार्लिंपल कहते हैं, ‘उस जमाने में इजिप्त में 24 एकड़ की सबसे अच्छी खेती खरीदी जा सकती थी, या इटली के बड़े शहर की प्रमुख, महत्वपूर्ण और विशाल ऐसी जगह आसानी से खरीद सकते थे’, इतनी कीमत उस एक जहाज के सामान की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">केवल एक जहाज में इतना बेशकिमती माल होगा, तो भारत का कितना बड़ा व्यापार उस समय रोमन साम्राज्य के साथ होता होगा? अकेले इजिप्त में ही भारत के बड़े-बड़े ऐसे लगभग 120 जहाज, ठसाठस माल भर के, साल भर में जाते थे, ऐसा स्ट्राबो इस इतिहासकार ने लिखकर रखा है। आगे चलकर इन जहाजों की संख्या दोगुनी हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत में से आने वाले माल के कर से रोमन साम्राज्य को जितनी कमाई होती थी, वह कमाई उनके सरकारी तिजोरी की, अर्थात कुल कमाई की, एक तिहाई थी..!</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर, केवल रोमन साम्राज्य से भारत इतना प्रचंड व्यापार करता था। फिर अन्य देशों के साथ हो रहे व्यापार को इससे जोड़ दे, तो भारत के समृद्धि का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ कल्पना की जा सकती है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-invented-advanced-farming-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-32 (उन्नत खेती का अविष्कारक – भारत – 1)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">क्रमशः</p>
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		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 06:24:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
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		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[vande mataram]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी पड़ी, जिसकी मुख्य बात यह है। “सन् 1947 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में हमारे प्रतिनिधि से राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग मांगी गई थी। हमारे पास उस समय किसी उपयुक्त राष्ट्रगान की रिकार्डिंग नहीं थी, जिसे हम न्यूयार्क भेज सकते। संयोग से उस समय हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकॉर्ड थी जिसे आर्केस्ट्रा को दे दी गई। जब आर्केस्ट्रा पर इसे बजाया गया तो अनेक देशों के विदेशी प्रतिनिधियों ने इसे बहुत पसंद किया। इस नई तर्ज का रिकॉर्ड बनाकर भारत भेज दिया गया, तब से यही हमारी सेना, विदेशी दूतावासों आदि में आवश्यक अवसरों पर बजाया जाता है। मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि संविधान सभा में अंतिम निर्णय न होने तक जन-गण-मन ही राष्ट्रगान के रूप में गाया जाता रहेगा। इसके बाद में पश्चिम बंगाल सरकार का संदेश मिला है कि वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाए रखा जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग ने दो पुस्तिकाएँ, ‘फेक्ट्स एबाउट इंडिया’ और ‘अवर नेशनल सोंग्स’ प्रकाशित की थीं। इन दोनों में राष्ट्रगान से सम्बन्धित कुछ विचारणीय बिन्दु निम्नलिखित हैं –</p>
<p style="text-align: justify;">“वन्देमातरम् और जन-गण-मन दोनों का ही आभायुक्त इतिहास है, अतः दोनों ही पुरानी स्मृतियाँ जगाते हैं। दोनों ही महान लेखकों की कृतियाँ हैं। राष्ट्रगान में राष्ट्रीय भावना होनी चाहिए और वह गेय होना चाहिए। यद्यपि वन्देमातरम् ने देशभक्तों को महानतम बलिदान देने हेतु प्रेरित किया है, तथापि इसको राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि इसका ‘हार्मोनाइजेशन’ नहीं हो सकता। विशेषज्ञों का मत है कि यह गीत कुछ आकारहीन और आनन्ददायी गुण के विषय में संदिग्ध है। और वन्देमातरम् में संगीत की दृष्टि से लय, ताल व सुर का भी अभाव है।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सफाई से उभरे प्रश्न व उनका समाधान</strong><strong>?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त सफाई में तनिक भी सच्चाई नहीं है, इसलिए अनेक ज्वलन्त प्रश्न उभरे हैं, जो अधोलिखित हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>राष्ट्रगान पर संविधान सभा में प्रस्ताव द्वारा निर्णय क्यों नहीं लिया गया? बार बार इस विषय को टालने के पीछे किसका हाथ था और क्यों?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रगान के विषय को स्वयं नेहरु जी ने उलझाए रखा। वे अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए मुसलमानों को नाराज नहीं करना चाहते थे। मुसलमानों की वाहवाही लूटने तथा रवीन्द्र समर्थकों को खुश करने के लिए पं. नेहरु ने ‘टैगोर शतवार्षिकी ग्रंथमाला की भूमिका में लिखा था कि &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“कविगुरु के साथ मेरी अंतिम मुलाकात के मौके पर मैंने उनसे नये भारत के लिए नया राष्ट्रगान लिखने का अनुरोध किया था, जिसे उन्होंने आंशिक रूप से स्वीकार भी किया था। तब हमारे दिमाग में जन-गण-मन की बात नहीं आई थी। उसके बाद में कविगुरु दिवंगत हो गए। इसलिए अब मुझे यह बताने में अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है कि कुछ वर्षों के बाद भारत के आजाद हो जाने पर हमने उनके ‘जन-गण-मन’ को ही राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त किया है। मुझे सन्तोष है कि मैं स्वयं काफी हद तक इस निर्णय के लिए जिम्मेदार रहा। यह एक महान राष्ट्रगान तो है ही, साथ में यह हमें कविगुरु रवीन्द्रनाथ का स्मरण भी करवाता रहेगा। “नेहरुजी की यह गर्वोक्ति स्वयं उनको वन्देमातरम् के विरुद्ध मुख्य षडयंत्रकारी सिद्ध करने हेतु पर्याप्त है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li>दि. 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा में अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करने के पीछे किसकी योजना थी? घोषणा में कहा गया कि ‘यह उचित समझा गया’ तो यह किसने समझा?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">उक्त दिन संविधान सभा के अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करवाने के पीछे नेहरुजी की योजना थी, उन्होंने ही ऐसा करना उचित समझा था। यदि योजना सबकी सहमति से बनी होती तो पुरुषोत्तमदास जी टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं देते।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="3">
<li>न्यूयार्क स्थित हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकार्ड कहाँ से आई? वन्देमातरम् की रिकॉर्ड प्राप्त करने के प्रयास क्यों नहीं किए गए?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">नेहरु जी शुरु से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे थे। इसलिए उन्होंने योजनापूर्वक जन-गण-मन की रिकॉर्ड ही भिजवाई थी। तब 15 अगस्त 47 को राष्ट्रसंघ की जनरल एसेंबली में जन-गण-मन की रिकॉर्ड बजी थी। यदि प्रयत्न किया जाता तो उस समय अनेक देशभक्त बंगाली परिवार न्यूयार्क में रहते थे, उनसे वन्देमातरम् की रिकॉर्ड लेकर बजवाई जा सकती थी।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="4">
<li>नेहरु जी ने अज्ञान का परिचय देते हुए कहा कि न्यूयार्क में उपस्थित संभ्रांत विदेशी प्रतिनिधियों ने जन-गण-मन धुन की बहुत सराहना की थी। क्या राष्ट्रगान के चयन की कसौटी विदेशी प्रतिनिधि होते हैं?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">कितनी हास्यास्पद बात है कि जन-गण-मन की धुन विदेशियों को पसन्द आई इसलिए उसे राष्ट्रगान बना दिया गया। राष्ट्रगान राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक होता है और राष्ट्र के धर्म व संस्कृति का परिचायक होता है। किसी राष्ट्रगान का पूर्व इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका सर्वाधिक मायने रखती है। जिस गान की धुन एवं शब्द स्वदेशवासियों को स्वदेशप्रेम का पाठ सिखाए, उसके गान से देशभक्तों की धमनियों में खून खोलने लगे, वही राष्ट्रगान की सही कसौटी होती है। अमरीका में बैठे कुछ विदेशियों की पसन्द हमारे राष्ट्रगान के चयन की कसौटी कैसे हो सकती है? किसी भी राष्ट्र में विदेशियों की पसन्द का राष्ट्रगान चुना जाना, आज तक किसी भी व्यक्ति ने नहीं सुना होगा।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="5">
<li>राष्ट्रगान के विषय पर अनेक संस्थाओं ने जनमत संग्रह क्यों करवाया था?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">संविधान सभा में राष्ट्रगान का निर्णय होने से पहले ही नेहरुजी ने अपनी मर्जी से वन्देमातरम् को हटाकर एक बिल्कुल नये गान को राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त कर दिया, जो नेहरुजी की तानाशाही थी। इस तानाशाही के विरुद्ध सांकेतिक जनमत संग्रह किया गया था। सन् जुलाई 1949 में ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ ने जो जनमत संग्रह आयोजित किया था, उसमें 5,19,435 लोगों ने भाग लिया था। उस जनमत संग्रह में 95% लोगों ने राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत डाला था। अतः पूरा देश वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाना चाहता था, परन्तु नेहरुजी की तानाशाही जीत गई।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="6">
<li>सरकारी सूचना पुस्तिकाओं में हास्यास्पद जानकारी क्यों दी गई?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">दोनों पुस्तिकाओं में लिखी बातें मनघडंत थी। सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग को जन-गण-मन का कौनसा आभायुक्त इतिहास दिखाई दे गया और इसने कौनसी पुरानी स्मृतियों को जगा दिया? जबकि वास्तविकता यह है कि वन्देमातरम् का इतिहास तो आभायुक्त है, परन्तु जन-गण-मण का तो कोई आभायुक्त इतिहास ही नहीं है। फिर भी जन-गण-मन को महान बताने वाली मिथ्या बातें हास्यास्पद नहीं तो ओर क्या है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="7">
<li>वन्देमातरम् के लिए आकारहीन व आनन्ददायी गुणों का अभाव जैसी बातें क्यों कही गई?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् को पदच्युत करने के लिए ऐसे असत्य विमर्श गढ़े गए, अन्यथा जिसने भी इसका भावार्थ समझा है, वह तो आनन्दित हो नाच उठा था। स्वयं गांधीजी ने कहा है कि “मैंने जब वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया।” फिर इसमें आनन्ददायी गुणों का अभाव कहाँ से आ गया।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="8">
<li>वन्देमातरम् पर महत्वपूर्ण यह आपत्ति क्यों उठाई गई कि इसका हार्मोनाइजेशन नहीं हो पाता? इसमें सुर, ताल व लय का अभाव है तथा पाश्चात्य आर्केस्ट्रा पर इसकी धुन नहीं बैठती।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">उनका यह आरोप भी मिथ्या व दुराग्रहपूर्ण है। तत्कालीन सुविख्यात संगीतज्ञ मास्टर कृष्णराव ने सन् 1940 से पहले ही वन्देमातरम् को स्वरबद्ध करके झिंझोटी राग में उसकी रिकॉर्डिंग तैयार कर एक पत्र के साथ भारत सरकार को भेज दी थी। उस पत्र में उन्होंने दावा किया था कि इस सरल धुन पर चालीस-पच्चास हजार लोगों के मुख से गवाकर देख लिया है, अनुभव बहुत अच्छा रहा। अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि लाखों मनुष्य इसे समवेत स्वर में गा सकते हैं। इस तर्ज पर गाने से वातावरण भी अत्यंत गरिमामय बन जाता है। इसे पुलिस परेड के कदमों के साथ भी गाया जा सकता है। सरदार पटेल के आदेश पर उन्हें रेडियो पर भी गाया था। अनेक संवाददाताओं के दबाव से स्वयं नेहरु ने इन्हें अपने सामने गाने का अवसर दिया था। जनरल करिअप्पा के आदेश पर बैंड चीफ लाजपत सिंह के सम्मुख इस धुन को बैंड पर बजाया गया, उन्होंने सन्तुष्ट होकर अपनी सहमति दी। ब्रिटिश बैंड कमांडर सी.आर. गार्डन ने स्वयं बजाकर देखा और प्रसन्नतापूर्वक प्रमाणपत्र दिया कि यह धुन ब्रिटिश बैंड पर बहुत बढ़िया बैठती है। कहने का अर्थ यही है कि वन्देमातरम् पर जो जो मिथ्या आरोप लगाए गए थे उन्हें मास्टर कृष्णराव ने गलत सिद्ध कर दिया था, फिर भी नेहरुजी ने उनके अथक परिश्रम पर पानी फेर दिया। अतः यह कहा जा सकता है कि असंदिग्ध रूप से यह नेहरुजी प्रदत्त वन्देमातरम् को अपदस्थ करने का एक पूर्वनियोजित नाटक मात्र था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमारी अभिलाषा&#8230;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रगान राष्ट्र का अनन्य प्रतीक होता है। इस पवित्र प्रतीक का प्रथमतः अंगभंग करके, द्वितीयत: इसको पदच्युत करके हमने जननी जन्मभूमि के प्रति जो जघन्य अपराध किया है, उसका प्रायश्चित करने से ही राष्ट्र की चिति एवं विराट का जागरण होगा, परिणामस्वरूप राष्ट्र अपना सर्वतोमुखी अभ्युदय करेगा। सम्पूर्ण वन्देमातरम् को पुनः राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त करके जब राष्ट्र की आबाल-वृद्ध सभी सन्तानें इस मातृस्तोत्र के नित्य गान द्वारा ज्ञान, शक्ति व समृद्धि की प्रतीक स्वदेश माता की, इन विभूतियों को प्राप्त करने हेतु संकल्प करेंगी, तभी ये हमें प्राप्त होंगी।</p>
<p style="text-align: justify;">सुखदा, वरदा माता प्रसन्न होकर हमें निश्चित रूप से सम्पूर्ण विश्व को धारण और भरण करने योग्य ज्ञान, शक्ति व समृद्धि प्रदान करेंगी। हमें इस सनातन राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य में अटल विश्वास है, अतः भविष्य में हम अपने इन्हीं चर्मचक्षुओं से पुनः वन्देमातरम् के उत्कर्ष को देखेंगे।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राष्ट्र भक्ति प्रेरणा का गान वन्दे मातरम्।।</strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong><span style="color: #3366ff;"><strong> <a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/" target="_blank" rel="noopener">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 06:06:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का प्रचार हो चुका था। इस गीत को प्रथम स्वर दिया था रविंद्र नाथ ठाकुर के संगीत शिक्षक श्री यदु भट्ट ने। इसी धुन पर  स्वयं बंकिम बाबू और उनके मित्र यह गीत गाया करते थे। तत्पश्चात सन 1886 में ठाकुर परिवार की ‘बालक पत्रिका’ में श्रीमती प्रभा सुंदरी देवी रचित स्वरलिपि प्रकाशित हुई थी। सन् 1889 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में बंकिम के साथी कवि हेमचन्द्र ने अपनी कविता ‘राखी’ में वन्देमातरम् का कुछ भाग जोड़कर गाया था। स्वयं कविगुरु रवींद्रनाथ ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदेमातरम् अपनी ही स्वरलिपि में गया था। सन् 1901 के बाद तो नियमित रूप से कांग्रेस के अधिवेशन में पूरा वंदेमातरम् गाया जाता रहा। पहली बार सन 1923 के काकीनाड़ा अधिवेशन में अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति की। अध्यक्ष की आपत्ति के पश्चात भी देशभक्त पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा वंदेमातरम् उल्लास पूर्वक गाया था। अध्यक्ष मोहम्मदअली वंदेमातरम् गान के शुरु होते ही उठकर पंडाल से बाहर चले गए और जब गान पूरा हुआ, तब आकर पुनः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ गए। उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने अध्यक्ष के इस अशोभनीय आचरण के लिए नहीं टोका। सभी लोग स्तब्ध तो थे, अध्यक्ष की इस आपत्ति ने भारत के मुसलमानों में राष्ट्रीय धारा से अलग होने के भाव का बीजारोपण कर दिया था। सन 1937 में ही प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती थी और विधानसभाओं की कार्यवाही वन्देमातरम् गान से आरम्भ की जाने लगी। इससे मुस्लिम लीग बौखला गई और मुस्लिम विधायक आपत्ति स्वरूप विधानसभाओं का बहिष्कार करने लगे। वही मनोवृत्ति आज भी चल रही है, जो देश विघातक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वन्देमातरम् का अंगभंग किया जाना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 1937 में मुस्लिम लीग ने अपना पृथक अधिवेशन कोलकाता में किया था। उस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके वंदेमातरम् को राष्ट्रगान बनाना मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का निरादर करना तथा उनके हितों के विरुद्ध साजिश रचना बताया था। मुस्लिम विधायकों द्वारा वंदेमातरम् गाए जाने पर नित्य नए-नए विवाद उत्पन्न किए जाने के कारण कांग्रेस उनके दबाव में आ गई। अतः दि. 26 से 31 अक्टूबर सन 1937 के कांग्रेस कार्यकारिणी एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में वंदेमातरम् का अंग-भंग करके उसे सर्वजनग्राह्य बनाया जा सकता है या नहीं, इस बात पर निर्णय होना था। उन्हीं दिनों सुभाष चंद्र बोस विदेश से लौट कर आए थे और कर्सियांग में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वे वंदेमातरम् के विवाद से अत्यधिक दुखी थे। सुभाष बाबू ने 16 अक्टूबर को कविगुरु रवीन्द्रनाथ को वन्देमातरम् विवाद के सम्बन्ध में एक मार्मिक पत्र लिखा। किन्तु उस समय कविगुरु गंभीर अस्वस्थता की दशा में चिकित्सालय में भर्ती थे। दूसरा पत्र उन्होंने ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘प्रवासी’ के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को लिखकर, उन्हें यह विषय महात्मा गांधी को लिखने का अनुरोध किया था। संयोग से गांधी जी भी उस समय अस्वस्थ थे, इसलिए गांधी जी तक सुभाष बाबू का वह संदेश नहीं पहुँच पाया। इस स्थिति में वह संदेश मॉडर्न रिव्यू और प्रवासी में छापकर प्रचारित किया गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस अधिवेशन से ठीक एक दिन पहले 25 अक्टूबर को जवाहरलाल नेहरू कविगुरु रवीन्द्रनाथ जी से एकांत में मिलकर आ गए थे। इसलिए कविगुरु ने अधिवेशन के दिन 26 अक्टूबर को एक विस्तृत पत्र कांग्रेस सभापति जवाहर लाल जी को अपने अभिमत सहित लिखा। उस पत्र का सार यह था &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“निस्संदेह वन्देमातरम् एक अत्यन्त सुन्दर स्वदेश प्रेम की प्रेरणा देने वाला गान है। इसी वन्देमातरम् गान ने बंग-भंग आन्दोलन को अपनी अन्तर्निहित शक्ति के द्वारा सफल बनाया था। परन्तु पूरा वन्देमातरम् मुसलमानों की भावनाओं को आहत कर सकता है, उसके प्रथम दो स्तवक निर्विवाद रूप से राष्ट्रगान होने योग्य हैं। उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं हैं।”  रवीन्द्रनाथजी के इस समर्थन से उत्साहित होकर कांग्रेस कार्यकारिणी ने अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरु द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगान सम्बन्धित एक प्रस्ताव पारित किया, उसका सार निम्नलिखित है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“वन्देमातरम् विगत 32 वर्षों से देशभक्तों को स्वाधीनता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में अमानुषिक अत्याचारों को सहते हुए अपना सर्वस्व यहाँ तक की प्राणों का बलिदान देने के लिए प्रेरित करता आया है। हमारे राष्ट्रीय संग्राम का यह जीवंत एवं अभिन्न अंग है और हमारे श्रद्धा व प्रेम का पूर्ण अधिकारी है। अतः इसके प्रथम दो स्तवक राष्ट्रीय सम्मेलनों में गाए जाते रहेंगे, कारण कि इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर कोई आपत्ति उठा सके। हमारे मुस्लिम बंधुओं द्वारा इस गान के कुछ अंशों पर आपत्ति उठाने के कारण ही यह निर्णय लिया गया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व इस महान स्वदेश गान का केवल ऊपरी रूप ही देख पाया। इसके भावार्थ में प्रवेश न कर पाने के कारण गान के मूल आशय को समझ नहीं पाया। दूसरा कारण भारत के अहिन्दू सम्प्रदायों के प्रति अतिरिक्त उदारता ने उन्हें यह करने हेतु प्रेरित किया और तीसरा कारण शायद कांग्रेस यह प्रमाणित करना चाहती थी कि वह साम्प्रदायिक नहीं है। इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने वन्देमातरम् का अंगभंग कर दिया। वास्तविक अर्थ में वन्देमातरम् का यह अंगभंग ही देश विभाजन की पूर्व सूचना थी। अन्यथा राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज तो राष्ट्र के प्रतीक होते हैं, उनका अंगभंग नहीं किया जाता। यह स्पष्ट है कि उन्होंने देश के साथ छलावा किया। उन्होंने अपने प्रस्ताव में कहा था कि “इन दो स्तवकों में किसी के द्वारा भी आपत्ति योग्य कुछ भी नहीं है। तथा यह हमारे राष्ट्रीय संग्राम का अविच्छेद्य अंग है।” यदि ये दोनों वाक्य निष्कपट होते तो वन्देमातरम् के स्थान पर अन्य गान के गाये जाने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस नेतृत्व विभ्रांत होकर इस परम सत्य को ही भूल गया कि राष्ट्रगान देशवासियों के अन्त:करण में देशप्रेम और देशहित जीवन उत्सर्ग की प्रेरक ज्वाला की सहज अभिव्यक्ति होता है। यह बात कांग्रेसी नेता उस दिन भूल गए थे। उन्हें यदि फ्रांस के राष्ट्रगान ‘मार्सिलेज’ का इतिहास ज्ञात होता तो यह बात अवश्य समझ में आ जाती कि “राष्ट्रगान ऐसा होना चाहिए जिसके श्रवण मात्र से देशवासियों की धमनियों में खून खौलने लगे।” हमारा वन्देमातरम् इस कसौटी पर खरा उतरता है, फिर भी इसको काट दिया गया, क्यों?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रबुद्धजनों द्वारा वन्देमातरम् की प्रशंसा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उस समय के सभी प्रमुख लोग वन्देमातरम् का यशोगान करते थे और चाहते थे कि वन्देमातरम् ही भारतराष्ट्र का राष्ट्रगान होना चाहिए। प्रशंसा करने वालों में प्रमुख थे, महात्मा गांधी। गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में सन् 1939 की एक जुलाई के दिन लिखा था, “मैंने जब पहली बार वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया, उसका मुझ पर जादू सा असर हुआ था। हमारा झण्डा और यह गीत तब तक जिन्दा रहेंगे जब तक यह राष्ट्र जिन्दा है।” देश की आजादी के लगभग एक सप्ताह बाद 23 व 29 अगस्त 1947 को गांधीजी ने कलकत्ता की सभा में, वह भी सुहारावर्दी की उपस्थिति में वन्देमातरम् गाया था। उस सभा में गांधीजी ने इस गान को देशमाता की अति सुन्दर वन्दना बताते हुए मुस्लिमलीगियों से अपना दुराग्रह त्यागने का आग्रह किया था। उन्होंने इस तथ्य को फिर दोहराया कि “रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत दिया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">यशस्वी पत्रकार श्री रामानन्द चट्टोपाध्याय का स्पष्ट मत था कि सरसरी दृष्टि से देखने पर वन्देमातरम् प्रतिमाव्यंजक लग सकता है, किन्तु असल में ऐसा नहीं है। वन्देमातरम् गान में कहीं भी मुस्लिम विद्वेष नहीं है, यहाँ तक कि इसमें मुसलमानों का उल्लेख तक नहीं है। इसमें जो ‘रिपुदल वारिणीम्’ पद आया है, उसमें रिपुदल का अर्थ मुसलमानों से नहीं अंग्रेजों से है। आनन्दमठ में वर्णित युद्ध मुसलमानों से नहीं था अपितु संन्यासियों का अंग्रेज सेनापतियों के विरुद्ध हुआ युद्ध था। अतः मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">उधर विपिनचन्द्र पाल ने सन् 1919 में ही वन्देमातरम् का अपूर्व और दीर्घ विश्लेषण कर दिया था, जो महर्षि अरविन्द घोष की ‘धर्म पत्रिका’ में छपा था। उसका सार यही था कि, “वन्देमातरम् में स्वदेश मातृका का स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप में समग्र प्रकटीकरण हुआ है।”</p>
<p style="text-align: justify;">मौलाना रेजाउल करीम तो वन्देमातरम् के अंगभंग से बहुत दुखी हुए थे। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘बंकिम ओ मुसलमान समाज’ में निर्भीकतापूर्वक इस गान के विरोधियों की धज्जियाँ उड़ाई थीं। मातृभूमि को नमस्कार करना इस्लाम विरोधी नहीं है। क्या मुसलमान अपने मुल्ला-मौलवियों को, अपने आकाओं को झुककर सलाम नहीं करते? यदि कांग्रेस जिन्नापंथियों को खुश करने के लिए वन्देमातरम् को पूर्णतः हटा भी देती है, तब भी उनमें से एक भी मुसलमान कांग्रेस में शामिल नहीं होगा। क्योंकि उनका असली उद्देश्य वन्देमातरम् को हटाना नहीं है, अपितु अंग्रेज प्रेरित देश विभाजन के षडयंत्र को सफल बनाने का एक बहाना मात्र है। अन्यथा ‘वन्देमातरम्’ भी वैसा ही शब्द है, जैसा ‘मादरे वतन’। जो वन्देमातरम् का अर्थ है, वही अर्थ मादरे वतन का है, मैं अपने वतन को सलाम करता हूँ। अतः किसी भी इस्लामी आदर्श के तहत इसमें आपत्ति जनक कुछ भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">मौलाना अकरम खाँ ने अरब देश का भौगोलिक वर्णन करते हुए लिखा है, “हे अरब मानवेर आदि मातृभूमि” कवि ने अरब को माँ कहकर पुकारा है। जब अरब को मानव की आदि मातृभूमि स्वीकार करने वाले मुसलमान भारत में बस गए, तब भारत को माँ कहने में इस्लाम क्यों आड़े आता है? अतः सत्य यही है कि वन्देमातरम् का विरोध करना तो मात्र एक बहाना मात्र था। वास्तविकता यही है कि कांग्रेस ने मुसलमानों के तुष्टिकरण का आत्मघाती मार्ग अपनाकर भारत विभाजन का बीजारोपण कर दिया था। कांग्रेस देश की आजादी तक इसी मार्ग पर चलती रही। मुस्लिमलीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत को नाम मात्र का अमान्य करते हुए भी उसके घातक परिणाम कांग्रेस ने मान लिए। वन्देमातरम् का अंगभंग जैसी घुटनाटेक पराजयवृत्ति को भाँपकर लीग ने सत्तालोलुप बूढ़े कांग्रेसी नेताओं को देश का विभाजन स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था। फलतः वन्देमातरम् के अंगभंग के मात्र दस वर्ष बाद ही सन 1947 में कृतघ्न कांग्रेसियों ने भारत माता को भी अंगभंग कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वन्देमातरम् को पदच्युत करना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस दिन वन्देमातरम् को पदच्युत करने का षडयंत्र रचा गया वह दिन था, 24 जनवरी 1950 का। और उपलक्ष्य था, उस दिन स्वतंत्र भारत के नव-निर्मित संविधान पर संविधान-निर्मात्री सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर करने का। सभा की कार्यवाही शुरू हुई। सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, अन्य औपचारिक कार्य भी सम्पन्न कर लिए गए। जब सभा समाप्त होने वाली थी, तब अचानक सभापति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने खड़े होकर राष्ट्रगान के सम्बन्ध में एक घोषणा की। उस घोषणा का सार था कि “वैसे तो निश्चय यही किया गया था कि राष्ट्रगान के बारे में संविधान सभा में एक प्रस्ताव द्वारा निर्णय किया जायेगा, परन्तु यह निर्णय करना छूट गया। आज ही यह बिन्दु याद आया, परन्तु अब प्रस्ताव द्वारा निर्णय लेने का समय नहीं रहा। अतः उचित यही समझा गया कि इस विषय पर मैं एक घोषणा कर दूँ। अब से ‘जन गण मन अधिनायक’ को राष्ट्रगान एवं ‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाता है। दोनों को बराबर सम्मान प्राप्त होगा। आशा है इससे सभी सदस्य सहमत होंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">इस असंवैधानिक निर्णय को सुनकर वन्देमातरम् के सभी भक्त अवाक् रह गए। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन तो इतने दुखी हुए कि उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से ही त्यागपत्र दे दिया। क्योंकि इस घोषणा का समय अत्यन्त चालाकी से चुना गया था, और अब बोलने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया था। इस अप्रत्याशित निर्णय के फलस्वरूप जो वन्देमातरम् फाँसी के तख्ते पर झूलने वाले शहीदों के कंठों से गर्व के साथ गूँजा था, जो जयघोष पूरे स्वाधीनता संग्राम में देशभक्तों की प्रेरणा एवं श्रद्धा का प्रतीक बना रहा था, उसे सत्तालोलुपों की साजिश से तिरस्कृत होकर नीचे गिरना पड़ा। यह एक ऐसी कटु सत्यकथा है, जिसमें खून से की गई मातृभूमि की वंदना को स्याही से मिटा देने का षडयंत्र दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सम्पूर्ण भारत में नेहरु की तीखी आलोचना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त असंवैधानिक व अप्रत्याशित निर्णय पर सभी इसलिए आश्चर्यचकित थे कि इस दिन भी सभा के प्रारम्भ में सभापति के आदेश से लक्ष्मीकांत मैत्र ने वन्देमातरम् गाया था। सभी देशभक्त यह मानते थे कि राष्ट्रगान तो वन्देमातरम् ही होगा। इससे पूर्व भी 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि में जब देश को आजादी मिली थी, उस समय भी स्वतंत्रता के स्वागत में श्रीमती सुचेता कृपलानी ने वन्देमातरम् गाया था। दूसरे दिन 15 अगस्त को प्रातःकाल आकाशवाणी से भारत के महान गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने पूरा वन्देमातरम् गान अपने हृदयद्रावी रोमांचक स्वर में भारतीय स्वतंत्रता के स्वर्णिम विहान में मुक्त विहंग की भाँति पूरे उल्लास के साथ गाया था। यहाँ यह बात भी स्मरण रखने योग्य है कि पं.ओंकारनाथ ठाकुर बड़े स्वाभिमानी थे। जब 1937 में कांग्रेस ने वन्देमातरम् गान का अंगभंग किया था, वह इन्हें मान्य नहीं था। इसलिए जब इन्हें हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में वन्देमातरम् गाने के लिए बुलाया गया तो इन्होंने खंडित वन्देमातरम् गाने से स्पष्ट मना कर दिया और पूरा वन्देमातरम् गाकर ही माने थे। इसलिए वे उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से पूरा वन्देमातरम् गाने का पक्का आश्वासन लेकर ही मद्रास से दिल्ली आए थे और 15 अगस्त की प्रातः आकाशवाणी पर पूरा वन्देमातरम् गाया था। अतः सब देशभक्त यही आशा लगाए बैठे थे कि वन्देमातरम् ही राष्ट्रगान होगा। जब-जब भी संविधान सभा में राष्ट्रगान के विषय को लाने का प्रयत्न किया गया, तब-तब ही इस पर प्रस्ताव लाने को स्थगित किया गया था। इस सारे षडयंत्र के पीछे नेहरु स्वयं थे, इसलिए पूरे भारत में नेहरु की तीखी आलोचना हुई थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/" target="_blank" rel="noopener">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</a></strong></span></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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			</item>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-8 (श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी राम कथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 14:03:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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		<category><![CDATA[Ramayan]]></category>
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		<category><![CDATA[Shri Ram Janmabhoomi Movement]]></category>
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		<category><![CDATA[रामायण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है जिसका उद्भव एक आंदोलन से हुआ और उस कथा का स्वरूप भी अलग प्रकार का है। यह कथा है श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी रामकथा।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन मात्र अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन ही नहीं है, यह आंदोलन राष्ट्र जागरण का आंदोलन है, हिंदुत्व शक्ति जागरण का आंदोलन है, श्रीराम भक्ति जागरण का आंदोलन है और सबसे महत्वपूर्ण ‘राम मंदिर से राष्ट्र मंदिर’ निर्माण का आंदोलन है। 1984 में शुरू हुआ आंदोलन, 2019 में मंदिर निर्माण की अनुमति, 2020 में भूमि पूजन और 2024 में मंदिर उद्घाटन में पूर्ण हुआ। 1984-2019 के दौरान संघर्ष का यह आंदोलन भारत में एक नई रामकथा को जन्म देता है जो गीतों के रूप में, वीर रस और ओजपूर्ण कविताओं के रूप में, भाषणों के रूप में, भजनों के रूप में, नए कथाकारों के मुख से निकली रामकथा के रूप में, नारों के रूप में सम्पूर्ण भारत में एक विराट जनजागरण का कार्य करती है। यह रामकथा भारत के हिन्दू समाज के मन में व्याप्त अनन्य राम भक्ति को राष्ट्र भक्ति के रूप में अभिव्यक्त करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख जयघोष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत के सर्वदूर ग्रामों में व्याप्त ‘जय सिया राम’, ‘राम-राम’ का अभिवादन इस आंदोलन में ‘जय श्रीराम’ के जयघोष के साथ प्रकट होता है। यह जयघोष भारत में सभी रामभक्तों में, कारसेवकों में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा व उत्साह का संचार करता है। आंदोलन के समय कुछ और जयघोष विशेष रूप से प्रचलित हुए, जो उस समय रैलियों व रथ यात्रा में लगते थे और जिन्हें आज भी बोलें तो श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की स्मृतियाँ आँखों के सामने पुनर्जीवित हो उठती हैं। ये जयघोष है- ‘एक ही नारा एक ही नाम जय श्रीराम जय श्रीराम’, जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा’, ‘बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’। कुछ अति उत्साही युवक ये भी नारे लगाते थे- ‘तेल लगाकर डाबर का नाम मिटा दो बाबर का’, ‘एक धक्का और दो बाबरी ढांचा तोड़ दो’, ‘जय श्रीराम हो गया काम’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख गीत</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आंदोलन के काल में अनेक गीत बने और राष्ट्र व्यापी हुए। इन गीतों ने अपने भावों से समाज को आंदोलन से जोड़ा भी और समाज के मन को उद्वेलित भी किया। ये गीत हर सभा, रथ यात्रा और कार सेवा में लाऊड स्पीकरों पर गूंजते थे। ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनायेंगे’, सौगंध राम की खाते हैं मन्दिर वहीं बनायेंगे’, ‘चले अयोध्या, चलें अयोध्या राम काम के काज को’ ये गीत प्रमुख रूप से प्रचलित हुए। ‘राम जी की सेना चली, श्रीराम जी की सेना चली, हर हर महादेव’ यह गीत मूल रूप से रामानन्द सागर की ‘रामायण’ का गीत है, लेकिन जब कारसेवकों के जत्थे निकलते थे तो इस गीत से उनका स्वागत व विदाई होती थी। ‘राम कहानी सुनो रे राम कहानी’ – श्री रविन्द्र जैन के संगीत व आवाज में सजे भजनों ने आंदोलन को गहरा आध्यात्मिक आधार दिया। ‘अयोध्या करती है आह्वान, हाथ से कर मंदिर निर्माण। शिला की जगह लगा दे प्राण, बैठा दे वहाँ राम भगवान।।’ इस प्रकार के गीत ने अयोध्या नगरी व आंदोलन के जीवंत चरित्र को प्रस्तुत किया। भारत की विविध भाषाओं में विभिन्न गीतों की रचना हुई जो समाज व्यापी हुए। राजस्थान में एक गीत बहुत प्रचलित हुआ – ‘कसो लंगोटो ले ल्यो सोटो, अभै अयोध्या जाणो है। बण जाओ बजरंग बली, मन्दिर वहीं बनाणो है।’</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के ऑडियो व वीडियो कैसेट्स</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आंदोलन के समय सोशल मीडिया नहीं था और न ही व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम जैसे मैसेंजर एप्प थे। देश के कोने-कोने तक वैचारिक सन्देश, ओजस्वी भाषण और प्रेरक गीतों को पहुंचाने का एक मात्र साधन कैसेट्स ही थे। इस आंदोलन में साध्वी ऋतंभरा के ओजस्वी व तीखे भाषणों के ऑडियो कैसेट्स सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुए। उनकी ओजपूर्ण वाणी, कविताओं और राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत भाषणों ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। गाँव की चौपालों और नगरों की गलियों में लाऊड स्पीकर लगाकर इनके कैसेट्स बजाए जाते थे। साध्वी ऋतंभरा की तरह प्रखर वक्ता उमा भारती के भाषणों के ऑडियो कैसेट्स भी देशभर में बांटें गए, जिन्होंने धार्मिक व सांस्कृतिक अस्मिता की भावना जगाई। रथ यात्रा व रैलियों में हुए अशोक सिंघल, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के वैचारिक भाषणों की रिकार्डेड ऑडियो कैसेट्स को भी प्रसारित किया जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मन्दिर का निर्माण करो’ यह उस समय का सबसे चर्चित ऑडियो एल्बम था। इसमें आंदोलन के मुख्य संकल्प गीत राम लला हम आएँगे.. शामिल थे। कई स्थानों पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद इसकी लाखों प्रतियाँ ब्लैक में बिकी। गुलशन कुमार की ‘टी-सीरिज’ कम्पनी ने इस दौर में राम भजनों की बाढ़ ला दी। ‘जय श्री राम’ नाम की ऑडियो कैसेट में शामिल गीतों को उस समय प्रचलित हिंदी फिल्मों के गानों की धुनों पर तैयार किया गया था ताकि वे आम जनता की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के स्थानीय लोक कलाकारों ने स्थानों बोलियों (भोजपुरी, अवधी, बुन्देली) में श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े गीतों के कैसेट रिकार्ड कर प्रसारित किए जिससे ग्रामीण भारत इस आंदोलन से सीधे जुड़ गया। कुछ और प्रसिद्ध ऑडियो कैसेट्स हैं- काशी बुल्लू की ‘राम जन्म भूमि अयोध्या’: मैक्स कैसेट्स इंडस्ट्री द्वारा 1991 में जारी यह एक बेहद लोकप्रिय &#8216;बिरहा&#8217; और लोकगीत शैली की ऑडियो कैसेट, कार्यकर्त्ता प्रबोधन की दृष्टि से ‘डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और आचार्य धर्मेंद्र के वक्तव्य’; संतों के संदेश, कारसेवा के निर्देश, अयोध्या पहुँचने के आह्वान गीत के लिए ‘चलो अयोध्या’, भजनों और गीतों के लिए ‘सौगंध राम की खाते हैं’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि</strong> <strong>आंदोलन में काव्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के काल में हिंदी काव्य-जगत में एक समानांतर धारा विकसित हुई, जिसे ‘आंदोलन-काव्य’ कहा जा सकता है। ओज और वीररस प्रधान इन कविताओं में राम को संघर्षशील, न्यायप्रिय और आत्मगौरव के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया। उस समय देश के बड़े-बड़े कवियों की कविताओं को संकलित कर विशेष कैसेट जारी किए जाते थे। इनमें भारत के 500 वर्षों के संघर्ष और हिन्दू मान बिन्दुओं की पुनर्प्रतिष्ठा का वर्णन होता था। साध्वी ऋतंभरा के भाषणों में एक कविता अवश्य रूप में आती थी –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>महाकाल बन करके हम दुश्मन से टकराएँगे। जहाँ बनी है मस्जिद, अपना मन्दिर वहीं बनाएंगे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>काशी</strong><strong>, मथुरा, वृन्दावन ने एक साथ हुंकारा है। कहो गर्व से हम हिन्दू है हिन्दुस्थान हमारा है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वीर रस के कवि हरिओम पंवार ने आंदोलन में अपनी कविताओं से गहरी छाप छोड़ी &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>‘राम दवा है रोग नहीं हैं सुन लेना। राम त्याग है भोग नहीं है सुन लेना।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम दया है क्रोध नहीं है सुन लेना। राम सत्य है शोध नहीं है जग वालों।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम हुआ है नाम लोक हितकारी का। रावण से लड़ने वाली खुद्दारी का।’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में रामकथा व कथाकार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रथयात्रा, शिलापूजन और रैली जैसे आयोजनों में दिए गए भाषण रामकथा-प्रसार का सबसे प्रभावी माध्यम सिद्ध हुए। इन भाषणों में वक्ता रामायण के प्रसंगों को ऐतिहासिक-राजनीतिक संदर्भों से जोड़ते थे। राम-वनवास को ‘सांस्कृतिक पराभव’ और राम-राज्याभिषेक को ‘मुक्ति की प्रतीक्षा’ के रूपक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। भाषण-शैली भावना प्रधान व आह्वान करने वाली थी, जिसका उद्देश्य श्रोता को कथा का सक्रिय भागीदार बनाना था। इस आंदोलन में विभिन्न संत-साध्वी ‘राम कथाकार’ के रूप में उभरे। इनमें प्रमुख नाम है- मोरारी बापू, संत आचार्य धर्मेन्द्र, स्वामी रामभद्राचार्य, रमेश भाई ओझा, महंत रामचन्द्र दास परमहंस, स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती, देवराहा बाबा, महंत अवैद्यनाथ, स्वामी वामदेव महाराज, स्वामी परमानन्द गिरी महाराज, साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमाश्री भारती, स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज, स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरी महाराज।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर साहित्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रामजन्मभूमि आंदोलन के समय ही नरेंद्र कोहली की पूर्व-प्रकाशित रामकथा शृंखला को ‘अभ्युदय’ (1989-1990) नाम से दो वृहद् खंडों में समेकित कर पुनः प्रकाशित किया गया, जो उस समय सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनी। कुछ और प्रमुख पुस्तकें आंदोलन के दौरान प्रकाशित हुई – ‘Ram Janmabhoomi Vs. Babri Masjid: A Case Study in Hindu-Muslim Conflict’ (1990): बेल्जियम के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कोनराड एल्सट द्वारा लिखित, ‘Ayodhya and After: Issues Before Hindu Society’ (1991): डॉ. कोनराड एल्सट की पुस्तक, Hindu Temples: What Happened to Them&#8217; (1990): सीताराम गोयल और सहयोगी लेखकों द्वारा संकलित। कुछ पुस्तकें बाद में प्रषित हुई, पर उनका सम्बन्ध आंदोलन की कड़ियाँ ही थी – मीनाक्षी जैन की ‘राम और अयोध्या’, हेमंत शर्मा की ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘राम फिर लौटे’।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का व्याप जितना विस्तृत व व्यापक था, उस समय उपजी रामकथा भी उतनी ही विस्तृत व व्यापक है। वह रामकथा जिसने भारत के जनमानस पर छाप छोड़ी। रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने लिखा है – “हरी अनंत हरी कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥” इसके अनुसार श्रीराम जन्मभूमि की रामकथा भी अनंत है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ram-katha-in-tribal-area/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>संस्कार और साक्षरता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 13:41:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[हम सरस्वती पुत्र]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कार और साक्षरता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; दिलीप बेतकेकर ‘साक्षर जनता &#8211; भूषण भारत’, (जनता साक्षर हो तो भारत विभूषित होगा) ‘साक्षरतेचा दिवा घरोघर लावा’, (साक्षरता का दीपक हर घर में जले), ये और इस जैसी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p style="text-align: justify;">‘साक्षर जनता &#8211; भूषण भारत’, (जनता साक्षर हो तो भारत विभूषित होगा) ‘साक्षरतेचा दिवा घरोघर लावा’, (साक्षरता का दीपक हर घर में जले), ये और इस जैसी अनेक घोषणाएं आजकल सर्वत्र दिखाई-सुनाई पड़ती हैं। प्रचार-प्रसार माध्यमों के द्वारा भी साक्षरता का प्रचार हो रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात कितने ही वर्षों की अवधि बीत जाने पर अभी भी जनता निरक्षर है यह बात गौरव के प्रतिकूल है। साक्षरता योजना का प्रभाव शंकास्पद रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि उद्देश्य अच्छा है। सभी स्तरों पर साक्षरता हेतु प्रयास निरंतर चल रहे हैं। यह अच्छी बात है।</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल की परिस्थिति को देखते हुए केवल साक्षरता पर ही दबाव बनाना उचित नहीं है। कोई व्यक्ति साक्षर होते हुए भी संस्कारवान न हो तो साक्षर व्यक्ति को राक्षस बनने में देर नहीं लगेगी। अपने देश में कुछ समय पूर्व घटित और अभी भी निरंतर घट रही घटनाएं इस ओर संकेत करती हैं। बड़ी-बड़ी आर्थिक चोरी वाली घटनाओं को अंजाम देने वाले निरक्षर नहीं हैं, उच्च विद्या विभूषित व्यक्ति हैं। बम विस्पफोट घटनाओं में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लिप्त व्यक्ति निरक्षर नहीं। अच्छे पदवीधर व्यक्ति, साक्षर व्यक्ति हैं। किन्तु उनका व्यवहार देखते हुए ‘राक्षस’ कहने की इच्छा ही होगी। देशभक्ति का संस्कार नहीं, सामाजिक बंधनों के संस्कार नहीं। परिणामस्वरूप अन्य किसी का कुछ भी हो, मुझे आरामतलब जिंदगी बिताना है, यही उद्देश्य रहता है। सत्ता की कुर्सी हथियाने हेतु प्रयास, एक दूसरे की टांग खींचने की स्पर्धा, ये सब केवल निरक्षर व्यक्ति करते हैं ऐसी बात नहीं। अपनी विद्या का, साक्षरता का, उपयोग (दुरुपयोग) ये साक्षर व्यक्ति स्वयं के भरने हेतु करते हैं। घिन आती है, इन तथाकथित ‘साक्षर’ व्यक्तियों को देखकर।</p>
<p style="text-align: justify;">इसका अर्थ ये नहीं कि साक्षरता के महत्व को कम आंका जाना चाहिए, किन्तु साक्षरता संस्कारों के साथ हुए बिना साक्षरता का कोई अर्थ नहीं। ‘शिक्षा एक द्विधारी तलवार जैसी है’ ऐसा डॉ॰ बाबा साहब अंबेडकर कहते थे। इस शस्त्र का उपयोग सावधानीपूर्वक होना चाहिए। आज हम देखते हैं कि इस शस्त्र का प्रयोग स्वयं के लाभ हेतु और समाज के अहित के लिये हो रहा है। इसीलिए संस्कारों की आवश्यकता पूर्व की अपेक्षा आजकल अधिक हो रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कार और साक्षरता दोनों का सहकार आवश्यक है। हमें केवल ‘शिक्षित’ नहीं, वरन ‘सुशिक्षित’ लोग चाहिए। जब साक्षरता का मेल संस्कारों से होगा तभी ‘सुशिक्षित’ मानव का गठन हुआ माना जायेगा। तब दूध में शक्कर मिलने समान अनुभव होगा, स्वर्ण सुगंधित हो जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">‘संस्कार’ मतलब क्या? ये संस्कार किसलिये? ऐसे प्रश्न अनेक बार पूछे जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘संस्कार’ का अर्थ यदि समझ लिया जाये तो ‘किसलिये हैं ये संस्कार?’ ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जायेंगे। ‘संस्कार’ शब्द का शब्दकोष में लिखा अर्थ है पूर्णता, शुद्ध, परिणाम, समाप्ति। किसी बात में पूर्णता लाने के लिये जो कुछ किया जाता है उसे संस्कार कह सकते है, अथवा अंतिम परिणाम प्राप्ति के लिये जो रचनात्मक कार्य आवश्यक है उसे संस्कार कहना ठीक होगा। उदाहरण के लिये &#8211; मूर्तिकार को मूर्ति बनानी है। इस हेतु उसे मिट्टी की आवश्यकता है। किन्तु जिस रूप में है वैसी ही मिट्टी लेकर मूर्ति नहीं बन सकती। मूर्ति गढ़ने के लिये उपयुक्त मिट्टी तैयार करनी पड़ेगी। मिट्टी में से कंकर-पत्थर, कचरा आदि अनावश्यक वस्तुओं को अलग करना पड़ता है। मिट्टी को छानना पड़ता है। उचित मात्रा में पानी मिलाकर गूंधना पड़ेगा। मिट्टी अधिक पतली न हो, न ही अधिक कठोर, इसकी सावधानी मूर्तिकार अवश्य रखेगा। मूर्तिकार मिट्टी के साथ जो ये सब प्रक्रियाएं करता है उसे मिट्टी का संस्कार कहते हैं। शिल्पकार भी पत्थर पर इसी प्रकार संस्कार करता है। लेखक भी जो कुछ लिखता है उस पर संस्कार करता है अर्थात् पूर्णता लाने के लिये जो कुछ करना पड़ता है उसे मोटे तौर पर संस्कार कह सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जब निर्जीव वस्तुओं पर संस्कार करने की आवश्यकता होती है तो मनुष्य के लिये संस्कार की कितनी आवश्यकता होगी, इसकी कल्पना कर सकते हैं। निर्जीव के सम्बन्ध में एक सुविधा है। पत्थर को एक आकार दे दिया तो वह बदलता नहीं, परन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। मनुष्य का मन अति चंचल है। पल-पल मन के विचार बदलते रहते हैं। बुद्धि को रास आई कोई बात प्रत्यक्ष कार्यान्वित होगी या नहीं, कहना कठिन है। इसलिये मानवीय मन पर केवल एक बार संस्कार करना पर्याप्त नहीं होता। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है मानव के समबन्ध में।</p>
<p style="text-align: justify;">‘किसलिये ये संस्कार?’ प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति को किसी ने धोखा दिया, लूट लिया, कोई उससे झूठ बोला तो उसे बुरा लगेगा। उसकी अपेक्षा होती है कि सभी लोग उससे सच बोलें, ईमानदारी बरतें, उसे धोखा न दें इत्यादि। अब यदि सच बोलना आदि संस्कार सामने वाले मनुष्य पर नहीं हुआ हो तब वह आपसे अच्छा व्यवहार, ईमानदारी का बर्ताव नहीं कर सकता और इस प्रकार का गलत व्यवहार हमें पसन्द नहीं होगा। इसलिये आवश्यक है संस्कार। ये संस्कार कैसे होते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">शासकीय सेवा में कार्यरत माता-पिता को जब ध्यान में आता है कि उनके पुत्र ने पिता की जेब से 4-5 रुपये की चोरी की है तब वे नाराज होते हैं। उससे भी अधिक उन्हें बुरा लगा, दुःख हुआ। हम अपने बच्चे को प्यार-दुलार करते हैं, उसकी सभी इच्छाएं पूरी करते हैं, उसका कौतुक देखते हैं, फिर भी उनके लाड़ले ने चोरी की। इस घटना से दोनों ही दुःखी हुए। बच्चे को दोबारा ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये ऐसा वह सोचने लगे। उन्होंने बच्चे को एक कॉपी-पेन्सिल दी और कॉपी पर ‘चोरी कभी नहीं करना’ वाक्य पांच सौ बार लिखने को कहा। बच्चा लिखने लगा। परन्तु जिस पेन्सिल से वह बच्चा लिख रहा था वह पेन्सिल माता अपने ऑफिस से लायी है और जिस कॉपी पर वह लिख रहा था वह पिताजी के ऑफिस से आयी है ये उस बच्चे को मालूम था। इसलिये ‘चोरी कभी नहीं करना’ वाक्य को वह पांच सौ क्या पांच हजार बार लिखे तब भी चोरी न करने का संस्कार कभी होना संभव नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘चोरी कभी नहीं करना’ ये वाक्य बच्चा लिख सकता है, पढ़ सकता है अर्थात् बच्चा ‘साक्षर’ हुआ। किन्तु वैसा व्यवहार करना उसकी आदत में नहीं आया क्योंकि उसका संस्कार नहीं बना अर्थात् बच्चा साक्षर हुआ, शिक्षित हुआ किन्तु सुशिक्षित नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">समाज की गाड़ी ठीक से चले इसलिये कुछ नियम बने हैं। ये नियम लिखने-पढ़ने में आयें इतना पर्याप्त नहीं। प्रश्न उठता है उन नियमों का पालन करने का। यहीं ‘संस्कार’ का विचार करना पड़ता है। सभी कृतियों का उद्गम स्थान ‘मन’ ही होने के कारण उसका संस्कारित होना महत्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">साक्षरता का महत्व सभी को ज्ञात है। शाला में क्यों भेजना? क्यों पढ़ाई करना? ऐसे प्रश्न आजकल पूछे नहीं जाते। अशिक्षित व्यक्ति को भी अपने बच्चे की पढ़ाई होना आवश्यक है, ऐसा समझ में आता है। किन्तु संस्कारों का अभाव रहता है। अनेक शिक्षित पालकों को अपने बच्चे का परीक्षा में प्रथम आना भाता है और वे यह समझते हैं कि सब कुछ पा लिया। वह प्रथम स्थान किसी भी प्रकार से प्राप्त हो, इसका विचार वे नहीं करते।</p>
<p style="text-align: justify;">एक परीक्षा केन्द्र पर निरीक्षक को बड़े पैमाने पर ‘नकल’ के सम्बन्ध में पता चला। उन्होंने ऐसे छात्रों पर कठोर कार्यवाही करते हुए सभी नकलची छात्रों को बाहर कर दिया। वे लड़के बाहर चले गये। कुछ देर पश्चात वे और उनके पालक आ गये और उस परीक्षा केन्द्र पर पथराव करने लगे। अंत में पुलिस की सुरक्षा में निरीक्षक शिक्षा अधिकारियों को वापिस भेजना पड़ा। ये साक्षरता देश को कहां पहुंचाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">एक चीनी कहावत है, ‘आपको एक वर्ष की व्यवस्था करनी है तो अनाज बोएं, दस वर्ष की व्यवस्था करनी है तो वृक्षारोपण करो और सौ वर्ष की व्यवस्था करनी है तो मनुष्य का गढ़न करो।’</p>
<p style="text-align: justify;">और ऐसे मनुष्य गढ़ने के लिए ‘संस्कार और साक्षरता’ दोनों ही अत्यंत आवश्यक हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/bharatiya-concept-of-personality-development/" target="_blank" rel="noopener">व्यक्तित्व विकास की भारतीय संकल्पना</a></span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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		<title>संत नारायण गिरी जी उर्फ पंडित साधुराम</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/sant-narayan-giri-also-known-as-pandit-sadhuram/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 03:15:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवन दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[पंडित साधुराम]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-सोमदत्त शर्मा भारतीय संस्कृति में संतों का योगदान अद्वितीय रहा है। भारत की यह भूमि युगों-युगों से तप, साधना और मानव कल्याण के लिए समर्पित महान विभूतियों की कर्मभूमि रही&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-सोमदत्त शर्मा</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय संस्कृति में संतों का योगदान अद्वितीय रहा है। भारत की यह भूमि युगों-युगों से तप, साधना और मानव कल्याण के लिए समर्पित महान विभूतियों की कर्मभूमि रही है। इन्हीं श्रेष्ठ संत परंपराओं में से एक हैं महान संत, दार्शनिक, कवि और अद्वैत साधक ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 स्वामी नारायण गिरी जी महाराज, जिन्हें लोक में पंडित साधुराम के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन भारतीय आध्यात्मिकता, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का अनुपम उदाहरण है &#8211; एक ऐसा जीवन जो &#8216;नर से नारायण&#8217; की यात्रा का सजीव प्रतीक बन गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आरंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि </strong></p>
<p style="text-align: justify;">पंडित साधुराम जी का जन्म हरियाणा राज्य की पवित्र भूमि कुरुक्षेत्र के ग्राम पबनावा में 13 दिसंबर 1904 (मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत 1960) को पंडित कृष्णलाल जी के घर हुआ। परिवार भगवद्भक्ति और वैदिक संस्कारों से परिपूर्ण था। उनके पिता त्रिकाल संध्या करते थे और दैनिक रूप से श्री आनंद बिहारी जी मंदिर में सेवा करते थे। एक दिव्य स्वप्न अनुभव के अनुसार, उनके पूर्वज पुत्र हरिनारायण ने पुनर्जन्म लिया और वही आत्मा नारायण शर्मा के रूप में वापस परिवार में आई। इस जन्म में वह बालक साधुराम कहलाया, जिसने आगे चलकर संन्यास धारण कर स्वामी नारायण गिरी जी के रूप में प्रसिद्धि पाई।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिक्षा और गृहस्थ जीवन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गुरु महाराज ने प्रारंभिक शिक्षा गाँव बारना में आचार्य पंडित श्री भिक्षाराम जी से प्राप्त की। तत्पश्चात रंगवाला एवं दुर्गियाणा संस्कृत विद्यालय अमृतसर से &#8216;आचार्य&#8217; की उपाधि ली और बोर्ड ऑफ आयुर्वेदिक एंड यूनानी सिस्टम ऑफ मेडिसिन, पंजाब से आयुर्वेदिक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर बने। 1927 ईस्वी में उनका विवाह प्रसिद्ध वैदिक परिवार में हुआ, किंतु उनकी पत्नी कम आयु में ही स्वर्गवासी हो गईं। इस घटना ने उनके भीतर वैराग्य की लौ प्रज्वलित की। गृहस्थ रहते हुए भी वे सत्संग, स्वाध्याय और भजनोपदेश में निरंतर संलग्न रहे और “पबनावा ग्राम भजन मंडली” की स्थापना की।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संन्यास ग्रहण और देशाटन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">समय आने पर पंडित साधुराम जी ने त्याग मूर्ति स्वामी चौदस गिरी महाराज जी से संन्यास दीक्षा प्राप्त की और &#8216;स्वामी नारायण गिरी जी&#8217; बने। बारह वर्षों तक वे चारों धामों सहित भारतवर्ष के अनेक तीर्थों का भ्रमण करते रहे। यह काल उनका आत्मबोध और लोक शिक्षण का काल था। देशाटन के उपरांत जब वे अपने ग्राम पबनावा लौटे तो भव्य शोभायात्रा द्वारा उनका स्वागत हुआ। तत्पश्चात उन्होंने पुनः कुरुक्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया और हरियाणा के अनेक ग्रामों जैसे करोड़ा, भाणा, पाई, बरोट, नौच, सालवन, पबाना आदि में सत्संग, प्रवचन और भजनोपदेश के माध्यम से लोकजागरण किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साधु राम आश्रम की स्थापना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अपने ब्रह्मलीन होने से कुछ समय पहले उन्होंने अपने शिष्यों की विनती पर कुरुक्षेत्र में &#8216;साधु राम आश्रम&#8217; की स्थापना 25 फरवरी 1988 को की। यह आश्रम आध्यात्मिक शिक्षा और लोककल्याण का केंद्र बन गया। 19 नवंबर 1989 को स्वामी नारायण गिरी जी ब्रह्मलीन हो गए। आज यह आश्रम सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है और हर वर्ष गुरु पूर्णिमा तथा मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर विशाल भजन-कीर्तन व भंडारे आयोजित किए जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साहित्यिक योगदान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी नारायण गिरी जी एक ओजस्वी साहित्यकार भी थे। उन्होंने समाज कल्याण और आत्मबोध के उद्देश्य से 17 प्रामाणिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं: पं. साधुराम की कापी (भजनोपदेश माला), श्रीमद्भगवद्गीता &#8211; ज्ञान प्रबोधिनी, दशरथ रामायण (तीन भाग), गुरु शिष्य संवाद, राम मिलन की राह, विचार तरंग, संकल्प शक्ति, जीव आत्मा और मन का संवाद, सत्संग महिमा, सतगुरु गीता, गर्भगीता, और श्री दत्तात्रेय जीवन चरित्र। इनकी ‘भजनोपदेश माला’ में 370 से अधिक भजनों का संकलन है। इन भजनों में कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग, तथा मानव जीवन के गहन आध्यात्मिक रहस्यों का विवेचन लोकभाषा में किया गया है। इनका प्रमुख प्रभाव श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में ‘हरियाणवी लोकधारा’ नामक पाठ्यपुस्तक में इनके भजनों को शामिल किया गया। यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि पंडित साधुराम न केवल संत थे, बल्कि हरियाणवी लोकसाहित्य के समृद्ध संवाहक भी थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लोकजागरण और भक्ति परंपरा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पंडित साधुराम जी की भजनोपदेश माला ने साधना और भक्ति के मार्ग को जन-सुलभ बनाया। उनके भजनों में जीवन का तत्वज्ञान, कुसंग से बचने की प्रेरणा, और ईश्वर ध्यान की सरल विधि की व्याख्या है। उन्होंने श्वास-प्रश्वास के वैज्ञानिक रहस्य को &#8216;सोहं&#8217; ध्यान के माध्यम से समझाया तथा कुंडलिनी जागरण के चक्रों का उल्लेख किया। उनके उपदेश साधारण जन के लिए आध्यात्मिक प्रयोगशाला बन गए। उन्होंने कहा कि सत्संग जीवन का सर्वोत्तम साधन है। इसी सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने भजन-मंडली परंपरा को स्थापित किया। परिणामस्वरूप हरियाणा के अनेक गांवों पबनावा, पाई, भाणा, बारना, सालवन, पबाना आदि में भजन मंडलियाँ बनीं, जो समानता व सामाजिक एकता का माध्यम बनीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सामाजिक समरसता और मानवता का संदेश</strong></p>
<p style="text-align: justify;">साधुराम जी जातिगत भेदभाव को नकारने वाले सर्वस्पर्शी संत थे। उनके शिष्यों में ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर, रैबारी, नाई, कुम्हार, अग्रवाल आदि सभी समुदायों के लोग सम्मिलित थे। उन्होंने कहा कि हर वह व्यक्ति “हरिजन” है जिसने काम, क्रोध, लोभ आदि पर विजय पा ली। उनके लिए भक्ति का मार्ग जाति, लिंग, संप्रदाय या सामाजिक स्थिति से ऊपर था।अद्वैत दर्शन की प्रतिष्ठापंडित साधुराम जी के साहित्य में अद्वैत वेदान्त का गहन दर्शन विद्यमान है। शंकराचार्य के कथन “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” उनका आध्यात्मिक आधार था। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं और गद्य ग्रंथ “जीवात्मा और मन का संवाद” में स्पष्ट किया कि जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। उनके भजनों में प्रश्नोत्तर शैली के माध्यम से तत्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि जैसे वेदांत सूत्रों का लोकभाषीय व्याख्यान प्रस्तुत है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा और योगविज्ञान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उनकी पुस्तक “राम मिलन की राह” में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का वैज्ञानिक विवेचन है। उन्होंने स्वर-विज्ञान और प्राणविद्या के सूक्ष्म ज्ञान से शरीर के भीतर की नाड़ियों इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना के शोधन की प्रक्रिया को सरल भाषा में बताया। उन्होंने प्रतिदिन की 21,600 श्वासों को देवतुल्य माना और प्राणशक्ति के जागरण को आत्म-उत्थान का साधन माना। भक्तियोग में उन्होंने प्रार्थना और नामजप के वैज्ञानिक रहस्य स्पष्ट किए, वहीं ज्ञानयोग में आत्मा को समस्त आनन्द का सार बताया। उनकी दृष्टि में शरीर एक रथ है, जिसकी दस इंद्रियां उसके अंग हैं—यह विचार उन्होंने &#8216;दशरथ रामायण&#8217; में विस्तार से लिखा। भारत बोध और कुरुक्षेत्र महिमा &#8216;कुरुक्षेत्र पथ प्रदर्शक&#8217; पुस्तक में उन्होंने 48 कोस की पवित्र भूमि, 767 तीर्थों और 9 नदियों का वर्णन किया। अपने भजनों में उन्होंने भारत की सांस्कृतिक अखंडता का गौरवपूर्ण चित्रण किया। उनके पदों में अहिंसा, गौ-संरक्षण और करुणा का संदेश झलकता है। वे मानते थे कि वही सच्चा हिंदू है जो जीव-हिंसा से दूर रहे और धर्म को करुणामय आचरण के रूप में जिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भाषा, शैली और काव्य-सौंदर्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पंडित साधुराम जी की भाषा सरल, संगीतात्मक और लोकानुकूल थी। वे संस्कृत, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी सभी भाषाओं में निपुण थे। उनके भजनों में लय, छंद और अलंकारिक सौंदर्य के साथ हिन्दी-हरियाणवी मिश्रित शैली मिलती है। वे लोक की भाषा में शास्त्र का मर्म समझाने के अद्वितीय प्रतिभाशाली कवि थे। उनके भजनों में तत्सम, तद्भव, देशज, और विदेशी शब्दों का संतुलित प्रयोग दिखाई देता है ।उनके भजनों में कथा-शैली, तुलनात्मक दृष्टान्त, एवं संवादात्मक शैली का प्रयोग पाठक को आत्मानुभूति की ओर खींच लेता है। श्रीकृष्ण, राम और भक्त प्रह्लाद जैसी कथाएं उन्होंने प्रतीक रूप में उपयोग करके जीवन-दर्शन के गूढ़ संदेश को सरलतम भाषा में प्रस्तुत किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">संत नारायण गिरी उर्फ पंडित साधुराम जी का संपूर्ण जीवन भारतीय संत परंपरा की उज्ज्वल कड़ी है। उनके भजन, साहित्य, और उपदेश न केवल हरियाणा की लोकसंस्कृति को समृद्ध करते हैं बल्कि भारतीय अध्यात्म के सार्वभौमिक संदेश को पुनः जीवंत करते हैं। उनकी भजनोपदेश माला में लोक और वेद, अध्यात्म और विज्ञान, भक्ति और ज्ञान का सुंदर समन्वय है।वे जीवन के उस परम सत्य के साधक थे जिसे उन्होंने शब्द दिया — “नर से नारायण की यात्रा”। वास्तव में उनका जीवन, साहित्य और साधना उस परंपरा का जीवंत दीप है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान की पूर्णिमा से लोक को आलोकित करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/siddh-shiromani-baba-mastnath/" target="_blank" rel="noopener">सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ (सन् 1707-1807)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक पूर्व प्रधानाचार्य है एवं वर्तमान में विद्या भारती हरियाणा में शिशुवाटिका विभाग में पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता है।)</p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-34 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था &#8211; १)</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Oct 2025 03:07:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>✍ प्रशांत पोळ सामान्यतः ऐसा माना जाता है (और जो शालेय/ महाविद्यालयीन शिक्षा से और दृढ़ होता गया है) कि, न्याय प्रणाली, न्यायालय, न्यायमूर्ती, वकील&#8230;. यह सब व्यवस्थाएं अंग्रेजों ने&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्यतः ऐसा माना जाता है (और जो शालेय/ महाविद्यालयीन शिक्षा से और दृढ़ होता गया है) कि, न्याय प्रणाली, न्यायालय, न्यायमूर्ती, वकील&#8230;. यह सब व्यवस्थाएं अंग्रेजों ने भारत में लायी। अंग्रेज आने से पहले भारत में यह कुछ भी नहीं था। यदि जनता की कोई शिकायतें होती थी, तो वह सीधे राजा के सामने रखी जाती थी। राजा उसके मनमर्जी से, या उस समय उसकी जो मनस्थिति रही होगी, उस प्रकार निर्णय देता था।</p>
<p style="text-align: justify;">परंतु वास्तविक चित्र क्या है?</p>
<p style="text-align: justify;">हजारों वर्षों से अपने देश में सुव्यवस्थित न्याय प्रणाली कार्यरत थी। इस न्याय प्रणाली का आधार था &#8211; धर्मशास्त्रों का,अलग-अलग स्मृतियों का। इस न्याय व्यवस्था को समाज मान्यता थी। इस व्यवस्था के कारण उस समय के अखंड और विशाल भारत देश में स्वस्थ, सुदृढ और सशक्त समाज व्यवस्था का अस्तित्व था। महेश कुमार शरण ने उनकी पुस्तक ‘कोर्ट प्रोसिजर इन एन्शंट इंडिया’ में लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">‘It is just possible that elements of Hindu law were adopted by Romans thourgh Greek and Egyptian channels’</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, विश्व में परिपूर्ण न्याय व्यवस्था सर्वप्रथम भारत में ही विकसित हुई है। यह न्याय व्यवस्था ग्रीक और मिस्त्र देश के माध्यम से रोमन्स (युरोपियन्स) ने अपनायी होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">महेश कुमार शरण ने आगे लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">‘It should be a pride and satisfaction to a Hindu to know that his / her ancestors had scaled great heights not only in literature, philosophy and religion, but had advanced very far in the domain of law’ &#8211; (Court procedures in Ancient India)</p>
<p style="text-align: justify;">(अर्थात, एक हिंदू के लिए इसकी जानकारी होना अत्यंत गर्व और समाधान की बात है कि उसके पुरखों ने केवल साहित्य, दर्शन और धर्म में ही अपनी कीर्ति ध्वजा फहराई थी, ऐसा नहीं है। तो न्याय के क्षेत्र में भी उन्होंने कीर्तिमान रचा था।)</p>
<p style="text-align: justify;">आगे लिखा है-</p>
<p style="text-align: justify;">‘The rule and evidence were as complete and perfect, as we can find them today. The administration of justice was regular and the system was well defined, as no aspect was left arbitrarily, capricious or uncertain. Judiciary had the highest regard and supreme position.</p>
<p style="text-align: justify;">(अर्थात, ‘नियम’ और ‘प्रमाण’ इन की परिभाषा इतनी परिपूर्ण और निर्दोष थी, जितनी आज है। न्याय प्रणाली एक नियमित व्यवस्था थी। परिभाषा सुस्पष्ट थी। इसमें कोई भी अनियंत्रितता नहीं थी, अनिश्चितता नहीं थी। न्याय व्यवस्था सर्वोच्च स्थान पर थी और उस व्यवस्था को सर्वाधिक आदर और सम्मान मिलता था।)</p>
<p style="text-align: justify;">इसी पुस्तक में महेश कुमार शरण ने आगे लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">Besides this, the whole procedure is completely indigenous and nothing has been imported into it from any other system, whatsoever.’</p>
<p style="text-align: justify;">(अर्थात, इस न्याय व्यवस्था की संपूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः स्वदेशी थी। इसमें कोई भी बाहरी (देशों से) बिंदु या व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया गया था।)</p>
<p style="text-align: justify;">भारत की यह संपूर्ण न्याय व्यवस्था, स्मृतियों के आधार पर खड़ी थी। कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति आदि प्रमुख स्मृतियां थी।</p>
<p style="text-align: justify;">यह स्मृति क्या होती है? यह कितनी पुरानी है?</p>
<p style="text-align: justify;">एक सुव्यवस्थित समाज रचना निर्माण करने के लिए, हजारों वर्षों से अपने पूर्वजों ने कुछ ग्रंथों का निर्माण किया हैं। इन ग्रंथों के अनुसार ही अपने समाज में प्रथा, परंपरा, व्यवस्थाएं निर्माण हुई। इन ग्रंथों के आधार पर अपना समाज चल रहा था। इसलिए, इतने सारे आक्रमणों के बाद भी हमारी पहचान कायम रही, बनी रही।</p>
<p style="text-align: justify;">इन ग्रंथों में वेद है, उपनिषद है, श्रुति है, स्मृति है, पुराण है। हजारों वर्षों से हमारे ऋषि मुनियों ने, समाज महर्षियों ने, जिस ज्ञान का संचय किया है, वह संचय यानी स्मृतियां। एक प्रकार से परंपराओं का संकलन होने के कारण इन्हें ‘स्मृति’ यह नाम दिया गया है। यह स्मृति मानो हमारा धर्मशास्त्र है। भारत का और पौर्वात्य प्राचीन साहित्य का अध्ययन करने वाले जो पाश्चात्य विद्वान है, उनके अनुसार इन स्मृतियों की रचना ईसा पूर्व 500 वर्षों से लेकर तो ईसा के बाद पांचवें सदी तक हुई है। तक्षशिला विश्वविद्यालय में जिस काल खंड में आर्य चाणक्य अर्थशास्त्र लिख रहे थे, उसी कालखंड में स्मृतियों की रचना हुई है, ऐसा पश्चिम के विद्वानों का मत है। परंतु उपलब्ध संदर्भों के अनुसार स्मृतियों का कालखंड इससे भी बहुत प्राचीन है।</p>
<p style="text-align: justify;">इन स्मृतियों में से ‘कात्यायन स्मृति’ यह ऋषि कात्यायन द्वारा लिखी गई है, ऐसा माना जाता है। कात्यायन यह याज्ञवल्क्य ऋषि के पुत्र थे। इनका कार्यकाल ईसा पूर्व कुछ हजार वर्ष माना जाता है। अर्थात ‘कात्यायन स्मृति’ यह ग्रंथ, कात्यायन ऋषि ने लिखे हुए सूत्र और उनके अन्य शिष्यों के साहित्य का संकलन है। इसलिए कात्यायन स्मृति में केवल ऋषि कात्यायन के श्लोक नहीं है। देवल  पितामह, प्रजापति, वशिष्ठ, मनु आदि ॠषियों का सहभाग भी इस कात्यायन स्मृति में है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस स्मृति में कात्यायन ऋषि ने उनके पहले, इस न्याय के क्षेत्र में जिन्होंने काम किया था, उनका उल्लेख किया है। भृगु, बृहस्पति, गार्गीय, तम, कौशिक, लिखिता, मनु, मानव आदि..! प्राचीन भारत में जो न्याय प्रणाली विकसित हो रही थी, उसमें कात्यायन ऋषि के बाद, लगभग 1000 वर्ष तक, इसमें विशिष्ट सुधार होते रहे। कात्यायन स्मृति में उसका प्रभाव दिखता है। इस स्मृति में प्रत्यक्ष कात्यायन ऋषि ने लिखे हुए श्लोक अंत में दिए हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">महामहोपाध्याय डॉक्टर पांडुरंग वामन काणे (1880 &#8211; 1972) ने प्राचीन भारतीय न्याय शास्त्र के क्षेत्र में, अत्यंत गहन शोध और भरपूर लेखन किया है। ‘भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास’ इस विषय पर उनका 6500 पृष्ठों का, पांच खंडों में लिखा हुआ साहित्य प्रकाशित हुआ है। स्वयं न्याय शास्त्र के विद्वान तो थे ही, साथ में उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का का गहन अध्ययन किया। वर्ष 1963 में महामहोपाध्याय काणे जी को भारत का सर्वोच्च सम्मान, ‘भारत रत्न’ दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे पां. वा. काणेजी ने, कात्यायन स्मृति के बारे में बहुत कुछ लिख रखा है। वे लिखते हैं &#8211; ‘कात्यायन स्मृति में न्याय प्रणाली के संदर्भ में जो विषय आएं है, वह अद्भुत और आश्चर्य जनक है। क्योंकि आज के आधुनिक न्याय शास्त्र जैसी पद्धति और नियम, कात्यायन स्मृति में हैं।’</p>
<p style="text-align: justify;">[Some of his (sage Katyayan’s) rules, such as those about the contents and characteristics of good points and written statements, about the evidence of witness and about documents, about constructive res judicata are startling in their modernity].</p>
<p style="text-align: justify;">कात्यायनी स्मृति में आए हुए विषय &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; न्यायालय, न्यायालय की प्रक्रिया / पद्धति</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; कागजात</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; परिक्षण (बहस)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; शपथ लेकर दी हुई साक्ष्य / बयान</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; भागीदारी</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; भेंट वस्तु (gift)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; अनुबंध तोड़ना</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; जो मालिक नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति ने की हुई वस्तुओं की बिक्री</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; परंपराओं का / नियमों का उल्लंघन</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; विवादों की सीमा</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; पैतृक संपत्ति का बंटवारा / विवाद</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; वाकपारुष्य (आज की भाषा में ‘हेट स्पीच’)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; दंड पारुष्य (कठोर सजा)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; प्रकीर्णक (विविध / अनेक प्रकार के यम-नियम)</p>
<p style="text-align: justify;">(क्रमशः)</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े : <span style="color: #3366ff;"><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-invented-advanced-farming-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-32 (उन्नत खेती का अविष्कारक – भारत – 1)</a></span></strong></span></p>
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