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	<title>Child Education Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<title>Child Education Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>शिशु शिक्षा 36 – जीवन का घनिष्ठतम अनुभव (परिवार/आचार्य शिक्षण)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Mar 2023 05:42:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[Closest Experience of Life (Family/Teacher Teaching)]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त शिशु शिक्षा पर विशेष महत्व एवं चिन्तन का कारण है उसका समग्र विकास जो कि इस अवस्था में 85 प्रतिशत हो जाता है। इस समग्र विकास/व्यक्तित्व विकास&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-6424 " src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-300x171.jpg" alt="" width="1719" height="980" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-300x171.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-1024x584.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-768x438.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308.jpg 1155w" sizes="(max-width: 1719px) 100vw, 1719px" /></p>
<p>शिशु शिक्षा पर विशेष महत्व एवं चिन्तन का कारण है उसका समग्र विकास जो कि इस अवस्था में 85 प्रतिशत हो जाता है। इस समग्र विकास/व्यक्तित्व विकास को दो भागों में बांटकर समझा जा सकता है &#8211;</p>
<ol>
<li>व्यक्तित्व/ व्यष्टिगत/ पंचकोशात्मक विकास (अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश)।</li>
<li>समष्टिगत (परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व), सृष्टिगत (पर्यावरण) और परमेष्ठिगत (परमात्मा, इस सम्पूर्ण सत्ता को बनाने वाला)।</li>
</ol>
<p>गत सोपानों में अनौपचारिक शिक्षा क्या और क्यों पर विचार किया था। इस सोपान में अनौपचारिक शिक्षा ‘कैसे’ पर विस्तार से विचार करेंगे। उपरोक्त समग्र विकास हेतु बालक के मसितष्क का 85 प्रतिशत विकास पठन और लेखन/ भाषण के द्वारा सम्भव नहीं बल्कि इसका आधार अनौपचारिक शिक्षा द्वारा संस्कारों का निर्माण करना है। उल्लेखनीय है कि अनौपचारिक शिक्षा को हम शिशु की प्रारंभिक अवस्था में देखभाल मान सकते हैं जो कि बाल्यावस्था में जाकर औपचारिक शिक्षा का आधार बनेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी इसको (ECCE) सीखने की नींव कहा गया है। तो आइए जीवन की नींव से ही प्रारम्भ करते हैं &#8211;</p>
<p><strong>जीवन का घनिष्ठतम अनुभव </strong></p>
<p>इस जीवन की प्रारम्भिक अवस्था क्या है, जिसका ज्ञान एवं ध्यान हमें सीखने/शिक्षा में सहयोगी हो सकता है। शिक्षा पेट भरने का साधन नहीं अपितु जीवन जीने की कला है। इसलिए कहा जाता है &#8211; सा विद्या या विमुक्तये।</p>
<ol>
<li>
<h4><strong> पंचमहाभूत तत्वों का परिचय</strong></h4>
</li>
</ol>
<p>यह तन जिसमें आत्मा निवास करती है, पंचमहाभूत तत्वों से बना है। जैसे मिट्टी से बना घङा मिट्टी में ही मिल जाता है, वैसे ही पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) से बना यह तन पांच तत्वों में ही मिल जाता है। परन्तु इस तन के माध्यम से किए गए कर्मों के संस्कार, इसमें स्थित आत्मा (जो कि अजर, अमर और अविनाशी है) अपने साथ ले जाती है। अगले जन्म में यही संस्कार उसके पूर्व जन्म के संस्कार कहलाते हैं। सृष्टि के पांचों तत्व हमारे तन/शरीर में विद्यमान होते हैं।</p>
<p>जैसे मिट्टी, रेत, कंकङ-पत्थर और धातु आदि पृथ्वी तत्व से बने हैं वैसे ही शरीर की मांसपेशियां, हड्डियां आदि भी पृथ्वी तत्व से बने हैं। शरीर में बहने वाला खून, पसीना और मल-मूत्र आदि जल का रूप हैं, आंखों के तेज और जठराग्नि में अग्नि तत्व होता है, श्वास-प्रश्वास, रक्त का प्रवाह, हृदय की धङकन, मल-मूत्र का त्याग सब वायु के ही कारण सम्भव है और शरीर में जो भी स्थान खाली है, वहां आकाश तत्व विद्यमान होता है जैसे &#8211; गला (वाणी तंत्र), श्वास नलिका और कान आदि।</p>
<p>इन पांच तत्वों से न केवल यह शरीर बनता है, इन पांच तत्वों से ही पांच ज्ञानेन्द्रिय भी बनती हैं और इन्हीं के माध्यम से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसलिए इन पंचमहाभूतों का परिचय एवं इनके गुणधर्मों के बारे में बताना ही जीवन का घनिष्ठतम अनुभव देना है।</p>
<p>अभिभावक और आचार्य को इसके महत्व की गहनता को समझना चाहिए क्योंकि शिक्षा/सीखने के लिए यह शरीर और ज्ञानेन्द्रियां ही मुख्य साधन (Main Tools) हैं और ये दोनों पंचमहाभूत से ही बने हैं। शिशु अवस्था में चित्त की सक्रियता के कारण इनके माध्यम से लिए गए अनुभव सीधे ही आत्मा के संस्कार बन जाते हैं। शिशु जैसा देखेगा (ज्ञानेन्द्रिय आंख द्वारा), जैसा सुनेगा (ज्ञानेन्द्रिय कान द्वारा) वैसा ही अनुकरण करेगा। ऐसा ही अन्य ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभवों के द्वारा ही संस्कार बनते हैं।</p>
<ol start="2">
<li>
<h4><strong> पदार्थो के गुणधर्म का परिचय</strong></h4>
</li>
</ol>
<p>माता के गर्भ में 9 मास तक रहने के कारण शिशु को माता से ही सर्वाधिक प्रेम, स्नेह और सुरक्षा का अनुभव होता है, उसी तरह इन पंचमहाभूतों से बना होने के कारण वह इनके बीच में रहने से ही आनन्द की अनुभूति करता है। मिट्टी-पानी में खेलना, खुली हवा में घूमना, आकाश में सूरज-चांद-तारों और उङते पक्षियों को देखना उसे भाता है। ये सब प्राकृतिक रूप से उसके स्वभाव में शामिल होता है और इन्हीं सबसे तो उपरोक्त समग्र विकास की पूर्ति होनी है। अज्ञानता वश हम इन सबके सान्निध्य से उसे रोकने का प्रयास करते हैं, जबकि हमें तो खेल खेल में उसके इस आनन्द से उसे उचित सीखने का वातावरण देना चाहिए।</p>
<p>उदाहरण के लिए पंचमहाभूतों के कुछ गुणधर्म &#8211;</p>
<ul>
<li>
<h5>सूखी मिट्टी कठोर होती है, पर गीली मिट्टी कोमल होती है।</h5>
</li>
<li>
<h4>मिट्टी पानी को सोख लेती है, पर पत्थर नहीं सोखता।</h4>
</li>
<li>
<h4>दो पत्थरों को रगङने से चिंगारी निकलती है।</h4>
</li>
<li>
<h4>पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है।</h4>
</li>
<li>
<h4>तेल डालने से आग जलती है, पर पानी डालने से आग बुझ जाती है।</h4>
</li>
<li>
<h4>गोल चीज लुङकती है, पर चपटी नहीं।</h4>
</li>
<li>
<h4>पानी को जिस बर्तन में डालो, वैसा ही रूप ले लेता है।</h4>
</li>
<li>
<h4>पानी में कुछ चीजें डूब जाती हैं और कुछ चीजें तैरती रहती हैं।</h4>
</li>
<li>
<h4>आग हवा के कारण ही जलती है और हवा के कारण ही बुझ भी जाती है, क्यों और कैसे ?</h4>
</li>
<li>
<h4>खुले और खाली बन्द कमरे मे आवाज गूंजती है।</h4>
</li>
</ul>
<p>यह सब भौतिक विज्ञान, इस भौतिक जगत से ही जुङा हुआ है। ऐसे ही अनेक गुणधर्मों का अनुभव केवल गतिविधियों के द्वारा अनौपचारिक रूप से इसी आयु में देना ही अनिवार्य है क्योंकि यही आयु सीखने की नींव कहलाती है। इस आयु में पढ़ना और लिखना तो उसको आता ही नहीं और मात्र भाषण से अनुभव लेना सम्भव नहीं। इसीलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी क्रिया आधारित एवं खोज आधारित शिक्षा की शिक्षण विधियों (Padagogy) को सीखाने का माध्यम बताया है।</p>
<p>यह अनुभव केवल प्री-स्कूल/शिशुवाटिका में ही नहीं बल्कि घर में भी दिये जा सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को भी इसका ज्ञान होना जरूरी है। शिशुवाटिका में भी इन अनुभवों को कराने के लिए सामग्री से सुसज्जित प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है। शिशुवाटिका की आचार्य दीदी को भी समय समय पर अभिभावकों को गतिविधियों एवं उससे होने वाले विकास के बारे में बताना चाहिए।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-6425" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-300x300.webp" alt="" width="1727" height="1727" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-300x300.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-150x150.webp 150w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-768x768.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me.webp 924w" sizes="(max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<ol start="3">
<li>
<h4><strong> ललित कलाओं का रसास्वादन</strong></h4>
</li>
</ol>
<p>कला के बिना मनुष्य पशु के समान माना जाता है। शिशु अवस्था में शिशुओं की चित्रकारी के शौक को कौन नहीं जानता। घर की दीवारें हों या भाई-बहन की पुस्तक-कापियां, शिशुओं की चित्रकारी से अछूती नहीं रहती।</p>
<p>किसी संस्कार पत्रिका के लेखन के लिए मेरा किन्हीं सज्जन के घर जाना हुआ। उनका लगभग 3 वर्ष का पोता मोहित उनके पास था क्योंकि उनकी बहू विद्यालय में पढ़ाने गई हुई थीं। मोहित को व्यस्त करने के लिए उन्होंने एक कागज और पेंसिल दे दी। मोहित ने कागज पर कुछ गोल गोल और आङी-तिरछी रेखायें बनाकर अपने माता-पिता, बङे भाई तथा दादा जी के चित्र बनाए। अब वह बोर होने लगा तो उन्होंने यूटयूब पर बच्चों की कविताएं चला दीं। मोहित मस्त होकर नाच-नाच कर कविता गाने लगा। हमारा कार्य भी लगभग खत्म हो गया, तो दादा जी ने उसे कहानी सुनाने के लिए कहा। मोहित ने पूरे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई। अभी मोहित की माँ भी विद्यालय से वापिस आ गई थीं। उन्होंने आते ही हमारे लिए भोजन पकाना शुरू किया। परन्तु मोहित अपनी माँ के साथ खेलना चाहता था। माँ ने उसे थोङा सा आटा दिया और कहा कि कल जैसे चिङिया बनानी सिखाई थी, वैसी बनाओ। मोहित तो प्रसन्न&#8230;। उसने आटे से चिङिया और सांप आदि बनाए।</p>
<p>मोहित की माँ शिशुवाटिका की आचार्य थीं। शिशु के मनोविज्ञान और उसके विकास को भली प्रकार जानती थीं। उन्होंने दादा जी को भी यह सब बता रखा था। यही सब तो ललित कलाएं हैं। चित्र बनाना, गीत गाना, कहानी सुनाना, बातें करना, नाटक करना, खिलौने बनाना आदि। खेल खेल में मोहित आनन्द से ये सभी कलायें सरलता और सहजता से सीख रहा था। मोहित की माँ जैसी जागरूकता प्रत्येक अभिभावक में होनी चाहिए।</p>
<p>ऐसी गतिविधियों से शिशु में सृजनशीलता का संस्कार आता है। ऐसा सृजनशील बालक कभी विसर्जन (तोङ-फोङ /हानि) नहीं कर सकता। यही तो है जीवन का घनिष्ठतम अनुभव।</p>
<p>समग्र विकास की इस कङी का शेष भाग अगले सोपान में &#8230;&#8230;.. ।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/what-why-and-how-of-non-formal-education/">शिशु शिक्षा 35 – अनौपचारिक शिक्षा क्या, क्यों और कैसे?</a></strong></span></p>
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			</item>
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		<title>राष्ट्र जीवन में मकर संक्रांति का महत्व</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/importance-of-makar-sankranti-in-the-life-of-the-nation/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Jan 2022 10:11:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Makar Sakranti]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ. राम देशमुख &#160; मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्रियाकलापों का उसके परिवार, वह जिस समाज में रहता है वह समाज एवं प्रकृति के साथ घनिष्ठ़ संबंध होता ही है।&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ. राम देशमुख</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्रियाकलापों का उसके परिवार, वह जिस समाज में रहता है वह समाज एवं प्रकृति के साथ घनिष्ठ़ संबंध होता ही है। भौतिक जगत की उत्पत्ति जिन पंच महाभूतों से हुई है, उसी पंच महाभूतों से मनुष्य शरीर भी निर्मित हुआ है। स्वाभाविक रूप से पंच महाभूतों से निर्मित प्रकृति के सभी नियम मनुष्य पर भी लागू होते हैं। किसी भी समाज का राष्ट्र जीवन, भूमि तथा प्रकृति से प्राप्त सभी प्रकार की प्राकृतिक संपदाओं के सहयोग से ही बनता है। कोई भी मनुष्य अकेले अपना जीवन सुखी और समृद्ध कर ही नहीं सकता। इस अनुभव के कारण मानव समाज परस्पर सहयोग से एक विशिष्ट भूमि पर नैसर्गिक संसाधनों की सहायता से अपना जीवन यापन कर रहा है।</p>
<p>स्वाभाविक ही साथ रहने के कारण एक दूसरे के सुख-दु:खों में वह परस्पर सहयोग करते हैं। आने वाली आपदाओं का साथ-साथ मुकाबला करते हैं। प्रकृति के साथ उनका एक नाता, एक अपनत्व का भाव निर्माण होता है। साथ रहते-रहते जीवन जीने की कुछ विशिष्ट पद्धतियाँ व परम्पराओं का भी विकास होता हैं। उस समाज में निर्मित मनिषियों द्वारा मनुष्य, परिवार, समाज, प्रकृति तथा परमात्मा के बीच अनुभव में आने वाले एकात्म भाव को मनुष्य समाज जीवन में कई परम्पराएं, प्रथाएं, उत्सव आदि कार्यक्रमों के माध्यमों से व्यक्ति से राष्ट्र तक एकात्म समाज का राष्ट्र जीवन खडा करने का प्रयास हमारे हिंदू समाज में हुआ है। इसीलिए व्यक्ति से समष्टि तक किसी भी स्तर पर होने वाले परिवर्तनों का, क्रिया कलापों का राष्ट्र जीवन पर प्रभाव होता ही है।</p>
<p>हमारा हिंदू जीवन भी हजारों वर्षों से ऐसे ही प्रक्रियाओं से राष्ट्र जीवन के रूप में विकसित हुआ है। हमारे प्राचीन ऋषि, मुनियों ने इस जगत का सूक्ष्म अध्ययन तथा अनेक उपसाना मार्गों से प्रत्यक्ष अनुसंधान कर व्यक्ति से परमात्म सृष्टि तक जो प्रत्यक्ष तथ्य उनके अनुभव में आए, उन्होंने समाज के सम्मुख रखें। वे सभी तथ्य आज के आधुनिक वैज्ञानिक भी मान रहे हैं। व्यक्ति को एक-दूसरे की सहायता के बिना तथा प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक संसाधनों के साथ समन्वय करके ही सुखी जीवन प्राप्त हो सकता है, इस वास्तविकता को हमारे मनिषियों ने जान लिया था। इस दृष्टि से व्यक्ति-व्यक्ति में तथा व्यक्ति और प्रकृति में सुसंगत समन्वय करने वाली जीवन पद्धति विकसित करने का प्रयास किया गया।</p>
<p>प्रकृति के बदलते स्वरूप के साथ समाज का स्वभाव सुसंगत हो सके इसीलिये उन्होंने अनेक परम्पराओं, उत्सवों एवं जीवन जीने की अनेक विधियों का आविष्कार कर समाज में संस्कारों के माध्यम से उसे स्थापित किया हैं। इसलिए केवल मकर संक्रांति ही नहीं हर उत्सव तथा परम्पराओं का राष्ट्र जीवन के हर अंग पर प्रभाव होता ही है। उसका अपना महत्व होता है। समाज में रहने वाले सभी व्यक्ति एक विचार से प्रेरित होकर, एक-दूसरे से संवाद करते हुये, संगठित होकर ही मनुष्य जीवन की सार्थकता को पा सकते है, यह अनुभव सिद्ध विषय उन्होंने सिद्धांतों तक सीमित न रखते हुये उसे उत्सव, विशिष्ट धार्मिक आयोजनों, कुलधर्म, कुलाचार आदि के माध्यम से व्यक्ति तथा समाज के स्वभाव को प्रकृति के साथ सुसंगत रखने का प्रत्यक्ष प्रयास किया है। ऐसा हम देखते है।</p>
<p>वैसे तो संक्रांति हर मास में होती है। लेकिन जनवरी मास के 14 तारीख को सूर्य का धनु राशि से मकर राशी में जाना विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन दक्षिणायण समाप्त होकर उत्तरायण का प्रारंभ होता है। पौष मास के मकर संक्रमण से सूर्य नारायण धीरे-धीरे अधिक समय पृथ्वी तल पर प्रकाशमान होना प्रारंभ होता है। व्यवहार में हम इसे दिन बड़ा होना कहते है। 21 जून जो वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है, तब तक क्रमश: सूर्य देवता अधिक समय प्रकाशमान रहते है। इसलिये 21 जून को सारा विश्व अब योग दिवस मनाता है। सूर्य नारायण प्रकाशमान होते ही सम्पूर्ण जीवन गतिमान होता है। स्वाभाविक ही मकर संक्रांति के इस संक्रमण के बाद प्रकृति और मनुष्य जीवन भी जाड़े के जीवन में आई सुस्ती झटक कर गतिमान होता है, इस परिवर्तन को हम अनुभव करते ही हैं।</p>
<p>हमारे देश में इन दिनों नई फसल आती है। खेती हमारे देश का प्रधान अंग है। इन दिनों ठंड का मौसम भी रहता है।  इस स्थिति को माध्यम बनाकर समाज जीवन में इन दिनों नई फसल से आने वाले फल, धान्य आदि का प्रेमपूर्वक परस्पर आदान-प्रदान करने की परम्परा हमारे पूर्वजों ने स्थापित की। भारतीय समाज जीवन में परिवार व्यवस्था का केन्द्र घर की महिला ही होती है। इसलिये महिलाओं के माध्यम से समाज में समरसता निर्माण करने का एक स्वाभाविक तथा सहज उत्सव हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-4615" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/l155_18301578735812-300x169.webp" alt="राष्ट्र जीवन में मकर संक्रांति का महत्व" width="895" height="504" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/l155_18301578735812-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/l155_18301578735812-1024x576.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/l155_18301578735812-768x432.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/01/l155_18301578735812.webp 1440w" sizes="(max-width: 895px) 100vw, 895px" /></p>
<p>मिट्टी के घागर में चावल और हरी मूंग दाल इकट्ठा कर परस्पर महिलाएं एक-दूसरे को प्रेम से देती है। मानो द्वैत भाव में जीने वाली मूंग दाल अद्वैत भाव में जीने वाले चावल के साथ में एकरस होकर अद्वैत का संदेश दे रही हो। इसी समय तिल की फसल भी होती हैं। तिल से मिलने वाली गर्मी शरीर स्वास्थ्य के लिये विशेष फलप्रद होती है। साथ ही तिल की गर्मी से नुकसान न हो, इसलिये सावधानी के नाते गुड़ को जोड दिया है। इस संक्रांति के मास में तील-गुड़ से बने हुये विविध प्रकार के पदार्थ ही सभी घरों में बनाये भी जाते और विशेष रूप से खाये भी जाते हैं। परस्पर एक दूसरे को तील-गुड़ देते समय “तील गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो” ऐसा भाव भी व्यक्त किया जाता है। तील-गुड़ के लड्डू में कई स्थानों पर पैसे छुपाकर गुप्तदान की प्रथाएं भी दिखती है। गुजरात में तो इस पर्व पर समाज के सभी वर्गों के व्यक्ति एकत्रित होकर पतंग उत्सव मनाते है। मुस्लिम समुदाय भी इसमें सम्मिलित होता हुआ हम देखते हैं।</p>
<p>संक्रांति के साथ पौराणिक कथा भी जुड़ी है। राष्ट्र जीवन की स्थिरता के लिये दुष्ट शक्तियों का नाश एवं सज्जन शक्ति का रक्षण आवश्यक है। संकासुर और किंकरासुर नामक दैत्य जो समाज को पीड़ित करते रहते थे उनका वध इसी पर्व पर संक्रांति देवी ने किया था। उनके मृत्यु के कारण समाज में आनंद की लहर निर्माण हुई। जिसके फलस्वरूप समस्त महिलाएं एक-दूसरे के घर हल्दी-कुंकू के लिए आज भी जाती हुई दिखाई देती है। मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक सभी महिलाएं पूरे साज श्रृंगार के साथ उत्तमोत्तम आभूषण पहनकर एक-दूसरे के घर हल्दी-कुंमकुंम के लिये जाती है। सभी नगरों में नगर के रास्ते दोपहर से सायं तक महिलाओं से भरे रहते है। इन दिनों महिलाएं खेती से उत्पन्न फल-धान्य जैसे गेहू, जवारी, बाजरा, हरे चने, गन्ने के टुकड़े, बेर, गाजर, मटर, तील-गुड का लड्डू ऐसे पदार्थ हल्दी-कुंमकुंम के माध्यम से एक-दूसरों को देते है। हल्दी-कुंमकुंम हेतु आने वाली महिलाओं को हल्दी-कुंमकुंम आयोजन करने वाली महिला, महिलाओं के नित्य साज श्रृंगार में लगने वाली चीजें, जैसे चूडी, कंगा, तेल, बिंदी, रूमाल, बाली, नथनी, आयना, साड़ी पिन, दिया इत्यादी वस्तुओं की भेट स्वरूप देती है। मानो इस माह पूरे महिला समाज का घर-घर में सम्मेलन ही होता रहता है।</p>
<p>संपूर्ण समाज जीवन में एक-दूसरे से प्रेम से मिलता, नई फसल से आने वाली धान्य फलादी वस्तुएं प्रेमपूर्वक, परस्पर भेंट देना, हल्दी-कुंमकुंम के माध्यम से महिलाओं का परस्पर मिलना, संवाद करना, रोज उपयोग में आने वाली वस्तुओं को परस्पर आदान-प्रदान कर एक-दूसरे के सहयोग से ही कल्याण संभव इस राष्ट्रभाव का संस्कार करना यह स्वाभाविक प्रक्रिया राष्ट्र जीवन को दॄढ और चैतन्यदायी बनाती है। साथ ही साथ संपूर्ण सृष्टि में चैतन्य निर्माण करने वाली परमात्म शक्ति का भगवान सूर्य नारायण तथा संक्रांती देवी के रूप में आवाहन, पूजन, अभिषेक, सूक्तो का पठन-पाठन, होम आदि धार्मिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठानों द्वारा मन:शुद्धि का भी प्रयास इस पर्व के माध्यम से किया जाता है।</p>
<p>सारा समाज एक विचार, एक आचार और एक संस्कार से ऐसे उत्सवों के अवसर पर सामुहिक जीवन की आवश्यकता एवं यथार्थता का अनुभव करता है। इसलिये हमारे मनिषियों ने सामाजिक जीवन के हित में स्थापित किये सभी उत्सव एवं पर्वो की वैज्ञानिकता, सामाजिकता और आने वाली पीढ़ी में इसकी आवश्यकता को समझकर हमें आधुनिक समय में भी इन उत्सवों तथा पर्वों को अधिक सजगता के साथ हमारे दैनिक जीवन तथा सामाजिक जीवन में आचारों, विचारों में बनाये रखना अत्याधिक आवश्य़क है। तभी हम पाश्चात्य अंधानुकरण के कारण हो रहे विघातक सांस्कृतिक प्रदूषण से अपनी नई पीढी को और स्वयं को सुरक्षित रख सकेंगे।</p>
<p>(लेखक श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर महाविद्यालय, जळगांव (जामोद) जिला बुलडाणा, महाराष्ट्र में प्राचार्य है और विद्या भारती विदर्भ प्रान्त उपाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/festival-and-exam/" target="_blank" rel="noopener">पर्व और परीक्षा</a></strong></span></p>
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		<title>पाती बिटिया के नाम-36 (बड़ा काम कैसे होता है? पूछा मेरे मन ने)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Nov 2021 10:09:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ विकास दवे]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पाती बिटिया के नाम]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Pati Bitiya Ke Naam]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ विकास दवे प्रिय बिटिया! आज एक सच्ची घटना सुनाता हूँ। उस दिन भोपाल जाने हेतु सुबह की पहली ट्रेन से निकलना तय हुआ। प्रात: 7 बजे से पूर्व&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ विकास दवे</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-4224 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Screenshot-2021-01-17-at-16.33.36-300x227.png" alt="books reading" width="518" height="392" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Screenshot-2021-01-17-at-16.33.36-300x227.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/Screenshot-2021-01-17-at-16.33.36.png 600w" sizes="auto, (max-width: 518px) 100vw, 518px" /></p>
<p>प्रिय बिटिया!</p>
<p>आज एक सच्ची घटना सुनाता हूँ।</p>
<p>उस दिन भोपाल जाने हेतु सुबह की पहली ट्रेन से निकलना तय हुआ। प्रात: 7 बजे से पूर्व मैं ट्रेन में बैठ गया। डिब्बे में काफी जगह थी। तभी देखा एक वृद्ध व्यक्ति दो बड़े-बड़े झोले टांगे डिब्बे में चढ़े। धोती, कुर्ता, सिर के पूरे बाल सफेद और वैसी ही श्वेत हल्की-हल्की दाढ़ी। भाल पर लगी बड़ी-सी गोल बिंदी उनके व्यक्तित्व को और भी प्रभावशाली बना रही थी। उन्होंने वे झोले उस डिब्बे के मध्य वाले द्वार के पास पहली ही सीट पर रख दिए और दोनों झोलों के मुँह खोलकर इस प्रकार रख दिए कि उनमें रखी पुस्तकें दिखने लगीं। कोई उस सीट पर बैठने का प्रयत्न करता तो वे बाबा कहते- “भैया किसी ओर सीट पर बैठ जाईए। यहाँ मेरी पुस्तकें बैठेंगी। बहुत जगह है आगे कहीं बैठ जाएं।” मेरा पूरा ध्यान हाथ में पकड़े समाचार-पत्र से हटकर उन पर ही टिक गया था। वे बोले- “मित्रों आप सबको दशहरे की शुभ कामनाएँ। हम सबने एक रावण मैदान में जलाकर मार दिया, लेकिन क्या हमारे मन में छुपे रावण को हम मार पाए? उसे मारने कोई राम नहीं आएंगे, उसे मारने के लिए हमें सहयोग लेना होगा, इन पुस्तकों का। इस दीवाली पर एक दीप इन पुस्तकों के प्रकाश का जलाईए। ये थैले यहीं रखे रहेंगे। मैं दूसरे डिब्बे में ऐसे ही झोले रखकर आता हूँ। आपमें से कोई भी इन पुस्तकों को निकालकर देख सकते हैं। मैं देवास में आऊँगा आपसे फिर बात करने।”</p>
<p>इतना कहकर वे उतरकर चले गए। कुछ लोग नाक-भौं सिकोड़कर कह रहे थे- “धंधा करने के नए-नए तरीके निकाल लेते हैं ये बेचने वाले भी।”</p>
<p>मैं फिर समाचारों में डूब गया। देवास में वे सज्जन पुन: आए। उनकी आवाज एक बार फिर गूँजने लगी- “किस-किसने ये पुस्तकें देखने के लिए ली हैं, कृपया हाथ खड़ा करें मैं आपके पास तक आता हूँ।”</p>
<p>एक बहन ने एक पुस्तक ली थी। केवल उसने ही हाथ खड़ा किया। बाबा प्रसन्न हो गए- “अरे वाह, मेरी बिटिया ने हिम्मत की है। कौन-सी पुस्तक ली है? वाह बेटे ये पुस्तक बहुत अच्छी है। तेरा जब विवाह होगा तो इसका ज्ञान तेरी संतानों को श्रेष्ठ संस्कार देने के काम आएगा। इसकी कीमत वैसे तो छ:रुपये है किन्तु छुट्टे पैसे न तो मेरे पास हैं और तेरे पास भी नहीं। ऐसा कर, पाँच रुपये ही दे दे। अब इतनी कम मूल्य की पुस्तकें सबके आकर्षण का केन्द्र बन गई। कई लोगों ने पुस्तकों को देखना और खरीदना प्रारंभ कर दिया। मैं देख रहा था, वे किसी को कुछ राशि बच जाने पर उससे अधिक मूल्य की पुस्तक दे देते थे। इस बीच एक युवक ने शेरो-शायरी की पुस्तक माँगी।</p>
<p>बाबा बोले- “बेटे मेरे पास इस प्रकार की भी पुस्तक हैं लेकिन सच कहूँ, इसकी कीमत मात्र 4 रुपये है और यह 10 रुपये में बिकती है। इसमें मैं कोई छूट भी नहीं देता। मेरी मानो तो ये अन्य गीता प्रेस की पुस्तकें खरीदो बहुत अच्छी भी हैं और स्वाध्याय की आदत भी बनेगी।”</p>
<p>युवक पर कोई असर नहीं हुआ। उसने वही रोमांटिक शायरी की पुस्तक ली। बाबा के चेहरे पर 10 रुपये लेकर भी कष्ट की छाप स्पष्ट दिखाई दे रही थी। वे फिर बोले- “किसी के पैसे मेरी ओर बाकी तो नहीं रह गए आप बता दें, मैं लौटा दूंगा। क्या करूँ वृद्ध हूँ ना याद नहीं रहता। अब मैं उतर रहा हूँ। आप सबसे निवेदन है अच्छा साहित्य पढ़ें और सकारात्मक सोचें, सकारात्मक करें। अरे हाँ मेरी वह बेटी कहाँ है जिसने सबसे पहली पुस्तक ली थी।”</p>
<p>झोले से एक पुस्तक निकालकर वे उसके पास पहुँचे और देते हुए बोले- “बेटी यह मेरी ओर से रख लो। आदर्श गृहस्थी के निर्माण में यह काम आएगी। इसके पैसे नहीं लूँगा। यह मेरा आशीर्वाद समझ कर रख ले।”</p>
<p>वे झोलों को मुश्किल से खींच कर दरवाजे तक ले आए। मैं उठकर उनके पास पहूँचा। “बाबा आप कहाँ रहते हैं?” मैंने पूछा। वे बोले- “खास रहने वाला शूजालपुर का हूँ लेकिन अब इन्दौर ही रहता हूँ।”</p>
<p>“इससे पूर्व क्या करते थे?” प्रश्न के उत्तर में बोले- “एच.आर.डी.(मानव संसाधन विभाग) से सेवानिवृत्त हुआ हूँ। केन्द्र सरकार पेंशन खूब देती है उसी का सदुपयोग करता हूँ।”</p>
<p>“आपका शुभ नाम जान सकता हूँ?” मैंने संकोच से पूछा।</p>
<p>वह तेजोमयी चेहरा एक क्षण को शून्य में ताकता रहा और धीरे से बोला- “डॉ. दीपेश्वर।” मुझे भौंचक छोड़ वे उज्जैन के प्लेटफार्म पर उतर चुके थे।</p>
<p>मैं सोच रहा था और कानों में आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी की पंक्तियाँ गूंज रही थीं- “बड़ा काम कैसे होता है? पूछा मेरे मन ने&#8230;.”</p>
<p>मेरे हाथों में इस समय यात्रा के दौरान पढने के लिए लाई गई एक पुस्तक थी- “सकारात्मक सोच”। मैं मन ही मन सोच रहा था- “केवल पढने से नहीं कुछ करने से ही दृश्य बदलता है।” तुम क्या समझी पत्र लिखकर मुझे बताना।</p>
<p>-तुम्हारे पापा</p>
<p>(लेखक इंदौर से प्रकाशित <strong>”</strong><strong>देवपुत्र”</strong><strong> </strong>सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/letter-to-daughter-lets-light-the-lamp-again/" target="_blank" rel="noopener">पाती बिटिया के नाम-35 (आओ फिर से दिया जलाएँ)</a></strong></span></p>
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		<item>
		<title>शिशु शिक्षा &#8211; 12- तीन से पांच वर्ष के शिशु का पालन पोषण (संगोपन)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-baby-care-from-three-to-five-year/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Sep 2021 06:56:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Best Kids Child]]></category>
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		<category><![CDATA[Child Three to Five Month]]></category>
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		<category><![CDATA[Mother Education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; नम्रता दत्त शिशु अवस्था (0 से 05 वर्ष) स्वाभाविक विकास की अवस्था है। यह विकास शिशु अपनी अन्तःप्रेरणा से ही करता है। इस अवस्था में माता पिता एवं परिवारजन&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-3960" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/o-indian-mom-facebook-300x150.jpg" alt="" width="952" height="476" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/o-indian-mom-facebook-300x150.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/o-indian-mom-facebook-768x384.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/o-indian-mom-facebook.jpg 842w" sizes="auto, (max-width: 952px) 100vw, 952px" /></p>
<p>शिशु अवस्था (0 से 05 वर्ष) स्वाभाविक विकास की अवस्था है। यह विकास शिशु अपनी अन्तःप्रेरणा से ही करता है। इस अवस्था में माता पिता एवं परिवारजन उसको केवल उचित वातावरण देने का ही कार्य कर सकते हैं। परन्तु होता इसके विपरीत ही है। सामान्यतः माता पिता अज्ञानता के कारण उसकी अन्तःप्रेरणा को अनदेखा करके उसके विकास में सहायक नहीं अपितु बाधक ही बनते हैं।</p>
<p>माता पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि शिशु अपनी क्षमता के अनुरूप सही समय पर ही कार्य करता है जैसे &#8211; यदि दो मास के शिशु को आप कुछ ठोस आहार खिलाने की कोशिश करते हैं तो वह उसे तुरन्त मुंह से बाहर निकाल देगा क्योंकि वह जानता है कि वह उसे नहीं खा सकता। वह दांत निकलने पर ही उसे खाएगा। दो दिन के बच्चे को कोई नहीं सीखाता कि उसे मां का दूध कैसे पकङना है अथवा चूसना/पीना है, यह कार्य वह अन्तःप्रेरणा से ही करता है। वह कार्य को अपनी क्षमता विकसित होने पर क्रमशः करता है जैसे &#8211; पहले करवट लेना&#8230;..फिर बैठना&#8230;.सहारे से खङा होना&#8230;..चलना आदि। यह कार्य वह अन्तःप्रेरणा से करता है। माता पिता चाह कर भी ये सब स्वयं सीखा नहीं सकते। वे केवल उसकी क्षमता विकसित होने पर उसे उचित वातावरण देकर उसके अभ्यास/विकास में सहयोगी बन सकते हैं।</p>
<p>संजय और मीना बहुत परेशान हैं क्योंकि उनका तीन वर्ष का बेटा मयंक जब नहाने जाता है तो बाथरूम से बाहर ही आना नहीं चाहता। धूप में भी पार्क जाने की जिद करता है। पार्क में जाते ही मिट्टी में खेलने लग जाता है। बारिश में नहाना तो उसे बहुत ही अच्छा लगता है। वायुयान की आवाज सुनते ही बालकॉनी में जाकर खङा हो जाता है। आसमान में उङते पक्षी देखना उसे बहुत पसन्द है। और प्रश्न तो इतने पूछता है कि बस&#8230;। कहानी सुने बिना तो सोता ही नहीं। संजय और मीना उसे आफत की पुङिया कहते हैं।</p>
<p>शिशु का स्वाभाविक विकास उसके स्वाभाविक गुणों के कारण ही होता है। पंचमहाभूत तत्वों से बना यह शरीर जितना उनके सानिध्य में रहेगा उतना ही फले फूलेगा। इसलिए उसकी अन्तःप्रेरणा उसे उनके बीच में जाने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु माता पिता इस बात से अनजान हैं। वह उसे वहां जाने नहीं देना चाहते। उसका जिज्ञासा का स्वभाव उसे हर बात में प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है। परन्तु माता पिता के पास उसके प्रश्नों का जवाब देने का ज्ञान अथवा समय ही नहीं है। वह बङों की भांति ही उनका अनुकरण करके सब कार्य स्वयं करना चाहता है, परन्तु माता पिता अपने भय के कारण उसे करने ही नहीं देते। यह गिर जाएगा, यह टूट जाएगा, तुम्हें चोट लग जाएगी, तुम खराब कर दोगे, तुम देर लगाओगे, तुम अभी नहीं कर सकते, तुम अभी छोटे हो&#8230;&#8230;&#8230;.आदि। ऐसा करते हुए वे अनजाने में उसकी अन्तःप्रेरणा को नकार देते हैं और उसको अनुभव लेने से वंचित कर देते हैं।</p>
<p>यह समय उसकी कर्मेन्द्रियों के विकास का समय है उसके दौङने, कूदने, उछलने, गाने, शोर मचाने, खेलने आदि के लिए उसे अनुकूल वातावरण देना चाहिए न कि शैतान और शरारती कह कर उसे हर समय डांटना चाहिए। यह अवस्था तो लालयेत् पंचवर्षाणि की है। इस अवस्था में किसी भी प्रकार का भय उसके विकास अथवा संस्कार निर्माण में बाधा ही बनेगा।</p>
<p>परिवार के वातारवण से ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा वह जो अनुभव प्राप्त करता उसे ही वह अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। अतः परिवार का वातावरण संस्कारक्षम होना चाहिए। श्रेष्ठ संस्कार देने के लिए अपनी संस्कृति और अपने जीवन दर्शन का ज्ञान और उसके अनुरूप व्यवहार करना अनिवार्य है। शिशु भाषण से नहीं बल्कि व्यवहार से सरलता से सीखता है।</p>
<p>यह अवस्था ही सीखने की अवस्था है। शिशु कोई व्यक्तिगत सम्पति नहीं अपितु राष्ट्र की धरोहर है। अतः अपने राष्ट्र की धरोहर को उसके लिए तैयार करना परिवार का दायित्व है। पाश्चात्य संस्कृति को आधुनिकता का नाम देकर शिशु को दो नावों पर सवार करना ठीक नहीं। अन्य संस्कृतियों का सम्मान करना परन्तु अपनी परम्पराओं को स्वयं भी श्रद्धा और विवेक से धारण करना और पारिवारिक वातावरण से शिशु में भी उसके प्रति गौरव का भाव जगाना, परिवार का कार्य है। यह भाव भोजन के प्रति हो, वेशभूषा के प्रति हो या उसके महापुरुषों अथवा परम्पराओं के प्रति। शिशु कच्ची मिट्टी है इस समय उसे जो संस्कार दिए जाएंगे वही उसके आजीवन के संस्कार बन जाएंगे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-3956" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/iStock_000020453016XSmall-300x199.jpg" alt="" width="1051" height="697" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/iStock_000020453016XSmall-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/iStock_000020453016XSmall.jpg 425w" sizes="auto, (max-width: 1051px) 100vw, 1051px" /></p>
<p>पवित्र धन और पवित्र मन से घर में बना शुद्ध सात्विक भोजन उसके तन और मन को पवित्र भावों से भर देगा। प्रादेशिक वेशभूषा उसके सौदंर्य को तो बढाएगी ही साथ ही अपने प्रदेश के प्रति गौरव को भी बढाएगी। वह आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति को नहीं जानता। उसे तो परिवार जिस वातावरण में रखेगा उस पर वही संस्कार पङ जाएंगे।</p>
<p>सृष्टि के जीवों के प्रति दया, प्रेम, करूणा, परोपकार उनका संरक्षण आदि करने के श्रेष्ठ संस्कार इसी अवस्था में दिए जा सकते हैं। पौधों को पानी देना, चिङियों/चींटियों को दाना देना, गाय को रोटी देना, दोस्तों से अपने खिलौने बांट कर खेलना, भोजन बांट कर खाना, अपनी बारी का इंतजार करना, अपनी और आस पास की सफाई का ध्यान रखना, अपने सामान को यथा स्थान रखना आदि बातें उसे परिवार के वातावरण से ही सीखने को मिलती हैं। शिशु को सीखाने के लिए स्वयं परिवार को भी यह सब संयमित व्यवहार सीखना होगा और अपनी दिनचर्या एवं आहार विहार को बदलना होगा।</p>
<p>तीन वर्ष की आयु में वह परिवार से निकलकर विद्यालय (जिसे समाज का छोटा रूप भी कहा जाता है) भी जाने लगता है। ऐसे में विद्यालय को भी अपनी भूमिका का ज्ञान होना चाहिए। इस आयु में उसे किसी औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती बल्कि उसकी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को विकसित करते हुए उसके मन को श्रेष्ठ भावनाओं के द्वारा आत्मा को संस्कारित करने की आवश्यकता है। बिना कुछ सीखाए उसे बहुत कुछ सीखाने की कला (खेल खेल में शिक्षा) माता पिता एवं विद्यालय की दीदी को आनी चाहिए। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की यही नींव है क्योंकि इस अवस्था में चित की सक्रियता रहती है।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)</p>
<p>और पढ़ें : <strong><a href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-baby-care-from-one-to-three-year/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा – 11- एक से तीन वर्ष के शिशु का पालन पोषण (संगोपन)</a></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-baby-care-from-three-to-five-year/">शिशु शिक्षा &#8211; 12- तीन से पांच वर्ष के शिशु का पालन पोषण (संगोपन)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>बच्चों के सिर से भय का भूत हटाएं</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/remove-a-lot-of-fear-from-childrens-heads-2/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Oct 2020 04:44:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Educatiomn]]></category>
		<category><![CDATA[palkay namah]]></category>
		<category><![CDATA[rashtiya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर श्रुति छह माह की बालिका, फर्श पर खेल रही थी। निकट की स्टूल पर मिक्सर चल रहा था। धक्का लगा और वह मिक्सर बच्ची के हाथ&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2217" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/3-Simplest-Ways-to-Ease-the-Fear-of-DARKNESS-in-Kids-300x160.jpg" alt="बच्चों के सिर से भय का भूत हटाएं" width="909" height="485" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/3-Simplest-Ways-to-Ease-the-Fear-of-DARKNESS-in-Kids-300x160.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/3-Simplest-Ways-to-Ease-the-Fear-of-DARKNESS-in-Kids-768x409.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/3-Simplest-Ways-to-Ease-the-Fear-of-DARKNESS-in-Kids.jpg 940w" sizes="auto, (max-width: 909px) 100vw, 909px" /></p>
<p>श्रुति छह माह की बालिका, फर्श पर खेल रही थी। निकट की स्टूल पर मिक्सर चल रहा था। धक्का लगा और वह मिक्सर बच्ची के हाथ पर आ गिरा। सुदैव से ज्यादा गंभीर कुछ हुआ नहीं। परन्तु उसे दर्द हो रहा था। वह चिल्लाते हुए रोने लगी। रोते-रोते ही सो गई।</p>
<p>परन्तु इस घटना के बाद घर में मिक्सर अथवा कपड़े धुलाई की मशीन चालू हो अथवा कुकर की सीटी बजे तो उसकी ध्वनि सुनकर वह रोने लगती। सो भी रही हो तो जाग जाती और चिल्लाते हुए रोने लगती। इस कारण अब कपड़े धोने की मशीन, मिक्सर अथवा कुकर शुरू करने से पूर्व उसे गोद में लेना पड़ता। कुकर की सीटी अब बजने ही वाली है यह ध्यान में आते ही उसे तुरंत उठाकर गोद में लेना पड़ता! आवाज़ का भय उसके मन में निर्मित हो गया था! इस भय को दूर करने के लिये एक दिन एक प्रयोग करना निश्चित किया। उसको गोद में लेकर ही अनेक बार मिक्सर शुरू और बंद किया। यह क्रिया अनेक बार दोहराई। धुलाई मशीन पर भी इसी प्रयोग को किया। अनेक बार ऐसा करने पर धीरे-धीरे उसका आवाज के प्रति भय कम होता गया। अब वह आवाज़ से नहीं घबराती।</p>
<p>छोटे बच्चों को अनेक बातों का भय लगता है। सभी बालकों को एक ही प्रकार का भय नहीं रहता। कुछ वर्ष पूर्व शिरोडा के ‘शिवग्राम शालेय परिवार’ ने कक्षा पांच से आठवीं तक के विद्यार्थियों के लिये एक शिविर आयोजित किया था। पाँच-छः शालाओं के बच्चे एकत्रित हुए थे। उनके समक्ष भाषण न देते हुए उनके विचार समझने के उद्देश्य से मैंने उनसे कुछ प्रश्न पूछे। उनसे बातचीत की।</p>
<p>बच्चों को किन बातों का भय लगता है ये जानने को मैं उत्सुक था। इस हेतु मैंने उनसे एक कागज पर लिखकर देने को कहा कि उन्हें किस बात का डर लगता है? तदनुसार बच्चों ने लिख दिया। उसके अनुसार 26 प्रकार का भय उनके मन में रहता है ये बात ज्ञात हुई। भय के प्रकार भी भिन्न-भिन्न थे। किसी को शिक्षकों का भय; अधिकतर बच्चों को तो किसी को शाला जाते हुए कुत्ता अथवा अन्य पशु से भय लगता! किसी को खेलते हुए गिर जाने का डर, तो किसी को बच्चे उन पर हंसेंगे इस बात का डर! कोई बड़े लड़कों से भय करता, तो कोई शाला जाते समय उन्हें कोई पकड़ न ले इस बात का भय! ऐसे कितने ही प्रकार के भय जानने को मिले। एक आठवीं की लड़की को तो कक्षा के लड़कों से भय लगता!</p>
<p>भय के इन प्रकारों को सुनकर बड़े हँसेंगे, बच्चों का मज़ाक उड़ाएंगे। ‘इमसें भय की क्या बात है’ कहेंगे, उसे अनदेखा करेंगे। परन्तु इससे बच्चों का भय तो दूर नहीं होगा! इसके विपरीत समय रहते भय को दूर करने के उपाय न करने पर वह भय मन में कायम जाएगा और बाद में युवा होने पर भी वह भय का भूत पीछा न छोड़ेगा। बड़ी आयु के अनेक लोगों में भी भय का कुछ अंश पाया जाता है। इसलिये बच्चों को लगने वाले भय को हंसी का विषय न समझते हुए कारगर उपाय कर, प्रयास कर, भय को दूर करें। विशेषकर पालक और शिक्षक इस ओर अधिक ध्यान दें।</p>
<p>पालकों के व्यवहार से बातचीत के दौरान कभी भय व्यक्त होता है, और इस बात का भय बच्चों में भी व्याप्त हो जाता है। उदाहरण झींगुर, कॉकरोच या छिपकली देखते ही माँ जब ‘ई’&#8230;‘ई’&#8230; कर चिल्लाती है तब जब भी बच्चे उसे देखते हैं तब उसे भी भय उत्पन्न हो जाता है। कुत्ता देखने पर यदि माँ जैसे कोई भूकंप आ गया हो, डर से अपने बच्चे को तुरंत अपनी ओर झटके से खींच लेती है, इससे बच्चे के मन में भी कुत्ते के प्रति भय उत्पन्न हो जाता है। कुत्ता पागल हो तो बात अलग है। प्राणियों का भय लगता हो तो प्रत्यक्ष प्राणी दिखाना, कभी प्राणी संग्रहालय में अथवा अभयारण्य में जाने से यह भय कुछ परिमाण में कम हो सकता है।</p>
<p>अनेक बार बच्चों के मन में भय उत्पन्न करने के लिए पालक कारणीभूत होते है। अपनी इच्छानुसार कार्य कराने के उद्देश्य से बच्चों को भय दिखाया जाता है। विशेषकर बच्चा पढ़ाई नहीं करता हो तब, भोजन नहीं कर रहा हो तब, दंगा कर रहा तब, भय दिखाया जाता है। बच्चों के प्रति प्रेम के कारण, परवाह के कारण, अनजाने ही पालक ऐसा व्यवहार करते हैं। बच्चों को बोर्डिंग हाऊस में भेज देने का भय तो घर-घर में दिखाया जाता है। अपने माता-पिता से दूर रहना पड़ेगा, वे अपने को दूर भेज देंगे, इससे बच्चों को भय लगता है। अधिक छोटे बच्चों को ‘बाबा आया’, ‘बूढ़ा बाबा पकड़कर ले जायेगा झोली में रखकर’, ‘भूत पकड़ लेगा’, ऐसा कहकर उनके मन में भय उत्पन्न किया जाता है। पालकों का उद्देश्य कितना भी अच्छा हो, बच्चों के मन पर होने वाले दूरगामी परिणाम निश्चित ही उसके व्यक्तित्व के लिये घातक बन जाते हैं।</p>
<p>बच्चे चलते-चलते कहीं गिर पड़ेंगे, उन्हें चोट लगेगी, ऐसी चिन्ता पालकों को लगती है और इसीलिये वे बच्चों को कहते हैं &#8211; ‘‘अंधेरे में नहीं जाना, वहाँ कोई बैठा है, भूत है अथवा राक्षस है’’, ऐसी अज्ञात बातों का भय दिखाने पर बच्चे विश्वास कर लेते हैं। फिर बच्चे अंधेरे में जाने से डरते हैं। ये डर बाद में उनके युवा होने पर भी कभी-कभी कायम रहता है। ऐसे वातावरण में पलने वाले बच्चे कायर बन जाते हैं। समस्या उस समय के लिये हल हो जाती है, बच्चे उस समय तो अंधेरे में नहीं जाते, परन्तु अंधेरे का भय उनके मन में कायम हो जाता है और इस भय का दूर होना कठिन हो जाता है।</p>
<p>मां-पिता में आपसी सम्बन्ध अच्छे न होने पर उनका निरंतर झगड़ा करना, ऐसा वातावरण भी बच्चे में असुरक्षितता की भावना पैदा करता है। बच्चे के सामने ही पिता द्वारा माता को डाँटना या मारपीट करना, इन कारणों से भी बच्चे में भय उत्पन्न होता है।</p>
<p>कुछ पालक बच्चों की गलती पर पूर्णतया दुर्लक्ष करते हैं, तो कुछ अत्यधिक चिंता दर्शाकर बच्चों को अपने दबाव में रखते दिखाई देते हैं। इस प्रकार दो भिन्न प्रकार की, विपरीत प्रकार की भूमिकाएं होती हैं।</p>
<p>बच्चों से केवल मारपीट करके, बांध के रखने से, कमरे में बंद करने आदि उपायों से वे सुधर जाएंगे ये धारणा गलत है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2219" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/parent-child-fear-300x167.jpg" alt="बच्चों के सिर से भय का भूत हटाएं" width="898" height="500" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/parent-child-fear-300x167.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/parent-child-fear.jpg 759w" sizes="auto, (max-width: 898px) 100vw, 898px" /></p>
<p>कुछ पालक बच्चे की इतनी अधिक चिन्ता करते हैं कि वे उसके आसपास निरंतर रहना पसन्द करते हैं। बच्चों पर निरंतर उनका साया रहता है! वे बच्चों को स्वतंत्र रूप से कुछ भी करने नहीं देते। बच्चा गिर पड़ेगा, उसे चोट लगेगी, जख्मी हो जाएगा, ऐसी चिन्ता निरन्तर करते रहते हैं। इस कारण वे बच्चों को ‘ये मत करो’, ‘वो मत करो’, ‘हाथ कट जायेगा’, ‘पैर में छाले पड़ जायेंगे’, ‘ऊपर से गिर जाओगे’, ‘सिर फट जायेगा’, ऐसे टोकते रहते हैं। उनका बच्चों के प्रति प्रेम, ममत्व, चिंता आदि का आदर करते हुए भी कहना चाहूँगा कि ऐसे पालक बच्चों के विकास में बाधक बनते हैं।</p>
<p>बच्चों को इतनी नाजुकता से पालने के कारण बच्चे मजबूत, निर्भय होने की अपेक्षा कमजोर, रोने वाला, कायर बन जाता है। उसकी सृजनशीलता नष्ट हो जाती है। स्वयं निर्णय लेने की क्षमता निर्मित नहीं हो पाती और बड़े होकर भी वह परावलंबी बनकर रह जाता है।</p>
<p>कुछ पालकगण दूसरा छोर पकड़ते हैं, विपरीत व्यवहार करते हैं। बच्चे स्वतंत्र रूप से व्यवहार करें ऐसा वह सोचते हैं और अति स्वातंत्रय देते हैं। कुछ पालक अपने छोटे बालक को भी अलग कक्ष में सोने देना चाहिए, ऐसी अपेक्षा रखते हैं। ऐसी स्थिति में ‘माता-पिता हमें दूर रखते हैं’ ऐसी भावना बच्चे में आने से भी वे भय के शिकार होते हैं।</p>
<p>पालकों को संयम रखते हुए समझदारी से व्यवहार करना चाहिये। बच्चों में भय उत्पन्न हो ऐसा कुछ न करते हुए उन्हें समझाकर (किंतु अति लाड़-प्यार दिखाकर नहीं) परिस्थिति को सुलझाएं।</p>
<p>बच्चों को लगने वाले डर की ओर पूर्णतया दुर्लक्ष न करते हुए वह भय किस कारण उत्पन्न हुआ, इस बात को खोजने का प्रयास करें। उसको दूर करने का प्रयास करें। बच्चों को भयमुक्त करना आवश्यक है और इस हेतु एक बात अत्यंत आवश्यक है “बच्चों के लिए कुछ समय देना”!!</p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/parent-education-why-do-children-lie/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">बच्चे झूठ क्यों बोलते हैं?</a></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>बालकों के लिए उपयोगी &#8211; आपके घर में ऐसा है क्या?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Jul 2020 08:31:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Kya aap ke ghar main bhi ye hai]]></category>
		<category><![CDATA[Palkay Namh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर आज के घर सामानों के ‘भंडारगृह’ हो गए हैं। जगह की कमी, फिर भी फर्श से छत तक विविध वस्तुओं का संग्रह देखने को मिलता है।&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p>आज के घर सामानों के ‘भंडारगृह’ हो गए हैं। जगह की कमी, फिर भी फर्श से छत तक विविध वस्तुओं का संग्रह देखने को मिलता है। कुछ घरों में सुंदर सजावट देखने को मिलती है तो कुछ घरों में विविध प्रकार का सामान बेतरतीब ठूंसा हुआ दिखता है। कपड़े इधर उधर लटकते दिखते हैं। हमारे एक मित्र इसे ‘‘ठूंसो-लटको संस्कृति’’ सम्बोधित करते हैं। अनेक बार तो अनावश्यक सामान भी जगह घेरे रहता है। ऐसा सामान न तो फेंका जाता है और न ही उपयोग में लाया जाता है। कुछ वस्तुओं की तो बिल्कुल भी उपयोगिता नहीं होती, फिर भी उसका मोह छूटता नहीं है। किन वस्तुओं को अग्रक्रम में रखें, ये न समझने के कारण अनेक झमेले झेलने पड़ते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1736" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1-38-300x159.jpg" alt="" width="900" height="477" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1-38-300x159.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1-38-768x407.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1-38.jpg 850w" sizes="auto, (max-width: 900px) 100vw, 900px" /></p>
<p>जिनके घर बच्चे होते हैं ऐसे पालकों को दिखावे वाली वस्तुओं का संग्रह करने की अपेक्षा बच्चों की दृष्टि से कौन सी वस्तुएं महत्वपूर्ण तथा उपयोगी हैं, इसका विचार करके वस्तुएं क्रय करें। बच्चों के विकास के दृष्टिकोण से अधिक सहायक कौन सी वस्तुएं होंगी इसका विचार करना आवश्यक है। अन्यथा दलाई लामा के शब्दों के अनुसार, ‘‘दिखावा अधिक, भंडार खाली’’ की स्थिति उत्पन्न होगी।</p>
<p>घर में प्रथम आवश्यक वस्तु है ‘पूजा घर’! घर चाहे कितना भी छोटा हो, उसमें एक ‘पूजाघर’ होना आवश्यक है। दिनभर में से कुछ समय निकाल कर, अन्य प्रापंचिक बातों के विचारों से मुक्त रहकर, शांति से जहां बैठ सकें, वह है ‘‘पूजाघर’’ भले ही वहाँ कोई भी देव प्रतिमा हो या न भी हो! परिवार के सभी सदस्यों द्वारा दस-पंद्रह मिनट का समय निकालकर, पूजाघर में एकत्र आकर प्रार्थना करनी चाहिये।</p>
<p>पालकगण यदि स्वयं इस प्रकार का अभ्यास करें तो बच्चे भी वैसा ही अनुकरण करेंगे। प्रार्थना से क्या प्राप्त होता है, इस सम्बन्ध में विस्तार से बताने की अपेक्षा, <strong>Prayer does not change the things for you but you for the things </strong>कहना पर्याप्त है।</p>
<p>अनेक घर तो सिनेमाघर ही बनते जा रहे हैं। जिधर देखो उधर सिनेमा के कलाकारों के चित्र, देह प्रदर्शन करने वाले चित्र दीवारों पर लगे दिखाई देते हैं। बच्चों की पुस्तकों-कॉपियों पर भी भद्दे चित्र लगे दिखते हैं। इस कारण प्रवृत्ति भी उसी प्रकार की बनती जाती है। निरंतर ऐसे चित्र आँखों के समक्ष आने से मन में, सपनों तक में वही दिखते हैं। जैसे विचार मन में होते हैं उसी के अनुरूप बच्चे व्यवहार करते हैं। इसलिये अपने घर में किस प्रकार के चित्र, प्रतिमा लगाई जानी है इस सम्बन्ध में पालकगण सावधानी बरतें। देवी-देवता, महापुरुष, राष्ट्रपुरुष जैसे चित्र अथवा प्रतिमाएं उपयोग में लाएं तो बेहतर होगा।</p>
<p>घर में अलमारियाँ बहुतायत में होती हैं। वे केवल कपड़ों से भरी रहती हैं। कुछ लोगों के घर में तो विविध प्रकार के जूते-चप्पलों से भरी अलमारियां होंगी। कितने भी कपड़े हों फिर भी और अधिक खरीदने का मोह कम नहीं होता। जितने हैं, वह कम ही लगते हैं। पुस्तकों की अलमारियां नहीं दिखाई देतीं। <strong>&#8220;A room without books is a body without soul&#8221;</strong> कहते हैं।</p>
<p>इससे स्पष्ट है कि घर में पुस्तकों का होना कितना महत्वपूर्ण है। शरीर के लिये अन्न आवश्यक है यह सर्वविदित है किन्तु शारीरिक आवश्यकताओं की ओर हम अधिक ध्यान देते हैं किन्तु बुद्धि की महत्ता की ओर हम ध्यान नहीं देते। बौद्धिक क्षुधाशमन के लिये आवश्यक हैं पुस्तकें! प्रति माह एक पुस्तक पालकों द्वारा बच्चों के लिए खरीदी जाएं तो बच्चों में पढ़ने की आदत डाली जा सकती है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1738" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1-300x169.jpg" alt="" width="895" height="504" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/1.jpg 480w" sizes="auto, (max-width: 895px) 100vw, 895px" /></p>
<p>समाचारपत्र दुनिया को देखने वाली आँखें और कान होते हैं। अपने आसपास क्या घटित हो रहा है? वर्तमान स्थिति कैसी है? हवाएं किस ओर चल रही हैं? आदि की जानकारी के लिए समाचारपत्र एक साधन है। प्रायः समाचारपत्रों में बच्चों के लिए भी एक स्थान आबंटित रहता है। शनिवार-रविवार के समाचार पत्रों में तो विशेष ही! हानिकारक और अनावश्यक वस्तुओं पर हम जितना खर्च करते हैं, उसके ऐवज में थोड़ा सा खर्च समाचारपत्र खरीदने पर किया जाए तो बच्चों में पढ़ने की आदत पैदा होगी, ज्ञानवृद्धि होगी, भाषा समृद्ध होगी, विचारशक्ति जागृत होगी। अतः कम से कम एक समाचारपत्र नियमित क्रय करें।</p>
<p>शिशु वाटिका से कॉलेज तक में पढ़ने वाले किसी भी आयु के बच्चों के लिए उपयुक्त एक वस्तु है ‘‘रोल अप बोर्ड’’! क्षमतानुसार उसे खरीदा जा सकता है। शिशुवाटिका के बच्चों को उस पर रेखाएं खींचना, चित्र बनाने में आनंद आएगा। घर पर बच्चे दीवारों पर रेखाएं खींचकर दीवार गंदी कर देते हैं। यदि रोलअप बोर्ड टांग दिये जाएं तो बच्चे उस पर चित्र आदि बनाएंगे और दीवारें गंदी नहीं होंगी!</p>
<p>प्राथमिक कक्षा के बच्चों को गणित के प्रश्न हल करने, शब्द, वाक्य लिखने आदि के लिये रोल अप बोर्ड उपयुक्त रहेगा। सूत्र, समीकरण, महत्वपूर्ण तिथियाँ, आकृति आदि यदि बच्चों ने फलक पर अंकित कर रखी हो और उसे आते-जाते देखें तो ये बातें सहजता से याद रखने में सुविधा होगी।</p>
<p>‘पृथ्वी का ग्लोब’ भी एक सरल, सहज, शैक्षणिक साधन है। ग्लोब बाजार में अनेक आकार और अनेक प्रकार के उपलब्ध हैं। इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र आदि सभी विषयों के अध्ययन के लिये सहायक के रूप में ये उपयोगी हैं। बचपन से ही बालक इस ग्लोब का उपयोग करें तो अनेक बातें सुगम हो जाती हैं।</p>
<p>आजकल अनेक घरों में ऑडियो/वीडियो प्लेयर आदि उपलब्ध है। उसका उपयोग विशेषकर सिनेमा गीतों के लिए किया जाता है। बाजार में आजकल सभी विषयों की CD/DVD/ई-कंटेंट उपलब्ध हैं। बाल गीतों से लेकर अंग्रेजी संभाषण, वर्णमाला से लेकर विज्ञान और गणित के सूत्र तक, ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों के व्याख्यान आदि सभी प्रकार की ‘सी.डी.’ उपलब्ध हैं। ये श्रवण शक्ति के विकास के लिये सहायक होती हैं। अध्ययन के लिये ये एक अच्छा माध्यम हैं। इस प्रकार के साधनों का प्रयोग हम करने लगे तो उसका प्रभावी उपयोग करने के लिये अनेक मार्ग प्रशस्त होंगे।</p>
<p>विद्यार्थियों का एक घनिष्ठ मित्र है ‘‘शब्दकोष’’! आजकल केवल अंग्रेजी भाषा का ही शब्दकोष नहीं, वरन् गणित, पदार्थ विज्ञान, रसायन शास्त्र, अर्थशास्त्र, कम्प्यूटर, चिकित्साशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर शब्दकोष उपलब्ध हैं। घर पर एक शब्दकोष उपलब्ध रहना आवश्यक है।</p>
<p>घर के लिये उपयुक्त वस्तुओं की सूची आवश्यकता और क्षमतानुसार घट-बढ़ सकती है। सभी वस्तुएं एक साथ खरीदी जाएं, ये आवश्यक नहीं। वर्तमान की भूल-भुलैया वाली दुनिया में हमें भ्रमित करने वाली अनेक बातें हैं। घर-घर जाकर बिक्री करने वाले अपनी कुशलता से हमारे लिये अनावश्यक वस्तुओं को हमें भ्रमितकर हमें थोपकर चले जाते हैं। थोड़ा सतर्क रहकर, विचार करके, बच्चों के विकास हेतु उपयुक्त अथवा घर के लिये आवश्यक वस्तुएं ही खरीदी जाएं तो लाभकारी होगा। बच्चों के लिये केवल वस्तु अथवा खिलौने क्रय करके समझदार पालक नहीं कहलाएंगे। बच्चों के लिये आप कितना समय देते हैं ये भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/food-from-mothers-hand-matrihaste-bhojnam/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">मातृहस्तेन भोजनम्!</a></p>
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		<title>शिक्षा में संस्कृति बोध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सुरेश सोनी]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Mar 2019 12:34:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति बोध]]></category>
		<category><![CDATA[Bharat Men Sanskriti Bodh]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[Sanskriti Bodh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रत्येक समाज में एक लम्बे अनुभव से निकलते-निकलते कुछ विशेषताएं बन जाती हैं उनकों हम संस्कृति की विशेषता कहते हैं। हमारे यहां पर कहा गया कि यह समाज में संस्कारयुक्त&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>प्रत्येक समाज में एक लम्बे अनुभव से निकलते-निकलते कुछ विशेषताएं बन जाती हैं उनकों हम संस्कृति की विशेषता कहते हैं। हमारे यहां पर कहा गया कि यह समाज में संस्कारयुक्त व्यवहार से संस्कृति की विशेषता उत्पन्न होती है तो यह संस्कार क्या है? अब कोई न कोई क्रिया होगी जब उसका कोई न कोई अवशेष रह जाएगा तो वह संस्कार है। हथोड़ा मारा हमने तो एक निशान छूट गया, जो निशान छूट गया वह संस्कार है। संस्कार के संदर्भ में भी हमारे पूर्वजों ने सोचा और उन्होंने उसकी एक व्याख्या की। इसकी मीमांसा में हमारे ऋषि कहते हैं कि विशेष गुणवृद्धि होना ही संस्कार है और शंकराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र के भाष्य के अंदर उसको और विस्तृत रूप से व्याख्यायित किया। उन्होंने ‘’दोषापनयेन गुणाधान संस्कार:’’ के रूप में संस्कार शब्द की परिभाषा की। हमारे जीवन में जो दोष हैं, कमियाँ हैं, उनको निकाले और जो सद्गुण हैं उनको ग्रहण करें, यह जो निकालने और ग्रहण करने की प्रक्रिया है, यही संस्कार है। इसी संस्कार के माध्यम से धीरे-धीरे जीवन के व्यवहार की विशेषताएं प्रकट होंगी और इसलिए जब हम भारतीय संस्कृति की विशेषताओं के सम्बन्ध में जो भी विचार प्रस्तुत करते हैं वे विशेषताएं एक दिन में पैदा नहीं हुई हैं।</p>
<p>भारतीय जीवन में संस्कार की बहुत सी बातें हैं जैसे ‘मातृवत् परदारेषु’, अर्थात् पराई स्त्री को माँ के समान समझो। एक संस्कार है ‘परद्रव्याणि लोष्ठवत्’ अर्थात् दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझो। एक अन्य संस्कार है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी को अपने जैसा या अपनी आत्मा से जुड़ा समझो। हम देखते हैं कि हमारी इन विशेषताओं ने भारतीय समाज-जीवन को एक ऊँचाई प्रदान की। आजकल का जीवन भले ही कुछ अलग हो गया है परन्तु लगभग 1000 साल पहले की हमारी संस्कृति का भारत में आनेवाले ज्यादातर विदेशी समाज के लेखकों ने जो वर्णन किया है, अगर आज आप पढे़गे तो पाएंगे कि यह सारी विशेषताएं उन्होंने जीती-जागते रूप में हमारे समाज में उन्होंने देखीं। हमारे समाज में विद्यमान संस्कारों- यथा अतिथि-सत्कार, दया , करूणा, न्याय, नैतिकता आदि का रूप जैसा उन्होंने देखा, वैसा वर्णन किया। अतः यदि हम पुनः वैसा ही समाज जीवन बनाना चाहते हैं तो समाज में संस्कृति बोध आवश्यक है।<br />
यह जो संस्कृति बोध है समाज के अंदर उसे पीढी दर पीढी स्थानांतरित अथवा हस्तांतरित करने का माध्यम अनेक प्रकार की कलाएं है। जिस प्रकार सामान्यतः अक्षरज्ञान की जो शिक्षा होती है, उसका सम्बंध बुद्धि से होता है, कला का संबंध हृदय से होता है। इस प्रकार बुद्धि और हृदय का परिष्कार करने के लिए हमारे यहां पर साहित्य है, संगीत है, कला है इनको जीवन में बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक सुभाषित है- ‘‘साहित्य, संगीत, कला विहिनः साक्षात पशु पुच्छ विषाणहीनः’’ अर्थात् जिस मनुष्य के जीवन में न तो साहित्य है न कला है न संगीत है न उसकी रूचि है वह मनुष्य तो है परन्तु कैसा है वह बिना पूंछ के पशु जैसा है। जब साहित्य कहेंगे तो उसमें कथा है, कहानी है, कविता है, उपन्यास है, अर्थात् कई तरह से विभिन्न रूपों में विचार और भावना की अभिव्यक्ति हुई है। जब हम संगीत कहेंगे तो स्वरों की दुनिया है वह मुंह से गाए हुए रागों की भी एक दुनिया है और यन्त्रों के माध्यम से स्वरों के जो स्पन्दन निकलते हैं उसकी भी एक दुनिया है उनके अपने-अपने अन्तर हैं।</p>
<p>आजकल इस पर बहुत विश्लेषण किया ज़ा रहा है कि यह जो भारतीय शास्त्रीय संगीत है वह सुकून देता है, मनुष्य तन्मय हो जाता है, तनाव निकल जाता है, क्यों है ऐसा? यह जो भारतीय संगीत है, राग है उसके स्पन्दन ऐसे हैं कि वह दिमाग में तनाव लाने वाली जो बातें है उन सबको हटा देता है। धीरे-धीरे आदमी तन्मय हो जाता है। 1935 में इटली में संगीत प्रेस वार्ता हुई थी मुसोलिनी उस समय तानाशाह था, भारतीय संगीतज्ञ पंडित ओंकारनाथ ठाकुर उससे मिले। उस समय मुसोलिनी को बताया गया भारतीय संगीत में सुबह का राग है, शाम का राग है, दुःख का राग है, सुख का राग है, तो मुसोलिनी ने कहा मुझे पता नहीं है, पर मुझे कुछ दिन से नींद नहीं आ रही है। क्या आपके पास कोई ऐसा राग है जिसे सुनकर मुझे नींद आ जाए। कोशिश करता हूँ यह कहकर ठाकुर जी ने बजाना चालू किया और 15-20 मिनट के अंदर मुसोलिनी गहरी नींद में सो गया। दो दिन तक सोता रहा। तो संगीत की भी एक दुनिया है &#8211; दो पेड़ लगा करके अरविन्द आश्रम में प्रयोग किया गया कि एक के सामने माइकल जैक्सन और मैडोना वगैरह का पॉप संगीत बजाया गया और दूसरी तरफ भारतीय संगीत। प्रभाव देखिये कि जिसके सामने भारतीय संगीत बजा उस पेड़ के पत्ते बड़े अच्छे थे और जहाँ पॉप म्यूजिक बज रहा था उसके पत्ते बहुत कटे-फटे और खंडित। लम्बे समय में पॉप संगीत मनुष्य के व्यक्तित्व को आंतरिक रूप से खण्डित कर देता है। इसलिए पॉप म्यूजिक के जितने पॉप स्टार वर्ल्ड में हुए वे तनावग्रस्त हुए, जेलों में गए या आत्महत्याएं की।</p>
<p>इसी प्रकार रंगो और रेखाओं की भी एक दुनिया है &#8211; चित्रकला है, मूर्तिकला है, कार्टून बनते हैं, आजकल चित्ररेखाएं है और चित्र बहुत कुछ कह देता है। अगर हम मूर्तियों का निरीक्षण करेंगे तो हमें जीवन के सभी रंग वहां दिखाई देंगे। जैसे रंगों और रेखाओं की एक दुनिया है, वैसे ही भाव और भंगिमाओं की भी एक दुनिया है। दृष्टि इधर की उधर होने से अर्थ बदल जाता है। दृष्टि या नजर अर्थात् देखना। आंख से देखते हैं। तो आंख इधर-उधर घुमाते हैं, लेकिन आंख घुमाने के पीछे भी मनोविज्ञान है। कोण बदलने के साथ भाव और अर्थ बदल जाता है। एक उर्दू की पंक्ति थी, ‘‘नजर ऊंची की तो दुआ बन गई, नजर नीची की तो हया बन गई।’’ कुछ लज्जास्पद काम कर दिया तो नजर नीची हो जाती है। ‘‘ नजर तिरछी की तो अदा बन गई, नजर फेर ली तो कजा बन गई।’’ एक ही दृष्टि है, कोण बदल गया तो अर्थ बदल गया, भाव बदल गया। इसीलिए कहते हैं कि भाव भंगिमाओं की भी एक दुनिया है। भरतमुनि का नाट्य शास्त्र पूरा का पूरा इसी विषय पर केन्द्रित है। यह संसार भी एक नाटक है, हमारे यहाँ सारे ब्रह्मांड के अंदर शिव का तांडव नृत्य उसका प्रतीक है। नटराज का चित्र सारे ब्रह्माण्ड के सृजन और विध्वंस की कहानी है, उसके अंदर ही ध्वंस भी है और संतुलन भी। कला इसकी वाहक होती है और इन सबका अधिष्ठान अध्यात्म है। उसकी बहुत व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है।</p>
<p>हमारे पूर्वजों ने कही कि मूलतः एक ही तत्व है उसे सर्व खलिव्दम् ब्रह्म कहा होगा ईशावास्यमिदं सर्वं कहा होगा और उस एक ही मूल तत्व से विविध तत्व बने और इसलिए विविधता में एकता है, इन विविध तत्वों के आपस में सम्बन्ध हैं और इस आधार पर आपसी सम्बन्धों की परिवार संकल्पना के रूप में परिभाषित किया। इस नाते मनुष्य का शरीर भी इन्द्रियां, मन, बुद्धि यह भी एक परिवार है। फिर अपना घर भी परिवार है। कुल भी परिवार है बाकि सब परिवार है। परिवार की संकल्पना से जुड़ना और तब फिर परस्पर सहयोग और परस्पर आश्रितता की भावना स्वभाविक रूप से उसमें से निकलकर आती है। करूणा और संवेदना के बिना यह जुड़ाव संभव नहीं हो पाता है और इसलिए कहा गया है कि हमारी शिक्षाओं का, हमारी कलाओं का उद्देश्य मानव-हृदय को उदात्त बनाना और उसमे करुणा का सृजन करना है। उसकी संवेदना, उसकी जो संवेदनशीलता है, उसकी व्याप्ति बढ़ती चली जाए और इस नाते से यह जो हमारा एक आधारभूत अधिष्ठान है, जो अधिष्ठान संपूर्ण विश्व को एक परस्पर सहयोगी रूप प्रदान करने के अंदर एक आधार देता है, उसका बोध होना। उस बोध के प्रकाश में दीर्घकाल के प्रवाह में बनी हुई संस्कृति की विशेषताओं को शिक्षा और कला के विविध कार्यक्रमों के माध्यम से आने वाली पीढियों के अंदर संक्रमित करते हुए उन सबके मन के अंदर संस्कृति बोध को जाग्रत करना, यह हम सबका उद्देश्य होना चाहिए।</p>
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		<title>अभिनव प्रयोग से समृद्धि का सफर</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Mar 2019 13:35:07 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लखीमपुर खीरी। आज भले ही इंटरनेट का दौर है। पुस्तकालयों के प्रति लोगों का आकर्षण कम हो रहा है। लोग घंटों कंप्यूटर और टीवी से चिपके रहते हैं। ऐसे में राजकीय पुस्तकालय अध्यक्ष संजय कुमार साह ने अपने अभिनव प्रयोगों से इस लाइब्रेरी को प्रदेश में नंबर एक की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि अमेरिका की संस्था मिलिंडा बिल गेट्स फाउंडेशन की नजर इस लाइब्रेरी पर पड़ी है। मिलिंडा बिल गेट्स फाउंडेशन ने उत्तर प्रदेश में इस लाइब्रेरी को सहायता देने के लिए चयनित किया है।</p>
<p>इस लाइब्रेरी के संचालक संजय कुमार साह इसकी पाठक संख्या बढ़ाने के लिए नित नए प्रयोग कर रहे हैं। उनके अभिनव प्रयोगों का ही नतीजा है इस लाइब्रेरी के हजारों की संख्या में नियमित पाठक हैं। पिछले महीने उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के तीन हजार बच्चों को एक साथ पुस्तकें पढ़वाईं। विद्यालयों में घूम-घूम कर वे विद्यार्थियों को लाइब्रेरी की पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके इन प्रयासों ने जिले की लाइब्रेरी को प्रदेश में नंबर एक पर लाकर खड़ा कर दिया है। यहां की लाइब्रेरी के कार्यों की खबर अमेरिका संस्था मिलिंडा बिल गेट्स फउडेशन तक पहुंच गई है। मिलिंडा बिल गेट्स फाउडेशन ने इस लाइब्रेरी का चयन सहायता देने के लिए किया है।</p>
<p>मिलिंड बिलगेट्स फाउंडेशन ने मांगे प्रस्ताव अमेरिका की संस्था मिलिंडा बिलगेटस फाउंडेशन ने प्रदेश में लखीमपुर की लाइब्रेरी का चयन सहायता देने के लिए किया है। इस लाइब्रेरी को समृद्ध बनाने के लिए बिल गेटस फाउंडेशन ने स्वयं सेवी संस्था प्रथम के माध्यम से राजकीय पुस्तकालय अध्यक्ष संजय कुमार साह से लाइब्रेरी को समृद्ध बनाने के लिए प्रस्ताव मांगा है। संस्था प्रथम के लोग लाइब्रेरी आकर पूरी रिपोर्ट बनाकर ले गए हैं इसे बिल गेट्स फाउंडेशन को भेजेगें।</p>
<p>यह दिए प्रस्ताव जिला पुस्ताकालयध्यक्ष संजयकुमार साह ने लाइब्रेरी को समृद्ध बनाने के साथ यहां के लोगों को विभिन्न भाषाएं सिखाने के लिए लैंग्वेज लर्निंग लैबोरेटरी लैब, इनफारमेशन लिटरेसी लैब बनाने के अलावा मोबाइल वैन के माध्यम से जिले के विभिन्न कस्बों, तहसील और ब्लाक मुख्यालयों पर लोगों को पुस्तकें पढ़ाने की व्यवस्था करने का प्रस्ताव किया है। यह प्रस्ताव मिलिंडा बिल गेट्स फाउडेंशन को भेज दिए गए हैं।<br />
साभार अमरउजाला</p>
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