भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 81 (शिक्षा की तंत्रगत समस्याएँ)

 ✍ वासुदेव प्रजापति

आज की आधुनिक शिक्षा में शिक्षक गौण होता जा रहा है और तंत्र प्रमुख बनता जा रहा है। हमारे यहाँ तो कहा जाता रहा है कि “गुरु बिन ज्ञान कहाँ से पाऊँ”, अर्थात ज्ञान देनेवाला तो गुरु ही है, बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। किन्तु आज गुरु/शिक्षक का स्थान तंत्र लेता जा रहा है। शिक्षा के लिए ऐसी व्यवस्थाएँ खड़ी की जा रही हैं, जिनमें शिक्षक की उपस्थिति आवश्यक नहीं है। बिना शिक्षक के तंत्र ही सब कुछ कर रहा है, तंत्र मनुष्य के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। इसलिए शिक्षा में तंत्र से सम्बन्धित कुछ व्यावहारिक समस्याएँ उपस्थित हो रही हैं।

तंत्र में दायित्वबोध का अभाव है

आज शिक्षा के तंत्र का दायित्व लेने वाला कोई नहीं है। अधिकार रखने वाले तो अनेक हैं परन्तु जवाबदेही किसी की नहीं है। दायित्वबोध के अभाव में या तो कुछ भी नहीं होता या सब कुछ हो जाता है। क्योंकि काम करने वाला तंत्र है, व्यक्ति नहीं। व्यवस्था बहुत अच्छी होने पर भी उसे संभालने वाला व्यक्ति नहीं है, व्यवस्था को व्यवस्था ही संभाल रही है। लोग शिकायत करते हैं कि तंत्र बहुत जड़ हो गया है। तंत्र तो जड़ ही होता है, किन्तु विशेष बात यह हो गई है कि तंत्र ने मनुष्य को भी जड़ बना दिया है। हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि तंत्र मनुष्य के लिए होता है, व्यवस्था के लिए नहीं।

यह सभी जानते हैं कि सरकारी विद्यालयों में अच्छी पढ़ाई नहीं होती। सात-आठ वर्ष पढ़ने के बाद भी छात्रों को पढ़ना नहीं आता। ऐसा भी नहीं है कि सरकारी विद्यालयों के शिक्षक योग्य नहीं होते। वास्तविकता यह है कि निजी विद्यालयों की तुलना में सरकारी शिक्षक अधिक योग्यता रखते हैं। समस्या उनकी योग्यता की नहीं अपितु नियत की है या उन्हें प्रेरणा देने वाली और उन्हें नियमन में रखने वाली व्यवस्था की है। यह सब जानते हुए भी उनकी नियत को बदला नहीं जा सकता।

ऐसा होना अत्यन्त स्वाभाविक है क्योंकि जब जड़ तंत्र ही नियमन करता है, तब मनुष्य उस तंत्र के अधीन हो जाता है। तंत्र तो जड़ है जबकि मनुष्य चेतन है। जड़ तंत्र के पास विवेक नहीं होता जबकि चेतन मनुष्य के पास विवेक होता है, इसलिए मनुष्य को तंत्र के अधीन रहना अच्छा नहीं लगता। परन्तु व्यवस्था के कारण मनुष्य कुछ कर नहीं सकता। फलतः जड़-तंत्र में काम करते-करते वह स्वयं जड़ बन जाता है। और जड़ बनकर वह सबसे पहले दायित्व छोड़ने का काम करता है।

जड़तंत्र अपूर्ण है

मनुष्य का स्वभाव है अच्छा बने रहना, अच्छे-अच्छे काम करना। अच्छे काम करने के लिए उसे कोई न कोई प्रेरणा चाहिए या किसी का नियंत्रण चाहिए। ये दोनों बातें उसे जीवित मनुष्य से ही प्राप्त होती हैं। तंत्र न तो प्रेरणा दे सकता है और न मनुष्य का नियंत्रण कर सकता है। तंत्र नियंत्रण तो करता है परन्तु वह केवल जड़ का ही नियंत्रण कर सकता है। जैसे तंत्र द्वारा उपस्थिति अनिवार्य की जा सकती है, परन्तु उपस्थित रहने मात्र से काम होता हो, यह आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार तंत्र द्वारा विद्यालय में पूर्ण समय उपस्थित रहना, पाठ्यक्रम पूरा करवाना, विद्यालय का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत रखवाना आदि काम करवाए जा सकते हैं, परन्तु इतने मात्र से शिक्षा नहीं होती। ये जड़ व्यवस्थाएँ मात्र हैं, शिक्षा नहीं है। तंत्र द्वारा शरीर को, प्रक्रिया को, अंकों को बाध्य किया जा सकता है, ज्ञान को नहीं। फलतः छात्र पास तो हो जाते हैं परन्तु ज्ञानवान नहीं होते। छात्र परीक्षार्थी होते हैं, विद्यार्थी नहीं। वे परीक्षा पास करते हैं किन्तु पढ़ते नहीं। शिक्षक भी केवल परीक्षा पास करवाते हैं, उन्हें पढ़ाते नहीं। उन्हें वेतन उपस्थित रहने व छात्रों को पास करवाने का मिलता है, पढ़ाने का नहीं।

वेतन का सम्बन्ध ज्ञान से नहीं है

शिक्षक को वेतन विद्यालय में उपस्थित रहने का मिलता है। उपस्थिति पंजिका में उसके हस्ताक्षर हैं तो उसे वेतन मिलेगा, चाहे उसने पढ़या हो अथवा नहीं। वह छात्रों को ज्ञान व संस्कार देता है या नहीं, वह उनका चरित्र निर्माण करता है या नहीं, इस बात का वेतन दिया भी नहीं जा सकता। वेतन का ज्ञान और संस्कार से कोई सम्बन्ध नहीं है। ज्ञान और संस्कार का सम्बन्ध स्वेच्छा से, दायित्वबोध से तथा ज्ञाननिष्ठा से है। ये बातें धर्म की, धर्माचार्यों की, स्वजनों की या स्वयं की प्रेरणा से प्राप्त होती हैं। जड़-तंत्र को तो इस बात की गंध भी नहीं आती, उसे तो समस्या का पता तक नहीं चलता।

एक बात और भी है, जड़तंत्र को लगता है कि सुविधा देने से छात्र शिक्षा ग्रहण करेंगे। इसलिए तंत्र छात्रों को निशुल्क शिक्षा देता है, निशुल्क पाठ्यपुस्तकें देता है, निशुल्क भोजन व गणवेश आदि देने की व्यवस्था करता है। यह सब करने में सद्भाव दिखाई देता है, परन्तु यह उस तंत्र का जड़ सद्भाव है। छात्रों के परिवारों को सहायता अवश्य मिल जाती है, किन्तु सहायता मिल जाने से छात्रों को शिक्षा नहीं मिल जाती। शिक्षा सुविधा से नहीं जिज्ञासा से ग्रहण की जाती है। और जिज्ञासा जाग्रत करना सुविधा के वश में नहीं होता। जिज्ञासा तो शिक्षक, माता-पिता और आत्मीयजन ही जगा सकते हैं।

मन को साधे बिना तंत्र निरर्थक है

जड़-तंत्र कभी भी छात्रों को दायित्वबोध की, निष्ठा की, छात्रों के कल्याण की शिक्षा नहीं दे सकता। इसलिए शिक्षकों में या तंत्र सम्हालने वाले लोगों में ये तत्व प्रभावी नहीं होते। ऐसी स्थिति में मनुष्य का मन उसे और अधिक स्वैच्छाचारी बनाता है। अनियन्त्रित मन हमेशा पानी की भाँति नीचे की ओर ही बहता है, अर्थात दायित्वबोध, निष्ठा व कल्याण की भावना से दूर भागता है। इसलिए मन को साधने की शिक्षा का कार्य अध्यापक, छात्र अथवा तंत्र के लिए भी सम्भव नहीं होता।

आजकल साक्षरता को शिक्षा मान लेने की अतार्किक धारणा चल पड़ी है। केवल पढ़ना व लिखना आ जाने से ज्ञान व संस्कार नहीं आ जाते। मात्र पढ़ने-लिखने से जानकारी भी नहीं होती। साक्षरता अलग है और शिक्षा अलग है, यह बात मंचों से बार-बार बोली जाती है, किन्तु तंत्र के कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती।

हमारे यहाँ साक्षरता को लक्ष्य मानकर विभिन्न प्रकार के प्रयास किये जाते हैं। बहुत अधिक पैसा इन प्रयासों पर खर्च होता है। इन योजनाओं से सम्बन्धित साहित्य निर्माण किया जाता है। योजना में लगे कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण भी होता है। समय-समय पर आधुनिक संचार माध्यमों से प्रचार भी किया जाता है। इतना सब कुछ करने के बाद भी परिणाम वही “ढ़ाक के तीन पात”। न साक्षरता के लक्ष्य पूरे होते हैं न शिक्षा प्राप्त होती है।

बिना साक्षरता भी ज्ञानी होते हैं

हमारे देश के ज्ञात इतिहास में कबीर व रेदास जैसे अनेक उदाहरण हैं, जो लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे, फिर भी ज्ञानी, योगी, भक्त, पराक्रमी, कुशल व्यापारी, कवि, साहित्यकार और शास्त्रों की रचना करने वाले हुए हैं। वे कभी विद्यालय नहीं गए, बिना विद्यालय गए यदि अपनी योग्यता के बल पर पढ़ना-लिखना सीख गए तब भी उनकी ख्याति पढ़ने-लिखने के कारण नहीं अपितु अपनी प्रतिभा के कारण थी। यह बात सहज समझ में आने वाली है, परन्तु जड़-तंत्र को समझ में नहीं आती जो स्वाभाविक है।

शैक्षिक दृष्टि से विचार किया जाय तो पढ़ना-लिखना अर्थात साक्षरता को शिक्षा के अर्थ में प्रयुक्त करना ही अनुचित है। अक्षरों या शब्दों को पढ़ने व लिखने का कार्य कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों से होता है। लिखने व पढ़ने से पहले सुनना व बोलना अपेक्षित है, क्योंकि सुने बिना बोला नहीं जाता और पढ़े बिना लिखा नहीं जाता। ये चारों, सुनना, बोलना, पढ़ना व लिखना भाषा के कौशल कहलाते हैं, अन्य विषयों के नहीं। भाषा के इन चारों कौशलों से भाषा सीखी जाती है परन्तु ये भाषा की पूर्णता नहीं है। अतः हम यह कह सकते हैं कि साक्षरता, पढ़ने-लिखने के यांत्रिक कार्य में शिक्षा को सीमित कर देती है। इस रूप में यह बड़ा ही निरर्थक कार्य है।

शिक्षा को जड़-तंत्र ने जकड़ रखा है

साक्षरता को शिक्षा मानने का मार्ग बहुत दूर तक जाता है। आगे जाकर जानकारी को शिक्षा मानना, परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने को शिक्षित मानना, भौतिक साधनों से नापे जाने वाले तत्वों को प्रमाण मानना, इसी साक्षरता की संकल्पना का ही विस्तार है, अतः वह जड़ ही है। आज देश का सम्पूर्ण उच्च शिक्षा का क्षेत्र इसका शिकार बना हुआ है। यह बहुत बड़ा अनिष्ट है, जो कल्पनातीत है। आज पन्द्रह-बीस वर्षों तक शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त भी शिक्षित नवयुवक अपनी योग्यता सिद्ध नहीं कर पाते, फलतः उनकी दुर्गति होती है, जिसका कोई हिसाब ही नहीं है।

हमारे यहाँ कहा गया है, “साक्षरा का विपरीत राक्षसा होता है।” जब तक साक्षरता धर्म व संस्कृति से विहीन होगी, वह राक्षस ही निर्माण करेगी। जीवन का मूल्यवान समय योग्यता प्राप्त करने के स्थान पर केवल दुर्गति को अपनी झोली में डालने के लिए खर्च हो जाते हैं। वे स्वयं इसके लिए दोषी नहीं हैं, वे इस दुर्गति के लायक भी नहीं हैं। परन्तु करे भी तो क्या करे? इस जड़-तंत्र ने उन्हें बुरी तरह जकड़ रखा है। जड़-तंत्र से मुक्त होना, मन को साधना और योग्यता प्राप्त करना ही एकमेव उपाय है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

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