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	<title>सनातन_संस्कृति Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<title>सनातन_संस्कृति Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>सनातन संस्कृति के मर्यादा पुरुषोत्तम : श्रीराम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 09:06:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ.कमल किशोर डुकलान &#8216;सरल&#8217; बांसन्तिक नवरात्र और रामनवमी के पर्व का सनातन संस्कृति में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चरित्र से गहरा संबंध है। सृष्टि की संचालिका आदिशक्ति की&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ.कमल किशोर डुकलान &#8216;सरल&#8217;</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9278" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/8569-300x169.jpg" alt="" width="1676" height="944" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/8569-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/8569-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/8569-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/8569.jpg 1500w" sizes="(max-width: 1676px) 100vw, 1676px" /></p>
<p style="text-align: justify;">बांसन्तिक नवरात्र और रामनवमी के पर्व का सनातन संस्कृति में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चरित्र से गहरा संबंध है। सृष्टि की संचालिका आदिशक्ति की आराधना का यह उत्सव हमें यह प्रेरणा देता है कि यम, नियम, व्रत-उपवास के द्वारा सूक्ष्म व स्थूल कार्मेंद्रियों की शुचिता और आत्म-अनुशासन की दृढ़ता से श्रीराम के मर्यादित पुरुषोत्तम स्वरूप को पाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">बासंतिक नवरात्र माँ आदिशक्ति की आराधना का उत्सव ईश्वर के प्रति आत्मनिष्ठा भारतीय संस्कृति का एक दार्शनिक पक्ष है, भारतीय बहुलतावादी उत्सवधर्मिता इसका एक जीता-जागता व्यावहारिक पक्ष है। वास्तव में अगर देखा जाए तो यहां की उत्सवधर्मिता जीवंतता की कसौटी है। पश्चिमी सभ्यता में उत्सव के बजाय ‘सेलिब्रेशन’ को अहमियत दी जाती है, जबकि भारतीय संस्कृति के संदर्भ में व्यक्ति का अंतर्मन जीवंतता से प्रफुल्लित हो उठता है और उत्सव की स्वाभाविकता का प्रकटीकरण होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय सनातन संस्कृति में चैत्र नवरात्र की नवमी तिथि में श्री रामनवमी मनाई जाती है। असल में चैत्र नवरात्र को सृष्टि की संचालिका आदिशक्ति की आराधना का सर्वश्रेष्ठ कालखंड माना गया है। यह उत्सव हमको यह प्रेरणा देता है कि नौ दिनों तक यम, नियम, व्रत-उपवास के द्वारा सूक्ष्म व स्थूल कर्मेंद्रियों की शुचिता और आत्म-अनुशासन में दृढ़ता से राम के मर्यादित और पुरुषोत्तम स्वरूप को पाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">राम शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘रम’ क्रीड़ायाम धातु से हुई है अर्थात प्रत्येक मनुष्य के अंदर रमण करने वाला जो चैतन्य-स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान है, वास्तव में वही राम है। राम को शील-सदाचार, मंगल-मैत्री, करुणा, क्षमा, सौंदर्य और शक्ति का पर्याय माना गया है। जब कोई व्यक्ति सतत साधना के द्वारा अपने संस्कारों का परिशोधन कर राम के इन तमाम सद्गुणों को अंगीकार कर लेता है तो उसका चित्त इतना निर्मल और पारदर्शी हो जाता है कि उसे अपने अंत:करण में राम के अस्तित्व का अहसास होने लगता है। कदाचित यही वह अवस्था है जब संत कबीर के मुख से निकला होगा &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में। ना मैं मंदिर ना मैं मस्जिद</strong><strong>, ना काबे कैलाश में।’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भगवान श्री राम राजा दशरथ और कौशल्या के ज्येष्ठ पुत्र थे। संस्कृत भाषा में राजा दशरथ का शाब्दिक अर्थ है- दस रथों का मालिक। अर्थात जो मनुष्य के अन्दर पांच कर्मेंद्रियां और पांच ज्ञानेंद्रियों का स्वामी ही दशरथ हैं। कौशल्या का अर्थ है- ‘कुशलता’ जब कोई अपनी कर्मेंद्रियों पर संयम रखते हुए अपनी ज्ञानेंद्रियों को मर्यादापूर्वक सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है तो उसका चित्त स्वाभाविक रूप से राम में रमने लगता है, और मनुष्य के लिए पूजा-अर्चना की तमाम सामग्रियां गौण हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना सहज और सरल हो जाता है कि वह जीवन में आने वाली तमाम मुश्किलों का स्थितप्रज्ञ होकर मुस्कुराते हुए सामना कर लेता है। भारतीय जनमानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं, बल्कि उनका महत्व इसलिए भी है, क्योंकि उन्होंने उन सब कठिनाइयों का सामना बहुत ही सहजता से किया। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए भी कहते हैं, क्योंकि भगवान श्रीराम ने अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी स्वयं को बेहद गरिमापूर्ण रुप से रखा।</p>
<p style="text-align: justify;">भगवान विष्&#x200d;णु का अवतार श्रीराम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्&#x200d;त शासन के लिए याद किया जाता है। भारतीय संस्कृति में अगर आस्था का प्रकटीकरण करना हो तो सबसे पहले राम ही याद आते हैं। उनका बाल्यकाल से लेकर प्रयाणकाल तक की सम्पूर्ण लीलाएँ धर्म व मर्यादा पर आधारित रही हैं जिस कारण उन्होंने अनन्त कोटि ब्रह्मांडनायक परब्रह्म होते हुए भी पारिवारिक जीवन में मर्यादा का इतना उत्कृष्ट आदर्श प्रस्तुत किया कि वे समस्त विश्व में ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहकर संबोधित किए जाने लगे।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9280 " src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Shri-Ram-Ji-Ki-Aarti-Hindi-Lyrics-300x169.webp" alt="" width="1596" height="899" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Shri-Ram-Ji-Ki-Aarti-Hindi-Lyrics-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Shri-Ram-Ji-Ki-Aarti-Hindi-Lyrics.webp 440w" sizes="(max-width: 1596px) 100vw, 1596px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अगर हम राम शब्द का सन्धि विच्छेद करते हैं तो &#8216;रा&#8217; अक्षर के उच्चारण मात्र से सारे संचित पाप शरीर से निकल जाते हैं और &#8216;म&#8217; अक्षर वह द्वार है जो पापों के निकलते ही बंद हो जाता है जो पुन: पापों के संचय को रोकता है। सप्तपुरियों में मोक्षदायिनी शब्द इसीलिए लगा है अयोध्या भी उसमें से एक मोक्षदायिनी पुरी है। राम भारत की सनातनी सांस्कृतिक चेतना हैं इसलिए राम के प्रति आस्था, धर्म के विचार के परे जाकर प्रकट होती है। ऐसा उदाहरण संभवत: विश्व की किसी भी अन्य संस्कृति में नहीं मिलता है, जहां किसी एक आराध्य की जीवन गाथा को मानवीय धरातल पर इतने गहराई से एकाकार होकर अंगीकृत किया जाता हो। यह इसलिए भी संभव हो पाता है, क्योंकि राम के जीवन के सभी पहलू कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सबके जीवन के साथ एकाकार होते हैं। इसलिए पश्चिमी देशों में अपने पूर्वजों की धरोहर को संजोकर रखने वाले संग्रहालय में रामचरितमानस का गुटका प्रमुख आकर्षण होता है। जिसने राम को नहीं जाना उसने अपने आपको नहीं जाना। जिससे राम का परिचय नहीं हुआ, वह अपने आपसे अपरिचित रह गया। इसलिए देव होते हुए भी राम अपने लगते हैं। जो श्वास के साथ जीवन के प्रमुख तंतु के रूप में जुड़ जाते हैं और व्यक्ति को उसमें तल्लीन कर देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत के विद्वान कवि महाकवि भास, कालिदास और भवभूति आदि कवियों ने श्रीराम को कुल रक्षक, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श पिता, धर्म-संस्थापक और आदर्श प्रजापालक जैसे चरित्रों को प्रजा के सामने रखा। महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में इक्ष्वाकु वंश का वर्णन किया तो महाकवि भवभूति ने उत्तर रामचरितम् में अनेक मार्मिक प्रसंग जोड़े हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो श्रीराम के आदर्श चरित्र का कोई प्रसंग नहीं छोड़ा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि रामचरितमानस में श्री राम की आदर्श की संपूर्णता वास्तव में गोस्वामी तुलसीदास जी ने ही प्रदान की है। रामचरितमानस एक ऐसी कालजयी रचना है जो भारतीय मनीषा के समस्त लौकिक, पारलौकिक, आध्यात्मिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को श्रीराम के चरित्र से जोड़ती है।</p>
<p style="text-align: justify;">रामनवमी का उत्सव समूची मानव जाति के लिए उल्लास का उत्सव है, यह उत्सव अपने &#8216;स्व&#8217; को अनुभूत करने का उत्सव है। यह पर्व धर्म की स्थापना एवं बुराइयों से संघर्ष का प्रतीक पर्व है, आज भी अंधेरों से संघर्ष करने के लिये इस प्रेरक एवं प्रेरणादायी पर्व की संस्कृति को जीवंत बनाने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">हम सब भी मन में सबके प्रति सद्भाव रखते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जैसा आचरण करेंगे तो समूचे विश्व के मंगल की कामना में हमारी आस्था में श्रीराम का सही प्रकटीकरण होगा।</p>
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		<title>हल्दीघाटी युद्ध विजय@450 वर्ष : आक्रांता से संधि कैसी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Dec 2025 05:38:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रताप सिंह झाला &#8216;तलावदा&#8217; अकबर ने महाराणा प्रताप के पास चार संधि प्रस्ताव भेजे। मान सिंह को तो उन्होंने कहा था कि एक म्लेच्छ और आक्रांता के साथ कोई&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रताप सिंह झाला &#8216;तलावदा&#8217;</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-9172" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/mAHARANA-e1766986474576-300x199.jpg" alt="" width="1722" height="1142" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/mAHARANA-e1766986474576-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/mAHARANA-e1766986474576-1024x680.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/mAHARANA-e1766986474576-768x510.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/mAHARANA-e1766986474576.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अकबर ने महाराणा प्रताप के पास चार संधि प्रस्ताव भेजे। मान सिंह को तो उन्होंने कहा था कि एक म्लेच्छ और आक्रांता के साथ कोई संधि नहीं हो सकती।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">महाराणा प्रताप ने अकबर को कभी बादशाह कहकर संबोधित नहीं किया। उन्होंने उसे हमेशा तुर्क आक्रांता ही कहा। मेवाड़ से प्रथम युद्ध (1568 ई.) के बाद ही अकबर को यह स्पष्ट हो गया था कि युद्ध से मेवाड़ को जीतना कठिन है। इस बीच महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के बाद महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ में रहकर मेवाड़ का राज्य संभालने लगे। महाराणा का भाई जगमाल, जो स्वयं को गद्दी का अधिकारी बता रहा था, आगरा में अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ। उसे मेवाड़ की सीमा पर जहाजपुर परगना देकर अकबर ने मेवाड़ की अंर्तकलह को स्थाई बना दिया। इस अंर्तकलह का लाभ उठाने के लिए अकबर ने मेवाड़ से युद्ध करने के स्थान पर कूटनीति से संधि करने का प्रस्ताव पेश किया।</p>
<p style="text-align: justify;">इधर, प्रताप ने मेवाड़ का महाराणा बनते ही सिरोही पर कल्ला देवड़ा के जरिए अधिकार कर लिया तथा कुछ समय बाद राव सुरताण से मित्रता भी कर ली। महाराणा प्रताप सिंह ने मंदसौर के मुगल थानों पर जबरदस्त हमले कर मुगलों को चेता दिया कि मेवाड़ युद्ध के लिए तैयार है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मुगलों का प्रथम संधि प्रस्ताव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अकबर को प्रताप के महाराणा बनने की जानकारी लग गई थी, लेकिन पहले गुजरात के विद्रोह से निपटना उसके लिए अधिक जरूरी था और सिद्धपुर की ओर अभियान किया। अक्तूबर 1572 ई. में अकबर ने अपने सबसे अच्छे कूटनीतिज्ञ जलाल खां कोरची को प्रताप से बातचीत करने मेवाड़ भेजा। कोरची ने महाराणा के समक्ष प्रस्ताव रखा कि राजपूताने के अधिकांश राजा अकबर के दरबार में मनसब स्वीकार कर हाजिरी बजा रहे हैं और मुगलों की ओर से राजपूतों और भारत के अन्य हिन्दू राज्यों को जीत कर मुगल सम्राज्य को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में न तो धन से और न ही बल से अकबर विजय पाना संभव है। जलाल खां ने महाराणा प्रताप को यह समझाने का प्रयास किया कि मुगल संप्रभुता स्वीकार करना मेवाड़ के हित में है, किंतु महाराणा अपनी बात पर अडिग रहे और संधिवार्ता विफल हो गई। महाराणा प्रताप ने कहा, “संधि राजाओं के मध्य होती है। आक्रांताओं के साथ संधि नहीं होती।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरी बार मान सिंह को भेजा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जलाल खां कोरची नवंबर 1572 ई. में आगरा लौट गया। छह माह बाद गुजरात की समस्या से निपट कर अकबर ने मान सिंह के नेतृत्व में डूंगरपुर व उदयपुर की ओर सेना भेजी। उसके साथ शाह कुली खां, मुराद खां, मुहम्मद कुली खां, सैयद अब्दुल्ला, मान सिंह का छोटा भाई जगन्नाथ कछवाहा, राजा गोपाल सिंह कछवाहा, बहादुर खां, लश्कर खां, जलाल खां और बूंदी के राव हाड़ा भोज थे। अकबर का संधि प्रस्ताव लेकर मान सिंह डूंगरपुर पहुंचा। वहां रावल आसकरण से उसका युद्ध हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">मान सिंह की सेना ने डूंगरपुर जीत लिया और रावल वहां से निकल कर पहाड़ों में चले गए। डूंगरपुर पर अधिकार करने के बाद मान सिंह ने अधिकतर सेना को अजमेर भेज दिया। वह कुछ सैनिकों को साथ रख कर महाराणा से समझौता वार्ता करने के लिए जून 1573 ई. में उदयपुर पहुंचा। अकबर के संधि प्रस्ताव पर महाराणा ने मान सिंह ने कहा, &#8220;एक मलेच्छ, तुर्क आक्रांता से किसी भी तरह की संधि नहीं हो सकती।&#8221; उन्होंने मान सिंह को प्रस्ताव दिया कि वह मेवाड़ के पाले में आ जाए और मुगलों को भारत से भगाने में उनका साथ दे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">यह सुनकर मान सिंह स्तब्ध रह गया। हालांकि राजकीय शिष्टाचार के अनुसार महाराणा ने उसका सत्कार किया और भोजन के समय अपने पुत्र अमर सिंह को साथ भोजन करने के लिए भेजा। मान सिंह और उसके साथी भोजन कक्ष में अपने-अपने आसन पर बैठ गए। वे महाराणा की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन उन्होंने कहलवा भेजा यह सुनकर मान सिंह स्तब्ध रह गया। हालांकि राजकीय शिष्टाचार के अनुसार महाराणा ने उसका सत्कार किया और भोजन के समय अपने पुत्र अमर सिंह को साथ भोजन करने के लिए भेजा। मान सिंह और उसके साथी भोजन कक्ष में अपने-अपने आसन पर बैठ गए। वे महाराणा की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन उन्होंने कहलवा भेजा कि उनके पेट में दर्द है, इसलिए वह भोजन नहीं कर सकते। दरअसल, महाराणा प्रताप मान सिंह के साथ बैठकर भोजन नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को भेजा था। महाराणा प्रताप का यह निर्णय उचित था, लेकिन मान सिंह को यह बात खटक गई। उसने अपमानित महसूस किया।</p>
<p style="text-align: justify;">उपस्थित लोगों में कानाफूसी होने लगी। भोजन के बाद केसर मिश्रित पान के सेवन के वक्त मेवाड़ के सामंत भीम सिंह डोडिया और मान सिंह के बीच शाब्दिक विवाद भी हुआ था। इससे वह रुष्ट हुआ और महाराणा से आज्ञा लेकर आगरा की ओर रवाना हो गया। वह सीधे आगरा पहुंचा और अकबर से मुलाकात कर मेवाड़ में महाराणा प्रताप से वार्ता के विफल होने की जानकारी दी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9173" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/896-300x169.jpg" alt="" width="1637" height="922" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/896-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/896-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/896.jpg 948w" sizes="auto, (max-width: 1637px) 100vw, 1637px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अकबर का तीसरा प्रयास</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अकबर उसी समय मेवाड़ पर चढ़ाई करना चाहता था, लेकिन उस समय वह अपने राज्य को व्यवस्थित करने में लगा हुआ था। अतः उसने सितंबर-अक्तूबर 1573 ई. में आमेर के राजा भगवन्तदास को संधि प्रस्ताव के साथ महाराणा के पास भेजा। भगवन्तदास मान सिंह का पिता व भारमल का बेटा था और पहले महाराणा उदय सिंह का सामंत था, पर 1562 ई. में अकबर ने उसकी बहन से विवाह किया। इसके बाद भगवन्तदास मेवाड़ का सामंत पद छोड़कर अकबर की खिदमत में चला गया। प्रताप को अपनी ताकत दिखाकर डराने के मकसद से वह बड़नगर, रावलिया आदि इलाकों पर कब्जा करता हुआ ईडर पहुंचा। ईडर के राय नारायणदास प्रताप के ससुर थे, उन्होंने भगवन्तदास की खातिरदारी की, लेकिन मुगल दरबार में नहीं गए। महाराणा प्रताप ने गोगुंदा के महलों में भगवन्तदास से मुलाकात की, जब उसने अकबर का संधि प्रस्ताव सुनाया तो उन्होंने कठोरता से मन आकर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अबुल फजल का झूठ</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अबुल फजल लिखता है, &#8220;उदयपुर में बागियों को सबक सिखाकर राजा भगवन्तदास, शाह कुली महरम, लश्कर खां समेत कुछ सिपहसालारों के साथ राणा को समझाने गोगुंदा पहुंचा। भगवन्तदास को राणा अपने महल ले गया। राणा का दिल उजाड़ था। उसने खुद न आकर अपने बेटे अमरा को राजा भगवन्तदास के साथ बादशाही खिदमत में भेजा। शहंशाह ने अमरा (अमर सिंह) को वापस मेवाड़ भेज दिया।&#8221; यह बिल्कुल असत्य है। यह बात सिवाय अबुल फजल के किसी भी मुगल इतिहासकार ने नहीं लिखी। अबुल फजल की इस बात को गलत साबित करने वाला था जहांगीर। &#8216;तुजुक-ए-जहांगीरी&#8217; में जहांगीर लिखता है कि राणा अमर सिंह ने हिन्दुस्थान के किसी बादशाह को नहीं देखा। उसने और उसके बाप-दादाओं ने भी कभी किसी बादशाह के पास हाजिर होकर ताबेदारी नहीं की।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>टोडरमल ने मांगा हाथी राम प्रसाद</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एक माह बाद ही दिसंबर 1573 ई. में अकबर ने अपने वित्त मंत्री राजा टोडरमल को वार्ता के लिए मेवाड़ भेजा, लेकिन वह भी महाराणा प्रताप के साथ समझौता वार्ता में विफल होकर खाली हाथ लौट गया। महाराणा प्रताप को संधि के लिए मनाने के लिए अकबर की ओर से यह चौथा संधि प्रस्ताव दल मेवाड़ भेजा गया था। जब टोडरमल को अपना काम बनता हुआ नहीं दिखा, तो उसने महाराणा से कहा कि &#8216;संधि की बात छोड़िए, आप तो बस अकबर के लिए एक तोहफा ही भिजवा दीजिए। तोहफे के रूप में यदि आप अपना प्रिय रामप्रसाद हाथी दे दें तो बेहतर रहेगा।&#8217; लेकिन वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने टोडरमल का यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया और कहा कि पहले तो आप बुजुर्ग हैं, दूसरे आप दूत हैं, इस खातिर हम विनती करते हैं कि ऐसा प्रस्ताव दोबारा न रखिएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">अबुल फजल लिखता है कि टोडरमल जब राणा को समझाने गया, तो उन्होंने अदब के साथ उसके साथ दूत जैसा व्यवहार किया, लेकिन संधि प्रस्ताव को ठुकरा दिया। प्रताप अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और अस्मिता के साथ समझौता कर उसे किसी विदेशी आक्रान्ता को समर्पित नहीं करना चाहते थे। वे भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति के पुरोधा थे और अकबर आक्रांता था। इस तरह, अकबर ने चार बार संधि प्रस्ताव भेजा, लेकिन वह महाराणा प्रताप के स्वाभिमान को डिगा नहीं सका। अकबर के दरबारी कवि दुरसा आढ़ा ने लिखा है-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कदे न नमावे कंध</strong><strong>, अकबर ढिग आवेने ओ। सूरज वंश संबंध, पाले राण प्रतापसी॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इसका अर्थ है, सूर्य किसी के भी सामने नहीं झुकता। प्रताप सूर्य का वंशज है, इसलिए अपनी वंश-मर्यादा को रखने के लिए वह भी किसी के सामने नतमस्तक नहीं होता।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक वन विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेवाड़ के इतिहास के जानकार व झाला मन्ना के उत्तराधिकारी है।)</p>
<p style="text-align: justify;">साभार पांचजन्य</p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/haldighati-battle-victory-450-years-rana-of-mewar-the-maharana-of-all/" target="_blank" rel="noopener">हल्दी घाटी युद्ध विजय@450 वर्ष : मेवाड़ के राणा सबके महाराणा</a></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/haldighati-war-victory-450-years-how-to-make-a-treaty-with-the-invader/">हल्दीघाटी युद्ध विजय@450 वर्ष : आक्रांता से संधि कैसी</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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