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	<title>संस्कार और साक्षरता Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>संस्कार और साक्षरता Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>संस्कार और साक्षरता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 13:41:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; दिलीप बेतकेकर ‘साक्षर जनता &#8211; भूषण भारत’, (जनता साक्षर हो तो भारत विभूषित होगा) ‘साक्षरतेचा दिवा घरोघर लावा’, (साक्षरता का दीपक हर घर में जले), ये और इस जैसी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p style="text-align: justify;">‘साक्षर जनता &#8211; भूषण भारत’, (जनता साक्षर हो तो भारत विभूषित होगा) ‘साक्षरतेचा दिवा घरोघर लावा’, (साक्षरता का दीपक हर घर में जले), ये और इस जैसी अनेक घोषणाएं आजकल सर्वत्र दिखाई-सुनाई पड़ती हैं। प्रचार-प्रसार माध्यमों के द्वारा भी साक्षरता का प्रचार हो रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात कितने ही वर्षों की अवधि बीत जाने पर अभी भी जनता निरक्षर है यह बात गौरव के प्रतिकूल है। साक्षरता योजना का प्रभाव शंकास्पद रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि उद्देश्य अच्छा है। सभी स्तरों पर साक्षरता हेतु प्रयास निरंतर चल रहे हैं। यह अच्छी बात है।</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल की परिस्थिति को देखते हुए केवल साक्षरता पर ही दबाव बनाना उचित नहीं है। कोई व्यक्ति साक्षर होते हुए भी संस्कारवान न हो तो साक्षर व्यक्ति को राक्षस बनने में देर नहीं लगेगी। अपने देश में कुछ समय पूर्व घटित और अभी भी निरंतर घट रही घटनाएं इस ओर संकेत करती हैं। बड़ी-बड़ी आर्थिक चोरी वाली घटनाओं को अंजाम देने वाले निरक्षर नहीं हैं, उच्च विद्या विभूषित व्यक्ति हैं। बम विस्पफोट घटनाओं में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लिप्त व्यक्ति निरक्षर नहीं। अच्छे पदवीधर व्यक्ति, साक्षर व्यक्ति हैं। किन्तु उनका व्यवहार देखते हुए ‘राक्षस’ कहने की इच्छा ही होगी। देशभक्ति का संस्कार नहीं, सामाजिक बंधनों के संस्कार नहीं। परिणामस्वरूप अन्य किसी का कुछ भी हो, मुझे आरामतलब जिंदगी बिताना है, यही उद्देश्य रहता है। सत्ता की कुर्सी हथियाने हेतु प्रयास, एक दूसरे की टांग खींचने की स्पर्धा, ये सब केवल निरक्षर व्यक्ति करते हैं ऐसी बात नहीं। अपनी विद्या का, साक्षरता का, उपयोग (दुरुपयोग) ये साक्षर व्यक्ति स्वयं के भरने हेतु करते हैं। घिन आती है, इन तथाकथित ‘साक्षर’ व्यक्तियों को देखकर।</p>
<p style="text-align: justify;">इसका अर्थ ये नहीं कि साक्षरता के महत्व को कम आंका जाना चाहिए, किन्तु साक्षरता संस्कारों के साथ हुए बिना साक्षरता का कोई अर्थ नहीं। ‘शिक्षा एक द्विधारी तलवार जैसी है’ ऐसा डॉ॰ बाबा साहब अंबेडकर कहते थे। इस शस्त्र का उपयोग सावधानीपूर्वक होना चाहिए। आज हम देखते हैं कि इस शस्त्र का प्रयोग स्वयं के लाभ हेतु और समाज के अहित के लिये हो रहा है। इसीलिए संस्कारों की आवश्यकता पूर्व की अपेक्षा आजकल अधिक हो रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कार और साक्षरता दोनों का सहकार आवश्यक है। हमें केवल ‘शिक्षित’ नहीं, वरन ‘सुशिक्षित’ लोग चाहिए। जब साक्षरता का मेल संस्कारों से होगा तभी ‘सुशिक्षित’ मानव का गठन हुआ माना जायेगा। तब दूध में शक्कर मिलने समान अनुभव होगा, स्वर्ण सुगंधित हो जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">‘संस्कार’ मतलब क्या? ये संस्कार किसलिये? ऐसे प्रश्न अनेक बार पूछे जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘संस्कार’ का अर्थ यदि समझ लिया जाये तो ‘किसलिये हैं ये संस्कार?’ ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जायेंगे। ‘संस्कार’ शब्द का शब्दकोष में लिखा अर्थ है पूर्णता, शुद्ध, परिणाम, समाप्ति। किसी बात में पूर्णता लाने के लिये जो कुछ किया जाता है उसे संस्कार कह सकते है, अथवा अंतिम परिणाम प्राप्ति के लिये जो रचनात्मक कार्य आवश्यक है उसे संस्कार कहना ठीक होगा। उदाहरण के लिये &#8211; मूर्तिकार को मूर्ति बनानी है। इस हेतु उसे मिट्टी की आवश्यकता है। किन्तु जिस रूप में है वैसी ही मिट्टी लेकर मूर्ति नहीं बन सकती। मूर्ति गढ़ने के लिये उपयुक्त मिट्टी तैयार करनी पड़ेगी। मिट्टी में से कंकर-पत्थर, कचरा आदि अनावश्यक वस्तुओं को अलग करना पड़ता है। मिट्टी को छानना पड़ता है। उचित मात्रा में पानी मिलाकर गूंधना पड़ेगा। मिट्टी अधिक पतली न हो, न ही अधिक कठोर, इसकी सावधानी मूर्तिकार अवश्य रखेगा। मूर्तिकार मिट्टी के साथ जो ये सब प्रक्रियाएं करता है उसे मिट्टी का संस्कार कहते हैं। शिल्पकार भी पत्थर पर इसी प्रकार संस्कार करता है। लेखक भी जो कुछ लिखता है उस पर संस्कार करता है अर्थात् पूर्णता लाने के लिये जो कुछ करना पड़ता है उसे मोटे तौर पर संस्कार कह सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जब निर्जीव वस्तुओं पर संस्कार करने की आवश्यकता होती है तो मनुष्य के लिये संस्कार की कितनी आवश्यकता होगी, इसकी कल्पना कर सकते हैं। निर्जीव के सम्बन्ध में एक सुविधा है। पत्थर को एक आकार दे दिया तो वह बदलता नहीं, परन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। मनुष्य का मन अति चंचल है। पल-पल मन के विचार बदलते रहते हैं। बुद्धि को रास आई कोई बात प्रत्यक्ष कार्यान्वित होगी या नहीं, कहना कठिन है। इसलिये मानवीय मन पर केवल एक बार संस्कार करना पर्याप्त नहीं होता। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है मानव के समबन्ध में।</p>
<p style="text-align: justify;">‘किसलिये ये संस्कार?’ प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति को किसी ने धोखा दिया, लूट लिया, कोई उससे झूठ बोला तो उसे बुरा लगेगा। उसकी अपेक्षा होती है कि सभी लोग उससे सच बोलें, ईमानदारी बरतें, उसे धोखा न दें इत्यादि। अब यदि सच बोलना आदि संस्कार सामने वाले मनुष्य पर नहीं हुआ हो तब वह आपसे अच्छा व्यवहार, ईमानदारी का बर्ताव नहीं कर सकता और इस प्रकार का गलत व्यवहार हमें पसन्द नहीं होगा। इसलिये आवश्यक है संस्कार। ये संस्कार कैसे होते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">शासकीय सेवा में कार्यरत माता-पिता को जब ध्यान में आता है कि उनके पुत्र ने पिता की जेब से 4-5 रुपये की चोरी की है तब वे नाराज होते हैं। उससे भी अधिक उन्हें बुरा लगा, दुःख हुआ। हम अपने बच्चे को प्यार-दुलार करते हैं, उसकी सभी इच्छाएं पूरी करते हैं, उसका कौतुक देखते हैं, फिर भी उनके लाड़ले ने चोरी की। इस घटना से दोनों ही दुःखी हुए। बच्चे को दोबारा ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये ऐसा वह सोचने लगे। उन्होंने बच्चे को एक कॉपी-पेन्सिल दी और कॉपी पर ‘चोरी कभी नहीं करना’ वाक्य पांच सौ बार लिखने को कहा। बच्चा लिखने लगा। परन्तु जिस पेन्सिल से वह बच्चा लिख रहा था वह पेन्सिल माता अपने ऑफिस से लायी है और जिस कॉपी पर वह लिख रहा था वह पिताजी के ऑफिस से आयी है ये उस बच्चे को मालूम था। इसलिये ‘चोरी कभी नहीं करना’ वाक्य को वह पांच सौ क्या पांच हजार बार लिखे तब भी चोरी न करने का संस्कार कभी होना संभव नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘चोरी कभी नहीं करना’ ये वाक्य बच्चा लिख सकता है, पढ़ सकता है अर्थात् बच्चा ‘साक्षर’ हुआ। किन्तु वैसा व्यवहार करना उसकी आदत में नहीं आया क्योंकि उसका संस्कार नहीं बना अर्थात् बच्चा साक्षर हुआ, शिक्षित हुआ किन्तु सुशिक्षित नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">समाज की गाड़ी ठीक से चले इसलिये कुछ नियम बने हैं। ये नियम लिखने-पढ़ने में आयें इतना पर्याप्त नहीं। प्रश्न उठता है उन नियमों का पालन करने का। यहीं ‘संस्कार’ का विचार करना पड़ता है। सभी कृतियों का उद्गम स्थान ‘मन’ ही होने के कारण उसका संस्कारित होना महत्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">साक्षरता का महत्व सभी को ज्ञात है। शाला में क्यों भेजना? क्यों पढ़ाई करना? ऐसे प्रश्न आजकल पूछे नहीं जाते। अशिक्षित व्यक्ति को भी अपने बच्चे की पढ़ाई होना आवश्यक है, ऐसा समझ में आता है। किन्तु संस्कारों का अभाव रहता है। अनेक शिक्षित पालकों को अपने बच्चे का परीक्षा में प्रथम आना भाता है और वे यह समझते हैं कि सब कुछ पा लिया। वह प्रथम स्थान किसी भी प्रकार से प्राप्त हो, इसका विचार वे नहीं करते।</p>
<p style="text-align: justify;">एक परीक्षा केन्द्र पर निरीक्षक को बड़े पैमाने पर ‘नकल’ के सम्बन्ध में पता चला। उन्होंने ऐसे छात्रों पर कठोर कार्यवाही करते हुए सभी नकलची छात्रों को बाहर कर दिया। वे लड़के बाहर चले गये। कुछ देर पश्चात वे और उनके पालक आ गये और उस परीक्षा केन्द्र पर पथराव करने लगे। अंत में पुलिस की सुरक्षा में निरीक्षक शिक्षा अधिकारियों को वापिस भेजना पड़ा। ये साक्षरता देश को कहां पहुंचाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">एक चीनी कहावत है, ‘आपको एक वर्ष की व्यवस्था करनी है तो अनाज बोएं, दस वर्ष की व्यवस्था करनी है तो वृक्षारोपण करो और सौ वर्ष की व्यवस्था करनी है तो मनुष्य का गढ़न करो।’</p>
<p style="text-align: justify;">और ऐसे मनुष्य गढ़ने के लिए ‘संस्कार और साक्षरता’ दोनों ही अत्यंत आवश्यक हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/bharatiya-concept-of-personality-development/" target="_blank" rel="noopener">व्यक्तित्व विकास की भारतीय संकल्पना</a></span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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