मूल्यांकन प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन

 – डॉ. रवीन्द्र नाथ तिवारी

वर्तमान में प्रचलित शिक्षा प्रणाली शिक्षकों द्वारा अध्यापन और विद्यार्थी को सीखने का पूरा प्रयास परीक्षाओं में अच्छे परिणाम प्राप्त करने पर केंद्रित है। इस प्रकार परीक्षाएं शिक्षा की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी करती हैं, यह हितधारकों के लिए चिंता का विषय है। शिक्षा की पवित्रता और गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए समय-समय पर शिक्षण संस्थान, शिक्षक और विद्यार्थियों का मूल्यांकन आवश्यक है। सामान्य तौर पर शिक्षा में सुधार और विशेष रूप से परीक्षाओं में मूल्यांकन प्रणालियों में सुझाव देने के लिए समय-समय पर कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया। कई संस्थानों ने विशेष रूप से आचरण, प्रशासन और मूल्यांकन में अपनी परीक्षा प्रणालियों के विभिन्न प्रक्रियाओं में गुणवत्ता और दक्षता में सुधार के लिए अभिनव प्रयास किये हैं। इन सभी प्रयासों के पश्चात् भी परीक्षा प्रणाली से संबंधित कुछ समस्याएं जैसे परीक्षाओं का शैक्षिक प्रक्रिया पर हावी होना, परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना शिक्षा प्राप्त करने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, कंठात्मक परीक्षाएं टकसाली प्रश्नों के कारण चयनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहित करती हैं। परीक्षाओं में प्राप्त अंक विद्यार्थी के प्रदर्शन का एक विश्वसनीय और वैध उपाय नहीं है। तीन घंटे में किसी भी विषय की आयोजित होने वाली परीक्षा में विद्यार्थी के वर्ष भर में पढ़ाये गये विषय का मूल्यांकन न्यायोचित एवं सुसंगत नहीं है।

विद्यार्थियों के सीखने और विकास का अनुकूलन करने के लिए शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया को लगातार संशोधित करने की बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कही गई है। प्रस्तावित राष्ट्रीय कला केंद्र एनसीईआरटी और एससीईआरटी के मार्गदर्शन में राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों के सभी विद्यार्थियों के स्कूल आधारित आकलन के आधार पर तैयार होने वाले और अभिभावकों को दिए जाने वाले प्रगति कार्ड को पूरी तरह से नया स्वरूप देने की योजना है। प्रगति कार्ड एक समग्र 360 डिग्री बहुआयामी कार्ड होगा, जिसमें विद्यार्थियों के संख्यात्मक, भावनात्मक साइकोमीटर डोमेन में विकास का बारीकी से विश्लेषण का विस्तृत विवरण विद्यार्थी की विशेषताओं समेत दिया जाएगा। प्रगति कार्ड के द्वारा शिक्षकों और माता-पिता को बच्चे के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी भी मिलेगी। सभी बोर्ड परीक्षाओं के लिए तत्काल महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखे जाने की बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में की गई है। बोर्ड परीक्षाओं में विद्यार्थियों के तनाव को लगभग समाप्त करने के लिए सभी विद्यार्थियों को वर्ष में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की अनुमति दी जायेगी। एक मुख्य परीक्षा और यदि वांछित हो तो एक सुधार के लिए, इस मायने में कि वे कोचिंग और रटने के बजाय मुख्य रूप से क्षमताओं/योग्यताओं का ही आंकलन करेंगी। वार्षिक/सेमेस्टर/ माडयूलर बोर्ड परीक्षाओं की एक प्रणाली विकसित करने की योजना है, जिससे काफी कम सामग्री से ही प्रतीक टेस्ट लिया जा सके और स्कूल में संबंधित पाठ्यक्रम पूर्ण होने के तुरंत बाद परीक्षा ली जाय। बोर्ड की परीक्षा को दो भागों में तैयार किया जायेगा, बहुविकल्पीय और वर्णानात्मक।

राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद ने उच्चतर शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता के लिए अपने प्रयास में नवीन प्रथाओं का प्रचार करना चाहती रही है, जो विभिन्न संस्थानों द्वारा सफलतापूर्वक संचालित किए जा रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए समयबद्ध मूल्यांकन पर विशेष जोर दिया गया है। वर्तमान में शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन करने के लिए नैक ही अधिकृत एजेंसी है। सरकारों द्वारा काफी प्रयासों के बावजूद भी अधिकतर विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों में प्रथम चक्र की नैक मूल्यांकन की प्रक्रिया अभी तक पूर्ण नहीं हो सकी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में नैक के अतिरिक्त अन्य मूल्यांकन एजेंसी बनाने की भी बात की गई है। शिक्षकों का मूल्यांकन उनके कार्य के आधार पर किया जाएगा, जिसमें भूतपूर्व छात्र, वर्तमान छात्र और उनके अभिभावक प्रमुख भूमिका निभाएंगे। अभी तक विद्यार्थियों के मूल्यांकन के लिए ज्यादातर संस्थान लिखित परीक्षा, बहुविकल्पीय परीक्षा और मौखिक परीक्षा के आधार पर करते हैं, किन्तु अब विद्यार्थियों का आंतरिक मूल्यांकन करने के लिए शैक्षणिक गतिविधियों से संबंधित सभी कार्य जैसे प्रोजेक्ट वर्क, सेमिनार, रोल प्ले, क्विज, पजल, क्लास टेस्ट, प्रैक्टिकल, सर्वे, बुक रिव्यू, स्टूडेंट पार्लियामेंट, स्क्रीनप्ले, निबंध, एग्जीबिशन, फेयर, शैक्षणिक भ्रमण आदि के द्वारा आंतरिक मूल्यांकन किया जा सकेगा। विद्यार्थियों के आत्मबल बढ़ाने के लिए स्व मूल्यांकन करने का भी अवसर दिया जाएगा। यह मूल्यांकन ऑनलाइन माध्यम से स्वनिर्देशात्मक सामग्री के अंतर्गत होगा, इसमें पारदर्शिता बनी रहेगी और विद्यार्थियों को अपना सही स्तर पता लगाने में मदद मिलेगी। प्रति माह संस्थानों में आवश्यकतानुसार मनोवैज्ञानिक की सेवा भी इच्छुक विद्यार्थियों हेतु ली जायेगी।

शिक्षा मंत्रालय (पूर्व में एमएचआरडी) के अन्तर्गत एक मानक निर्धारक निकाय के रूप में राष्ट्रीय मूल्यांकन केन्द्र स्थापित किए जाने की योजना है, जो भारत के सभी मान्यता प्राप्त स्कूलों के लिए विद्यार्थी आकलन एवं मूल्यांकन के लिए मानदंड को दिशा निर्देश बनाने जैसे कुछ मूल उद्देश्यों  को पूरा करेगा। साथ ही साथ स्टेट अचीवमेंट सर्वे का मार्गदर्शन और नेशनल अचीवमेंट सर्वे का संचालन भी करेगा। इस नीति के घोषित उद्देश्यों के अनुरूप 21वीं सदी की कौशल आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में मूल्यांकन पैटर्न को बदलने के लिए स्कूल बोर्डों की मदद करना इसका मूल उद्देश्य होगा। इस केन्द्र के माध्यम से मूल्यांकन पैटर्न और नवीनतम शोधों के बारे में स्कूल बोर्ड को भी सलाह दी जायेगी।

विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा के लिए सिद्धांत समान होंगे तथा राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) उच्चतर गुणवत्ता वाली सामान्य योग्यता परीक्षा साथ ही विज्ञान, मानविकी, भाषा, कला और व्यावसायिक विषयों में प्रत्येक वर्ष कम से कम दो बार सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों हेतु परीक्षा लेने का काम करेगी। इससे निश्चित रूप से समय और संसाधनों की बचत होगी। परीक्षाओं में अवधारणात्मक समझ और ज्ञान को लागू करने की क्षमता की जांच की जाएगी तथा इन परीक्षाओं के लिए कोंचिंग लेने की आवश्यकता को समाप्त करने पर जोर रहेगा। विद्यार्थी उन विषयों का चुनाव कर पाएंगे जिस विषय में परीक्षा देने में रुचि रखते हैं और प्रत्येक विश्वविद्यालय अपने प्रत्येक विद्यार्थी का व्यक्तिगत विषय पोर्टफोलियो को देख पाएगा और विद्यार्थी की रुचि और प्रतिभा के मुताबिक उन्हें अपने कार्यक्रमों में प्रवेश दे पाएंगे।

पेपर सेटर को विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने के लिए मॉडल उत्तर तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा। उत्तर पत्रक को चिन्हित करने में विद्यार्थियों के मूल विचारों और उनके वैचारिक समझ और रचनात्मक अभिव्यक्ति को उचित महत्व दिया जायेगा। पेपर को इस तरह से तैयार किया जायेगा कि इसमें पूरे पाइ्यक्रम को कवर किया जाए और छात्रों द्वारा चुनिंदा पढ़ाई का न्यूनतम दायरा हो। बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए परीक्षाएं बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इन्हें संगठित तरीके से आयोजित किया जाना चाहिए। शिक्षकों को परीक्षा पैटर्न में नए विकास के साथ प्रशिक्षित किए जाने की योजना भी इस शिक्षा नीति में शामिल है। मूल्यांकन प्रणाली में सुधार, विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर परीक्षा तनाव एवं बोझ कम करने हेतु है। इस नीति में मूल्यांकन प्रणाली को लचीली एवं पारदर्शी बनाने की बात कही गयी है।

मूल्यांकन प्रणाली में आमूलचूल बदलाव वर्तमान परिदृश्य की अपरिहार्य आवश्यकता है। नीति निर्धारकों ने  विद्यार्थियों एवं अभिभावकों की समस्या के प्रति संवेदशीलता का परिचय देते हुए एक लचीली, पारदर्शी, सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास परक, निरंतर रचनात्मक मूल्यांकन प्रणाली की सिफारिश की है। निश्चित रूप से इससे विद्यार्थियों  का सर्वांगीण विकास होगा तथा वे मूल्यपरक, गुणवत्तापूर्ण, सुसंगत शिक्षा प्राप्त कर समाज और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगें।

(लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष है।)

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