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	<title>Game Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>Game Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>मनः स्थिति बनाम परिस्थिति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2025 10:43:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[indian education]]></category>
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		<category><![CDATA[टग ऑफ़ वार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर शाला में एक खेल खेला जाता है रस्सा खींच। एक मजबूत रस्सी के दो सिरों की बाजू में दो समूह रस्सी को पकड़े खड़े हो जाते हैं।&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class=" wp-image-8732" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/istockphoto-875961182-612x612-1-300x201.jpg" alt="" width="1582" height="1060" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/istockphoto-875961182-612x612-1-300x201.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/istockphoto-875961182-612x612-1.jpg 612w" sizes="(max-width: 1582px) 100vw, 1582px" /></p>
<p style="text-align: justify;">शाला में एक खेल खेला जाता है रस्सा खींच। एक मजबूत रस्सी के दो सिरों की बाजू में दो समूह रस्सी को पकड़े खड़े हो जाते हैं। खेल शुरु होते ही दोनों समूह रस्सी को अपनी ओर खींचते हैं। (टग आफ वार)। जो समूह रस्सी को सामने वाले समूह समूह सहित अपनी ओर खींचने में सफल हो जाए वह विजयी होगा। यह खेल केवल मैदान में नहीं अपितु हमारे जीवन में भी चलता रहता है। परिस्थिति विरूद्ध मनःस्थिति ऐसा है यह हर पल जीवन में चलने वाला खेल! जिसकी मनः स्थिति प्रबल, मजबूत उसी की विजय! अपने पास कुछ धन, दौलत, साधन सामग्री का अभाव रहते हुए भी, बगैर किसी रोने-धोने, शिकायत के, संघर्ष रत रहते हुए, जिन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण की है ऐसे अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। पहले भी थे आज भी हैं- ऐसे प्रेरक उदाहरण!</p>
<p style="text-align: justify;">एक बार एक व्यक्ति से पूछा- आपकी शिक्षा कहां और किस प्रकार हुई? उत्तर मिला- मेरी शिक्षा गरीबी की शाला में हुई। गरीबी एक श्राप, बाधा न मानकर उस पर जीत प्राप्त कर उत्तम प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने वाले आज भी हमारे आसपास ही दिखाई देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">किसी पत्थर को देखकर एक व्यक्ति कहता है कि यह एक रोड़ा है, बाधा है, तो दूसरे व्यक्ति की दृष्टि में वह एक ऊपर जाने वाली सीढ़ी है। (Stepping stone) फर्क है केवल दृष्टिकोण का!</p>
<p style="text-align: justify;">प्रत्येक वर्ष दसवीं-बारहवीं की परीक्षा के पश्चात, परिणाम घोषित होने पर, कई विद्यार्थियों की यशो गाथाएं पढ़ने को मिलती हैं। ऐसे सभी उदाहरणों पर दृष्टि डालें तो हमें प्रेरणा मिलती है, स्फूर्ति मिलती है। किसी ने कठिन परिश्रम, मजदूरी करके अपनी शिक्षा ग्रहण की तो किसी ने दूसरों के घर रहकर तो किसी ने प्रतिदिन लंबी दूरी पैदल चलकर शिक्षा प्राप्त की है। किसी के पास परीक्षा फीस जमा करने के लिए पैसे न थे तो कोई भूखा पेट रहकर पढ़ाई कर पाया। ऐसे उदाहरण संकलित करने पर एक बड़ा सा ग्रंथ तैयार हो सकता है। सीखने की ललक हो, तीव्र इच्छा हो तो कोई भी उसे रोक नहीं सकता। परंतु मनःस्थिति कच्ची हो, दुर्बल हो तो कोई भी मदद नहीं कर सकता। उत्तम मनः स्थिति का अर्थ तीन बातों का मेल, त्रिवेणी संगम है।</p>
<p style="text-align: justify;">१. सकारात्मक (Possitive), २. विजयी (Winning) ३. और कृतज्ञ (Gratitude) इन तीनों का मेलजोल, सहयोग आपस में रहा तो मनः स्थिति की डोर मजबूत होना निश्चित ही समझें!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१. सकारात्मकता :</strong> आज कुछ बाधा हो, कुछ समस्या हो, परन्तु उसका उत्तर भी उसी में छुपा है ऐसा दृढ़ विश्वास जिनका होता है वह उस समस्या से, बाधा से सुरक्षित बाहर निकलता ही है। मेघ कितना भी काला हो उसकी कहीं न कहीं चंदेरी किनार होती है। यह चंदेरी किनार जिसे दिखाई देती है, वह कभी निराश, हताश नहीं हो सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">एडिसन के कारखाने को आग लगी। वह आग देखकर एडिसन अपने लड़के को &#8211; चार्ल्स को बोला, जाओ अपनी माँ को बुला लाओ, ऐसी आग उसे पूरे जीवनकाल में देखने को नहीं मिलेगी। इतना ही नहीं, दूसरे दिन कारखाने की राख देखकर एडिसन स्वयं से कहने लगे, ऐसी बरबादी भी बहुत मूल्यवान होती है। अपनी गलतियां भी उसमें जलकर खाक हो जाती हैं। हे परमेश्वर, मुझे नए सिरे से कारखाना बनाने का अवसर दिया इसीलिए आपका आभारी हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रणाम है ऐसे धैर्यवान एडिसन को!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>२. विजयी प्रवृति :</strong> अरुणिमा सिन्हा को बदमाशों ने चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया था, उसका एक पैर ट्रेन के नीचे दबने से चकनाचूर हो गया। कृत्रिम पैर लगने के बाद उसने एवरेस्ट शिखर पर जाने का निश्चय किया। इस अत्यंत साहसी कृत्य को न करने हेतु परा वृत्त करने का अनेक लोगों द्वारा प्रयास किया गया। परंतु वह अपने निश्चय से टस से मस नहीं हुई। मैं जीतकर ही चैन लूंगी। विजय पाकर ही रहूंगी, ऐसी जिद्द उसे एवरेस्ट शिखर पर ले गई। गोपाल नाम का एक विद्यार्थी, अत्यंत गरीब, पहनने के लिए ढंग के वस्त्र नहीं! एक ही कुर्ता, उसे रात्रि में धोकर, सुखाकर दूसरे दिन वहीं पहनता। यही गोपाल- अर्थात महाराष्ट्र के विख्यात समाज सुधारक गोपालराव आगरकर थे।</p>
<p style="text-align: justify;">डॉ. अम्बेडकर की ज्ञान साधना कितनी अलौकिक थी! अस्पृश्यता की मार झेलते हुए, आर्थिक मार भी उन्होंने झेला, और कई पदवियां प्राप्त की। विदेश में रहते हुए वे पुस्तकालय में ही अधिक समय व्यतीत करते थे, अध्ययन करते। रात्रि भोजन के ऐवज में केवल काफी और एकाध टुकड़ा पाव खाकर अपनी भूख मिटाते। ‘विद्यातुराणाम न सुखम न निद्रा’ इसका साक्षात उदाहरण हैं डॉ. ए. पी. जे. कलाम। उनके पास कहां था अध्ययन के लिए पर्याप्त धन और साधन!</p>
<p style="text-align: justify;">इसके विपरीत अपार धन और पर्याप्त साधन होते हुए भी अध्ययन के नाम से सारा गड़बड़ घोटाला ही, ऐसे उदाहरण भी दिखते हैं। अब अन्य की बातें छोड़ें! हम अपने बारे में सोचें। हम किस प्रकार का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे?</p>
<p style="text-align: justify;">जिनके हाथ में शून्य होते हुए भी सकारात्मक एवं विजय वृत्ति के बल पर जिन्होंने विजय पताका फहराई, अथवा ईश्वर, माता पिता ने सबकुछ देते हुए भी हाथ में कद्दू ही रहेगा? इसका चयन सब स्वयं ही करेंगे। चोइज़ इज योर्स! समर्थ रामदास स्वामी कहते थे कि <strong>“उत्कट भव्य वह लेवें</strong><strong>, </strong><strong>महत्वहीन को त्याग देवें!”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अब ‘उत्कट भव्य’ अपनाएं अथवा नहीं इसका निर्णय करें!</p>
<p style="text-align: justify;">आप ही निर्णय अवश्य करें!</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/sadhan-and-sadhna/" target="_blank" rel="noopener">साधन और साधना</a></span></strong></p>
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		<title>हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद – 29 अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस विशेष</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Aug 2024 10:49:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
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		<category><![CDATA[Mejor Dhyan Chand]]></category>
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		<category><![CDATA[खेलकूद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ मुखतेज बधेशा 29 अगस्त 1905 को प्रयागराज में जन्मे मेजर ध्यानचंद का हॉकी के खेल में पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं था, उन्होंने लगभग 22 वर्ष तक भारत&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> मुखतेज बधेशा</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-7915" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Major-Dhyanchand-300x195.jpg" alt="" width="1420" height="923" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Major-Dhyanchand-300x195.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Major-Dhyanchand-768x500.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Major-Dhyanchand.jpg 859w" sizes="(max-width: 1420px) 100vw, 1420px" /></p>
<p style="text-align: justify;">29 अगस्त 1905 को प्रयागराज में जन्मे मेजर ध्यानचंद का हॉकी के खेल में पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं था, उन्होंने लगभग 22 वर्ष तक भारत के लिए हॉकी खेली और इस दौरान 400 से अधिक अंतरर्राष्ट्रीय गोल दागे। उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">29 अगस्त का दिवस भारत के लिए बहुत विशेष है। आज हमारा देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा है। इस दिवस को देश के महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। पहली बार राष्ट्रीय खेल दिवस 29 अगस्त 2012 को मनाया गया था और तब से हर वर्ष इसे बड़े उत्साह और गर्व के साथ मनाया जाता है। हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद की महानता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वह हॉकी खेलते थे तो ऐसा लगता था मानो गेंद उनकी स्टिक से चिपक जाती थी। ध्यानचंद की उपलब्धियों ने अंग्रेजी राज के दौरान भी भारतीय के खेल के इतिहास को नए शिखर पर पहुंचाया था। उन्होंने लगातार तीन ओलंपिक (1928 में एमस्टरडम, 1932 में लॉस एंजेलिस और 1936 में बर्लिन में भारत को हॉकी के खेल में अपने दम पर स्वर्ण पदक दिलाया था।</p>
<p style="text-align: justify;">मात्र 16 वर्ष की उम्र में ध्यान चंद ने आर्मी जॉइन कर ली थी इसी दौरान उन्हें मानो जैसे हॉकी से प्रेम हो गया था। ध्यानचंद को दुनिया में लगभग 55 देशों के 400 से अधिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इन्हीं उपलब्धियां के कारण उनके जन्मदिवस को देश में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">1932 में लॉस एंजेलिस में हुई ओलंपिक प्रतियोगिता में ध्यानचंद को टीम में शामिल कर लिया गया। उस समय सेंटर फारवर्ड के रूप में काफी सफलता और प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे। वह सेना में लांस नायक के बाद नायक हो गए थे। इस दौरे के दौरान भारत ने काफी मैच खेले, इस सारी यात्रा में ध्यानचंद ने 265 में से 101 गोल स्वयं किये। निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। अमेरिका के एक समाचार पत्र ने लिखा था कि भारतीय टीम तो पूर्व से आया तूफान थी उसने अपने वेग से अमेरिकी टीम के 11 खिलाड़ियों को कुचल दिया। 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों में ध्यानचंद को भारतीय टीम का कप्तान चुना गया। इस पर उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा था मुझे जरा भी आशा नहीं थी कि मैं कप्तान चुना जाऊंगा। उन्होंने अपने इस दायित्व को बड़ी ईमानदारी के साथ निभाया।</p>
<p style="text-align: justify;">अपने जीवन का संस्मरण सुनाते मेजर ध्यानचंद कहते हैं कि “17 जुलाई के दिन जर्मन टीम के साथ हमारे अभ्यास के लिए प्रदर्शनी मैच का आयोजन हुआ। यह मैच बर्लिन में खेला गया हम इसमें एक के बदले चार गोल से हार गए। इससे मुझे जो धक्का लगा उसे मैं अपने जीते जी नहीं भूल सकता। जर्मनी की टीम की प्रगति देखकर हम सब आश्चर्यचकित रह गए और हमारे कुछ साथियों को तो भोजन भी अच्छा नहीं लगा। बहुत से साथियों को तो रात में नींद भी नहीं आई।”</p>
<p style="text-align: justify;">“5 अगस्त के दिन भारत का हंगरी के साथ ओलंपिक का पहला मुकाबला हुआ जिसमें भारतीय टीम ने हंगरी को चार गोलों से हरा दिया। दूसरे मैच में जो कि 7 अगस्त को खेला गया भारतीय टीम ने जापान को 9 गोलों से हराया और उसके बाद 12 अगस्त को फ्रांस को 10 गोलों से हराया। 15 अगस्त को भारत और जर्मन की टीमों के बीच फाइनल मुकाबला था यद्यपि यह मुकाबला 14 अगस्त को खेला जाने वाला था पर उस दिन इतनी वर्षा हुई कि मैदान में पानी भर गया और खेल को एक दिन के लिए स्थगित कर दिया गया।”</p>
<p style="text-align: justify;">“अभ्यास के दौरान जर्मनी की टीम ने भारत को हराया था यह बात सभी के मन में बुरी तरह घर कर गई थी। फिर गीले मैदान और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे खिलाड़ी और भी निराश हो गए थे। तभी भारतीय टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता को एक युक्ति सूझी वह खिलाड़ियों को ड्रेसिंग रूम में ले गए और उन्होंने भारतीय ध्वज हमारे सामने रखा और कहा कि इसकी इज्जत अब तुम्हारे हाथ में है। सभी खिलाड़ियों ने श्रद्धापूर्वक ध्वज को नमन किया और वीर सैनिकों की तरह मैदान में उतर पड़े । भारतीय खिलाड़ी जमकर खेले और भारत ने जर्मनी पर 8-1 से बेहतरीन जीत प्राप्त की थी। उस दिन सचमुच देश के झंडे की लाज रह गई। उस समय कौन जानता था कि 15 अगस्त को ही भारत का स्वतंत्रता दिवस बनेगा।”</p>
<p style="text-align: justify;">मैच में मेजर ध्यानचंद के खेल से जर्मनी का तानाशाह एडोल्फ हिटलर भी अति प्रसन्न हो गया था। मैच के बाद हिटलर ने मेजर ध्यानचंद से भेंट की और उन्हें अपनी सेना में बड़े पद का प्रस्ताव दिया। हालांकि उन्होंने बड़ी ही विनम्रता के साथ हिटलर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था उनके इस कदम ने पूरी दुनिया में प्रशंसा प्राप्त थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा माना जाता है कि मेजर ध्यानचंद हॉकी खेलते थे तो मानो गेंद उनकी स्टिक से चिपक जाती थी, इस आशंका को दूर करने के लिए हॉलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक को तोड़कर चेक भी किया गया था। परंतु सारी आशंकाएं गलत निकली। जापान में भी एक मैच के दौरान उनके स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई थी।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-7916" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/national-sports-day-2022-major-dhyanchand-birth-anniversary-know-interesting-fact-about-its-history-and-magician-of-hockey.webp" alt="" width="1280" height="720" /></p>
<p style="text-align: justify;">मेजर ध्यानचंद के सम्मान में भारत सरकार देश के लिए खेल में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय खेल दिवस 2024 की थीम भी यही रखी गई है – “शांतिपूर्ण और समावेशी समाजों के संवर्धन के लिए खेल।”</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>यह थीम इस बात पर जोर देती है कि खेलों का समाज में एकता समावेश और शांति को बढ़ावा देने में कितना महत्वपूर्ण योगदान है।</li>
<li>खेल विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाकर आपसी सम्मान समझ और सहयोग को प्रोत्साहित करते हैं।</li>
<li>इस थीम के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि खेल न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बल्कि समाज में सौहार्द्र और एकजुटता को बढ़ाने के लिए भी आवश्यक है।</li>
<li>यह थीम सभी नागरिकों को अपने जीवन में खेल भावना टीमवर्क और निष्पक्ष खेल के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है जिससे एक शांतिपूर्ण और समावेशी समाज का निर्माण हो सके।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">“खेल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।”</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती खेल परिषद के अखिल भारतीय संयोजक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/bharatiya-traditional-game-is-the-powerful-medium-of-child-development/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय परम्परागत खेल : बाल विकास का सशक्त माध्यम</a></span></strong></p>
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		<item>
		<title>भारतीय परम्परागत खेल : बाल विकास का सशक्त माध्यम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Aug 2023 07:10:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Game]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Traditional Sports]]></category>
		<category><![CDATA[Khel]]></category>
		<category><![CDATA[परम्परागत खेल]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>  ✍ अवनीश भटनागर उत्साह, जोश, मस्ती तथा रोमांच से भरपूर खेलकूद बच्चों को तो क्या, बड़ों को भी पसन्द हैं। दुनियाँ के सभी देशों में खेलों का एक विस्तृत इतिहास&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">  <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> अवनीश भटनागर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6914" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Indian-traditional-Games-968x500-1-300x155.jpg" alt="" width="1723" height="890" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Indian-traditional-Games-968x500-1-300x155.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Indian-traditional-Games-968x500-1-768x397.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Indian-traditional-Games-968x500-1.jpg 968w" sizes="auto, (max-width: 1723px) 100vw, 1723px" /></p>
<p style="text-align: justify;">उत्साह, जोश, मस्ती तथा रोमांच से भरपूर खेलकूद बच्चों को तो क्या, बड़ों को भी पसन्द हैं। दुनियाँ के सभी देशों में खेलों का एक विस्तृत इतिहास रहा है। भारत में तो प्रत्येक अवसर विशेष के लिए, प्रत्येक आयु वर्ग के लिए तथा यहाँ तक कि विभिन्न पर्व-त्यौहारों के लिए खेलों की पर‌म्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। केरल में ओणम के अवसर नौकायन की स्पर्धा से लेकर ओडिशा की बाली जात्रा, और उत्तर भारत में कुश्ती, कबड्डी, खो-खो और तैराकी आदि के प्रमुख खेल हैं जो बड़ी आयु के लोगों में भी लोकप्रिय हैं। भारत की सभी प्रमुख भाषाओं के साहित्य में, पौराणिक आख्यानों में, लोक कथाओं में भी खेलों का उल्लेख मिलना है। सूरदास के पदों में ग्वाल बालों के साथ श्रीकृष्ण के गेंद खेलने, आपस में लड़ने-झगड़ने, रुठने-मनाने का वर्णन आता और गेंद के यमुना के जल में चले जाने पर कालिय नाग के मानमर्दन की कथा हम सबको ज्ञात है। मुंशी प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कथा ‘गुल्ली-डण्डा’ को बाल-युवा मनोविज्ञान का दस्तावेज कहा जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">आज के व्यस्तता भरे जीवन में, समय तथा स्थान की उपलब्धता के अभाव में भी खेलों के प्रति आकर्षण कम नहीं हो सका है, उसका स्वरूप भले ही बदल गया हो।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्ष 2020 कोरोना की वैश्विक आपदा से अलग दो सकारात्मक बातों के लिए भी स्मरण रखे जाने योग्य है। पहली है, राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा तथा दूसरी, भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा Vocal for Local का आह्वान। भारत की शिक्षा नीति और अर्थनीति के ये परिवर्तन कालक्रम से समाजनीति और राजनीति में भी व्यापक परिवर्तन के कारक बनेंगे, ऐसी आशा की जा रही है। इन दोनों नीतियों के मूल में भारत तथा भारतीयता के गौरव का भाव अन्तर्निहित है। जहाँ एक ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति ‘भारत केन्द्रित शिक्षा’ का उल्लेख प्रारम्भ में ही करती है, आगे के अध्यायों में पाठ्यक्रम में कला के समावेश (Art Integration ) तथा गतिविधि आधारित अनुभवजन्य अधिगम (Activity based experiential learning) की बात कहती है, वहीं दूसरी ओर, अर्थनीति तो पूरी तरह स्थानीय उत्पादन, बाजार को बढ़ावा देने तथा विदेशी बाजारों पर भारतीय समाज की निर्भरता को कम करने के विचार पर ही आधारित है।</p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त दोनों नीतियों के इस ‘भारत तथा भारतीय‌ता’ के मूल विचार का सह-सम्बन्ध यदि भारतीय खेलों की सुदीर्घ परम्परा के साथ जोड़ा जाए तो शिक्षा के एक सशक्त माध्यम के रूप में परम्परागत भारतीय खेलों को स्थान दिया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">परम्परा‌गत भारतीय खेलों की कुछ मूलभूत विशेषताओं को निम्नांकित प्रकार से चिह्नांकित किया जा सकता है :</p>
<ul style="text-align: justify;">
<li>अधिकांश परम्परागत भारतीय खेल शून्य निवेश (Zero investment) प्रकार के हैं अर्थात या तो उनमें कोई साधन-संसाधन-उपकरण (equipment) की आवश्यकता होती ही नहीं अथवा यदि होती भी है तो स्थानीय आधार पर उपलब्ध सामग्री से निर्मित। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ कभी भी सभी विद्यालय और अभिभावक बच्चों की खेल सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए धन व्यय नहीं कर सकते, अधिकांश भारतीय खेल सर्वसुलभ हो जाते हैं। इन्हें within the reach of common man कहा जा सकता है।</li>
<li>खेलों के विषय में कुछ बातें सभी शिक्षाविद् तथा विचारवान कहते हैं, जैसे खेलों से शारीरिक विकास (गति, लोच, संतुलन आदि) होता है, टीम भावना पनपती है, खेल भावना के कारण हार या जीत की स्थिति में समभाव (Sportsmen spirit) का विकास होता है, शरीर सबल, सुदृढ़, संतुलित, निरोगी बनता है, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है, आदि-आदि। सभी भारतीय पारम्परिक खेल इन सभी मापदण्डों पर खरे उतरते हैं। इनके अतिरिक्त भारतीय खेल शैक्षिक गतिविधियों के रूप में भी उपयोगी हैं जिनसे पाठ्यवस्तु को रोचक बनाया जा सकता है।</li>
<li>शारीरिक विकास तथा मनोरंजन के साथ-साथ बौद्धिक विकास, एकाग्रता वृद्धि, तर्कक्षमता विकास आदि की दृष्टि से भी अनेक भारतीय खेल उपयोगी हैं। शारीरिक शिक्षा के 5S सिद्धान &#8211; गति (Speed), बल (Strength), क्षमता (Stamina), कुशलता (Skill) तथा रणनीति (Strategy) के पाँचों गुणों को किसी भी परम्परागत भारतीय खेल में देखा जा सकता है।</li>
<li>अधिकांश भारतीय खेलों में कोई वाक्य, गीत की पंक्ति या संवाद जुड़ा रहता है। बहुत बार वह निरर्थक सा भी जान पड़ता है परन्तु यदि उसे ध्यान से सुना जाए तो उसमें से कोई प्राचीन संदर्भ, कुछ सिखाने का उद्देश्य, लयबद्धता, उत्साह सृजन आदि का स्वर सुनाई देता है। बुन्देलखण्ड और बृज के बच्चे खेलते समय ‘ओना मासी धम’ बोलते हैं जोकि ‘ॐ नमः सिद्धम्’ का बोलचाल में बिगड़ गया रूप ही है।</li>
<li>पहले से चले आ रहे परम्परागत खेलों के कोई कठोर, मान्यता प्राप्त नियम नहीं होने से स्थानीय आवश्यकता, साधनों की उपलब्धता, प्रतिभागियों की संख्या कम या अधिक होने पर तत्काल स्वरूप परिवर्तन किया जा सकता है। इससे बालकों में रचनात्मकता तथा तर्कक्षमता का विकास होता है। सब प्रतिभागी आपस में बातचीत और कभी कभी बहस कर के भी खेल के नियमों में बदलाव कर लेते हैं। विचारों में प्रारंभ में विरोध होने पर भी अंततः मिल-जुल कर लिए गए सामूहिक निर्णय पर सबकी सहमति और सबको पालन करना – यही तो लोकतंत्र का आधार है जो इन खेलों की सहायता से स्वत: विकसित होता है।</li>
<li>भारत विशाल देश हैं जिसमें क्षेत्रों-प्रान्तों में भाषा-भूषा-भोजन आदि में पर्याप्त विविधता देखी जाती है किन्तु एक राष्ट्र और संस्कृति के रूप में भारत में एकात्म भाव है, है यह बात भारत के परम्परागत खेलों में भी दिखाई देती है। भाषा-भेद के साथ अलग-अलग स्थानों पर उसी खेल का नाम अलग पाया जाता है। यह संस्कृति को व्यवहार में लाने का सशक्त माध्यम हैं।</li>
<li>परम्परागत भारतीय खेलों की एक तालिका उस टिप्पणी के साथ प्रस्तुत है, जिसमें खेलों का वर्गीकरण मैदान के खेल (outdoor) तथा कमरे के अंदर के खेल (indoor) के अतिरिक्त दो आधारों पर किया गया है :</li>
</ul>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6915" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Sadugudu_sadugude-300x185.jpg" alt="" width="1724" height="1063" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Sadugudu_sadugude-300x185.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/08/Sadugudu_sadugude.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;">(क) प्रान्त / क्षेत्र के आधार पर &#8211; संभावना है कि इनमें कुछ खेल ऐसे हो सकते हैं जिन्हें भाषा-भेद के कारण किसी अन्य प्रान्त में किसी दूसरे नाम से खेला जाता है। उदाहरण के लिए, पत्थरों की ढेरी को गेंद से मार कर गिराने और पुन: जमाने के खेल को पिट्टू, गेंदवड़ी, सुतौलिया भी कहा जाता है और कबड्डी को ‘हु-तू-तू’ भी।</p>
<p style="text-align: justify;">(ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में विद्यालयीन शिक्षा के जिस स्वरूप अर्थात् 5+3+3+4 का उल्लेख है, उसी आयु वर्ग के आधार पर। यद्यपि कोई भी खेल किसी भी आयु वर्ग द्वारा खेला जा सकता है किन्तु शारीरिक क्षमता तथा उस खेल के माध्यम से होने वाले शारीरिक मानसिक विकास को ध्यान में रख कर पहले 5 वर्ष को शिशु आयु वर्ग, दूसरे 3 को बाल वर्ग, तीसरे 3 को किशोर तथा चौथे 4 वर्ष को किशोर-तरुण आयु वर्ग के रूप में खेलों को सूचीबद्ध किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">आशा है, उपर्युक्त विवरण भारत के परम्परागत खेलों की शिक्षण माध्यम के रूप में उपयोगिता को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्र होगा। आज जब दुनियाँ भर में Back to Roots (जड़ों की ओर लौटो) का आह्‌वान किया जा रहा है, भारत की खेल परम्परा को भी नई पीढ़ी के संज्ञान तथा अभ्यास में लाने के लिए पाठ्यक्रम के साथ जोड़ कर जन-जन तक पहुंचाने की इस महत्वाकांक्षी योजना को अमल में लाया जाता निश्चय ही Rooted in culture, committed to progress युवा पीढ़ी के निर्माण में सहायक होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय महामंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/aap-ka-bacha-khelta-kab-hai/" target="_blank" rel="noopener">आपका बच्चा खेलता कब है?</a></span></strong></p>
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