<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>बाल बालिदानी Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
	<atom:link href="https://rashtriyashiksha.com/tag/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://rashtriyashiksha.com/tag/बाल-बालिदानी/</link>
	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
	<lastBuildDate>Thu, 08 Feb 2024 11:34:59 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	

<image>
	<url>https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/cropped-Logo-Hindi-32x32.png</url>
	<title>बाल बालिदानी Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
	<link>https://rashtriyashiksha.com/tag/बाल-बालिदानी/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>डाकोर जी का शंकर</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/shankar-of-dakor-ji/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/shankar-of-dakor-ji/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Feb 2024 11:31:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल बलिदानी]]></category>
		<category><![CDATA[Bal Balidani]]></category>
		<category><![CDATA[Dakore Ji Shankar]]></category>
		<category><![CDATA[Gujrat]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[गुजरात]]></category>
		<category><![CDATA[डाकोर जी का शंकर]]></category>
		<category><![CDATA[बाल बालिदानी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=7387</guid>

					<description><![CDATA[<p>✍ गोपाल माहेश्वरी वीरों की गाथाएँ सुनकर वीरोचित मानस बनता है। मातृभूमि पर बलि होने का बच्चों में साहस ठनता है।। कहानियाँ तो प्रायः सभी बच्चे सुनते हैं लेकिन सारे&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/shankar-of-dakor-ji/">डाकोर जी का शंकर</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-7389" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/02/Dakore-300x169.jpg" alt="" width="1449" height="816" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/02/Dakore-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/02/Dakore-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/02/Dakore-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/02/Dakore.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1449px) 100vw, 1449px" /></p>
<p style="text-align: center;"><strong>वीरों की गाथाएँ सुनकर वीरोचित मानस बनता है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मातृभूमि पर बलि होने का बच्चों में साहस ठनता है।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कहानियाँ तो प्रायः सभी बच्चे सुनते हैं लेकिन सारे बच्चे यह नहीं जानते कि कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं होती हैं बल्कि कहानियाँ हमारे कोमल मन को भविष्य के लिए पक्का बना रही होती हैं। हम जैसी कहानी सुनेंगे, उसकी घटनाएँ आगे चल कर हमारा संस्कार बन जाएँगी। कहानियों का बाल मन पर कैसा प्रभाव रहता है, यह जानना हो तो एक सच्ची घटना बताता हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">एक था शंकर। गुजरात के डाकोर गाँव में रहने वाला। उसके पिता नदी पर जाकर लोगों के कपड़े धोया करते थे। नाम था डाह्या भाई। नन्हा शंकर पिता के पास जब भी होता, कहानी सुनाने का आग्रह करता और वे उसे मना भी नहीं करते। पर वे कहानियाँ परियों की, जादूगर की या मनोरंजन भरी कहानियाँ न होकर देश के लिए बलिदान होने वाले स्वतंत्रता सेनानियों की सच्ची कहानियाँ होती थीं। उस समय सारे देश का वातावरण ही कुछ ऐसा था कि हर भारतीय स्वतंत्रता पाने के लिए मचल उठा था। बलिदान देने की होड़ लगी हुई थी।</p>
<p style="text-align: justify;">उस रात डाह्या भाई धेबी घाट से खूब थके हुए लौटे थे, पर शंकर ने आग्रह किया तो वे कहानी सुनाने लगे अमर शहीद भगत सिंह की। कहानी सुनकर शंकर पूछ बैठा, “शाला में गुरुजी कहते हैं कि जिसने भी जन्म लिया है वह मरता ही है। फिर फाँसी पर चढ़ कर भी भगत सिंह अमर कैसे हुए?”</p>
<p style="text-align: justify;">“बेटा! जो महान उद्देश्य के लिए, अपने देश-धर्म के लिए मरते हैं, वे मर जाने पर भी कई पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं इसीलिये अमर कहलाते हैं” और पिता ने ऐसे अनेक महापुरुषों के नाम गिनाए जो अमर कहलाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">रात को कहानी सुनते समय प्रायः नींद आने लगती है पर शंकर के मन में तो जैसे चैतन्य का विस्फोट हुआ हो, वह एकदम अत्यन्त उत्साह से उठकर खड़ा हुआ और पिता से बोला “बापू! अगर मैं अंग्रेजों को मार भगाऊँ तो मैं भी अमर हो जाऊँगा?”</p>
<p style="text-align: justify;">आजादी के आन्दोलन से डाकोर गाँव अछूता न था। वहाँ भी समय-समय पर जनता को जगाने और फिरंगियों को भगाने की बातों और योजनाओं वाली सभाएं होती रहती थीं और डाह्या भाई उनमें जाते भी थे। वे देश की वर्तमान परिस्थिति में अपने बच्चे के विचार सुनकर गर्व से भर उठे। बोले, “अवश्य, डीकरा! तू अंग्रेजों को भगाएगा तो लोग तुझे हमेशा याद रखेंगे। तू जरूर अमर बनेगा।” बाप ने बेटे को बाहों में समेट कर खूब लाड़ किया। धन्य हैं ऐसे पिता, जो अपनी संतानों को मातृभूमि की रक्षा की दीक्षा देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">नन्हा शंकर अब चौदहवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था। उधर 9 अगस्त को महात्मा गाँधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद कर देशभर को ‘करो या मरो’ का मंत्र दे दिया था। आन्दोलन तो एक प्रत्यक्ष माध्यम था, स्वतंत्रता पाने की छटपटाहट तो भारतवासियों में 1857 से ही तेज हो उठी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">डाकोर ग्राम में भी जुलूस निकला। हाथों में तिरंगा थामे शंकर भी पिता के साथ देशभक्ति के नारे लगाता जुलूस में सम्मिलित हुआ। पुलिस बल थोड़ा था और जनता का उत्साह अपार। भीड़ को रोकने आयी पुलिस भीड़ के हाथों अपनी बन्दूकें भी गँवा चुकी थी। सदैव पीटने वाले आज पिट रहे थे। शंकर के हाथों के झण्डे का डण्डा भी जमकर चला। अहिंसक नीति के पक्षधर एक स्वयंसेवक छोटा भाई ने लोगों को रोककर पुलिस वालों की बन्दूकें वापस दिलवाईं और उन्हें सुरक्षित भगाने में सहायता की। दुष्टों पर दया दिखाने का दुष्परिणाम भी तुरंत मिला। कुछ ही समय में भारी पुलिस दल निहत्थे ग्रामवासियों को गोलियों से भून रहा था। छोटा भाई भी उन गोलियों से बच न सके।</p>
<p style="text-align: justify;">इस हत्याकाण्ड का विरोध करने पर भारी प्रदर्शन हुआ कैरा (जिला स्थान) में। शंकर तो अति उत्साहित था ही। माँ ने रोका “बेटा! वहाँ बहुत पुलिस होगी। तुम छोटे हो।”</p>
<p style="text-align: justify;">“छोटा हूँ तो क्या, उस दिन पुलिस वालों की पिटाई नहीं कर सका था?” वह पिता के साथ जाने की ठान चुका था।</p>
<p style="text-align: justify;">कैरा के उस प्रदर्शन में सैकड़ों पुलिस वाले बन्दूकें ताने सामने खड़े थे और हजारों देशभक्त ‘भारत माता की जय’, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’, ‘महात्मा गाँधी की जय’ के नारे लगाते समुद्र की तूफानी लहरों की तरह आगे बढ़ रहे थे। हाथों में तिरंगा लिये शंकर भी पहली पंक्ति में आगे बढ़ रहा था। गोलियाँ चलती गईं, लाशें बिछती गईं। शंकर को आज छोटी सी आयु में ही ‘अमर’ होने का अवसर मिल गया था। वह चल पड़ा था शहीद शिरोमणि भगत सिंह से मिलने स्वर्ग की ओर।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/sacrificial-leadership-of-phuleshwari/" target="_blank" rel="noopener">फुलेश्वरी का बलिदानी नेतृत्व</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/shankar-of-dakor-ji/">डाकोर जी का शंकर</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/shankar-of-dakor-ji/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
