पू. सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत द्वारा शिक्षा पर प्रश्नोत्तर का सम्पादित अंश, भविष्य का भारत – संघ का दृष्टिकोण, (तृतीय दिवस), 20 सितंबर 2018, दिल्ली


 

प्रश्न – शिक्षा में भारतीय मूल्य।

शिक्षा में परम्परा और आधुनिकता का समन्वय वेद, रामायण, महाभारत आदि का शिक्षा में समावेश, सहशिक्षा आदि विषयों पर संघ की क्या राय है?

उच्च शिक्षा का स्तर लगातार घट रहा है। भविष्य के भारत का निर्माण कैसे होगा?

उत्तर – धर्मपाल जी का ग्रन्थ आप पढ़ेंगे तो आपको ध्यान में आयेगा कि अंग्रेजों के आने के बाद उन्होंने जब सर्वे किया तो उनको ध्यान में आया कि परम्परा से हमारी शिक्षा पद्धति ज्यादा प्रभावी, अधिक लोगों को साक्षर बनाने वाली, मनुष्य बनाने वाली और अपना जीवन चलाने के लिए योग्य बनाने वाली थी। वो अपने देश में ले गए और ऐसा सब कुछ एक साथ न कर सकने वाली उनकी पद्धतियां उन्होंने लाईं। ये इतिहास है। और इसलिए आज की दुनियां में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जो लेने लायक है वो लेते हुए अपनी परम्परा से जो लेना है, वो लेकर हमको एक नई शिक्षा नीति बनानी चाहिए। आशा करता हूं कि नई शिक्षा नीति आने को हुई है। उसमें ये सब बातें होंगी।

अपने देश का विचारधन उसमें से मिलना चाहिए –

चतुर्वेदाः पुराणानि सर्वोपनिषदस्तथा ।

रामायणं भारतं च गीता सद्दर्शानी च । ।

(श्रेष्ठ धार्मिक पुस्तकों: चार वेद, अठारह पुराण, सभी उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, छह दर्शन)

जैनागमस्त्रिपिटका गुरुग्रन्थः सतां गिर: (यानी संत वाणी) ।

ऐष: ज्ञाननिधि श्रेष्ठ: श्रद्धेयो हृदि सर्वदा । ।

(जैन शास्त्र आगम, बौद्ध धर्म के त्रिपिटक और संतों की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब जैसे ज्ञान के भंडार, श्रेष्ठ, वन्दनीय ग्रंथों को हम सर्वदा ह्रदय में धारण करें।)

 ये शिक्षा में भारत के लोगों को मिलना ही चाहिए। सबको मिलना चाहिए। और भी सम्प्रदाय हैं जो बाहर से आये हैं लेकिन उसकी अच्छी खासी संख्या है उसमें भी जो मूल्यबोध है वह सिखाना चाहिए। रिलीजन की शिक्षा भले हम न दें लेकिन दृष्टि मूल्यबोध इस दृष्टि से और उसमें से निकलने वाले संस्कारों की दृष्टि से इन सबका अध्ययन पठन-पाठन हमारी शिक्षा पद्धति में देश की शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा, स्नातक तक अनिवार्य है। ऐसा संघ का मत है।

शिक्षा का स्तर घट रहा है ऐसा हम कहते हैं। शिक्षा का स्तर नहीं घटता, शिक्षा देने वालों का स्तर घटता है, लेने वालों का घटता है। छात्र शिक्षा के लिए आता है कि अपने जीवन की कमाई पर दृष्टि रखकर उसके लिए आवश्यक डिग्री के लिए आता है। उसको हम घर में कैसा तैयार करते हैं।

मुझे एक सज्जन पूना में मिले। सज्जन यानी कृतित्व सम्पन्न व्यक्ति है। पढ़ेगा लिखेगा नहीं इसलिये शिक्षा छोड़कर उनके पिताजी ने सातारा से उनको पूना भेज दिया। और वहां वो प्रिंटिंग प्रेस का काम करने लगे। करते करते उनके ध्यान में आया तो उन्होंने अपनी एडवरटाइज एजेंसी चलाई और साथ-साथ शिक्षा भी ग्रेजुएशन तक पूरी कर ली। और आज उनकी स्थिति यह है कि उनकी एक अव्वल एडवरटायजिंग फर्म है। महाराष्ट्र सरकार को भी किसी गांव का सत्य डाटा चाहिए तो उनके पास जाते हैं। प्रदीप लोखंडे उनका नाम है। उन्होंने मुझे कहा कि भागवत जी आप लोगों में भाषण देते हो, एक संदेश हमारा पहुंचाओ। तो मैंने कहा क्या संदेश है। उन्होंने कहा हर व्यक्ति को लगता है कि अपना बेटा आर्किटेक्ट, इंजीनियर, डॉक्टर ऐसे ही बने। अरे हर लड़का ऐसा नहीं बन सकता। हर एक की अपनी क्षमता भी होती है, रुचि भी होती है। उसको जो अच्छा लगता है उसको करने को मिले और जो वह करे वो उत्कृष्ट करे।

तिलक जी के लड़के ने कहा कि मुझे यह यह पढ़ने की इच्छा है तो तिलक जी ने उसको पत्र लिखा कि जीवन में क्या पढ़ना है यह तुम विचार करो। तुम अगर कहते हो कि मैं जूते सिलाने का व्यवसाय करता हूं तो मुझे चलेगा। लेकिन ध्यान रखो कि तुम्हारा सिलाया हुआ जूता इतना उत्कृष्ट होना चाहिए कि पूना शहर का हर आदमी कहे कि जूता खरीदना है तो तिलकजी के बेटे से खरीदना है। अब जो मैं सीख रहा हूं वो मैं उत्कृष्ट करूंगा, उत्तम करूंगा। उसकी उत्कृष्टता में मेरी प्रतिष्ठा है। ये भावना भरकर हम छात्रों को भेजते हैं क्या स्कूल में अपने घर के लड़कों को? हम तो उनको ज्यादा कमाओ, कैसा भी कमाओ लेकिन कमाओ। ये मंत्र देकर भेजेंगे तो शिक्षा कितनी भी अच्छी होगी वो लेंगे नहीं उसको।

क्या शिक्षक को ये भान है कि मैं अपने देश के बच्चों का भविष्य गढ़ रहा हूँ? एक एक व्यक्ति को मैं गढ़ रहा हूं। अनेक महापुरुष अपने प्राथमिक विद्यालय के, माध्यमिक विद्यालय के, कॉलेज के शिक्षकों को याद करते हैं। क्यों करते हैं? उनके जीवन में कुछ कॉन्ट्रिब्यूशन है। ऐसा उनके जीवन में हमको कांट्रीब्यूट करना है ये देने वाला शिक्षक है क्या और शिक्षक को अपने विषय का ध्यान ठीक है क्या? शिक्षकों के स्तर का एक प्रश्न है। और कोर्स कंटेंट में भी ये प्रश्न है।

कई बार ऐसा होता है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों से लोग डिग्री लेकर तो निकलते हैं। लेकिन एम्प्लायबल नहीं रहते हैं। डिग्रियां बहुत मिल रहीं, उच्च शिक्षा के संस्थान चल रहे हैं। लेकिन रिसर्च कम हो रहा है हमारे यहां। विषय को पढ़ाने वाले प्रोफेसर्स, शिक्षक कम हो रहे हैं। इस दृष्टि से एक सर्वांगीण विचार करके सभी स्तरों की शिक्षा का एक अच्छा मॉडल हमको खड़ा करना पड़ेगा। इसलिए शिक्षा नीति का आमूलचूल विचार हो और आवश्यक परिवर्तन इसमें किया जाए, ये संघ बहुत सालों से कह रहा है। और इसके लिए जो कमीशन नियुक्त किए गए हैं, उन सब कमीशनों की रिपोर्ट भी ऐसी है। अब आशा करते हैं कि नई शिक्षा नीति में इस सारी बातों का अंर्तभाव होगा।

लेकिन अपने देश की एक और बात है। अधिक शिक्षा, निजी हाथों में है, सरकार के पास नहीं है। उस निजि क्षेत्र में बहुत अच्छे-अच्छे प्रयोग भी चल रहे हैं। यहां दिल्ली में ही एक साल पहले ऐसे प्रयोग करने वालों का एक सम्मेलन हुआ था। । साढ़े तीन सौ के ऊपर भारत के विभिन्न स्थानों से, अलग-अलग प्रांतों से लोग आए थे और They have done miracle. नीति जब आयेगी-आयेगी, लागू होगी तब होगी, उसकी राह देखने की आवश्यकता नहीं। शिक्षा संस्थानों में काम करने वाले लोग अपनी अधिकार मर्यादा में प्रयोग करके शिक्षा का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं। ऐसा हुआ तो फिर सरकारी नीति भी उसका अनुकरण करेगी। ऐसी स्थितियां आ जाएंगी। इसलिए हमको सारा कुछ सरकार के सर पर न डालते हुए हमको भी अपने-अपने क्षेत्र में इसका प्रयास करना चाहिए।

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