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	<title>समग्र_शिक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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		<title>‘विद्यार्थियों’ के शिक्षकों की आवश्यकता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Jan 2026 05:32:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप बेतकेकर ‘मुझे झटका लगा?’ ‘नहीं।’ ‘मैं संवेदनाहीन हुआ क्या?’ ‘बिलकुल नहीं।’ ‘तो फिर मैं ‘स्थित प्रज्ञ’ हूँ क्या?’ ‘नहीं जी! वह तो बहुत आगे की उच्च स्तरीय स्थिति&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong> &#8211; दिलीप बेतकेकर</strong></p>
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<p style="text-align: justify;">‘मुझे झटका लगा?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘नहीं।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘मैं संवेदनाहीन हुआ क्या?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘बिलकुल नहीं।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘तो फिर मैं ‘स्थित प्रज्ञ’ हूँ क्या?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘नहीं जी! वह तो बहुत आगे की उच्च स्तरीय स्थिति है।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘तो फिर इन घटनाओं का प्रभाव कुछ नहीं?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘है न!’</p>
<p style="text-align: justify;">‘एक शिक्षक के नाते मेरी क्या प्रतिक्रिया क्या?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘चिंता, चिंतन कैसा? उपाय योजना क्या?’</p>
<p style="text-align: justify;">सर्वप्रथम एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ, इन सारी घटनाओं के लिये केवल पालक अथवा केवल शिक्षक अथवा पूरी तरह से बच्चे ही जिम्मेदार हैं, ऐसा कहना कठिन ही होगा, फिर भी ये तीनों ही घटक बिल्कुल ही जिम्मेदार नहीं, उनका दोष नहीं, ऐसा भी नहीं कह सकते। आजकल जो कुछ भी घटित हो रहा है उसमें तीनों ही घटकों का सहभाग तो निश्चित है ही, इनके अतिरिक्त भी कुछ दृश्य और कुछ अदृश्य घटक है, अपनी जिम्मेदारी से कोई मुकर नहीं सकता!</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल की स्थिति विचित्र दुविधापूर्ण है, न तो पूरी तरह से आधुनिकता, विज्ञान, तर्क, बुद्धि, और न ही प्राचीन आध्यात्मिकता, भावनाएं आदि! जो भी भारतीय है वह त्याज्य, पिछड़ा हुआ, कालबाह्य, निरुपयोगी कहते हुए फेंक देना! अंध्श्रद्धा को धिक्कारते हुए नई अंध्श्रद्धा निर्मित हो रही है। इस कारण आध्यात्मिकता, धर्मिकता, नैतिकता आदि शिक्षा से, घर से, प्रचार माध्यमों से, समाज से हटाये जा रहे हैं। ऐसे शब्द भी सुनाई दें तो लेखक, ख्यात विचारवंत, शिक्षाविद् आदि ऐसे सिहर उठते हैं जैसे अचानक कोई छिपकली उनके शरीर पर गिरी हो।</p>
<p style="text-align: justify;">कोई क्या कहेगा? किस प्रकार ताना मारेगा? इसकी परवाह करे बिना शिक्षक को विद्यार्थी के हितार्थ को समझते हुए ईमानदारी से प्रयासरत रहना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">परीक्षा के अंकों की अपेक्षा स्वयं के गुणों पर अधिक ध्यान देने से कॅरिअर को कुछ भी हानि नहीं होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">आज के अधिकतर शिक्षक ‘विषय’ के शिक्षक हैं। उन्हें आवश्यकता है ‘विद्यार्थी के शिक्षक’ बनने की। ‘विषय का शिक्षक’ और ‘विद्यार्थी का शिक्षक’ इन दोनों में भिन्नता है। विषय की जानकारी देकर, प्रश्नों के उत्तर सिर पर उंडेलकर, विद्यार्थी द्वारा परीक्षा के समय ठीक से उतार दिया है न, इसकी दक्षता से संतोष मान लेता है ‘विषय का शिक्षक’! परंतु केवल उत्तर को दिमाग में न रखते हुए उसे ज्ञान में उतारकर, ज्ञान का रूपांतर विद्वत्ता में किस प्रकार किया जाये। इसका विचार और इस हेतु प्रयास करने वाला होता है ‘विद्यार्थी का शिक्षक’! आज के विद्यार्थियों की शैक्षिक, भावनिक समस्याओं को समझकर उनका निवारण करने हेतु आवश्यकता है ‘विद्यार्थी के शिक्षक’ की!</p>
<p style="text-align: justify;">अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश, इन सब को मिलाकर बनता है ‘व्यक्तित्व’! ये है ‘पंचकोशीय व्यक्तित्व’ की भारतीय कल्पना! इन सबका सम्यक, संतुलित, सर्वांगसुंदर विकास होना आवश्यक है, ऐसी अपेक्षा है। वर्तमान में अपनी शिक्षा प्रणाली में बुद्धि को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है। शरीर के विभिन्न पहलू हैं, इनमें सर्वाधिक चिंता की जाती है सुंदर दिखने की! प्रसार माध्यम तो सौदंर्य पर ही पूरा ध्यान केंद्रित करते है। दुनिया के अनेक विद्वान, शिक्षाविद् बुद्धिकांक ;प्ण्फण्द्ध की अपेक्षा भावनांक ;म्ण्फण्द्ध को अधिक महत्वपूर्ण मानते है। आध्यात्मिकता, सामाजिकता, जिज्ञासा, अपयश को पीछे छोड़ते हुए नये जोश के साथ चलते हुए कार्यशक्ति, कार्यशैली, कार्य संस्कृति, आदि भी व्यक्तित्व विकास हेतु महत्त्वपूर्ण और निर्णायक माने जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रमुख उद्देश्य यही है कि उपरोक्त सभी मुद्दों को अपनाने, प्रयास करने की क्षमता है अथवा नहीं ये इक्कीसवीं सदी के शिक्षकों को सोचने का विषय है।</p>
<p style="text-align: justify;">पंचकोशीय विकास के लिये वर्तमान पाठ्यक्रम, कार्यक्रम, उपक्रम, के स्थान पर नया क्रम निश्चित करने का समय आ गया है। केवल ऊपरी तौर पर चर्चा करने से कुछ साध्य नहीं होगा, उसके जड़ तक जाना आवश्यक है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9192" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/GoogleDrive_Kids-Camp-2--300x200.jpg" alt="" width="1730" height="1153" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/GoogleDrive_Kids-Camp-2--300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/GoogleDrive_Kids-Camp-2-.jpg 600w" sizes="(max-width: 1730px) 100vw, 1730px" /></p>
<p style="text-align: justify;">योग, संगीत, संस्कृत, शारीरिक शिक्षा और नैतिक/आध्यात्मिक शिक्षा, इन पांच स्तंभों पर शिक्षा की इमारत खड़ी की जाये तभी ये ऊंची, मजबूत और टिकाउ होगी। बच्चों की व्यवहार सम्बन्धी विभिन्न समस्याएं आज सभी के लिये भयावह होती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्सटाइन ने कहा था- “जो और जिस प्रकार के विचार से समस्या निर्मित हुई है वह और उसी प्रकार के विचार से समस्या निवारण नहीं होगा।” अर्थात् कुछ अलग प्रकार के विचारों से ही समस्या निवारण हो पायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">आज अत्यंत तेज गति से परिवर्तन हो रहा है। इस वेग से घबराहट उत्पन्न हो रही है। ये गति और भी बढ़ने वाली है। इसलिये इस बदलती परिस्थिति को परखकर स्वयं में भी शिक्षक को आवश्यक बदलाव लाने चाहिये। पद्धति, दृष्टिकोण, साधन, प्रक्रिया आदि में परिस्थितिनुरूप परिवर्तन किये बिना शिक्षकों को इस चुनौती का सामना करना संभव नहीं होगा। विज्ञान और तंत्रज्ञान की अपनी मर्यादाएं हैं। विज्ञान और तंत्रज्ञान शिक्षक के लिए सहायक हो सकते हैं फिर भी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकते। तंत्रज्ञान द्वारा जानकारी अच्छी प्राप्त होती है, परंतु गुस्से से व्याप्त, निराशा से ग्रस्त, अपयश से निराश, बदले की भावना से ग्रस्त विद्यार्थियों की पीठ पर प्रेम से, स्नेहिल, प्रोत्साहन युक्त हाथ फेरने वाला तो केवल शिक्षक ही होगा। ‘संघर्ष करते रहो’ ऐसे शब्द कहकर आश्वस्त करने वाला शिक्षक ही होगा। इसी कारण शिक्षक का स्थान तंत्रज्ञान कभी ले नहीं सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">इस अपने ‘स्थान’ की पहचान स्वयं शिक्षक को है क्या? ये प्रश्न अभी अनुत्तरित ही है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/teachers-go-home/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षकों, घर जाओ!</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/need-of-teachers-for-students/">‘विद्यार्थियों’ के शिक्षकों की आवश्यकता</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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