सरस्वती शिशु मंदिर योजना और राणा प्रताप सिंह

 – राजेन्द्र बघेल

शिक्षा जगत में आज विद्या भारती और उसके महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा सर्वदूर होती है। यह योजना स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सुनियोजित ढंग से अति सूक्ष्म साधनों पर ध्येयव्रती कार्यकर्ताओं के द्वारा आरंभ हुई। सर्वप्रथम योजना का पहला दीप गोरखपुर के पक्कीबाग़ नामक स्थान पर प्रज्वलित हुआ। विद्यालय का नाम सुविचारित ढंग से रखा गया, “सरस्वती शिशु मंदिर”। श्रद्धेय भाऊराव देवरस की प्रेरणा एवं स्वनामधन्य नानाजी देशमुख सहित गोरखपुर के क्रियाशील कार्यकर्ताओं ने इस कार्य को आरंभिक स्वरूप दिया।

शुरुआत में यह कार्य शिशु शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक स्वरूप देता रहा जो आज संपूर्ण देश में एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विस्तार पा चुका है। गोरखपुर के बाद उत्तर प्रदेश के रामपुर, महोना, माउल हाउस लखनऊ, ललितपुर जैसे दूरस्थ जिलों में शिशु मंदिरों का कार्य बढ़ा। 1952 से 1958 तक मात्र छ: वर्षों में संपूर्ण प्रदेश के अन्यान्य जिलों में योजना के दीप जल चुके थे। उन्हें एक व्यवस्थित स्वरूप देने की आवश्यकता को कार्यकर्ताओं ने गंभीरता पूर्वक सोचा। इस कार्य में जिन ध्येयव्रती एवं समर्पित कार्यकर्ताओं का नाम आता है उनमें से एक निष्ठावान योग दानी थे श्रद्धेय राणा प्रताप जी।

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के जागीर नामक गांव में 2 जुलाई 1929 को राणा प्रताप जी का जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ था। पिता श्री रामगुलाम सक्सेना मैनपुरी जिले के एक प्रतिष्ठित वकील थे। परिवार में जन्में चार भाइयों और एक बहिन में सभी को अच्छी शिक्षा का प्रबंध पिताजी ने किया। राणा प्रताप जी ने 1947 में आगरा से बी.एस.सी की शिक्षा पूर्ण की। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एम.बी.बी.एस के प्रशिक्षण हेतु उनका चयन भी हुआ था। इस अवधि के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से गहन संपर्क में आ जाने के कारण उन्होंने मेडिकल की शिक्षा प्राप्त करने का मोह छोड़ उन्होंने भारत माता की सेवार्थ संघ प्रचारक बनने का व्रत लिया। इटावा, मैनपुरी एवं फिरोजाबाद जैसे जिलों में वह संघ प्रचारक के रूप में कार्यरत रहे।

प्रचारक दायित्व से लौटकर पुन: यह ग्रहस्थ जीवन में आ गए तथा औरैया जिले में एक इंटर कॉलेज में अध्यापक के रूप में कार्यरत रहे। इस दौरान संघ के कार्य में भी वह संलग्न रहे तथा संघ क्षेत्र की जो जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई उसे भी करते रहे।

इस कालावधि में शिशु मंदिर योजना के विद्यालय वर्ष 1958 तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में विस्तार पा चुके थे तथा उन्हें सुव्यवस्थित स्वरूप देने के लिए शिशु शिक्षा प्रबंध समिति नामक पहली प्रबंध कारिणी समिति का गठन हो चुका था। मान्यवर श्री राणा प्रताप जी को इस समिति के मंत्री का दायित्व देकर उन्हें इस कार्य के लिए पूरा समय देखने का संदेश दिया गया।

बिना सरकारी अनुदान के सामाजिक सहयोग के आधार पर शिशु मंदिरों की स्थापना की मांग प्रदेश के विभिन्न जिलों में आने लगी। वास्तव में शिशु शिक्षा के क्षेत्र में किया गया यह अनूठा प्रयोग समाज में बहुत सराहा गया। आखिर कुल के दीपक को जग में दिवाकर बनने की प्रेरणा जो इस कार्य के पीछे थी और वह अब प्रत्यक्ष फलीभूत होने लगी थी। शिशु शिक्षा प्रबंध समिति के इस टीम में अब तक श्री राणा प्रताप जी को श्रद्धेय श्री कृष्ण चंद्र गोपी का महत्वपूर्ण सहयोग प्रदेश निरीक्षक के रूप में मिलने लगा था। स्वयं से भूमि, भवन व आर्थिक सहयोग का प्रबलतम योगदान देकर लोग अपने-अपने नगर, जिलों केंद्रों पर शिशु मंदिर की स्थापना करना चाह रहे थे। आखिर शिशु मंदिरों में पढ़ने वाले बच्चों में शिक्षा व संस्कार की गहरी छाप जो पढ़ रही थी।

तन मन लगाकर इस जोड़ी ने आज के उत्तराखंड सहित संपूर्ण उत्तर प्रदेश में शिशु मंदिरों का जाल बिछा दिया। इस कार्य के लिए उन्होंने अहर्निश प्रभावी प्रयास किया। श्रद्धेय राणा जी के प्रशासनिक एवं शैक्षणिक कौशल के ने इस योजना के विद्यालयों को एक संगठित स्वरूप दिया। यथा –

  • हमारी पाठ्य चर्चा कैसी हो ?
  • हमारा पाठ्यक्रम क्या हो?
  • हमारी पाठ्य पुस्तकों की विषय वस्तु क्या हो?
  • मूल्यांकन पद्धति कैसी हो?
  • प्रशासनिक रचना में विद्यालय आरंभ करने के लिए सक्षम एवं संवैधानिक स्वरूप क्या हो?
  • संस्थान के स्वरूप संचालन हेतु अचार्य नियमावली कैसी हो?
  • प्रधानाचार्य, समिति के सदस्यों के लिए कर्तव्य क्या हो?
  • आर्थिक लेखा प्रबंधन कैसे शुचिता पूर्ण हो?
  • कार्यालय लेखा का लेखांकन, संपर्क व्यवस्थाएं कैसी हो?

सब कार्यों को लिखित एवं व्यवस्थित स्वरूप देने में राणा प्रताप जी ने अथक परिश्रम किया।

  • शिशु मंदिर योजना का ध्येय चिंतन (सिंह शावक को दांत गिनते भरत का चित्र) श्रद्धेय वाक्य स्वयंमेव मृगेंद्रता की रचना कर एक अप्रतीम संदेश दिया।
  • शिशु मंदिर योजना के तत्कालिक उद्देश्य “हमें ऐसे बालकों का निर्माण करना है………….” की रचना की।
  • प्रार्थना सभा, शिशु भारती संगठन, अभिभावक संपर्क/ सम्मेलन/ अभिभावक परामर्श दात्री समिति, शिशु शिविर, देश दर्शन, वनविहार, शैक्षिक यात्राएं, शारीरिक एवं रंगमंचीय आयोजन का स्वरूप उनका संचालन ध्येय के अनुरूप कैसे हो? इसका संपूर्ण संदेश संस्थानों को देकर शिक्षा व संस्कार अमता की व्यवस्था सुदृढ़ की।
  • विभिन्न बैठकों में उनका यह संदेश रहता था हमारे कार्यक्रम केवल कार्यक्रम के लिए नहीं उनमें नियमितता एवं संस्कार प्रदान करने का संदेश अवश्य होना चाहिए।
  • प्रबंध समिति के सदस्यों के मध्य अहैतक भाव से एक बड़े उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया जाने वाले इस कार्य में रचना हम मात्र एक ट्रस्टी है – यह स्मरण अवश्य करते थे।
  • शिशु के लिए शिशुलोक व आचार्यों व अभिभावकों के लिए आलोक वार्षिक पत्रिका का संपादन कराने की व्यवस्था उन्हीं की देन है।
  • आचार्य सम्मेलनों में उनका दिशा बोध गजब का होता था तथा एक आदर्श शिक्षण बेला वह स्वयं संचालित करते थे। इस प्रक्रिया से शिक्षण का जो उत्तम संदेश मिलता था योजना के अनेक प्रभावी वह कार्यशील आचार्य आज भी याद करते हैं।
  • योजना के उद्देश्य पूर्ति हेतु कर्मशील आचार्यों के निर्माण के लिए स्थापित आचार्य प्रशिक्षण के वह प्रथम प्रधानाचार्य भी थे। उनकी शिक्षण कला में जो बोध मिला उससे प्रभावित होकर उनके अचार्य प्रधानाचार्य समाज में प्रभावी संस्थान खड़ा करने में सक्षम बन सके।
  • उनके मोती जैसे सुंदर लेख की अनुकृति बहु संख्या आचार्यों ने की तथा उन जैसा लेख आज भी लिखते हैं।
  • उनकी लेखन क्षमता भी बड़ी प्रभावी थी। उनके द्वारा लिखित पाठ्य पुस्तकों में इतिहास गा रहा है – गौरव गाथा, भगिनी निवेदिता, धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र, महर्षि वेद व्यास की कथाएं, बाल विकास, बाल रामायण, बाल महाभारत तथा शिशु मंदिर योजना एक परिचय – प्रकाशित हुई और आज भी पठनीय है।

1982-83 के बाद वह भारतीय शिक्षा शोध संस्थान के सचिव रहे तथा उसके बाद उनका कार्यक्षेत्र बिहार तथा उड़ीसा रहा व कार्य का केंद्र पटना था। बिहार तथा उड़ीसा राज्यों में उनकी कार्य विधा का वर्णन वहाँ के कार्यकर्ता आज भी करते हैं। योजना के आरंभ के वर्षों में आज के उत्तराखंड सहित संपूर्ण उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में आचार्य/प्रधानाचार्य का स्थानांतरण होता था। कोई कार्यकर्ता घर से दूर जाने के पर भी कैसे अपने कार्यों में क्षमता पूर्वक संलग्न रहकर करें पूर्ति करें इसके दो प्रसंगों का वर्णन करना चाहूँगा।

अलीगढ़ के निवासी श्री विनोद शर्मा जो उन दिनों अल्मोड़ा में आचार्य पद पर कार्यरत थे; अवकाश के दिनों में उन्हें कार्य विस्तार एवं नई विद्यालय शाखा आरंभ करने हेतु द्वाराहाट भेजा गया था। विनोद जी ने राणा जी को पत्र लिखा कि उनका आदेश मानकर वह द्वाराहाट आ गये हैं। इस पर राणा जी ने बड़े स्नेह भरे शब्दों में जो उत्तर दिया वह वर्णनीय है। राणा जी ने लिखा – प्रिय विनोद जी, पत्र में लिखा कि आपका आदेश मानकर मैं द्वाराहाट आ गया, तो क्या यह मात्र मेरा आदेश ही था। यह नहीं लगता कि देवभूमि के जिस क्षेत्र में आप कार्यरत है – वही ऐतिहासिक स्थल द्रोणागिरी भी है और उस पवित्र भूमि में शिक्षा का दीप जलाकर आप जो उजाला फैलाएंगे उससे वहां के स्थानीय बच्चों के जीवन का अंधेरा दूर होगा और वे समाज जीवन में एक योग्य स्थान पा सकेंगे। इस मर्म भरे पत्र को पढ़कर विनोद शर्मा के मन पर बड़ा सार्थक प्रभाव पड़ा और वह नियत कार्य पूरा करें सके। ऐसे ही एक दूसरा उदाहरण भी है –

अल्मोड़ा के जीवन धाम स्थित शिशु मंदिर में तत्कालीन प्रधानाचार्य श्री हरिदत्त जोशी ने राणा जी को एक पत्र लिखा कि आर्थिक कठिनाई के कारण 2 माह से आचार्यों का वेतन नहीं दिया जा सका है, कृपया मार्गदर्शन करें। राणा जी ने स्नेहपूर्वक उत्तर देते हुए लिखा कि वेतन हेतु आर्थिक स्थिति तो नहीं भेज सकूंगा पर प्रोजेक्टर सहित एक कार्यकर्ता एवं शिवाजी महाराज की एक फिल्म (1974 वर्ष में शिवाजी महाराज के राज्यारोहण का त्रिशती समारोह – ‘1674 से 1974’ मनाएं जाने पर फिल्म बनी थी) भेज रहा हूँ। विभिन्न स्थानों पर उसका प्रदर्शन कराये और व्यय के पश्चात जो राशि बचें उसे आचार्यों के वेतन में व्यय करें। श्री जोशी जी बताते हैं कि इस प्रक्रिया में उनकी समस्या हल हो गई।

ऐसे स्नेह भरे पत्रों  से अनेक प्राचार्य/प्राचार्यों का ह्रदय स्पर्श करने का काम राणा जी करते थे जिससे अगणित कार्यकर्ताओं ने इस योजना को फलीभूत किया।

आयु के अग्रिम 5-6 वर्षों में उन्हें स्मृति लोप की कठिनाई हो गई जिससे अपने निकटतम लोगों को पहचानने में कठिनाई अनुभव होने लगी। 20 मई 2008 में वह गोलोक वासी हो गए। आज हम गौरव के साथ श्रद्धेय श्री राणा प्रताप जी को स्मरण करते हुए यह कहेंगे कि विद्या भारती को विशाल वटवृक्ष बनाने व विश्व पहल पर लाने में उत्तर प्रदेश की शिशु मंदिर व्यवस्था व रचना का जो योगदान मिला, उसकी नींव के पत्थर बनकर वह अमर हो गए।

(लेखक विद्या भारती – विद्वत परिषद आयाम के अखिल भारतीय संयोजक है।)

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One thought on “सरस्वती शिशु मंदिर योजना और राणा प्रताप सिंह

  1. Really a great work done by Vidya Bharati and respected Rana Pratap Ji we all very grateful , Jay Gurudev

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