आजाद हिंद फौज की भूमिका

 – डॉ कुलदीप मेहंदीरत्ता

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आजाद हिंद फौज अथवा इंडियन नेशनल आर्मी का वास्तविक संस्थापक और संगठक माना जाता है। भारत के प्रति उनका अनन्य समर्पण, मातृभूमि के लिए सर्वस्व त्याग और बलिदान की उत्कंठा, देश के लिए कुछ कभी कर गुजरने के उत्साह ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारत के स्वतंत्रता सेनानियों की अग्रिम पंक्तियों में स्थापित कर दिया। 1897 को कटक में जन्मे सुभाष चंद्र को राष्ट्रवादी गतिविधियों के कारण कॉलेज से निष्कासित होना पड़ा। 1919 में भारतीय सिविल सेवा में चयनित होकर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया क्योंकि विदेशी सत्ता के साथ मिलकर वे अपनी जनता को शोषण नहीं कर सकते थे। 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने वाले सुभाष-ट्रेड यूनियन, जेल यात्रा, लेखन, सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि में सक्रिय रहे।

नेताजी की जीवन की सम्पूर्ण सक्रियता का लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता थी। इसके लिए उन्होंने बर्मा में भारतीय राष्ट्रीय सेना को संगठित किया। कौटिल्य के मंडल सिद्धांत के अनुसार ‘शत्रु का मित्र शत्रु और शत्रु का शत्रु मित्र’ की नीति अपनाते हुए सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजों के विरुद्ध, अक्ष शक्तियाँ या धुरी शक्तियों (जर्मनी, इटली और जापान) का सहयोग लिया क्योंकि उस समय प्रगतिशील व लोकतांत्रिक समझे जाने वाले राष्ट्र एक साम्राज्यवादी देश ब्रिटेन का साथ दे रहे थे। सुभाष का एकमात्र लक्ष्य मातृभूमि भारत को गुलामी की जंजीरों से आजाद करवाना था इसलिए सुभाष को जहां से सहायता मिल सकती थी उन्होंने स्वीकार की। सुभाष बाबू ने बर्लिन में स्वतंत्र भारत केंद्र की स्थापना की और उन भारतीय कैदियों से भारतीय सेना का गठन किया गया जिन्हें जर्मनी, जापान और इटली की सेनाओं ने उत्तरी अफ्रीका में बंदी बना लिया था। इन भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजो की तरफ से वहां युद्धों में भाग लिया था। 1942 में नेताजी ने जर्मनी में आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की और इस रेडियो के माध्यम से स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय जनमानस को तैयार करना शुरू किया।

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जुलाई 1943 में नेताजी जर्मनी से सिंगापुर चले गए जो उस समय जापान के नियंत्रण में था और विधिवत रूप से 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज और आजाद हिंद के गठन की घोषणा की। आजाद हिंद फौज या इंडियन नेशनल आर्मी का बीज रासबिहारी बोस, मोहन सिंह तथा जापानी मेजर इवायची फुजिवारा के द्वारा बोया जा चुका था। सुभाष बाबू के प्रयासों से इस सेना को नया स्वरूप और आकार मिला जब उन्होंने पराजित अंग्रेजी फौज के भारतीय सिपाहियों को अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने का तैयार कर लिया था। तात्कालिक परिस्थितियों में जापान शीघ्रता से विश्व पटल की पर अपनी विजय के चिह्न अंकित करता जा रहा था। मलय अभियान में सिंगापुर तथा दक्षिण पूर्व एशिया के क्षेत्र में जापान ने अंग्रेजी सेना को पराजित किया। अंग्रेजों के सेना में लड़ने वाले अधिकांश सैनिक भारतीय थे। नेताजी के प्रभाव के कारण इन सब सैनिकों को आजाद हिंद फौज के लिए स्वतंत्र कर दिया गया। इस प्रकार अब आजाद हिंद फौज की संख्या लगभग पचास हजार हो गई थी।

1944 में आजाद हिंद फौज ने इंफाल और बर्मा की ओर से अंग्रेजों पर आक्रमण किया और बड़ा जोरदार मुकाबला किया। द्वितीय विश्व युद्ध के आखिरी दौर में पूर्वी मोर्चे पर आजाद हिंद फौज ने कई सफलताएं भी हासिल की और भारतीय जनता में भारतीय एकता और शक्ति के बारे में विश्वास जगाया, परंतु मौसम की खराबी, असहज जलवायु, जापान से हथियारों और रसदकी आपूर्ति बाधित होना और अन्य क्षेत्रों में मित्र शक्तियों (ब्रिटेन तथा अन्य) के बढ़ते प्रभाव के कारण आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पड़ा। अतः अमेरिका द्वारा 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने से जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। जापान के आत्मसमर्पण के बाद सारी कहानी पलट गई। युद्ध लड़ने के लिए केवल मनोबल और इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं बल्कि भोजन-पानी, कपड़े, हथियार, गोला-बारूद आदि की आवश्यकता रहती है। संसाधनों की कमी और संघर्ष के लिए जापान पर आश्रित आजाद हिंद फौज को लंबे समय तक संसाधनों की कमी से जूझना पड़ा। इस सारे संघर्ष में आजाद हिंद फौज को जहां जनता से अत्यंत स्नेह मिला। नेता जी के आह्वान ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ और ‘दिल्ली चलो‘ ने देश की जनता को उनका अनुगामी बना दिया।

पूर्वोत्तर भारत की जनता के ऐसे सहयोग उदाहरण भी सुनने को मिलते हैं जहां नव-विवाहित महिलाओं ने अपने आभूषण भी आजाद हिन्द फौज और भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए दान कर दिए। लेकिन भाग्य की विडंबना देखिए कि आजाद हिंद फौज को जिस जनता का  भरपूर प्यार मिला वही भारत की तरफ से तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व का व्यवस्थित संस्थागत सहयोग नहीं मिला क्योंकि सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष करने का तरीका अलग था। स्वतंत्रता कभी एक दल, एक विचार, एक नेतृत्व, एक संस्था, मंच एक व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती। अगर यह असंभव कार्य संभव भी हो गया तो इस प्रकार मिली स्वतंत्रता स्थाई नहीं हो सकती। जनता की इच्छा, सहमति, स्वीकृति और सहयोग किसी भी देश के स्वतंत्रता संग्राम के आधारभूत तत्व होते हैं। भारत के संदर्भ में भी यही बात सत्य है। कांग्रेस के नेतृत्व में तत्कालीन जनांदोलन का दबाव भी एक कारण था वही आजाद हिन्द फौज की भूमिका भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कम महत्व नहीं रखती।

दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद आजाद हिंद फौज के सिपाहियों पर दिल्ली में देश-द्रोह का मुकदमा चलाया गया, जिसे लाल किले का मुकदमा कहा जाता है। अंग्रेजों को इस बात का अहसास नहीं था कि यह मुकदमा इतना बड़ा हो जाएगा और देश की जनता इन फौजियों के पक्ष में खड़ी हो जाएगी। ‘लाल किले से आई आवाज, ढिल्लों, सहगल, शाहनवाज’ के नारे ने सारे देश को इन सैनिकों के साथ खड़ा कर दिया, कैप्टन प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और मेजर शाहनवाज तत्कालिक भारत की धार्मिक सामाजिक संस्कृति के प्रतीक बन गए। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों और सशस्त्र सेनाओं के सैनिकों ने भी खुलेआम आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।

‘लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद फौज को छोड़ दो!’ के नारे से उस समय की जनता के मानस को समझा जा सकता है कि कितना प्रेम सुभाष चंद्र बोस और उनके आजाद हिंद फौज से था। आजाद सिंह फ़ौज का मुकदमा लड़ने वाले में भूला भाई देसाई, पंडित नेहरू, तेज बहादुर सप्रू आदि शामिल थे। जनता की प्रतिक्रिया देखते हुए कमांडर इन चीफ ने वायसराय को लिखा कि अगर इन सैनिकों को दंड दिया गया तो देश में न केवल अराजकता फैल सकती है बल्कि देश की सेना भी विद्रोह कर सकती है। 31 दिसंबर 1945 को कोर्ट मार्शल की कार्यवाही समाप्त कर इन तीनों नायकों को दोषी ठहरा दिया। देशद्रोह के आरोप लगाने वाली अंग्रेज सरकार हिम्मत नहीं कर पाई कि ‘ढिल्लों, सहगल, शाहनवाज’ की त्रिमूर्ति को फांसी या उम्रकैद की सजा सुना दे।

इसलिए इन तीनों को दोषी ठहराने करने के बावजूद 3 जनवरी 1946 (अर्थात 31 दिसंबर, 1945 के बाद केवल तीन  दिन में) को अंग्रेजों ने इन्हें रिहा कर दिया। ये जनता की शक्ति थी और बहुत बड़ी जीत थी और वहीं अंग्रेजों की बहुत बड़ी हार थी। अंग्रेजों की मानसिक हार का परिणाम यह हुआ कि भारत में जिन भी अन्य स्थानों पर आजाद हिन्द फौज के जिन सैनिकों पर मुकदमे चल रहे थे, उन्हें भी समाप्त कर दिया गया। ये भारत की जनता, स्वाभिमान, एकता और भारतीयत्व की जीत थी। लाल किले के इस मुकदमे ने सुनिश्चित कर दिया था कि अब अंग्रेज ज्यादा दिन भारत में नहीं टिक सकते। द्वितीय विश्व युद्ध में हुए नुकसान, लाल किले के मुकदमे के कारण उपजी जनचेतना और सैनिकों में अंग्रेजों के प्रति बढ़ते असंतोष ने अंग्रेजों को स्पष्ट चेतावनी दे दी थी कि अब भारत को छोड़ने का समय आ चुका है और 1947 में अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आजाद हिंद फौज के सैनिक और अधिकारी अपनी भूमिका के कारण अमर हो गए।

(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी (हरियाणा) में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)

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