श्री गुरु तेगबहादुर जी – 400 साला प्रकाश वर्ष – 1

 – इन्द्रजीत कौर

श्री गुरु तेगबहादुर जी का जन्म वैसाख वदि पंचमी सम्वत् 1678 अनुसार 1 अप्रैल, 1621 ई. को माता नानकी जी के पवित्र उदर से, गुरु के महल अमृतसर में हुआ।

आप श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के सबसे छोटे साहिबजादे थे। इतिहासकार लिखते हैं कि जब छठे पातशाह ने नवजात बालक के दर्शन किए तो आप जी ने सिर झुका कर प्रणाम किया। गुरु बिलास पातशाही छठी में लिखा है कि उस समय आपके साथ अन्य संगत भी थी। उन सिख सेवकों में उनका प्रिय गुरसिख बिधि चंद भी था। बिधि चंद चकित हुआ कि गुरु साहिब ने तो किसी के समक्ष सिर नहीं झुकाया था, लेकिन उन्होंने एक बालक को सिर झुका कर वंदना की है। इसलिए पूछने से न रह सका और गुरुजी के समक्ष हाथ जोड़ कर कहने लगा, “मीरी पीरी के स्वामी! सच्चे पातशाह! यह क्या कारण है कि आप जी ने इस बालक को प्रणाम किया है?”

श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी कहने लगे, बिधि चंद! यह बालक बड़ा होकर निर्धनों की रक्षा करेगा और दुनिया के दुखों को दूर करेगा। यह निर्भय बालक अत्याचारी तुर्कों की जड़ भी उखाड़ेगा।” बालक की इस विलक्षण शक्ति को मुख्य रखकर आप जी ने बालक का नाम भी ‘त्यागमल’ रखा।

माता नानकी के उदर से पैदा हुए आपके ज्येष्ठ भ्राता बाबा अटल राय थे। आप दोनों अपने मित्रों के साथ खेला करते थे। एक बार बाबा अटल राय व श्री गुरु तेगबहादुर जी अपने मित्रों के साथ छुपा-छुपी खेल रहे थे। ढूंढने की जिसकी बारी आती उसे अपनी बारी देनी ही पड़ती थी। एक दिन रात हो गई व अँधेरा होने के कारण खेल बंद करनी पड़ी। लेकिन ढूंढने की बारी मोहन नामक एक बालक की रह गई। अगले दिन दोनों भाई एवं अन्य बच्चे मोहन के घर गए कि वह आकर अपनी बारी दे।

जब सभी मित्र एकत्र होकर उस बाल के घर गए तो आपको पता लगा कि मोहन की सर्पदंश के कारण मृत्यु हो गई है। लेकिन बाबा अटल ने उनके विलाप की परवाह न की और कहने लगे, “यह जानबूझकर असावधानी से पड़ा है ताकि बारी न देनी पडे़। मैं अभी इसे छड़ी मार कर बताता हूं कि असावधानी कैसी की जाती है।” बाबा अटल राय ने छड़ी पकड़ कर जब मोहन को जोर से हिलाया तो वह उठकर बैठ गया। फिर सभी तालियां मार कर हंसने लगे और कहने लगे, “बच्चे यह बहाने बाजी नहीं चलनी, उठ और अपनी रात वाली बारी दे।” मोहन उठकर बाहर आ गया और सारे बच्चे खेलने लग गए।

गुरुजी की पढ़ाई लिखाई का योग्य प्रबंध किया गया। बाबा बुड्ढा जी से पढ़ाई पूरी करने के बाद गुरु को भाई गुरदास जी के पास उच्चस्तरीय विद्या हेतु भेज दिया गया। भाई गुरदास जी एक उच्चकोटि के विद्वान थे। आदि गुरुग्रंथ साहिब के संपादन के समय उन्होंने श्री गुरु अर्जुनदेव की सहायता की थी। आप एक उच्चकोटि के कवि भी थे। इसलिए उन्होंने श्री गुरु तेगबहादुर जी को कविता के बारे में ज्ञान दिया। गुरु साहिब की गुरुबाणी से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने अन्य रागों में वाणी लिखी जोकि पहले गुरु साहिबान की बाणी में उपलब्ध नहीं थी। आज भी उनकी बाणी समूचे विश्व का मार्गदर्शन करती है।

भाई गुरदास जी से शिक्षा प्राप्त करने के बाद आप जी को राग विद्या सिखाने हेतु एक विद्वान रबाबी को नियुक्त कर दिया गया। राग विद्या में निपुण बनाया जाता था। श्री गुरु तेगबहादुर जी भी राग विद्या में शीर्घ ही निपुण हो गए। इन पढ़ाईयों के साथ-साथ आप जी को शस्त्र विद्या का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता था।

जब श्री गुरु हरिगोबिंद जी साहिब करतारपुर निवास कर रहे थे तो वहां के निवासी एक गुरसिख, भाई लाल चंद का श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब से अत्यंत स्नेह हो गया। वह और उसका परिवार गुरु-घर की तन-मन से सेवा करते थे। श्री गुरु तेगबहादुर जी भी उस समय जवान हो रहे थे। वह अपने पिता की तरह अल्पायु में ही लम्बा कद निकाल रहे थे। भाई लाल चंद की भी एक सुपुत्री बीबी गुजरी श्री गुरु तेगबहादुर जी की आयु की थी। जब लाल चंद ने अपनी पुत्री के रिश्ते बारे श्री गुरु हरगोबिंद साहिब से विनती की तो गुरुजी ने उनकी इस विनती को स्वीकार कर लिया और रिश्ता पक्का हो गया। यहां रहते ही सन् 1632 ई. में श्री गुरु तेगबहादुर जी का विवाह हो गया। यह विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ और हजारों सिख एवं गुरु प्रेमी इस खुशी के अवसर पर पधारे। इस विवाह की खुशी में गुरु साहिब ने उस वर्ष की वैसाखी करतारपुर में ही मनाने का आदेश दिया। संगतें दूर-दूर से करतारपुर में पहुंचने लगीं। उस वर्ष वैसाखी की चहल-पहल देखने योग्य थी। इस अवसर पर सिख सेवक कई प्रकार के उपहार लेकर उपस्थित हुए। सैकड़ों घोडे़ एवं हथियार दरबार में अर्पित किए गए। धन का भी कोई अन्त नहीं था। भट्ट वहियों के अनुसार 11 अगस्त 1664 ई. को श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब के अन्तिम आदेशानुसार एक सिख संगत श्री गुरु तेगबहादुर को गुरुयाई तिलक लगाने के लिए बकाले पहुंची।

गुरुयाई की इस घटना के दो महीने बाद 9 अक्टूबर, 1664 ई. को एक श्रद्धालु सिख मक्खन शाह लुबाना गुरु साहिब की हजूरी में 500 मोहरें भेंट करने हेतु लाया। सूरत की बंदरगाह पर उसका समुद्री जहाज गुरु साहिब की कृपा से डूबने से बच गया था। इसलिए धन्यवाद के रूप में वह यह मोहरें भेंट करने हेतु आया था। लेकिन जब तक वह बाबा बकाला पहुंचा तो 22 मंजियों देखकर बहुत हैरान हुआ। उसने एक उपाय सोचा और प्रत्येक नकली गुरु के समक्ष दो-दो मोहरें रखता गया। उसने यह सोचा कि जो असली गुरु होगा, वह स्वयं शेष रकम मांग लेगा। लेकिन किसी ने भी उससे शेष रकम नहीं मांगी। अंततः उसे पता चला कि यहां श्री गुरु हरगोबिंद साहिब के छोटे साहिबजादो बाबा श्री तेगबहादुर जी रहते हैं, वह अपने घर में ही भक्ति करते हैं और संगतों को मिलते हैं। उन्होंने गुरु कहलाने हेतु मंजी नहीं लगाई है। मक्खन शाह लुबाना गुरुघर भी पधारा और उसने दो मोहरें गुरुजी के समक्ष रखीं। जब वह लौटने लगा तो गुरु साहिब ने शेष मोहरें भी मांगी। अब मक्खन शाह लुबाना को दृढ़ विश्वास हो गया कि असली गुरु यही हैं। उससे रहा न गया और उसने तुरंत कोठे पर चढ़ कर दामन फेर दिया और बड़ी ऊंची-ऊंची शोर मचाने लगा, ‘गुरु लाधे रे, गुरु लाधे रे’।

श्री गुरु तेगबहादुर साहिब ने बाबा बकाला में लगभग 20 वर्ष गुजारे थे। गुरु बनने के बाद उन्होंने अब अपना दायित्व अनुभव किया और प्रचार हेतु चल पडे़। सर्वप्रथम वह गांव में से होते हुए अमृतसर पधारे।

दरबार साहिब पहुंच कर गुरुजी ने शेष संगत के साथ पावन सरोवर में स्नान किया और फिर संगतों सहित हरिमंदिर साहिब माथा टेकने हेतु चल पडे़। जब बाबा हरि जी को यह पता चला कि श्री गुरु तेगबहादुर सैंकड़ों सिखों के साथ हरिमंदिर साहिब आ रहे हैं तो वह बहुत डर गया। उसने सोचा कि जैसे इन्होंने बाबा धीरमल को बकाले में से भगा दिया था, वैसे ही उसे भी दरबार साहिब में से भगा देंगे। इसलिए उसने अपने मसंदों को आदेश दिया कि वह दरबार साहिब के द्वार बंद कर दें।

जब सांयकाल हो गई तो गुरु साहिब एक सिख की प्रार्थना पर गांव वल्ले चल पडे़। गांव वल्ला श्री अमृतसर के उत्तर की ओर 4 मील दूर है।

एक माई ‘हरो’ गुरु घर की बड़ी श्रद्धालु थी। उसने गुरुजी से प्रार्थना कि वह संगतों सहित उसके कोठे में विराजें। गुरुजी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसके घर चले गए। जब अमृतसर की माइयों को यह पता चला कि दरबार साहिब के पुजारियों ने हरिमंदिर साहिब के द्वार बंद कर लिए थे तो उन्हें बड़ा दुख हुआ।

नगर की माइयां इकट्ठी होकर वल्ले पहुंची। गुरुजी उस समय माई हरो के घर विराजमान थे। माइयां अपने साथ कई प्रकार की सामग्री व उपहार लेकर आई थी। उन्होंने गुरुजी को माथा टेका और प्रार्थना की, “महाराज! मसंदों ने बहुत बुरा किया है, इसमें अमृतसर वासियों का कोई कसूर नहीं। हमें क्षमा करो और हमारे तुच्छ उपहार स्वीकार करो।” गुरुजी माइयों की इस सेवा पर बहुत प्रसन्न हुए व उन्होंने माइयों को यह वर दिया, माईयां रब्ब रजाईयां, भगती लाईआं।”

उसके पश्चात् माता कृष्ण कौर के निमंत्रण पर आप कीरतपुर पहुंच गए। वहां कुछ समय रहे, फिर गुरुजी ने 500/- रुपए देकर माखोवाल का पटा माता नानकी के नाम करवा लिया। गुरुजी यह भूमि प्राप्त करके संतुष्ट हो गए। वह नहीं चाहते थे कि कीरतपुर में रहकर अपने भाईयों से नित्य का वैर सहन करें।

खरीदे हुए स्थान का सर्वेक्षण करके गुरुजी ने नवीन नगर की नींव 19 जून, 1665 को रखने का निर्णय किया।  नींव रखने की रस्म बाबा बुड्ढा जी के पौत्रो बाबा गुरदित्ता जी ने अपने कर कमलों से रखी। नगर का नाम माता नानकी जी के नाम पर ‘चक्क नानकी’ रखा गया। इस गांव को पहले माखोवाल ही कहते थे। नगर वासियों को भी उपदेश देकर गुरुजी अपने परिवार एवं अन्य श्रद्धालु सिखों सहित मालवे देश की ओर चल पडे़।

(लेखिका कैंब्रिज इंटरनेशनल फाउंडेशन स्कूल जालंधर में प्रवक्ता एवं विभाग प्रमुख है।)

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