छात्र-छात्राओं के विकास में शारीरिक शिक्षा की भूमिका


– शिव कुमार शर्मा

‘शरीरमाद्य खलु धर्मसाधनम्’ हमारी परम्परा में एक महत्वपूर्ण उक्ति है। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी पुरुषार्थ की प्राप्ति का साधन शरीर है। अतः शरीर को साधन प्राप्ति योग्य बनाने पर सदैव बल दिया गया है। यही कारण है कि समाधि के मार्ग में आसन व प्राणायाम भी आते है। हमारी ज्ञान परम्परा में शारीरिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित योग (यहाँ योग के बृहतर स्वरुप की चर्चा नहीं की जा रही है) व क्रीड़ा का महत्वपूर्ण स्थान है।

टोलों, घटिकाओं, आश्रमों, गुरुकुलों में विद्यापीठों में विद्यार्थियों के लिए योग व क्रीड़ा, पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग के रुप में विद्यमान थे, इस बात के प्रचुर ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त होते हैं। कृत्रिम कृषक क्रीड़ा, निलयन क्रीड़ा, कर्मतोत्प्ल्वन क्रीड़ा, गर्तादिलंघन क्रीड़ा, नेत्राबंध क्रीड़ा, स्पन्दान्दोलिका क्रीड़ा, जल क्रीड़ा, कंदुक क्रीड़ा, नियुद्ध क्रीड़ा, घट प्लावन क्रीड़ा, दर्दुरप्लावन क्रीड़ा, गदा क्रीड़ा आदि कुछ प्रमुख खेलों का नाम कई प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार बालक-बालिकाओं के सर्वांगीण विकास (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आदि) की यात्रा में शारीरिक शिक्षा प्राचीन काल से ही अतीव महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य मूलतः शरीर को स्वस्थ, स्फूर्त व बलिष्ठ बनाना है जिससे कि शरीर सांसारिक विषम परिस्थितियों में भी संघर्ष के योग्य बन सके व पुरुषार्थ चतुष्ट्य की प्राप्ति का साधन बन कर जीवन को सार्थक बना सके।

शारीरिक शिक्षा मुख्यतः तीन भूमिकाओं का निर्वाह करती है – प्रथम उपराचात्मक (अर्थात् शारीरिक अस्वस्थता को दूर करने का मार्ग सुझाना),  द्वितीय निरोधात्मक (अर्थात् ऐसे मार्ग को सुझाना जिससे शरीर को व्याधिग्रस्त होने से रोका जा सके), तृतीय संरक्षणात्मक (अर्थात् शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने व उसे सुदृढ़ करने के मार्ग को सुझाना) ।

भारतीय परम्परा में उपर्युक्त तीनों ही भूमिकाओं पर व्यापक चिंतन किया गया है। महर्षि पतंजलि धनवन्तरी, चरक, सुश्रुत, भगवान महावीर, महर्षि घेरण्ड, आत्माराम, आधुनिक युग के चिंतक व विचारकों स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, महर्षि अरविन्द, डॉ. हेडगवार, श्रीगुरुजी आदि ने भी शारीरिक शिक्षा की विभिन्न भूमिकाओं पर व्यापक प्रकाश डाला है।

कुछ दशक तक एक कहावत पर लोगों का बहुत अधिक विश्वास था कि “पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होवोगे खराब।” यह आश्चर्य का विषय है कि भारतीय ज्ञान परम्परा में जिन खेलों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था वे कैसे एक कहावत के माध्यम से इतने तिरस्कृत हो गए। यह सोचनीय है कि क्या इसमें क्लर्क व पिछलगुओं को तैयार करने वाली ब्रिटिश कालीन शिक्षा की कोई भूमिका रही है? निश्चय ही आपकी खोज में यह बात सामने आएगी कि यह भ्रम जीवन कौशलों को दूर रखने वाली, आदेशों के अनुपालन बनाने वाली ब्रिटिश शिक्षा की देन है।

भारतीय ऋषि परम्परा ने तो यह सिद्ध किया है कि वे शास्त्राज्ञ के साथ-साथ बल सम्पन्न भी थे। अतः हमारे विद्यार्जन की प्रणाली में जीवनोपयोगी विद्याओं व शास्त्रों का समुचित समावेश था जिसमें शारीरिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण अंग के रुप में थी। अतः उक्त कहावत हमारी परम्परा में जीवन कौशलों के विकास के लिए शारीरिक शिक्षा अनिवार्य पक्ष है।

विदेशी दासता के काल में शासकों द्वारा ‘विदेशी मूल्यों के अनुसार जीवन को समग्रता में समझाने व तदनुरूप व्यवहार करने हेतु प्रेरित करने वाली शिक्षा’ को स्थापित करने का कुचक्र रचा गया और वे अपने अभियान में सफल भी हो गए। महात्मा गाँधी ने भी इस कुचक्र की चर्चा की है। उन्होंने भारतीय विद्या परम्परा को रमणीय वृक्ष कहा है और वे विदेशी कुचक्रों के समाज को जीवन कौशलों से युक्त बनाने वाले इस रमणीय वृक्ष के सूख जाने से आहत थे।

राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव नहीं हो पाए। सार्थक व आनंदपूर्ण जीवन जीने की कला से शिक्षा निरंतर दूर होती गई। यही कारण है कि शरीरिक शिक्षा भी पाठ्यचर्या में महत्त्वहीन बनी रही। परन्तु वर्तमान में एक बार फिर से योग व शारीरिक शिक्षा को महत्त्व देने की नीति स्पष्टता से सामने आई है। विद्यालयी व विश्वविद्यालयी स्तरों पर एवं सरकारी प्रयासों द्वारा भी योग तथा शारीरिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को लागू किया जा रहा है। यह विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में एक सार्थक प्रयास है।

शारीरिक शिक्षा के दो पक्ष हैं – प्रथम सैद्धांतिक तथा द्वितीय क्रियात्मक, शारीरिक शिक्षा की उपचारात्मक, निरोधात्मक व संरक्षणात्मक भूमिकाओं का निर्वहन हेतु दोनो पक्षों पर बल दिया जाना आवश्यक है। सैद्धांतिक पक्ष का सही ज्ञान ही क्रियात्मक पक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। साथ की एक और विशेष बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि भारतीय परम्परा में शारीरिक शिक्षा का स्वरुप पाश्चात्य शारीरिक शिक्षा से भिन्न है।

भारतीय ज्ञान परम्परा में शारीरिक शिक्षा का संबंध सिर्फ विकास या संरक्षण तक ही सीमित नहीं है वरन् मन व आत्मा के विकास से भी सम्बद्ध है। इस आत्मिक पक्ष के विकास की कमी पाश्चात्य शारीरिक शिक्षा में है अतः वर्तमान समय में इसे लागू करने के दौरान यह ध्यान रखा जाना अत्यावश्यक है कि हम किस परम्परा की शारीरिक शिक्षा विद्यार्थियों को दे रहे हैं। यह ध्यान रखने योग्य होगा कि शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ व्यक्ति को बलिष्ठ व स्फूर्तिवान बनाने तक की ही सीमित है या वह इस संवेदना का भी विकास कर रही है कि इसका उपयोग समाज व उसके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किया जाना है। यह भी देखा जाना चाहिए कि शारीरिक शिक्षा आत्मिक विकास का साधन बन पा रही है अथवा नहीं। यह हम इन बिन्दुओं पर विचार नहीं करेंगे तब संभवतः हम अत्यंत सीमित लक्ष्य को ही प्राप्त कर पाएँगे।

योग व खेलकूद दोनों शारीरिक शिक्षा के अनिवार्य पक्ष होने चाहिए। योग जहाँ तक विशेष रूप से व्यक्ति को केन्द्र में रखता है, वही खेलकूद का विशेष केन्द्र समाज है। योग व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य से आत्मिक उत्थान तक की यात्रा कराता है, वही खेलकूद शारीरिक स्वास्थ्य से सामाजिकता की यात्रा कराता है। खेलकूद द्वन्द्व का प्रदर्शन नहीं है, वरन सामाजिकता, परस्पर निर्भरता, सहजीविता व सामूहिक आनन्द का उत्सव है। इसे इसी सत्यनिष्ठा के साथ लेना चाहिए। समग्रता में यह कहना अधिक समीचीन होगा कि हमें यह प्रयास करना चाहिए कि शारीरिक शिक्षा बालक-बालिकाओं के शरीर, मन व आत्मा के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ सामाजिक आनन्द का भी साधन बने।

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