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	<title>Children Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>Children Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>शिशु शिक्षा 39 – क्षमताओं का विकास</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Jun 2023 05:31:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
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		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ नम्रता दत्त &#160; शिशु के जीवन के प्रारम्भ्कि पांच वर्ष सीखने की नींव के वर्ष होते हैं। पांच वर्ष की यह सीख/शिक्षा सम्पूर्ण जीवन की नींव का कार्य करती&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">शिशु के जीवन के प्रारम्भ्कि पांच वर्ष सीखने की नींव के वर्ष होते हैं। पांच वर्ष की यह सीख/शिक्षा सम्पूर्ण जीवन की नींव का कार्य करती है। नींव मजबूत होगी तो भवन (जीवन) मजबूत होगा। अतः इस अवस्था में शिशु के विकास को समझकर ही उसे सही वातावरण दिया जा सकता है। सामान्यतः माता-पिता/परिवार के सदस्य शिशु को छोटा समझ कर उसे अपने ढंग से सिखाने का प्रयास करते हैं। परन्तु शिशु का महज शरीर ही छोटा है, उसकी अन्तःप्रेरणा बहुत बङी है। इसी के कारण वह एक साधक/योगी है। इस अन्तःप्रेरणा के कारण ही वह माँ की गोद से अपने पैरों पर चलना, स्वयं भोजन खाना, अपने भावों को हाव भाव के साथ व्यक्त करना (भाषा) आदि आदि &#8230;..सीखता है अर्थात् हाथ, पैर और वाणी की कर्मेन्द्रियों साधने का अखण्ड प्रयास करता है। शिशु की अन्तःप्रेरणा के बिना यह सब कार्य माता-पिता अनेकों प्रयास के बाद भी नहीं सीखा सकते। यह सब ही शिशु की कर्मेन्द्रियों के विकास की क्षमताएं हैं। कुछ क्षमताएं प्रत्यक्ष रूप से विकसित होती हैं जैसे शारीरिक एवं प्राणिक क्षमताएं (वृद्धि और विकास) और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से विकसित होती हैं जैसे, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक (अन्तःकरण को प्रभावित करने वाली) क्षमताएँ। इस सोपान में 3 से 5 वर्ष तक के शिशु की क्षमताओं के विकास की ही संक्षिप्त बात करेंगे। ये क्षमताएं पांच प्रकार की होती हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>
<h5>शारीरिक क्षमताएं, 2. प्राणिक क्षमताएं, 3. मानसिक क्षमताएं, 4. बौद्धिक क्षमताएं और 5. आध्यात्मिक क्षमताएं। इन क्षमताओं का विकास ही व्यक्तित्व विकास का एक पक्ष है, दूसरा पक्ष व्यष्टि से परमेष्ठि है। इसे व्यक्तित्व का पंचकोशीय विकास भी कहते हैं। आइए इन्हें क्रमशः समझते हैं &#8211;</h5>
</li>
<li>
<h5><strong> शारीरिक क्षमताएं अर्थात् अन्नमयकोश</strong> &#8211; शारीरिक क्षमताओं को सहजता से देखा और मापा जा सकता है क्योंकि यह प्रत्यक्ष दिखाई देतीं हैं। इस विकास को देखने के लिए माता-पिता को निम्न पक्षों के प्रति सजग रहना चाहिए &#8211;</h5>
</li>
</ol>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.1 वृद्धि</strong> &#8211; सामान्यतः शिशु की वृद्धि माता-पिता के वंशानुक्रम के अनुसार ही होती है। आयु के अनुसार उसकी ऊंचाई एवं वजन आदि को मापना चाहिए। &#8211;</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.2 बल</strong> &#8211; शिशु बहुत व्यस्त रहता है। स्व-विकास की अन्तःप्रेरणा के अनुसार वह कार्य ढूंढ ही लेता है। इन कार्यों को करने में उसे बल की आवश्यकता होती है। उसकी सक्रियता और निष्क्रियता ही इसका मापदण्ड है।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.3 लोच</strong> &#8211; विभिन्न अंगों एवं जोङों को हिलाने डुलाने में सहजता का अनुभव करना ही लोच और स्वस्थता की निशानी है।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.4 कुशलता</strong> &#8211; हाथ, पैर आदि से जुङे कार्यों को व्यवस्थित रूप से उचित गति से करना और अपने भावों को सही व्यक्त करना (भाषा) ही कुशलता का विकास है।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.5 निरामयता</strong> &#8211; शरीर के आन्तरिक अंग (पाचन, रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास आदि) ठीक से कार्य करते हों तो शिशु की शारीरिक क्षमताएं उचित दिशा में विकसित हो रही हैं।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.6 तितिक्षा</strong> &#8211; सर्दी, गर्मी, भूख-प्यास और थकान आदि को सहन करने की शक्ति को ही तितिक्षा कहते हैं। बल एवं निरामयता के कारण ही तितिक्षा का विकास होता है।</h5>
<p style="text-align: justify;">घर में बना आयु के अनुरूप पौष्टिक भोजन, शान्त वातावरण में सुखद बिस्तर पर ली गई भरपूर नींद, घर में किए गए घरेलू कार्य एवं मैदान में किए गए खेल आदि के रूप में किये गये व्यायाम से शारीरिक क्षमताओं का विकास होता है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-6761" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/52685364-300x200.webp" alt="शिशु शिक्षा 39 – क्षमताओं का विकास" width="1523" height="1015" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/52685364-300x200.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/52685364.webp 400w" sizes="(max-width: 1523px) 100vw, 1523px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अनौपचारिक शिक्षा</strong> &#8211; वैसे तो शारीरिक विकास के उपरोक्त मापदण्डों के अनुसार वृद्धि और विकास होना ही शारीरिक विकास है परन्तु इस अवस्था में ज्ञानेन्द्रियों को सही दिशा देना (अनुभव प्राप्ति हेतु) और प्राप्त अनुभव को अभिव्यक्त करने के लिए कर्मेन्द्रियों को सही वातावरण देना ही अनौपचारिक शिक्षा है। उदाहरण के लिए श्वेता अपने तीन वर्ष के बेटे और पांच वर्ष की बेटी को अपने साथ मन्दिर लेकर जाती है और जैसे पूजा अर्चना वह स्वयं करती है वैसे ही बच्चों को भी करने को कहती है। अतिथियों के आने पर वह स्वयं उन्हें सादर वंदन करती हैं और बच्चों को भी करने को कहती है। बच्चे जो भी आँख से देखते और कान से सुनकर अनुभव करते हैं वे उसकी अभिव्यक्ति अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ और वाणी) से करते हैं। अतः पहले करके दिखाना और फिर करने का मौका/वातावरण देना ही अनौपचारिक शिक्षा है। हाथ (पकङना, फेंकना, उछालना आदि), पैर (चलना, दौङना, कूदना आदि) वाणी (सुनकर, बोलकर और समझकर उचित जवाब देना) जैसी क्षमताओं को विकसित करने के लिए शिशुओं को सम्बन्धित गतिविधियां करने का अधिक से अधिक वातावरण देना चाहिए।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li><strong> प्राणिक (प्राणमयकोश) और 3. मानसिक क्षमताएं (मनोमयकोश)</strong> &#8211; तन और मन दोनों की स्वस्थता/विकास प्राणों पर ही निर्भर करता है। इसलिए प्राण केवल जीवित रहने का माध्यम ही नहीं है। प्राण बलवान नहीं तो बच्चा किसी को जोर से पुकार नहीं सकता। प्राण संतुलित न हों तो वह धीमे से कान में बात कह नहीं सकता। बीमार मनुष्य चिढचिढा हो जाता है अर्थात् उसका मन खराब रहता है ये हमने प्रत्यक्ष देखा है। साहसिक कार्य करने के लिए प्राण एकाग्र होना आवश्यक है। निर्भयता का गुण मन का होता है परन्तु निर्भयता प्राण बलवान होने से ही आती है। प्राण ही तन और मन को चलाने की ऊर्जा है। अतः प्राण बलवान, संतुलित और एकाग्र होंगे तो तन स्वस्थ और मन शान्त, एकाग्र और संवेदनशील/भावुक होगा। अतः बच्चे को अनावश्यक भय न दिखायें। इन सब क्षमताओं के विकास के लिए शिशु को कार्य करने का अवसर दें जैसे- रंग भरना, कोलाज बनाना, मिट्टी के खिलौने बनाना, ईंटों पर चलना, बाल्टी में गेंद फेंकना, अनुकूल ऊंचाई से कूदना, वजन उठाकर चलना, आदि। ऐसी गतिविधियों से शरीर, प्राण और मन तीनों की ही क्षमताएं विकसित होंगी।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">अगले सोपान में बौद्धिक (विज्ञानमयकोश) और आध्यात्मिक (आनन्दमयकोश) क्षमताओं के विकास की चर्चा करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : </strong><span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/culture-and-character-building/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 38 – संस्कार एवं चरित्र निर्माण</a></strong></span></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 37 – अनौपचारिक शिक्षा कैसे?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Apr 2023 11:25:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
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		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त सजीव सृष्टि का परिचय आज पार्थ की मम्मी को ऑफिस से घर लौटने में देर हो गई थी और तीन वर्ष के पार्थ ने रो रोकर घर&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-6541" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11-300x300.jpg" alt="" width="1467" height="1467" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11-300x300.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11-150x150.jpg 150w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11.jpg 523w" sizes="(max-width: 1467px) 100vw, 1467px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सजीव सृष्टि का परिचय</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आज पार्थ की मम्मी को ऑफिस से घर लौटने में देर हो गई थी और तीन वर्ष के पार्थ ने रो रोकर घर सिर पर उठा रखा था। परेशान होकर उसकी दादी मां उसे सोसायटी के पार्क में घुमाने ले गईं। शाम का समय था इसलिए पंछियों के झुंड आसमान में उङान भरते हुए अपने घोंसलों को लौट रहे थे। दादी ने जैसे ही उन पंछियों की तरफ पार्थ का ध्यान खिंचवाया तो उसकी रोने की आवाज धीरे-धीरे शान्त होने लगी। वह दादी की गोद से नीचे उतर गया और दादी को पंछी दिखाने लगा। फिर तो उसने बगीचे में उङती तितलियों का भी आनन्द लिया और पार्क में लगी हरी घास पर भी बैठकर खेलने लगा। उसकी मम्मी ने भी दादी को फोन करके बताया कि वह घर आ गई हैं। दादी ने पार्थ को घर चलने के लिए कहा परन्तु वह अब घर जाना नहीं चाहता था।</p>
<p style="text-align: justify;">यही है सजीव सृष्टि से आत्मीयता, जो शिशु को प्राकृतिक रूप से मिलती है। अबोध शिशु तो स्वाभाविक रूप से इस आत्मीयता में जीता है परन्तु अभिभावक उसे यह वातावरण देते ही नहीं। उनके पास समय का अभाव है या तो वह अपनी ही उलझनों में उलझे हैं। अतः वे बच्चे को पशु पक्षी भी मोबाइल पर ही दिखा देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कक्षा छट्ठी के बच्चे पिकनिक पर जाते हुए जब खेतों के पास से निकले तो खेत में फूलगोभी लगी हुई थी। वे देखकर बहुत खुश हुए और एक दूसरे को हैरानी से बताने लगे, देख, गोभी लगी हुई है। उनकी हैरानी के कारण का अनुमान तो आपने लगा ही लिया होगा और पुस्तक में पढकर भी 11 वर्ष का बच्चा कितना सीखता है इस बात का भी पता चल गया होगा। बस यही अन्तर है सजीव सृष्टि में और निर्जीव सृष्टि में। अतः जीवन में अनुभव हेतु सीखने का कार्य बाल्यावस्था में अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से ही संभव है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिशु के प्राकृतिक स्वभाव का लाभ उठाते हुए अभिभावकों को उसे प्रकृति (वृक्ष, वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी) दर्शन करवाना ही चाहिए। इसमें रहकर वह न केवल प्रसन्नता/आनन्द का अनुभव करता है बल्कि उसे उनके रहने, खाने और उनकी आवाज आदि के विषय में जानकारी भी होती है। प्रकृति का यह सानिध्य उसे प्रकृति/सृष्टि से प्रेम करने का संस्कार सीखाता है। हम सबको एक ही भगवान ने बनाया है यह भाव/संस्कार जागृत करता है। प्रकृति/सृष्टि से प्रेम का यह संस्कार उसे भविष्य में प्रकृति/सृष्टि को हानि पहुंचाने से बचाता है। भावी जीवन में यही संस्कार उसे स्व/स्वार्थ अथवा परिवार (छोटा स्वरूप) से ऊपर उठकर सम्पूर्ण सृष्टि एक परिवार है (वसुधैव कुटुम्बकम्) के भाव से जोङता है। काम छोटा सा है परन्तु संस्कार निर्माण की दृष्टि से इसके परिणाम बङे हैं। अतः जब भी संभव हो उसे प्राकृति के बीच में ले जाएं और उसके दर्शन कराकर उसे प्रत्येक (वृक्ष, वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी) और नदी, पहाङ, झरने, सूर्य-चन्द्रमा आदि के विषय में बताएं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-6542" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/JOPEG-JPEG-300x166.jpg" alt="" width="1724" height="954" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/JOPEG-JPEG-300x166.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/JOPEG-JPEG.jpg 500w" sizes="(max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मानव सृष्टि से परिचय</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जन्म के पश्चात् धीरे-धीरे शिशु का परिचय मानव सृष्टि से बढ़ता जाता है। जन्म के पश्चात वह केवल माता को जानता है, पिता को जानता है और फिर धीरे-धीरे परिवार के अन्यों सदस्यों को भी जानने लगता है। तीन वर्ष में विद्यालय में प्रवेश लेता है तो समाज के छोटे स्वरूप से जुङ जाता है। रिश्तों को समझने लगता है। अपने और अजनबी को पहचानने लगता है। ऐसे में सभी रिश्तों और स्थानीय वातावरण की अपनी मर्यादाएं हैं, ऐसा उसे व्यवहार के द्वारा सीखाने की आवश्यकता होती है। अतः उसके सीखने और समझने के लिए उसे उचित वातावरण देकर उचित संस्कार देने की आवश्यकता है। वह तो सब काम करके सीखना चाहता है, परन्तु परिवार के सदस्य उसे हर कार्य करने से रोक देते हैं। उसकी कर्मेन्द्रियां विकासशील हैं, उन्हें काम चाहिए। वह घरवालों को जो भी काम करते हुए देखता है वह करना चाहता है जैसे &#8211; मां यदि कपङों की तह लगा रही है तो वो तह लगाना चाहता है। परन्तु मां उसके हाथ से कपङे छीन लेती हैं। परिवार के सदस्यों को ऐसा नहीं करना चाहिए। उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसे छोटे छोटे कार्यों में सहयोगी बनाना चाहिए जैसे &#8211; भोजन के समय बर्तन रखना। सब्जियों को छांटकर अलग-अलग करना आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">छोटी छोटी संस्कारित कहानियों के माध्यम से उसे संस्कारित व्यवहार करना सीखाना चाहिए जैसे &#8211; अपने सामान का ध्यान रखना, उसे यथा स्थान रखना, बांटकर खाना, घर का बना भोजन खाना, अतिथियों का सत्कार करना आदि आदि। इन सबसे उसकी स्वयं तथा अन्यों (मानव सृष्टि ) के प्रति व्यवहारिक समझ विकसित होती है। इससे वह अनायास ही स्वावलम्बी, सहयोगी, स्वस्थ एवं संस्कारित होता जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके लिए परिवार के सदस्यों में भी अनुशासित दिनचर्या का पालन करने एवं घर को व्यवस्थित रखने के संस्कार होने आवश्यक हैं क्योंकि बच्चा अनुकरण से सीखता है। परिवार में यदि आतिथ्य सत्कार होता है और अतिथि को देव माना जाता है तो बच्चा भी यह संस्कार स्वतः ही धारण कर लेगा। इसी प्रकार धीरे-धीरे विद्यालय में कैसे रहना, मन्दिर में कैसे जाना, किसी रिश्तेदार के घर में कैसा व्यवहार करना, बगीचे में जाकर क्या क्या ध्यान रखना, दूसरों की वस्तु न लेना, सार्वजनिक सम्पति को नुकसान नहीं पहुंचाना, बङों का सम्मान करना जैसी बातें सीखाने की उचित अवस्था/आयु यही है। इसे ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारम्भिक बाल्यावस्था में ‘देखभाल’ कहा है। इस देखभाल में संस्कारित शिक्षा अन्तर्निहित है जो आगे चलकर शिक्षा का आधार बनेगी। इसीलिए यह अवस्था सीखने की नींव है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : </strong><strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/closest-experience-of-life-family-teacher-teaching/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 36 – जीवन का घनिष्ठतम अनुभव (परिवार/आचार्य शिक्षण)</a></span></strong></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 35 – अनौपचारिक शिक्षा क्या, क्यों और कैसे?</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/what-why-and-how-of-non-formal-education/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Feb 2023 11:43:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त गत सोपान में हमने जाना कि शिशु अवस्था (3 से 5 वर्ष) में शिक्षा का अर्थ पढ़ना-लिखना अर्थात् औपचारिक शिक्षा नहीं अपितु अनौपचारिक शिक्षा द्वारा सीखना होता&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6333" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/youtube-696x392-1-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/youtube-696x392-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/youtube-696x392-1.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p><strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-informal-and-formal-education/" target="_blank" rel="noopener">गत सोपान</a></span></strong> में हमने जाना कि शिशु अवस्था (3 से 5 वर्ष) में शिक्षा का अर्थ पढ़ना-लिखना अर्थात् औपचारिक शिक्षा नहीं अपितु अनौपचारिक शिक्षा द्वारा सीखना होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह अनौपचारिक शिक्षा है क्या, जिससे शिशु का 85 प्रतिशत विकास हो जाता है।</p>
<p>अनौपचारिक शिक्षा क्या और क्यों?</p>
<p>यह 85 प्रतिशत समग्र विकास भी वास्तव में है क्या, यह जानना भी भावी पीढी के निर्माताओं अर्थात माता-पिता और शिक्षकों को समझना अनिवार्य है। तब ही वे इस विकास को करने के लिए क्या करें, ऐसा समझने में सक्षम होंगे।</p>
<p>हम जानते हैं कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी होती है। इसीलिए आत्मा के संस्कार उसमें समाहित रहते हैं। एक आत्मा में पूर्व जन्म के संस्कार लगभग 70 प्रतिशत होते है, मात -पिता से प्राप्त संस्कार 20 प्रतिशत होते हैं और वातावरण से प्राप्त संस्कार 10 प्रतिशत होते हैं। जन्म के समय आत्मा को अपना पूर्व जन्म याद होता है, परन्तु कमेन्द्रियों के विकसित न होने के कारण उसके यह संस्कार उजागर नहीं हो पाते। लेकिन जैसे जैसे उसकी कर्मेन्द्रियां विकसित होने लगती हैं वे संस्कार उजागर होने लगते हैं। उन संस्कारों का उजागर होना भी अत्यन्त अनिवार्य हैं क्योकि ये संस्कार अच्छे और बुरे कैसे भी हो सकते हैं।</p>
<p>गर्भ में माता-पिता के संस्कार उसके पूर्व जन्मों के संस्कार को प्रभावित करते हैं, परन्तु संस्कारों को सही दिशा देने के लिए वातावरण द्वारा संस्कार देना सबसे श्रेष्ठकर है। इस आयु में वातावरण के 10 प्रतिशत संस्कारों के द्वारा भी उसके पूर्व जन्म के 70 प्रतिशत कुसंस्कारों को भी बदला जा सकता है क्योंकि इस आयु में चित्त की सक्रियता के कारण बच्चा नए संस्कारों को तत्काल और स्थायी रूप से ग्रहण कर लेता है।</p>
<p>यदि इन संस्कारों को उजागर होने का अवसर ही नहीं मिला तो वातावरण द्वारा इन्हें सुधारने का अवसर ही नहीं मिलेगा। वातावरण द्वारा श्रेष्ठ संस्कारों का निर्माण करना ही अनौपचारिक शिक्षा/सीखाना है। इसीलिए इस अवस्था में बच्चे को प्रेम, स्नेह और स्वतंत्रता में पालना चाहिए, ताकि उसके पूर्व जन्म के संस्कार सहजता से बाहर आ सकें।</p>
<p>इस समय में जब औपचारिक शिक्षा (पठन-लेखन) के बंधन में हम उसको बांध देते हैं तो ये संस्कार उजागर नहीं हो पाते और इनको उचित दिशा देने का अवसर ही नहीं मिल पाता। संस्कारों को मिली यही दिशा ही उसके चरित्र का निर्धारण करती है और जीवन जीने के दृष्टि देती है।</p>
<p>राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी प्रारम्भ्कि बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) को सीखने की नींव कहा क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार बच्चे के मस्तिष्क का 85 प्रतिशत विकास 6 वर्ष से पूर्व ही हो जाता है। प्रारम्भिक बाल्यावस्था (3 से 8) में इसको दो खण्डों में बांटा गया है &#8211; देखभाल (3 से 6 वर्ष) और शिक्षा (6 से 8 वर्ष, पूर्व प्राथमिक शिक्षा)। अतः स्पष्ट है कि 3 से 6 वर्ष में जो देखभाल करनी है वही अनौपचारिक शिक्षा कहलाती है और इसी से बच्चे में औपचारिक शिक्षा को ग्रहण करने की पात्रता विकसित होती है। इसमें स्वस्थ शरीर की देखभाल के साथ स्वस्थ संस्कार के प्रति भी देखभाल करना आवश्यक है क्योंकि जन्म से ही प्राप्त ज्ञानेन्द्रियों के साथ-साथ अब उसकी कर्मेन्द्रियों भी विकसित हो रही हैं जिसके कारण वह ज्ञानेन्द्रियों से जैसा भी अनुभव प्राप्त करता है, कर्मेन्द्रियों से तुरन्त उसकी अभिव्यक्ति कर देता है और यही अभिव्यक्ति उसका संस्कार बन जाती है।</p>
<p>जैसे दूध पीने की अवस्था में बच्चे को अन्न नहीं खिलाया जा सकता, वैसे ही 6 वर्ष से पूर्व उसको औपचारिक शिक्षा (पठन-लेखन) नहीं दी जा सकती। अज्ञानता वश ऐसा करने से उसके परिणाम विपरीत ही होंगे (गत सोपान में इसकी चर्चा की गई है)।</p>
<p>वास्तव में यह अवस्था संस्कार ग्रहण करने के लिए उपयोगी होती है क्योंकि इस समय सूक्ष्म बुद्धि की निष्क्रियता (यह 6 वर्ष की आयु में सक्रिय होती है) के कारण चित्त की सक्रियता रहती है और संस्कार चित्त पर ही होते हैं। सुसंस्कारों से सुसज्जित आत्मा ही आलौकित होती है। यह आलोक ही आत्मविश्वास का वाहक बनता है। इन संस्कारों के आधार पर ही चरित्र निर्माण होता है और चरित्र से ही भावी पीढ़ी श्रेष्ठ बनती है। इसीलिए कहा जाता है कि राष्ट्र का धन बैंकों में नहीं, विद्यालयों में होता है। संस्कार के अभाव में शिक्षा निरर्थक सिद्ध होती है। इसके अभाव में ही शिक्षित व्यक्ति भी भ्रष्टाचारी, व्याभिचारी, निर्दयी और स्वार्थी जैसे कुसंस्कारों से ग्रस्त हो जाता है। वह स्वार्थवश समाज एवं देश को छलता है। अतः संस्कारों के निर्माण की इस अवस्था पर सर्वप्रथम सचेत रहने की आवश्यकता है। इनके प्रति सचेत रहने वाले माता-पिता और शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता कहलाते हैं।</p>
<p>इसी शिशु/बाल मनोविज्ञान के कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इसे सीखने की नींव कहा है।</p>
<p>जैसे श्रेष्ठ भवन बनाने के लिए मजबूत नींव की आवश्यकता होती है वैसे ही जीवन जीने की कला सीखने के लिए संस्कारों की आवश्यकता होती है। औपचारिक शिक्षा (भाषा एवं  गणित) विषय विशेष का ज्ञान तो भावी स्वाध्याय कर ज्ञान और अर्जित अनुभव को आत्मसात करने के लिए है। परन्तु भावी जीवन जीने की कला का आधार अथवा नींव इसी शिशु अवस्था की देखभाल (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित) अर्थात् संस्कार निर्माण से ही होगी। जैसे कच्ची मिट्टी के बर्तन को भट्टी में पकाने के बाद सुधार नहीं किया जा सकता ऐसे ही इस अवस्था में चूक जाने के बाद सुधार की संभावना बिल्कुल ऐसे ही है जैसे खेती सूखने के बाद वर्षा का होना। इस प्रारम्भिक अवस्था में देखभाल करना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है और शिक्षा के इसके बाद का (ECCE)।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6335" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School-300x200.jpg" alt="" width="1722" height="1148" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School.jpg 1024w" sizes="auto, (max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p><strong>अनौपचारिक शिक्षा कैसे</strong><strong>?</strong></p>
<p>निम्नलिखित तीन विषयों एवं उपविषयों में अनौपचारिक गतिविधियों के माध्यम से देखभाल करके हम बच्चे का न केवल समग्र विकास कर सकते हैं बल्कि औपचारिक शिक्षा के लिए पूर्व तैयारी भी कर सकते हैं &#8211;</p>
<ol>
<li>
<h5><strong> जीवन का घनिष्ठत्तम अनुभव</strong></h5>
</li>
</ol>
<ul>
<li style="list-style-type: none;">
<ul>
<li>
<h5>पंचमहाभूत तत्वों का परिचय</h5>
</li>
<li>
<h5>पदार्थों के गुणधर्म का परिचय</h5>
</li>
<li>
<h5>ललित कलाओं का रसास्वादन</h5>
</li>
<li>
<h5>सजीव सृष्टि का परिचय</h5>
</li>
<li>
<h5>मानव सृष्टि का परिचय एवं आत्मीय सम्बन्ध</h5>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<ol start="2">
<li>
<h5><strong> संस्कार एवं चरित्र निर्माण</strong></h5>
</li>
</ol>
<ul>
<li style="list-style-type: none;">
<ul>
<li>
<h5>पूर्वजों का परिचय एवं उनसे प्रेरणा</h5>
</li>
<li>
<h5>संस्कृति का परिचय एवं उनसे प्रेरणा</h5>
</li>
<li>
<h5>सद्गुण एवं सदाचार</h5>
</li>
<li>
<h5>देशभक्ति</h5>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<ol start="3">
<li>
<h5><strong> क्षमताओं का विकास </strong></h5>
</li>
</ol>
<ul>
<li style="list-style-type: none;">
<ul>
<li>
<h5>शारीरिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>प्राणिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>मानसिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>बौद्धिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>चैतसिक विकास</h5>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<p>अगले सोपान से हम उपरोक्त विषयों पर क्रमशः चर्चा करेंगे।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-informal-and-formal-education/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 34 – अनौपचारिक व औपचारिक शिक्षा</a></span></strong></p>
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		<title>आचार्य विनोबा भावे और उनकी शिक्षक दृष्टि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jan 2023 06:40:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षा दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[aacharya vinobha bhawe]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य विनोबा भावे]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ सचिन अरुण जोशी आचार्य विनोबा भावे एक ऋषितुल्य व्यक्तित्व। केवल चिंतन ही नहीं अपितु चिंतनाधारित कृति ऐसी उनकी प्रगल्भता थी। विनोबाजी मूलतः महाराष्ट्र से थे पर उनका अधिकतम काल&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> सचिन अरुण जोशी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6181" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/17_04_2022-vinoba_bhave_jagran_22634658-300x247.jpg" alt="" width="1481" height="1219" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/17_04_2022-vinoba_bhave_jagran_22634658-300x247.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/17_04_2022-vinoba_bhave_jagran_22634658.jpg 650w" sizes="auto, (max-width: 1481px) 100vw, 1481px" /></p>
<p>आचार्य विनोबा भावे एक ऋषितुल्य व्यक्तित्व। केवल चिंतन ही नहीं अपितु चिंतनाधारित कृति ऐसी उनकी प्रगल्भता थी। विनोबाजी मूलतः महाराष्ट्र से थे पर उनका अधिकतम काल गुजरात में बीता। पदयात्रा के कारण उनका भ्रमण संपूर्ण भारतभर में हुआ। भारत भ्रमण की वजह से उनका अनेकानेक विषयों पर प्रभुत्व, हर तरह का ज्ञान और उस गहन अध्ययन के माध्यम से होने वाली कृति विनोबाजी के ज्ञान संदर्भ की विशेषता भी थी। विनोबाजी को श्रीमद्भगवगीता के प्रति विशेष लगाव था साथ ही शिक्षा का भी।</p>
<p>शिक्षा के संदर्भ में विनोबाजी की संकल्पनाएँ अत्यंत प्रगत और वस्तुनिष्ठ भी थी। विनोबाजी कहते है, &#8220;शिक्षा से कुछ नया निर्माण नहीं होता बल्कि जो विद्यार्थीयों में विद्यमान हैं उसी की जागृति करना इतना ही कार्य शिक्षा का है। विद्यार्थीयों के अंदर छुपे हुए पूर्णत्व की खोज कर उसके विकसन के लिए मदद करना ही शिक्षक का कर्तव्य होता है इतनी स्पष्ट धारणा उनकी शिक्षक के संदर्भ में थी।</p>
<p style="text-align: center;">त्वं नो अस्या अमतेरूत क्षुधो अभिशस्तेरव स्पृधि।</p>
<p style="text-align: center;">त्वं न ऊति तव चित्रया धिया शिक्षा शचिष्ठ गातुवित्।।</p>
<p>उपरोक्त संस्कृत श्लोक का अर्थ है, &#8220;हे शचिष्ठ गातुवित्, हे श्रेष्ठ शक्तिशाली मार्ग शोधक, हमारा अज्ञान, हमारी भूख और हमारी व्याधीयाँ दूर करने का रास्ता हमें दिखा। तू हमें उत्तम शिक्षा दे, बुद्धि,रक्षण शक्ति, उत्पादन शक्ति और तरह तरह की शक्ति तू प्रकट कर।&#8221; वेद में इस श्लोक का शिक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण स्थान है उससे अधिक शिक्षक के संदर्भ में है यह कहना अनुचित नहीं होगा। वेदों में शिक्षक को ‘गातुवित’ कहा गया है जिसका अर्थ है ‘मार्ग खोज के निकालनेवाला’। गातु मतलब गमन मार्ग और वित् मतलब खोज के निकालने वाला। शिक्षकों के लिए वेदों में आया हुआ यह एक अर्थपूर्ण शब्द है। मूलतः गुरूकूल परंपरा मानने वाले हिंदू संस्कृति में गुरू का स्थान अनन्य साधारण है। जो ज्ञान देता है वह अपना गुरू होता है यह हमारी प्राचीन पुरातन परंपरा है। अपने पास होने वाले ज्ञान के आधार पर समाज का भला हों यह सोच रखने वाला शिक्षक होता है, इसलिए शिक्षक का समाज में अनन्य साधारण महत्त्व है। शिक्षक पर भरोसा करने वाली ऐसी अपनी प्राचीन पुरातन परंपरा है। एक शिक्षक के नाते समाज बडे़ विश्वास के साथ शिक्षक की ओर देखता है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक शिक्षक का समाज में महत्त्व अनन्य साधारण है। इसी मुद्दे को लेकर विनोबाजी के शिक्षक संदर्भ में दृष्टि समझ लेने की बेहद आवश्यकता आज निर्माण हुई है।</p>
<p>एक बार महात्मा गांधी जी को किसी ने एक सवाल पूछा कि आप ऐसा कौन-सा कार्य करते हो? उस समय महात्मा जी ने कहा था कि मैं धागा कातना और बुनना ऐसे दो कार्य करता हूँ। इसी आधार पर विनोबाजी कहते है, &#8220;अगर मुझे किसी ने सवाल पूछा तो मैं कहूँगा कि मैं शिक्षक हूँ, पढ़ाने का कार्य करता हूँ। इस बात का स्पष्टीकरण विनोबाजी बडे़ सटीक तरीके से देते है, &#8220;मैनें 13 वर्ष पदयात्रा की। उसमें मैं अविरत चलत रहा और इस पदयात्रा में मैंने अगर कोई कार्य किया तो एक शिक्षक और विद्यार्थी का।&#8221; जो शिक्षक होता है वह विद्यार्थी होता है पर जो विद्यार्थी नहीं होता वह शिक्षक कदापि नहीं होता। इतने सरल शब्दों में उन्होंने शिक्षक का श्रेष्ठत्व विदित किया है। विनोबाजी कहते है कि मेरे जीवन में ऐसा एक भी दिन नहीं गया जिस दिन मैनें कुछ अध्ययन नहीं किया हों। यह अध्ययन नये ज्ञान के लिए था या पुराने ज्ञान की पुनरावृत्ति के लिए था। इतनी श्रद्धा विनोबा जी की शिक्षक नामक व्यक्तित्व पर थी।</p>
<p><strong>शिक्षक के लिए आवश्यक तीन गुण </strong></p>
<p>विद्यार्थीयों के माध्यम से समाज निर्माण करने वाले शिक्षक के संदर्भ में विचार करना आवश्यक हुआ तो ऐसा कह सकते हैं कि अनेक गुणों का समुच्चय होने वाला व्यक्तित्व याने अध्यापक। आचार्य विनोबा भावे शिक्षक के संदर्भ में कम से कम तीन गुणों की आवश्यकता प्रतिपादित करते है । ये तीन गुण निम्न स्वरूप के है &#8211;</p>
<p>१) शिक्षकों का विद्यार्थीयों के प्रति प्रेम होना चाहिए। वात्सल्य और प्रेम इन दो घटकों पर आधारित जिनका जीवन भरा हुआ होता है वहीं असल में शिक्षक हो सकता है। माता के पास जो वत्सलता और प्यार होता है, वहीं शिक्षक के पास होनी चाहिए ऐसा विनोबाजी कहते है।</p>
<p>२) शिक्षक सदैव अध्ययनशील होना चाहिए। विश्व सतत बदलता रहता है। इस बदलते युग में छात्रों को किस प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता है, वह ज्ञान विद्यार्थीयों को देकर अद्ययावत बनाना ही शिक्षक की मूल भूमिका होनी चाहिए। इसके लिए शिक्षक स्वयं निरंतर अध्ययनशील रहें ऐसा सुझाव विनोबाजी देते है।</p>
<p>३) अध्यापक को राजनीति से अलिप्त रहना चाहिए। राजनीति में न्याय-अन्याय, अपना-पराया ऐसी भावनाएँ होती है। शिक्षा क्षेत्र मात्र इससे अलग है। शिक्षा के क्षेत्र में सभी अपने ही होते हैं और यही सीख छात्रों को देनी होती है। जिसके कारण अध्यापक को पक्षीय राजनीति से अलिप्त रहना चाहिए ऐसा विनोबा जी का कहना है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6182" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/banner-11-300x178.png" alt="" width="1731" height="1027" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/banner-11-300x178.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/banner-11-1024x609.png 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/banner-11-768x457.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1731px) 100vw, 1731px" /></p>
<p><strong>मातृमुखेन शिक्षणम्</strong></p>
<p>आचार्य विनोबा जी ने शिक्षा का क्रम बताया है &#8211;</p>
<p>‘मातृमान’, ‘पितृमान’, ‘आचार्यमान’ अर्थात शिक्षा प्रथम माता से, बाद में पिता से और अंततः आचार्य  की ओर से देना चाहिए। बच्चों को बचपन की शिक्षा माता से प्राप्त होती है। बचपन में अच्छे संस्कार माता के द्वारा ही किये जा सकते हैं। अन्य कोई इतना कर सकते है कि नहीं यह बताया नहीं जा सकता। इसालिए विनोबाजी स्त्री-शिक्षा पर जोर देते है। स्त्री बच्चों को सीखाती है और बच्चे देश का भविष्य बनाते है इसलिए नारी शिक्षा की जरूरत बहुत ज्यादा है। यह बताते हुए विनोबाजी कहते है कि प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेदारी महिलाओं के हाथों में दिया जाना चाहिए इससे और अच्छा विकास होगा। किसी बालक से कैसे वर्तन करना यह स्त्री को बहूत अच्छे से मालुम होता है, इसलिए शिक्षा ‘मातृमुखेन’ हों ऐसा साधारण पर महत्त्वपूर्ण विचार विनोबाजी ने रखा है। महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘मातृहस्तेन् भोजनम्’ ऐसा वर मांगा था। उसी से संबंधित विनोबाजी ने शिक्षा के संदर्भ में ‘मातृमुखेन शिक्षणम्’ ऐसा विचार प्रस्तुत किया है। छोटे बच्चों के शिक्षा संदर्भ में विनोबाजी की जागरूकता इससे प्रतित होती है।</p>
<p><strong>शिक्षकों का दायित्व</strong></p>
<p>शिक्षकों के संदर्भा में पतंजली के कुछ मार्गदर्शक योगसूत्र है। अर्थात पतंजली ने शिक्षकों के लिए आचार्य शब्द का प्रयोग किया है। उसमें उन्होंने ईश्वरविषयक विचार रखा है। ईश्वर अपने पूर्व पुरूखों के गुरू है ऐसा पतंजली कहते है। &#8220;त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव&#8221; ऐसा अपने प्राचीन साहित्य में कहा गया है। किन्तु यहाँ ईश्वर गुरू है और गुरू के लक्षण क्या तो वह शिष्यों को स्वातंत्र्य देता है। उन्हें अनुभव से सीखने के लिए प्रवृत्त करता है। ‘अनुभव से शिक्षा’ यह विनोबा जी को अभिप्रेत है। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों एक दूसरे के आचरण से सीखते है। अर्थात जो दिया नहीं जाता वह शिक्षण.जो लिया नहीं जाता, जिसका हिसाब रखा जा सकता है अथवा कुछ नोंद की जा सकती है वह शिक्षा नहीं हो सकती। कँलरी का असली हिसाब कागज पे नहीं तो वह शरीर पर ही दिखता है। जो अनुभव लिया, खाया और पचाया गया वही असल में शिक्षा है ऐसा विनोबाजी कहते है।</p>
<p>विनोबाजी के अनुसार शिक्षा की गिनती नहीं की जा सकती। जीवन यही शिक्षण है अतः शिक्षकों ने जीवन के क्षेत्र में ही शिक्षा देनी चाहिए, ऐसा आग्रह विनोबाजी करते है। इसलिए विनोबाजी कुरूक्षेत्र का उदाहरण देते है। भगवान श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में अर्जून को भगवद्गीता बतायी। वैसे देखा जाए तो एकांत में भी यह भगवत् ज्ञान श्रीकृष्ण अर्जून को बता सकते थे परंतु वैसे न करते हुए जीवन की शिक्षा जीवन के क्षेत्र में ही देने के लिए और दी गई शिक्षा के द्वारा प्राप्त ज्ञान का अवबोध हो इसलिए प्रत्यक्ष जीवन के क्षेत्र का चयन भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। इसी प्रकार की जीवन शिक्षा ही विनोबाजी को महत्वपूर्ण लगती है ।</p>
<p>आज के शिक्षक इस व्यक्तित्त्व के संदर्भ में आचार्य यह शब्द प्रचलित है। आचार्य इस शब्द में ‘चर’ ऐसा धातु है और आ उपसर्ग है। अर्थात आचार्य इस शब्द का अर्थ आचरण से संदर्भ में है। आचार्य मतलब विनोबाजी के शब्दों में &#8220;जो आचरण करता है वह आचार्य&#8221;। जो भी पढा़ना है वह आचरण में लाना और औरों से आचरण करवाना ऐसा प्रत्यक्ष बोध जिस व्यक्तित्व से प्राप्त होता है उसे ‘आचार्य’ कहना चाहिए ऐसा विनोबाजी कहते है। ऐसे ही कर्तृत्ववान आचार्य के माध्यम से कर्तृत्ववान विद्यार्थी निर्माण होंगे और परिणामतः कर्तृत्ववान राष्ट्र का निर्माण बनेगा जो समाज जीवन की आवश्यकता है।</p>
<p>आचार्य विनोबाजी के अनुसार अपनी शिक्षा का मंत्र सच्चिदानंद ऐसा होना चाहिए। सत् इस कर्मयोग के सिवाय जीवन आगे बढ़ नही सकता। चित्त यह ज्ञानयोग जिसके सिवाय जीवन बन नही सकता और आनंद के सिवाय जीवन में कुछ भी रस नहीं रहता। जिस शिक्षा में सत्, चित् और आनंद इन तीनों का योग होता है वहीं सच्ची शिक्षा होती है। यही सच्ची शिक्षा देने वाली कर्तृत्ववान पीढ़ी शिक्षकों के माध्यम से निर्माण हों ऐसी अपेक्षा हम सब इस माध्यम से करेंगे।</p>
<p>(लेखक आचार्य विनोबा भावे साहित्य के अभ्यासक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें :  </strong><span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/jagdish-chandra-basu-bharatiya-scientist-in-the-sky-of-science/" target="_blank" rel="noopener">जगदीशचंद्र बसु – विज्ञान के आकाश में भारतीय पुरोधा</a></strong></span></p>
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		<title>अनमोल भूमि अमर बलिदान</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Dec 2022 11:55:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[chaar sahib zaade]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[guru gobind singh]]></category>
		<category><![CDATA[idnian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[चार साहिब जादे]]></category>
		<category><![CDATA[चार साहिब जाड़े]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>राघव अभी केवल नौ वर्ष का था। प्रतिदिन अपने ताऊ जी और उनके बेटे माधव के साथ नियमित शाखा जाता।  ताऊ जी ने आज बाल स्वयंसेवकों के साहस के सच्चे&#8230; </p>
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<p>राघव अभी केवल नौ वर्ष का था। प्रतिदिन अपने ताऊ जी और उनके बेटे माधव के साथ नियमित शाखा जाता।  ताऊ जी ने आज बाल स्वयंसेवकों के साहस के सच्चे प्रसंग सुनाए थे शाखा से लौटते समय बातचीत इसी विषय पर चल रही थी।</p>
<p>तब तक घर आ गया था। वे आँगन में अमरूद के पेड़ नीचे बिछी खाट पर बैठ गए। घर महानगर की कालोनी में था पर घर के कई ठाठ अब भी बिल्कुल देशी थे। यह खाट और दूध दलिया या ऐसा ही कुछ अल्पाहार सब साथ साथ करते थे।</p>
<p>ताऊ जी कह रहे थे “बच्चे निश्चय कर लें तो बड़ा काम भी सरलता से कर जाते हैं। ‘लवकुश, ध्रुव प्रह्लाद बनें हम’ प्रतिदिन प्रार्थना में गाते हो न? ये ऐसे ही बच्चे थे जिन्होंने असंभव से दिखने वाले कठिन काम सरलता से कर दिखाए थे।”</p>
<p>“हाँ,सुनी हैं मैंने इनकी कहानियाँ, पर ये बहुत पुराने, अलग जमाने की बातें हैं, लव-कुश तो भगवान के बेटे थे और ध्रुव, प्रह्लाद राजाओं के।” राघव ने कहा।</p>
<p>“और वीर अभिमन्यु? खैर तुम कहोगे यह तो भगवान कृष्ण का भानजा था पर राजकुमारी मैना, पृथ्वीसिंह, हकीकत राय, बिशनसिंह कूका, बाजी राऊत, और भी ऐसे सैकड़ों नाम तो वर्तमान युग के ही हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए, देश-धर्म के लिए अपने बलिदान से दिखा दिया कि शेर के बच्चे छोटे भी हों तो शेर ही होते हैं।” ताऊ जी कहते-कहते आसमान की ओर देखने लगे, मानो इन सबकी कहानियाँ लिखी हैं वहाँ और वे उन्हें स्पष्ट पढ़ पा रहे हैं। फिर जैसे कुछ याद करते हुए बोले “अच्छा चलो। सब जल्दी नहा-धोकर तैयार हो जाओ, आज सब गुरुद्वारे चलेंगे।”</p>
<p>“गुरुद्वारे क्यों? आज न तो गुरुनानक देव जी की जयंती है न गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान दिवस, गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व भी अगले माह है।” माधव ने जिज्ञासापूर्वक पूछा।</p>
<p>“हाँ, पर गुरुद्वारे तो कभी भी जा सकते हैं न? वैसे तो आज भी एक विशेष दिन है इसीलिए सबको ले जाना चाहता हूँ। आज है 26 दिसंबर, वीर बाल दिवस।</p>
<p>दशम गुरु श्री गोबिंदसिंह जी महाराज के दोनों छोटे साहबजादे बाबा फतेहसिंह और बाबा जोरावरसिंह के महान बलिदान का दिन।” कहते कहते ताऊ जी भावुक हो उठे।</p>
<p>“फतेहसिंह जी बड़े थे या जोरावरसिंह जी?” माधव ने पूछ लिया।</p>
<p>“बड़े तो बाबा जोरावर सिंह जी थे पर मैंने बाबा फतेहसिंह जी का नाम पहले ले लिया, यही सोच रहे हो न? बताऊँगा, आज सब बताऊँगा, पर पहले गुरुद्वारा चलेंगे।” ताऊ जी से इन वीर बालकों के संबंध में कुछ जानने को मिलेगा यह जानकर दोनों भाइयों में बिजली जैसी फुर्ती आ गई। बहिन रोहिणी और राघव की माँ और ताईजी भी झटपट तैयार हो गईं। गुरुद्वारे जाना हो या जैन मंदिर अथवा बौद्ध विहार वे सपरिवार ही जाते थे हाँ आज राघव के पिता किसी काम से नगर के बाहर होने से अवश्य अनुपस्थित थे। घर में राम, कृष्ण, शिव, गणपति, दुर्गा सबकी पूजा होती पर नानक, बुद्ध, महावीर भी आपने ही आराध्य हैं ऐसा उदार एकात्म हिंदुत्वभाव संघ के कारण परिवार में सहजता से आ चुका था। वे और कहीं जाते तो प्रायः भोजन घर से बनाकर ले जाते पर गुरुद्वारे में तो लंगर छकने का विशेष ही आनंद होता इसी से महिलाएँ भी फटाफट तैयार हो लीं।</p>
<p>गुरुद्वारे के प्रांगण में ताऊ जी  ने सुनाया “श्री गुरु गोबिंदसिंह जी के चार पुत्र थे। नाम थे अजीतसिंह, जूझारसिंह, जोरावरसिंह और सबसे छोटे फतेहसिंह। श्रीगुरु गोबिंदसिंह जी के पिता श्री गुरु तेगबहादुर जी ने तो धर्मरक्षा के लिए बलिदान दिया ही था उनके अपने चारों बेटों को भी देश धर्म पर सब कुछ न्यौछावर कर देने के संस्कार दिए थे।”</p>
<p>“तो वे भी स्वयंसेवक थे?” छोटी रोहिणी ने पूछा।</p>
<p>“नहीं रे! यह तो सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी की बात है और संघ की स्थापना तो बहुत बाद में 1925 में हुई।” माधव ने समझाया।</p>
<p>“लेकिन संघ हिन्दु संस्कृति के.ऐसे सारे महान व्यक्तियों के जीवन से संस्कार एवं प्रेरणा लेकर ही बना है।” ताऊ जी  ने और स्पष्ट किया।</p>
<p>राघव को कहानी का रुकना अच्छा नहीं लग रहा था उसने बहिन से कहा “और कुछ पूछना है? मैं सब समझा दूँगा पर बाद में, पहले कहानी। ठीक है? “राघव की बात पर सब मुस्कुराने लगे पर ताऊ जी ने संकेत से उन्हें हँसने से रोक दिया। वे जानते थे बच्चों की जिज्ञासा को दबाना नहीं चाहिए। फिर भी राघव की उत्सुकता भी अनुचित न थी, यह भी वे समझ रहे थे।</p>
<p>ताऊ जी ने कहानी आगे बढ़ाई “उस समय देश पर क्रूर शासक औरंगजेब का आतंक छाया हुआ था। वह हिन्दुओं का घोर विरोधी था। सिखों की धर्मरक्षक गतिविधियाँ उसे खूब खटकती रहतीं। छत्रपति शिवाजी महाराज ने उधर दक्षिण में उसके नाको चने चबवा रखे थे तो श्रीगुरु गोबिंदसिंह जी इधर धर्म की अभेद्य ढाल बने हुए थे। दिल्ली में आज जहाँ गुरुद्वारा शीशगंज साहिब है वहीं गुरु तेगबहादुर जी धर्मरक्षा में अपना शीश भेंट चढ़ा चुके थे। लगभग एक वर्ष पहले यानि दिसंबर 1704 में ही चमकोर के युद्ध में गुरुजी के दोनों बड़े पुत्र बाबा अजीतसिंह जी और जूझार सिंह जी बलिदान हो चुके थे।</p>
<p>बात सन् 1705 की है। आनंदपुर साहिब की गढ़ी में गुरुजी सपरिवार अपने साथियों सहित औरंगजेब की सेना से घिरे हुए थे। अन्न भंडार समाप्त हो चुके थे। औरंगजेब ने एक कपटभरा प्रस्ताव दिया कि गुरुजी यदि गढ़ी छोड़ दें तो उनके साथियों सहित सुरक्षित जा सकते हैं। गुरुजी को यहाँ घिरकर भूखे-प्यासे मर जाने की अपेक्षा बाहर निकल कर देश-धर्म की रक्षा हेतु उपाय करना ठीक लगा। वे बाहर निकले पर चालबाज दुष्ट औरंगजेब की सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया। इस धोखे से हुए आक्रमण से गुरुजी का दल बिखर गया। दोनों छोटे बालक बाबा जोरावरसिंह जी और बाबा फतेहसिंह जी माता गुजरी जी के साथ भटक गए।”</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6112" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/mata-gujri-e1482950786644-300x178.jpg" alt="" width="1454" height="863" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/mata-gujri-e1482950786644-300x178.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/mata-gujri-e1482950786644-768x456.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/mata-gujri-e1482950786644.jpg 774w" sizes="auto, (max-width: 1454px) 100vw, 1454px" /></p>
<p>“माता गुजरी कौन थीं?” इस बार प्रश्न माधव की माता जी ने किया।</p>
<p>“माता गुजरी गुरुगोबिंदसिंह जी की माँ साहेब, इन बच्चों की 80 वर्ष की वृद्धा दादी थीं और तब जोरावरसिंह की आयु थी नौ वर्ष और फतेह सिंह की मात्र छः-सात वर्ष।” ताऊ जी ने बताया तो माँ का हाथ अपने आप राघव के सिर पर घूम गया।</p>
<p>ताऊ जी आगे कहने लगे “दादी पोतों ने एक रसोइये गंगूराम के घर सरहिन्द में शरण ली। वहाँ नवाब वजीर खान शासन करता था। पैसों के लालच में गंगू ने इन दादी पोतों को पकड़वा दिया। सरहिन्द की गढ़ी के बेहद ठंडे बुर्ज पर दिसंबर की हाड़ कँपाती भयानक ठंड में यह वृद्धा महिला और छोटे बच्चे बंदी करके रखे गए।”</p>
<p>‘अगर तुम इस्लाम कबूल कर लो तो तुम्हारी जान बख्श कर तुम्हे ईनाम भी देंगे।’ उस दिन वजीरखान रौबदार आवाज में कह रहा था। उसके दरबार में दोनों बच्चे अपराधियों के रूप में खड़े किए गए थे।</p>
<p>‘हम सिखी नहीं छोड़ेंगे अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे’ सिंह के बच्चों ने निडर उत्तर सुना दिया। विधर्मी औरंगजेब की गुलामी न स्वीकारने के लिए वजीरखान ने सजा सुनाई ‘इन गुस्ताख़ लड़कों को जिन्दा ही दीवार में चुनवा दिया जाए।’ और यह तत्काल किया जाने लगा।</p>
<p>चुनते-चुनते दीवार छोटे-से फतेहसिंह के गले तक आ गई तो उसने देखा बड़े भाई की आँखें छलक उठीं हैं। वह आश्चर्य से पूछ बैठा ‘भाई! डर लग रहा है क्या?’</p>
<p>‘नहीं रे! हम अपने पिताजी और दादाजी की गौरवशाली परंपरा के बच्चे हैं हम मौत से नहीं डरते मौत हम से डरती होगी। मेरी आँखें तो यह सोचकर भर आईं कि तुम छोटे हो पर मुझसे पहले तुम देश धर्म पर बलिदान हो रहे हो, मेरी श्वासें बाद में रोकेंगी।’</p>
<p>ताऊ जी आँखे पोंछते पल भर रुके। भर्राए गले से शब्द नहीं फूट रहे थे। आँखें सबकी भीग रही थीं। ताऊ जी ने धीरे से कहा “अब समझे सुबह मेरे मुँह से फतेहसिंह का पहले क्यों आ गया था। इन्हीं वीर बालकों से प्रेरणा लेने हेतु 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ मनाया जाता है।”</p>
<p>“गुरुपुत्रों की यह पवित्र बलिदान स्थली बाद में हिंदुओं ने प्राप्त करना चाही तो मुगलों ने साफ मना कर दिया। फिर दीवान टोडरमल जी ने मुँहमाँगी कीमत देने का लालच दिया तो ‘जितनी जमीन सोने की मुहरों से ढँक सको उतनी तुम्हारी’ की शर्त पर प्राप्त यह स्वर्ग से भी पवित्र भूमि कर सके। बच्चो! वीर बालकों के पवित्र बलिदान की यह भूमि संसार की सबसे मूल्यवान भूमि है। पंजाब के सरहिन्द नामक स्थान पर गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब आज भी संसारभर का पावन तीर्थ और प्रेरणास्थल बना हुआ है।”</p>
<p>ताऊ जी उठने लगे तो राघव और रोहिणी ने उन्हें उठने न दिया। एक शर्त उनकी भी थी “आप हमें सरहिन्द अवश्य ले जाएँगे इन्हीं छुट्टियों में।” ताऊ जी द्वारा मना करने का तो प्रश्न ही न था।</p>
<p>(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-inspiration-for-the-youth-is-the-sacrifice-of-the-gurus-sons-for-the-country-and-religion/" target="_blank" rel="noopener">युवाओं के लिए प्रेरणा है देश-धर्म के लिए गुरु पुत्रों का बलिदान</a></span></strong></p>
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		<title>अध्ययन क्या है?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Jun 2022 05:34:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Ecucation]]></category>
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		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर अभ्यास ‘अभ्यास’, ‘अध्ययन’ अध्ययन। यह अभ्यास- अध्ययन क्या है? इन शब्दों का उच्चारण दिन रात होता है। शिक्षकों द्वारा तैयार उत्तर रट कर याद कर लेना,&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5454" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/sl_05_fig003-300x210.jpg" alt="" width="1237" height="866" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/sl_05_fig003-300x210.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/sl_05_fig003.jpg 512w" sizes="auto, (max-width: 1237px) 100vw, 1237px" /></p>
<p>अभ्यास ‘अभ्यास’, ‘अध्ययन’ अध्ययन।</p>
<p>यह अभ्यास- अध्ययन क्या है? इन शब्दों का उच्चारण दिन रात होता है। शिक्षकों द्वारा तैयार उत्तर रट कर याद कर लेना, क्या यही अभ्यास-अध्ययन है?</p>
<p>एक स्थान में बैठकर, पुस्तकों में सिर घुसाकर &#8230;.. समझे या ना समझे&#8230;&#8230;. पढ़ते रहना- क्या यही है अध्ययन? कुछ लोगों की धारणा के अनुसार प्रश्नों के उत्तर अनेक बार लिखना ही अध्ययन है, अभ्यास है।</p>
<p>प्रथम और सरल अर्थ है अच्छी’ आस’ &#8230;.. इच्छा। इच्छा तो अच्छी ही होनी चाहिए। इच्छा अच्छी होगी तो फल प्राप्ति भी अच्छी होगी। यह बात मन में बार बार दोहराने पर तनाव दूर होगा। अभ्यास अर्थात श्रम, झंझट जैसा अनुभव नहीं होगा। अध्ययन को ’ स्वाध्याय ’ भी कहते हैं। अर्थात स्व का अध्ययन &#8211; ‘स्वेन अधियते इति स्वाध्यायम।’</p>
<p>हम यदि स्वयं से प्रश्न पूछें, और स्वयं समझ लें तो अध्ययन के जड़ में मूल में पहुंचना आसान होगा।</p>
<p>मुझे अध्ययन पसंद है क्या? मैं स्वयं अध्ययन करता हूं क्या?  मैं अभ्यास किस प्रकार से करता हूं? कुछ भिन्न प्रकार से कर सकता हूं क्या? किस समय पर अभ्यास बेहतर होता है? मैं जब अभ्यास करता हूं तो क्या करता हूं? ये और इस प्रकार के अनेक प्रश्न स्वयं को पूछते रहने पर अभ्यास का अर्थ समझ में आने लगेगा।</p>
<p>अभ्यास /अध्ययन मतलब सभी प्रकार से देखना, परखना, जांचना, करके देखना। अभ्यास का अर्थ है आदत डालना। ‘केले चि करावे’ (मराठी)। अर्थात एक बार किया हुआ अनेक बार करना।</p>
<p>पावलो सारासाते एक स्पेनिश संगीतकार हैं। उसके एक संगीत कार्यक्रम में श्रोता मंत्रमुग्ध हुए और मुहँ से प्रशंसोद्गार निकले &#8211; जीनियस!!</p>
<p>इस पर संगीतकार बोला &#8211; <strong>A genius! For thirty</strong><strong>&#8211;</strong><strong>seven years I have practiced fourteen hours a day, and now they call me genius!</strong></p>
<p>सैंतीस साल तक प्रतिदिन चौदह घंटे रियाज &#8211; अभ्यास करने के उपरान्त पावलो एक श्रेष्ठ संगीतकार बना।</p>
<p>हॉलमन हैट एक महान कलाकार केवल हाथ से वलय रेखता था। वह इतना अचूक होता कि वलय निकालने के लिए वे केवल पेंसिल अथवा पेन या चाक का ही उपयोग करते थे, कंपाश या किसी अन्य साधन का नहीं। फिर भी circle perfect एक बार किसी ने उनसे पूछा-मिस्टर “हैट, आपके समान ही क्या हम अचूक वलय का रेखांटन कर सकेंगे?”</p>
<p>हैट ने प्रश्नकर्ता को उत्तर दिया-”हां, हां! क्यों नहीं, मेरे समान अन्य कोई भी वलयाकृति बना सकता है।”</p>
<p>प्रश्नकर्ता बहुत प्रफुल्लित हुआ, हॉलमन ने प्रश्नकर्ता के चेहरे पर आश्चर्य और प्रसन्नता का भाव देखा और कहा- “मैं गत चालीस वर्षों से इस हेतु प्रतिदिन आठ घंटे प्रयासरत हूं! कितनी तपश्चर्या!!”</p>
<p>सन 2007 के भारत-आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट मैंच में ब्रेड हाग &#8211; एक नए बालर ने क्रिकेट के सम्राट भारतीय बल्लेबाज, सचिन तेंदुलकर को क्लीन बोल्ड आउट किया, आउट होने के पश्चात सचिन जब जा रहे थे तो दौड़ते हुए वहीं गेंद लेकर आया, और गेंद को सचिन के समक्ष पकड़कर बोला- “सर आज का दिन, मेरे जीवन का सुनहरा दिन है। कृपया इस गेंद पर आप अपने हस्ताक्षर करे तो आभारी रहूंगा!”</p>
<p>सचिन ने गेंद अपने हाथ में लिया और उस पर लिखा-</p>
<p>“ऐसा दिन तुम्हारे जीवन में दुबारा कभी नहीं आएगा”।</p>
<p>तत्पश्चात सचिन और ब्रेड लगभग तीस-पैंतीस बार मैदान में आमने सामने हुए परन्तु ब्रेड सचिन को दुबारा आउट कभी भी नहीं कर पाए।</p>
<p>क्या यह संयोग वश हुआ? या सहज ही घटित हुआ?</p>
<p>बिल्कुल नहीं। सचिन ने अपनी खेल शैली, खेल पद्धति, गलतियों का, सामने वाले बालर खिलाड़ी का गहन अध्ययन किया, अभ्यास किया, तब यह संभव हुआ।</p>
<p>इसीलिए संत तुकाराम कहते है (मराठी में)-</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5455" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/navbharat-times-300x224.webp" alt="" width="1221" height="912" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/navbharat-times-300x224.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/navbharat-times.webp 700w" sizes="auto, (max-width: 1221px) 100vw, 1221px" /></p>
<p><strong>असाध्य ते साध्य</strong><strong>, करिता सायास, कारण अभ्यास, तुका म्हणे,!!</strong></p>
<p>अत्यंत सावधानी पूर्वक, सतर्कता से, किसी बात को केवल देखना ही नहीं, वरन सूक्ष्म निरीक्षण करना है ‘अभ्यास’, ‘अध्ययन’।</p>
<p>पढ़ी हुई बात, सीखी हुई बात का प्रत्यक्ष प्रयोग कर देखना, परखना है अभ्यास! केवल ऊपरी तौर पर सुनना ठीक नहीं। ठीक से, समझकर श्रवण करना है अभ्यास प्रत्येक बार, उसी बात को दोबारा करते हुए, पहले की अपेक्षा बेहतर करने का लक्ष्य है अभ्यास! कोई भी घटना कैसे घटी, क्यों घटी, यह जांचना परखना है अभ्यास!</p>
<p>सतत अभ्यास करने की आदत होने पर दृष्टि अभ्यास मय हो जाती है। सहजता प्राप्त होती है। आलस्य, चिड़चिड़ापन तनाव दूर हो जाता है। अभ्यास एक स्वभाव बन जाता है।</p>
<p><em>मेरे लिए भी अभ्यास स्वभाव बने ऐसी आस!!</em></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/what-does-education-mean-papa/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षण मतलब क्या पापा?</a></strong></span></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 27 &#8211; एक से तीन वर्ष के शिशुओं की माताओं का शिक्षण-1</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jun 2022 07:23:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Child]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Mother and Child]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[shishu shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; नम्रता दत्त शिशु की स्वाभाविक विशेषताएं एक वर्ष से भी कुछ अधिक समय से हम निरन्तर शिशु शिक्षा का अध्ययन कर रहे हैं। शिशु शिक्षा गर्भावस्था से भी पूर्व&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5420" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/360_F_253441523_m2k3RO2WLZBh3ek3xk9KxhmrQEyhqVZT-300x200.jpg" alt="" width="1214" height="809" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/360_F_253441523_m2k3RO2WLZBh3ek3xk9KxhmrQEyhqVZT-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/360_F_253441523_m2k3RO2WLZBh3ek3xk9KxhmrQEyhqVZT.jpg 540w" sizes="auto, (max-width: 1214px) 100vw, 1214px" /></p>
<p><strong>शिशु की स्वाभाविक विशेषताएं</strong></p>
<p>एक वर्ष से भी कुछ अधिक समय से हम निरन्तर शिशु शिक्षा का अध्ययन कर रहे हैं। शिशु शिक्षा गर्भावस्था से भी पूर्व प्रारम्भ होती है, कैसे? इसका अध्ययन करते करते हमने गर्भावस्था के नौ मास का भी अध्ययन किया और जन्म से एक वर्ष के शिशु की शिक्षा के विषय में भी अध्ययन किया है।</p>
<p>इस श्रृंखला में हम शिशु की एक वर्ष से लेकर तीन वर्ष की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन करेंगे। यह विभिन्न अवस्थायें शिशु शिक्षा में किस प्रकार सहायक होती हैं, इस पर भी हम ध्यान देंगे और स्व-चिंतन के आधार पर उन्हें स्वीकार एवं धारण भी करेंगे।</p>
<p>इस श्रृंखला के प्रथम सोपान में एक से तीन वर्ष के शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं पर बात करेंगे। सम्भवतः सोपानों के नाम पहले जैसे ही हो सकते हैं, परन्तु इस बात का ध्यान रखें कि अवस्था (आयु) के विकास के साथ साथ शिशु के स्वभाव में परिवर्तन आना अपेक्षित है। अतः प्रत्येक अवस्था में स्वाभाविक विशेषताएं का अलग अलग होना निश्चित ही है।</p>
<p>शिशु को भगवान का स्वरूप उसकी स्वाभाविक विशेषताओं के कारण ही कहा जाता है। भगवान की ही भांति उसका स्वभाव निर्दोष, निर्मल और वात्सल्यमयी होता है। अन्तर केवल इतना है कि भगवान स्वावलम्बी हैं, सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं, परन्तु शिशु परावलम्बी (dependent) है। वह अन्तःप्रेरणा (self-inspiration) से अन्यों के सहयोग के माध्यम से स्वयं को स्वावलम्बी (independent) बनाना चाहता है। अन्तःकरण की यह प्रेरणा ही उसके स्वालंबन अर्थात् विकास का कारक बनती है।</p>
<p><strong>शिशु की स्वाभाविक विशेषताएँ</strong></p>
<ol>
<li style="text-align: justify;"><strong>संस्कार</strong> &#8211; इस अवस्था में शिशु की ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय होती हैं जबकि कर्मेन्द्रियां विकासशील होती हैं। ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता के कारण उसका अन्तःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार एवं चित्त) भी सक्रिय होता है। अन्तःकरण में भी मन, बुद्धि की अपेक्षा चित्त की सक्रियता अत्यधिक होती है। ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता के कारण वह जो कुछ भी अपने आसपास के वातावरण में देखता, सुनता है उसकी गहरी छाप सीधी उसके चित्त पर पङ जाती है और यही छाप भविष्य में संस्कार बन जाती है। अतः शिशु की इस स्वाभाविक विशेषता को ध्यान में रखते हुए माता-पिता एवं परिवार का यह दायित्व बनता है कि वे घर के वातावरण को संस्कारक्षम बनाएं।</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>जिज्ञासा</strong> &#8211; रमन ने अपने ढाई वर्ष के बेटे पंकज को एक चाबी वाली लाल रंग की कार दिलवाई। कार के दरवाजें बन्द थे और खिङकियों पर गहरे रंग के प्लास्टिक के शीशे लगे हुए थे। रमन से वह बार बार उसमें चाबी भरवाने आता। रमन परेशान हो गयी और उसने कहा जाओ खुद ही चलाओ। थोङी देर बेटे की आवाज न आने पर उसने कमरे में जाकर देखा तो कार का दरवाजा और खिङकी टूटे हुए थे। उसने गुस्से से पूछा- यह क्या किया? पंकज ने सहमते हुए कहा &#8211; मैं देख रहा था कि इसमें ड्राइवर कहां बैठा है? पंकज ने अपनी आंखों (ज्ञानेन्द्रिय) से अपने पापा को कार चलाते देखा था। वह जानता था कि कार में चाबी लगाने के बाद भी पापा ही सीट पर बैठ कर कार चलाते हैं। उसकी कार चाबी से कैसे चल रही है? शिशु की बुद्धि इस समय सक्रिय नहीं होती। परन्तु अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभवों की जिज्ञासा को वह निरीक्षण-परीक्षण के आधार पर शांत करना चाहता है। इसलिए वह प्रश्न करता है और तोङ फोङ भी करता है। उसकी जिज्ञासा का समाधान ही उसके विकास का माध्यम बनता है।</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>पुनरावर्तन अर्थात् एक ही क्रिया को बार बार करना</strong> &#8211; शिशु स्वावलम्बी बनना चाहता है। स्वावलम्बी बनने के लिए उसे अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर और वाणी) को सक्रिय करना है। इसका अर्थ है हाथ, पैर और वाणी से होने वाले सभी कार्यों का उसे अभ्यास करना है। और अभ्यास करने के लिए बार बार एक ही क्रिया को करना ही पङता है। यह पुनरावर्तन वह अन्तःप्रेरणा (self-inspiration) से ही करता है। जैसे- चलने का अभ्यास करने के लिए वह बार बार गिरता है परन्तु बार बार उठकर चलता है, जब तक वह अपना संतुलन बनाना और चलना नहीं सीख जाता। ऐसा ही अन्य क्रियाओं में भी सिद्धि (expertization) प्राप्त करने के लिए करता है। इसीलिए उसे सिद्ध अथवा योगी भी कहा जाता है।</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>सक्रियता</strong> &#8211; शिशु कभी भी खाली नहीं बैठता। वह हर क्रिया को खेल ही समझता है और खेल खेल में ही अपना विकास स्वयं कर लेता है। उसके ऐसे गुण को सही दिशा देने के लिए माता-पिता को उसे उपयोगी क्रिया करने का सहज वातावरण एवं प्रेमपूर्ण सहयोग देना चाहिए। अपनी इच्छा के अनुरूप कोई भी क्रिया को जबरदस्ती उसे करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए और न ही उसे लालच देना चाहिए। क्रिया उसे सहज लगेगी और वह खेल के रूप में उसे आनन्दित होकर करेगा तो उसका विकास अधिक होगा।</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>निरुद्देश्य अथवा निष्काम क्रियाएं &#8211;</strong> शिशु क्रियाएं निष्काम और निरुद्देश्य करता ही रहता है। किसी क्रिया के पीछे उसका कोई स्वार्थ नहीं होता केवल वह अपने आनन्द के लिए ही विभिन्न क्रियाएं करता है। कार्य करने की इस अन्तःप्रेरणा में ही उसका विकास अन्तर्निहित है। इसलिए शिशु जो भी क्रिया कर रहा हो उसमें बाधक नहीं बनना चाहिए अपितु उसकी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उसे करने देना चाहिए। स्वयं भी उसके आनन्द में सम्मिलित होना चाहिए। इससे उसका मनोबल और बढ़ेगा और आप भी अपने बचपन को दोबारा जी पाएंगे।</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>क्रमिक विकास</strong> &#8211; जिस प्रकार शिशु का विकास क्रमशः होता है उसी प्रकार उसकी क्रियाएं भी क्रमशः ही होती हैं। जब वह खङा होकर अपना संतुलन बनाना सीख लेता है, तब ही वह चलना शुरू करता है। ऐसे क्रमिक अभ्यास में उसकी शक्ति लगती है। कई बार गिरता है और उठता है। ऐसे में कभी भी माता-पिता को न स्वयं कमजोर बनना चाहिए और न ही शिशु को डराना अथवा कमजोर करना चाहिए। ऐसी स्थिति में सदैव प्रोत्साहित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। शिशु शब्दों के भावों को बहुत अच्छी तरह समझता है।</li>
</ol>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5417" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/images.jpg" alt="" width="968" height="542" /></p>
<p>सामान्यत: अज्ञानतावश माता-पिता बड़ी अजीब सी बात कर देते हैं जैसे शिशु के गिरने पर कहेंगे &#8211; अरे चींटी मर गई हा&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.। दूध न पीने पर कहेंगे &#8211; पी ले नहीं तो बिल्ली को दूध दे दूंगी। खाना खा लो नहीं तो डॉक्टर से सुई लगवा दूंगी। सो जा नहीं तो भूत आ जाएगा। विचार करें जरा इन सब वाक्यों से हम शिशु को क्या संस्कार दे रहे हैं। गलत संस्कारों के साथ साथ उसकी वाणी का विकास भी गलत ही हो रहा है क्योंकि वह जैसा सुनेगा, वैसा ही बोलेगा।</p>
<p>शिशु का विकास एक प्राकृतिक प्रक्रिया है अतः प्रकृति द्वारा प्राप्त उसकी स्वाभाविक विशेषताएँ को समझ कर ही माता-पिता को घर के वातावरण को अनुकूल एवं संस्कारक्षम बनाना चाहिए ऐसा करने से शिशु का विकास यथा समय एवं सही दिशा में होगा।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-causes-and-remedies-for-baby-crying/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 26 – शिशु के रोने के कारण और उपाय</a></strong></span></p>
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			</item>
		<item>
		<title>बालक के पूर्ण विकास का विज्ञान ‘बाल क्रीडा कर्म&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 May 2022 04:12:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-डॉ प्रज्ञा शरद देशपांडे चौंसठ कलाओं में से एक और सबसे महत्त्वपूर्ण कला ‘बाल क्रीडा कर्म’ (बच्चों का खेल) है। बाल का अर्थ है- “बलति इति प्राणेन”। अर्थात्, वह बालक&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-डॉ प्रज्ञा शरद देशपांडे</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5247 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/navbharat-times-1-300x225.webp" alt="" width="971" height="729" /></p>
<p>चौंसठ कलाओं में से एक और सबसे महत्त्वपूर्ण कला ‘बाल क्रीडा कर्म’ (बच्चों का खेल) है।</p>
<p>बाल का अर्थ है- “बलति इति प्राणेन”। अर्थात्, वह बालक कहलाता है जो जीवन शक्ति के साथ सांस लेता है। अमरकोश, शब्द रत्नावली, राजनीघंटु, मेदिनी आदि ग्रंथों में बालक-शब्द के लिए अलग-अलग विकल्प दिये हैं, जैसे अर्भक, माणवक, बालक, माणव, किशोर, बटु, मुष्टिन्धय, बटुक, किशोरक, पाक, गर्भ, हितक, पृथुक, शिशु, शाव, अर्भ, डिम्भक, डिम्ब इत्यादि।</p>
<p>स्मृति ग्रंथ में ‘बाल’ किसे कहा जाए यह बताया हैं-</p>
<p><strong>“आषोडशाद्भवेद्बालस्तरुणस्तत उच्यते।</strong></p>
<p><strong>वृद्धः स्यात् सप्ततेरूर्द्ध्वं वर्षीयान् नवतेः परम्॥”</strong></p>
<p>यानि 16 साल की उम्र से पहले का बचपन और 16 साल की उम्र के बाद किशोरावस्था। सत्तर के बाद पुराना और नब्बे के बाद बहुत पुराना। इसलिए, बचपन याने संस्कृति, नैतिकता, शिक्षा, अभिरुचि आदि के बीजारोपण करने का (को बोने का) समय है।</p>
<p>रघुवंश का वर्णन करते हुए, पहले सर्ग में, रघुवंशी राजाओं की जीवन शैली का वर्णन करते हुए, कालिदास कहते हैं-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने  विषयैषिणाम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥”</strong></p>
<p style="text-align: right;">-(रघुवंशम्-1.8)&#8221;</p>
<p>शैशवावस्था में विद्याध्ययन व अध्ययन विविधता, युवावस्थाओं में विषयों का उपभोग, वृद्धावस्था में निवृत्ति और अंत में योग द्वारा मृत्यु से मुक्ति। (प्राप्त करने वाले रघुवंशी राजाओं का वर्णन करता हुँ।)</p>
<p>‘यथा राजा तथा प्रजा’ इस उक्ति के आधार से हम निष्कर्ष निकाल सकते है कि राजा के जीवनमान के समान उस समय के समाज में भी उच्च जीवन स्तर स्वाभाविक है। शैशवावस्था में ऐसी तैयारी सुनिश्चित करें कि युवावस्था, वार्धक्य और अतिवार्धक्य सहजता से उन कर्तव्यों की परिपूर्ति करते हुए संतुष्टी से बितता हो।</p>
<p>इसका अर्थ यह हुआ कि समाज द्वारा बाल्यकाल को अत्यंत शैक्षिक एवं ग्रहणशील बनाने का प्रयास किया जा रहा था। बच्चे को कुलीन, सबसे अच्छा, सबसे चतुर, सबसे मजबूत और सबसे देशभक्त व्यक्ति बनाने का कोई तरीका निश्चित ही तत्कालीन समाज को ज्ञात था, किन्तु दुर्भाग्य से जिसके दस्तावेज आज उपलब्ध नहीं हैं।</p>
<blockquote><p>धर्मपालजी की पुस्तक ‘एजुकेशन इन द 18वीं सेंचुरी &#8211; ए ब्यूटीफुल ट्री’ में कहा गया है कि 18 वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा किए गए शिक्षा के सर्वेक्षण ने साबित कर दिया कि “भारतीयों का नैतिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास तत्कालीन यूरोपीय देशों की तुलना में बहुत अधिक था।” इन सर्वेक्षणों से स्पष्ट है कि ‘मानव-निर्माण’ के लिये भारतीय संस्कृति सर्वोत्तम है। इसके अलावा, ‘बाल-विकास’ पुस्तक में लिखने का विषय नहीं था बल्कि वास्तविक व्यवहार का विषय था।</p></blockquote>
<p>आधुनिक युग में हम देखते हैं कि बाल मनोविज्ञान, बाल केन्द्रित शिक्षा आदि विषयक वैज्ञानिक पुस्तकों का विस्तारपूर्वक विकास हुआ है। क्या प्राचीन भारत में भी यह शाखा विकसित थी? यदि आप इसके बारे में सोचते हैं, तो चाइल्डकैअर, चाइल्ड स्पोर्ट्स, चाइल्ड साइकोलॉजी आदि पर अलग से कोई ग्रंथ प्राचीन भारतीय साहित्य में  नहीं हैं।</p>
<p>चौसट (64)  कलाओं में से कुछ कलाओं, जैसे शुकप्रलपन, (द्यूतविद्या) जुआ, खाना पकाने, धर्ममातृका, पहेलियों, सौंदर्य प्रसाधन आदि की अभिव्यक्तियाँ संस्कृत साहित्य, धार्मिक-पौराणिक कथाओं में आसानी से मिल जाती हैं। लेकिन बच्चों के खेल पर शास्त्र शुद्ध तंत्र से पुस्तकों का अधिक उल्लेख नहीं है।</p>
<p>भागवत में कृष्ण के बाल लीलाओं का उल्लेख है। कृष्णभक्ति संप्रदाय में कृष्ण और उनके बाल गोपालों के साथ-साथ संदीपनी आश्रम की कई कहानियाँ, अभंग, रचनाएँ हमें देखने मिलते हैं।</p>
<p>यही विषयवस्तु लोककथा व ‘पाळणा’ (मराठी साहित्य-रचना विशेष) जैसे स्त्री साहित्य में भी प्रचुरता से दिखाई पडते हैं। बाल गौतम की कथा भी यही कहती है। बाल गौतम की ‘किसका हंस?’ यह कहानी हर जगह सुनी जाती है।</p>
<p>गुरु द्रोणाचार्य से पांडवों का विद्याभ्यास, राम और उनके तीन भाइयों के बचपन की कहानियाँ आदि पढ़ने के बाद   ‘खेलकूद के माध्यम से जीवन शिक्षण’ कैसे दिया जाता था, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ही मिलता है। प्राचीन वैदिक साहित्य में गुरुकुल का वर्णन, गुरुशिष्यों की कहानियाँ, इस बात का अंदाजा देती हैं कि ‘बालकों के सर्वांगीण विकास’ के लिए क्या-क्या किया जाता था।</p>
<p>परावर्ति संस्कृत साहित्य में, ‘बच्चे के लिए खिलौना-गाडी’ इस बिंदू को मध्यवर्ती रख कर विख्यात नाटक ‘मृच्छकटिकम्’ प्रख्यात हैं।</p>
<p>मराठी-संत-साहित्य में भी बालकृष्ण की लीलाओं पर कई रचनाएँ मिलती हैं। शिवाजी महाराज के बचपन का वर्णन करने वाला साहित्य, आज भी सभी मराठी लोगों के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व बनाने का सबसे अच्छा साधन माना जाता है।</p>
<p>भारतीय संस्कृति में चार आश्रम माने जाते हैं-</p>
<p>1) ब्रह्मचर्यश्रम</p>
<p>2) गृहस्थश्रम</p>
<p>3) वानप्रस्थश्रम</p>
<p>4) संन्यासश्रम।</p>
<p>इनमें से पहला आश्रम-काल सही ढंग से व्यतित किया गया तो बाकी सभी आश्रमकाल सही ढंग से ही व्यतीत होते ही है। यह आश्रम व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए ही भारतीय संस्कृति में सोलह संस्कार महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।</p>
<p>निम्नलिखित संस्कार बाल्यावस्था से संबंधित हैं-</p>
<p>1) पुंसवन संस्कार &#8211; यह संस्कार गर्भावस्था के दूसरे या तीसरे महीने में भ्रूण की रक्षा के लिए किया जाता है।</p>
<p>2) सिमन्तोन्नयन संस्कार &#8211; शुक्लपक्ष में विशिष्ट नक्षत्रयुक्त चन्द्रमा होने पर चौथे से आठवें महीने तक बच्चे की बौद्धिक शक्तियों के विकास करने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।</p>
<p>3) जातकर्म संस्कार &#8211; शिशु के जन्म के बाद उसकी समग्र सुरक्षा के लिए किया जाता है।</p>
<p>4) निष्क्रमण संस्कार (निकास) &#8211; शिशु को चौथे महीने में पहली बार घर से बाहर मंदिर ले जाया जाता है।</p>
<p>5) अन्नप्राशन संस्कार &#8211; आमतौर पर 6 से 8 महीने के बच्चे को पहली बार भोजन दिया जाता है।</p>
<p>6) चूड़ाकर्म संस्कार &#8211; तीन से पांच वर्ष के बच्चे के केशमुंडन करते है।</p>
<p>7) कर्णवेध संस्कार( कान छिदवाने का) &#8211; तीन से पांच वर्ष तक कान छिदवाना का विधि।</p>
<p>8) उपनयन संस्कार &#8211; 5 से 12 साल की उम्र के बालक को गुरुकुल-आश्रम में भेजने के लिये यह संस्कार किया जाता है।</p>
<p>9) वेदारम्भ संस्कार &#8211; गुरु के पास रहकर वेद/ज्ञान सीखना।</p>
<blockquote><p>इन सोलह संस्कारों में से नौ संस्कार बाल्यावस्था से संबंधित हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि ‘बाल विकास’ के विषय को भारतीयों ने बहुत सोच-समझकर परिपोषित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीयों की यह परंपरा थी कि हर बच्चा शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से सबसे अच्छा पैदा हो, इस में दो राय नहीं है।</p></blockquote>
<p>‘बालक’ याने समग्र समाज के लिए संस्कारबिंदू होता है। अष्टांग आयुर्वेद का एक महत्त्वपूर्ण अंग ‘कौमारभृत्य’ है। कौमारभृत्य शाखा के विविध ग्रंथों में बालक के समग्र व एकात्म विकास हेतु मौलिक पथदर्शक जानकारी उपलब्ध है।</p>
<p>माँ और उसके गर्भस्थ भृण की अवस्था तथा बालक के जन्म से लेकर सोलह वर्ष तक हर चरण के, भरण-पोषण-उपचार आदि विषय की शास्त्रशुद्ध जानकारी देना ‘कौमारभृत्य’ शाखा का विषय है।</p>
<p>बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए क्रीडा (खेलकुद) जरूरी है। लेकिन खेल के लिए पूर्वसिद्धता क्या हो, इस पर भी काफी गहन विचार ‘कौमारभृत्य-शाखा में’ किया गया है।</p>
<p><strong>कुमारागार &#8211; बालक का आवास कैसा होना चाहिए</strong><strong>?</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रशस्तवास्तुशरणं सज्जोपकरणं शुचि।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>निर्वातं च प्रवातं च वृद्धस्त्रीवैद्यसेवितम् ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>निर्मत्कुणाखुमशकमतमस्कं च शस्यते। </strong></p>
<p style="text-align: right;">-(अष्टांग संग्रह १/३५)</p>
<p>कुशल-वास्तुकार द्वारा विशेष रूप से कुमारागार (बालक-आवास) को  तैयार किया जाना चाहिए। जैसे-</p>
<p>कुमारागार सुंदर और आकर्षक बनें। वहाँ न अधिक अँधेरा, न अधिक उजाला हो। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हवा का  सिधा स्पर्श बच्चे के शरीर को ना हो। मच्छर, चूहे, खटमल आदि नहीं होने चाहिये। कमरे के पास बच्चे के लिए अलग स्वतंत्र स्नानगृह, शौचालय, रसोई आदि व्यवस्था हो। मौसम के अनुसार आरामदायक बिस्तर, आसनव्यवस्था, पालना (झुला) आदि होना चाहिए। खिलौने ऐसे हो जो बच्चे की अभिरुचि को बढ़ावा दें। बालक के देखभाल के लिए कुशल वैद्य, वयस्क सेविका होनी चाहिए।</p>
<p><strong>2) कुमारधार &#8211; बालक के लिए दास/दासी नियुक्त करना।</strong></p>
<p>बालक के परिपूर्ण देखभाल हेतु सहायक, परिचारक, सेवक रखना आवश्यक हैं। बच्चे के परिपूर्ण विकास के लिये  सही देखभाल महत्त्वपूर्ण है। आचार्य वाग्भट कहते हैं-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अभियुक्तः सदाचारो नातिस्थूलो न लोलुपः। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कुमारधारः कर्तव्यस्तत्राद्यो बालचित्तवित् ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अधार्मिकं दुराचारः स्थूलो विकटगामिनम्। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>करोति लोलुपो बालं घस्नरत्वेन रोगिणम् ॥</strong></p>
<p style="text-align: right;">-(अ. सं. १/३१/३२)</p>
<p>बालक के लिये नियुक्त सेवक सदाचारी होना चाहिए। लालची, धनलोभी नहीं। बच्चे को प्राथमिकता और वरीयता देने वाला चाहिए। बच्चे के मूड को जान कर उस को उचित संस्कार देने वाला सेवक हो। अधर्मी, दुष्ट, दुराचारी, कपटी, स्थूलशरीरवाला, लोभी ऐसा सेवक बालक को रोगी बना देता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5248 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/77800971-300x225.webp" alt="child sports" width="1111" height="834" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/77800971-300x225.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/77800971-1024x768.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/77800971-768x576.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/05/77800971.webp 1200w" sizes="auto, (max-width: 1111px) 100vw, 1111px" /></p>
<p><strong>3) बालक के लिये खेलभूमि तैयार करना।</strong></p>
<p>बच्चों के लिए खेल का मैदान बनाना आवश्यक हैं। अष्टांग संग्रह नामक ग्रंथ में बच्चों के लिए खेल का मैदान बनाने के बारे में मार्गदर्शन किया है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>क्रीडाभूमि समा कार्या निश्शेस्त्रोपलशर्करा।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कणाम्भोभिः सिक्ता निम्बोदकेन वा ॥ (१)</strong></p>
<p>बच्चे के खेलने के लिए जमीन समतल और साफ होनी चाहिए। उस भूमि पर कोई शस्त्र (नाखून, कील, कांटे, शीशा आदि) नहीं होना चाहिए।  तथा चीनी/गुड आदि नहीं होनी चाहिए। मिट्टी को कृमिनाशक जल जैसे विडंग, काली मिर्च, नीम आदि से उपचारित करना चाहिए।</p>
<p><strong>4) क्रीडनक (बच्चे का खिलौना) </strong></p>
<p>बच्चे का खिलौना ऐसा होना चाहिए जिससे बालक के शरीर, मन और भावनाओं का परिपूर्ण विकास हो सके। आयुर्वेद में कहा है-</p>
<p><strong>क्रीडनकानि खलु कुमारस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाणि चागुरुणि चातीक्ष्णाग्राणि चानास्यप्रवेशितानि चाप्राणहराणि चावित्रासनानि स्युः॥ </strong></p>
<p style="text-align: right;">-(चरकसंहिता ८.६३)</p>
<p>बच्चों के खिलौने रंगीन होने चाहिए। विविध व मधुर ध्वनि करने वाले (मुखर) खिलौने होने चाहिये। (वजन में) बहुत भारी या (आकार में) बहुत बड़े नहीं होने चाहिए। चुभने वाले, गढने वाले खिलौने नहीं होना चाहिए। मुंह में आसानी से निगले जाने वाले खिलौने नहीं होना चाहिए। जान को कोई खतरा हो ऐसा खिलौना नहीं होना चाहिए। भयकारक खिलौना नहीं होना चाहिए।</p>
<p>महर्षि चरक के आशय को आचार्य वाग्भट अधिक स्पष्ट विशद करते हैं-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>जातुषं घोषवच्चित्रमत्रासं रमणं बृहत्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अतीक्ष्णाग्रं गवाश्वादिमङ्गल्यमथ वा फलम् ॥</strong></p>
<p style="text-align: right;">-(अष्टांग संग्रह १/७६)</p>
<p>बच्चों के खिलौने लाक्षा (लाह/लाख) के बने होने चाहिए क्योंकि लाक्षा ठंडा, पित्तनाशक, ज्वरनाशक, जलनरोधी और बलवर्धक व वर्णवर्धक होता है। गलती से बालक खिलौने को चाटें, चखे, तो भी इससे कोई नुकसान नहीं होगा।खिलौने का आकार गाय, घोड़ा, फल आदि के होना चाहिए। जिससे बच्चे को उन चीजों का परिचय हो।</p>
<p>जब बच्चे को पहली बार उपवेशन (बिठाना) और अन्नप्राशन (भोजन कराना) कराते है, उस समय का वर्णन कश्यप संहिता में (जातकर्मोत्तराध्याय 12) किया गया है। शिशुओं के लिए विशेष बरामदा (चबुतरा) तैयार करना चाहिए। (उपर उल्लेखित क्रीडाभूमि पुनः संदर्भ ले।)</p>
<p>उस बरामदें पर बच्चेके लिये विभिन्न खिलौने रखे जाये। ये खिलौने, पके और मुलायम भोजन (चावल, दाल) या खोया (दूध से बनाया हुआ) से बनाने चाहिये। जैसे- विभिन्न जानवरों, पक्षियों, रोजमर्रा की वस्तुओं, परिचित लोगों आदि के प्रतिकृतियाँ हो। सभी खिलौनों को बरामदे पर आकर्षक तरीके से सजाया जाना चाहिए। बरामदे को सुशोभित करने के बाद बच्चे को (बरामदे पर) सहारा दे कर बिठाना चाहिए।</p>
<p>बच्चा अपनी पसंद का कोई भी खिलौना उठाएगा। यही बच्चे के मूलप्रवृत्ति की परीक्षा होगी। बालक की मूल अभिवृत्ति को जान कर इसका पोषण व संगोपन सही तरीके करना चाहिए।</p>
<p>इस प्रकार बालक के पूर्ण विकास का विज्ञान ‘बाल क्रीडा कर्म’ है।</p>
<p><strong>समारोप </strong></p>
<p>दाम्पत्यजीवन याने  गृहस्थधर्म की नींव मुख्यतः अर्थ और काम इन दो पुरुषार्थ पर आधारित है। इन्ही पुरुषार्थों का शास्त्रशुद्ध विवरण वात्स्यायन द्वारा लिखित ‘कामसूत्र’ ग्रंथ में किया गया है। इसी ग्रंथ में गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक चौसठ (64) कलाओं का उल्लेख है। इन महत्त्वपूर्ण 64 कलाओं में से एक है ‘बाल क्रीडा कर्म’ हैं।</p>
<p>सुखी और संतुष्ट गृहस्थ जीवन के लिए वंश की सातत्यता बनाए रखना महत्त्वपूर्ण व अनिवार्य है। मराठी भाषा में  एक उक्ति है, “शुद्ध बीजा पोटी  फळे  रसाळ गोमटी”। अर्थात् शुद्ध बीज से ही शुद्ध फल उपजता है। यह उक्ति गृहस्थधर्म में भी आवश्यक है।</p>
<p>सर्वोत्तम व कुलीन समाज बनाने के लिए बीजारोपण से लेकर परिपक्वता तक सभी संस्कारों का सानंद उपभोग लेना अत्यंत जरूरी है। इसी कारणवश कामसूत्र ग्रंथ में ‘बाल क्रीडा कर्म’ नामक कला का भी बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है।</p>
<p>‘बाल क्रीडा कर्म’ इस नाम से स्वतंत्र ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। फिर भी आयुर्वेद, कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि ग्रंथों में  इस विषय की जानकारी  इतस्ततः बिखरी है। भारतीय-ज्ञान-महासागर में युगानुकूल सभी विषयों के मौलिक ज्ञानरत्न  विपलता से उपलब्ध है। विभिन्न आयामों को समृद्ध करने वाले, विभिन्न ग्रंथों से जानकारी एकत्र करना तथा अनेक  स्वतंत्र ग्रंथों को रूप में प्रकाशित करना चाहिये। आगामी स्वर्णिम भविष्य के लिये भारतीयों का यह आद्यकर्तव्य होगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>यह भी पढ़े :</strong></span> <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-baby-toys-clothing/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा &#8211; शिशु के खिलौने और वस्त्र</a></strong></span></p>
<p>(लेखिका हडस जूनियर कॉलेज नागपुर में संस्कृत की व्याख्याता है और मराठी, हिन्दी, संस्कृत एवं अंग्रेजी में सतत लेखन करती हैं।)</p>
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		<title>ज्ञान की बात 56 (भाषा का सांस्कृतिक स्वरूप &#8211; भाग दो)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 Apr 2022 07:16:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Educaion]]></category>
		<category><![CDATA[Child and perents]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Ecucation]]></category>
		<category><![CDATA[Kids]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति प्रथम भाग में हमने जाना कि भाषा की मूल इकाई अक्षर है और इसकी व्याप्ति सम्पूर्ण जीवन है। अक्षर के विभिन्न पदार्थों के साथ जुड़कर अनेक रूप&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5188" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-22-at-8.28.23-AM-300x188.jpeg" alt="" width="1120" height="702" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-22-at-8.28.23-AM-300x188.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-04-22-at-8.28.23-AM.jpeg 650w" sizes="auto, (max-width: 1120px) 100vw, 1120px" /></p>
<p><span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-form-of-language/">प्रथम भाग में हमने जाना कि भाषा की मूल इकाई अक्षर है</a></strong></span> और इसकी व्याप्ति सम्पूर्ण जीवन है। अक्षर के विभिन्न पदार्थों के साथ जुड़कर अनेक रूप बनते हैं। इसलिए अक्षरों के उच्चारण का बहुत बड़ा शास्त्र बना है। उच्चारण के उस शास्त्र को शिक्षा कहते हैं। आज हम अंग्रेजी शब्द एज्यूकेशन को शिक्षा कहते हैं, उस अर्थ में यह शिक्षा नहीं है। वेद के ६ अंगों में से एक अंग का नाम शिक्षा है, जो उच्चारण शास्त्र है। शिक्षा के शास्त्रों में पाणिनीय शिक्षा व याज्ञवल्क्य शिक्षा प्रमुख हैं।</p>
<p><strong>वाणी के चार रूप हैं</strong></p>
<p>जिस प्रकार अव्यक्त ब्रह्म व्यक्त होकर विश्वरूप धारण करता है, उसी प्रकार अव्यक्त शब्द भी विविध व्यक्त रूप धारण करता है। यह एक निश्चित प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के चार चरण हैं। अक्षर या वाणी के चार रूप हैं। परा, पश्यन्ति, मध्यमा तथा वैखरी। परा वाणी ब्रह्म रूप है, इस स्तर पर वह नादब्रह्म है। दूसरी पश्यन्ति, यह वाणी का मूल रूप है। जिसका सम्बन्ध मूलाधार चक्र के साथ है। इस स्तर पर शब्द संकल्पना का रूप धारण करता है। तीसरी मध्यमा, यह वाणी का भावरूप है। इसका सम्बन्ध अनाहत चक्र के साथ है, जो हृदय स्थान में है। वाणी का चौथा रूप है, वैखरी। वैखरी पूर्ण व्यक्त रूप है, यह कानों को सुनाई देता है। वेद का अंग वेदांग कहलाता है, शिक्षा एक वेदांग है। शिक्षा परा वाणी को वैखरी तक लाने की प्रक्रिया सिखाने वाला शास्त्र है।</p>
<p>यहाँ हम बिना बोले संवाद करने का एक प्रसंग जानेंगे।</p>
<p><strong>अद्भुत संवाद</strong></p>
<p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी का मद्रास प्रवास निश्चित हुआ। इस प्रवास में संघ के कार्यक्रमों के अतिरिक्त एक कार्यक्रम पांडीचेरी जाकर श्रीमाँ से मिलना भी था। मद्रास प्रवास तो हुआ परन्तु किसी कारणवश पांडीचेरी जाने का कार्यक्रम स्थगित हो गया। दूसरी बार मद्रास प्रवास में श्रीमाँ से मिलने जाना तय हुआ। परन्तु दूसरी बार मद्रास प्रवास ही स्थगित हो गया। तीसरी बार पुनः प्रवास हुआ। इस बार तो श्रीमाँ से मिलने जाने को प्रमुखता दी गई। मद्रास से पांडीचेरी श्री अरविन्द आश्रम गए। गुरुजी के साथ दो-तीन कार्यकर्ता भी थे। वहां आश्रम में कुछ समय प्रतीक्षा भी करनी पड़ी, तब जाकर बुलावा आया। गुरुजी ने श्रीमाँ के कक्ष में प्रवेश किया। दूर से ही परस्पर मौन अभिवादन हुआ। गुरुजी श्रीमाँ के सामने पांच-छ: कदम की दूरी पर बैठ गए। साथ के तीनों कार्यकर्ता भी गुरुजी के दो कदम पीछे बैठ गए। लगभग दस-बारह मिनट तक सभी मौन बैठे रहे। न गुरुजी कुछ बोले और न श्रीमाँ ने कुछ कहा। कुछ समय पश्चात गुरुजी खड़े हुए, पुनः दोनों ने मौन अभिवादन किया और गुरुजी कक्ष से बाहर आ गए।</p>
<p>साथ के तीनों कार्यकर्ताओं को कुछ भी समझ में नहीं आया। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को गुरुजी के इन तीनों प्रवास की सम्पूर्ण जानकारी थी, उनके लिए भी यह अत्यधिक आश्चर्य की बात थी। इसलिए उन्होंने जिज्ञासावश गुरुजी से पूछ ही लिया। गुरुजी! इतने प्रयत्नों के पश्चात तो श्रीमाँ से मिलने का योग बना, किन्तु आप तो बिना बातचीत किए ही लौट आए? तब गुरुजी ने बताया कि हमारी बातचीत हो गई। बातचीत हो गई? आप दोनों में से एक भी शब्द बोला नहीं गया, फिर बातचीत कैसे हो गई? बातचीत के लिए बोलना आवश्यक नहीं, हमारे मध्य जितना संवाद होना था, वह पूर्ण हुआ और मैं इस संवाद से संतुष्ट होकर लौट रहा हूँ।</p>
<p>यह अद्भुत संवाद हमें बताता है कि बातचीत के लिए वैखरी वाणी आवश्यक है, किन्तु संवाद के लिए नहीं। यदि संवाद करने वाले समान आध्यात्मिक स्तर के मनीषी हैं तो मध्यमा वाणी के धरातल पर भी संवाद सम्भव है।</p>
<p><strong>भाषा के चार कौशल हैं</strong></p>
<p>भाषा के प्रमुख चार कौशल मान्य हैं। ये चार कौशल हैं &#8211; सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना। इन चारों में सुनना और बोलना मूल कौशल है, जबकि पढ़ना और लिखना वाचिक रूप का वर्ण रूप में रूपान्तरण है। जो सुना वही बोलना अर्थात् सुनना दूसरे के बोलने का अनुसरण करना है। इसी प्रकार जो लिखा है वही पढ़ना अर्थात् पढ़ना दूसरे के लेखन का अनुसरण करना है। इसका अर्थ यह है कि भाषा कभी भी अकेले नहीं सीखी जाती, दो मिलकर ही सीखी जाती है। अतः भाषा सीखने में सिखाने वाले की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>व्युत्पत्ति का शास्त्र निरूक्त है</strong></p>
<p>भाषा का दूसरा अंग है, पद। हम पद को शब्द भी कहते हैं। यहाँ शब्द मात्र ध्वनि नहीं है, ध्वनि के साथ कुछ और भी है। ध्वनि रूप अक्षरों के साथ जब जीवन में व्याप्त अर्थ जुड़ता है, तब वह ध्वनि समूह पद बनता है। पदों की रचना का एक विस्तृत शास्त्र है। पदों की रचना व्युत्पत्ति कहलाती है और व्युत्पत्ति के शास्त्र को निरूक्त कहते हैं। पद एक ऐसी व्यवस्था है, जिसका अनुरणन, आकार, क्रिया आदि बातों से सम्बन्ध है। यह कृत्रिम व्यवस्था नहीं है, अपितु अत्यन्त सार्थक व्यवस्था है।</p>
<p>इसकी सार्थकता का एक उदाहरण समझते हैं। ‘हृदय’ नामक पद तीन क्रियाओं का वाचक है। ये क्रियाएँ हैं &#8211; आहरति, ददाति व यमयति। आहरति अर्थात् लाता है, ददाति अर्थात् देता है और यमयति अर्थात् नियमन करता है। आहरति का ‘हृ’, ददाति का ‘द’ तथा यमयति का ‘य’ मिलकर पद बना ‘हृदय’। ये तीनों क्रियाएँ लाता है, देता है और नियमन करता है, हृदय के तीन कार्य हैं। इस प्रकार सार्थक पद रचना होती है। अर्थात् पदों की निश्चिति जीवन के अर्थ से जुड़कर होती है।</p>
<p><strong>भाषा श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है</strong></p>
<p>जीवन के सभी पहलुओं को शब्दों में व्यक्त करने का साधन भाषा है। जीवन में घटनाएँ होती हैं, सजीव-निर्जीव वस्तुएँ होती हैं, अनेक व्यवस्थाएँ होती हैं, मनोभाव होते हैं, विचार और संस्कार होते हैं। सार रूप में यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत जीवन और समष्टिगत जीवन में जो कुछ भी होता है, भाषा उन सबकी शाब्दिक अभिव्यक्ति है। इस प्रकार भाषा का सम्बन्ध सम्पूर्ण जीवन से है।</p>
<p>जीवन में अभिव्यक्ति के अनेक माध्यम हैं, जैसे &#8211; संगीत, चित्र, अभिनय, कलाएँ आदि। भाषा इन सब अभिव्यक्तियों में श्रेष्ठतम है। क्योंकि भाषा नादब्रह्म का आविष्कार है। नादब्रह्म अपने भौतिक स्वरूप में भी सूक्ष्मतम है, इसमें अनन्त सृजनशीलता है। समाधि अवस्था के अनुभव की अभिव्यक्ति के समय वह मंत्र रूप में प्रकट होती है।</p>
<p>हम देखते हैं कि जीवन का अनुभव जितना व्यापक और गहरा होता है, अर्थ का बोध भी उतना ही गहरा होता है। भाषा स्वत: उस अनुभव को व्यक्त करने योग्य बन जाती है। संत कबीर अशिक्षित कवि माने जाते हैं, परन्तु उनकी भाषा उनके अनुभवों को व्यक्त करने में समर्थ थीं। तात्पर्य यह है कि भाषा जीवन के बोध का अनुसरण करती है। जबकि बिना अनुभव के अलंकृत शब्द मात्र निरर्थकता का ही आभास करवाते हैं।</p>
<p><strong>भाषा की शैली</strong></p>
<p>विभिन्न अभिव्यक्तियों में भाषा के साथ उच्चारण शास्त्र, व्युत्पत्ति शास्त्र, व्याकरण शास्त्र और अलंकार शास्त्र जुड़े हुए हैं। विभिन्न छन्द एवं अलंकार के विनियोग से बनने वाली शैली अलंकार शास्त्र का विषय है। सन्धि उच्चारण शास्त्र का अंग है तथा समास शब्द रचना से सम्बन्धित विषय है। पदलालित्य, अर्थ गौरव व उपमा शैली के ही अंग है। कवियों की शैली की विशेषता बताने वाला श्लोक यह कहता है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>दण्डिन:  पदलालित्यम्   भारवैर्थगौरवं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उपमा कालिदासस्य माघे सन्ति त्रयोगुणा:।।</strong></p>
<p><strong>भाषा की शोभा</strong></p>
<p>शुद्ध भाषा, मधुर भाषा, ललित भाषा, प्रभावी भाषा, सार्थक भाषा, भावपूर्ण भाषा में सब भाषा की शोभा बढ़ाते हैं। इसी प्रकार मन, बुद्धि, चित्तादि अन्य:करण और हृदय भाषा को समृद्ध बनाते हैं। संगीत भाषा की मधुरता बढ़ाता है।</p>
<p>जीवन के घनिष्ठतम अनुभव भाषा को समृद्ध बनाते हैं। पंचमहाभूतों के साथ आत्मीयता, वनस्पति और प्राणीजगत के प्रति स्नेह और मनुष्यों के साथ सद्भाव जीवन का सार्थक अनुभव प्रदान करते हैं और भाषा इनका अनुसरण करती है।</p>
<p>भाषा सीखना अर्थात् ये सभी बातें सीखना। भाषा मात्र श्रवण, भाषण, पठन व लेखन के कौशलों तक सीमित नहीं है। शुद्ध, मधुर, दमदार, अर्थपूर्ण उच्चारण, शास्त्र शुद्ध व्याकरण, आशय के अनुरूप शैली और परावाणी से अनुस्यूत वैखरीवाणी भाषा प्रभुत्व के लक्षण हैं। भाषा सिखाते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5185" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Presentation2-300x169.jpg" alt="" width="1035" height="583" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Presentation2-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Presentation2-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Presentation2-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Presentation2.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1035px) 100vw, 1035px" /></p>
<p><strong>भाषा मूल से सिखानी चाहिए</strong></p>
<p>व्यावहारिक जीवन में व्यापक स्वाध्याय से शब्द सम्पत्ति बढ़ती है। व्याकरण के अध्ययन से भाषा शुद्ध होती है। अलंकार शास्त्र के अध्ययन से शैली का विकास होता है। निरूक्त के अध्ययन से अर्थवाहिता बढ़ती है। काव्य के अध्ययन से सृजनशीलता का विकास होता है। परन्तु यदि जीवन के साथ तादात्मयता नहीं है तो यह सारा अध्ययन निरर्थक हो जाता है।</p>
<p>अतः भाषा सिखाना मूल से प्रारम्भ करना चाहिए। सीधा व्याकरण पढ़ना अथवा चारों कौशलों पर ध्यान केन्द्रित करना या प्रश्नोत्तर बल देना अधिक उपयोगी नहीं होता। भाषा अन्य सभी विषयों का आधारभूत विषय है। भाषा का यह महत्त्व समझकर उसके अध्ययन-अध्यापन की योजना बनानी चाहिए। व्यवस्था करते समय मूल को समझना अनिवार्यतः आवश्यक होता है। शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही आवश्यक है।</p>
<p><strong>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)</strong></p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-form-of-language/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 55 (‘भाषा’ का सांस्कृतिक स्वरूप भाग एक)</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-talk-of-knowledge-cultural-form-of-language-2/">ज्ञान की बात 56 (भाषा का सांस्कृतिक स्वरूप &#8211; भाग दो)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>पाती बिटिया के नाम-44 (स्वाभिमानी रामतीर्थ)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 Apr 2022 07:12:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[डॉ विकास दवे]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पाती बिटिया के नाम]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Gyan Ki Baaten]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Swami Ram Krishan Tirth]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ विकास दवे प्रिय बिटिया! तुमको यह जानकारी तो है ही कि 1813 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व स्तरीय सर्वधर्म सम्मेलन सम्पन्न हुआ था। आप कई बार, अनेक स्थानों&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ विकास दवे</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5057" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Swami--300x169.jpg" alt="" width="1063" height="599" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Swami--300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Swami--1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Swami--768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Swami-.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1063px) 100vw, 1063px" /></p>
<p>प्रिय बिटिया!</p>
<p>तुमको यह जानकारी तो है ही कि 1813 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व स्तरीय सर्वधर्म सम्मेलन सम्पन्न हुआ था। आप कई बार, अनेक स्थानों पर यह भी पढ़ चुके हैं कि किस प्रकार वहाँ अपने राष्ट्र और अपनी संस्कृति की विजय पताका एक युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने फहराई थी। और किस तरह मारग्रेट नोबल उनके प्रभाव से ‘भगिनी निवेदिता’ बनी थी।</p>
<p>आओ आज तुमको एक भिन्न किन्तु वैसे ही घटनाक्रम से अवगत कराते हैं। इस घटनाक्रम के नायक हैं स्वामी रामतीर्थ। पंजाब के एक छोटे से गांव में जन्मे बालक तीर्थराम का बचपन अत्यन्त कष्ट में बीता। माँ का आँचल तो जन्म के कुछ दिनों के बाद ही दुर हो गया था। ऐसे ही संघर्षों में पले बढ़े इस बालक ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर 1901 में सन्यास ले लिया। विवेकानन्द जी से तो वे प्रभावित थे ही किन्तु उनके जीवन की घटनाओं का साम्य भी बहुत रहा।</p>
<p>1902 में जब शिकागो जैसा ही एक विश्वधर्म सम्मेलन जापान के टोकियो शहर में आयोजित हुआ। वहाँ भी भारत की विजय पताका स्वामी रामतीर्थ ने फहराई। विदेश में हजारों शिष्य बने और हिन्दू संस्कृति के अनुयायी बने। अमेरिका में अंग्रेजी में दिया गया भाषण हो या मिस्र की मस्जिद में दिया गया फारसी भाषण, इतने प्रभावशाली रहे कि लोगों ने उन्हें पलकों पर बैठाया। विद्वान तो थे ही स्वाभीमानी भी उतने ही थे। अपने आपको वे बादशाह कहते थे।</p>
<p>उनके जीवन के अनेक प्रसंगों ने उनका यह गुण प्रकट किया। अमेरिका में अंग्रेजों को दिया गया वह सटीक जवाब तो आपको याद ही होगा जो उनकी पगड़ी पर किए गए व्यंग्यात्मक प्रश्न पर दिया गया था- “पगड़ी मेरे राष्ट्र और संस्कृति का प्रतीक है इसलिए इसे तो मस्तक पर ही धारण करूंगा। हाँ, आपके दिए जूते जरूर मेरे पैरों में है”। ऐसा ही एक स्वाभिमान को जगाता प्रसंग लोगों के सामने तब आया जब वे विश्व भ्रमण के बाद भारत लौटकर आ रहे थे। जब उन्हें पता लगा कि भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन भी उसी जहाज से लौट रहे हैं तो उन्होंने स्पष्ट घोषणा कर दी- “एक जहाज में दो बादशाह एक साथ यात्रा नहीं कर सकते। मैं इस जहाज से यात्रा नहीं करूंगा”।</p>
<p>कैसा स्वाभिमान? कितनी निडरता? सचमुच भारत भूमि धन्य हो गई ऐसे सपूतों से। श्रीमती वैलमैन के शब्दों में-“मुझे उन्होंने जब माँ कहा तब मुझे लगा कि मैं जगत माता हूँ”। एक अंग्रेज महिला जब अपने को जगतमाता मान लेती है तो जिस माता की गोद में उनका जन्म हुआ वह तो सम्पूर्ण विश्व की जगतमाता है ही। ऐसी पवित्र भारत माता को नमन करें और प्रेरणा लें हम भी पुन: रामतीर्थ सा गौरव अपनी माता को दिला पाएँ।</p>
<p><strong>&#8211; </strong>तुम्हारे पापा</p>
<p>(लेखक इंदौर से प्रकाशित <strong>‘</strong><strong>देवपुत्र’</strong><strong> </strong>सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/category/letter-to-daughter/" target="_blank" rel="noopener">पाती बिटिया के नाम-43 (पुरुषार्थ और प्रतिभा)</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/letter-to-daughter-swabhimani-ramtirth/">पाती बिटिया के नाम-44 (स्वाभिमानी रामतीर्थ)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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