भारतीय शिक्षा का दार्शनिक आधार

 – शिव कुमार शर्मा

शिक्षा मनुष्य का परिष्कार करती है। शिक्षा ही उसके गुणों का संवर्द्धन कर देवत्व की ओर प्रेरित करती है। किन्तु शिक्षा के उद्देश्य उसके दर्शन से नियंत्रित होते हैं। शिक्षा साध्य है अथवा साधन इसको लेकर चिंतकों में मतभेद हैं।

भारतीय शिक्षा परम्परा प्राचीनतम है किन्तु कालक्रम में यह परम्परा विच्छिन्न हो गई। आज आवश्यकता है शिक्षा पर भारतीय मनीषियों के विचारों को जानने-समझने और शिक्षण पद्धति में उनका उपयोग कर भारत को विश्वगुरु के रूप में पुनः अभिषिक्त करने की।

भारतीय मनीषा में अनेक चिंतकों ने शिक्षा पर गहन विचार किया है। उन्होंने इसके उद्देश्य, स्वरूप और दिशा पर पर्याप्त विमर्श किया है।

भारतीय परम्परा में विद्या को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वेदांग के छः अंगों में शिक्षा भी सम्मिलित है। यहाँ उसका विस्तार करते हुए उच्चारण, व्याख्या, विधियों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। विद्या यहाँ परा व अपरा दो वर्गों में विभाजित है। भारतीय परम्परा इसे धर्म के दस लक्षणों में स्थान देती है-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमनिद्रियनिग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकंधर्मलक्षणम् ।।

 – मनुस्मृति

विष्णु पुराण में भी इसका उल्लेख है-

तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये।

आयासायापरम् कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ।।

– विष्णुपुराण  1/19/41

अनेक चिंतकों और रचनाकारों ने विद्या (आध्यात्मिक, श्रेष्ठ) एवं अविद्या (लौकिक) इसे दो रूपों में वर्गीकृत किया है –

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभुतिमउपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भुत्याम्रता : ।।

अर्थात् जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वो गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। पर जो केवल विद्या में ही रत रहता है वह उससे भी गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। यहाँ शास्त्रकार का मन्तव्य विद्या के अनुप्रयोग को लेकर है। विद्या प्राप्ति के साथ ही विवेकसम्मत प्रयोग भी अभीष्ट है। यह चिंतन मनुष्य के लिए लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के ज्ञान को आवश्यक मानता है। इनमें से किसी एक के बिना वह अपूर्ण है और अपने दायित्वों का निर्वाह सम्यक् ढंग से नहीं कर सकेगा।

दर्शन के संदर्भ में

दर्शन का सामान्य अर्थ है देखना, जानना, ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’। जिसे देखा जाए अर्थात् सत्य का दर्शन किया जाए। दृश्यते यथार्थतत्त्वमनेन अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ तत्त्वों की अनुभूति हो। ज्ञान की अनेक शाखाओं में दर्शन विशिष्ट है। यह मूल की खोज करता है। वस्तुतः यह ज्ञान की वह शाखा है जिसके माध्यम से सत्य की प्राप्ति होती है।

हमारी संस्कृति अध्यात्म केन्द्रित है। परमतत्त्व की प्राप्ति ही हमारी साधना का उद्देश्य है। सभी दार्शनिक परम्पराओं में अद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि आत्मचिंतन और परमतत्त्व का अन्वेषण ही प्रमुख है। उन्होंने आत्मानुभूति को ही मुक्ति का मार्ग माना है। ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’ अंधकार से प्रकाश की ओर की यात्रा है, जिसमें अमृत जीवन ही काम्य है।

जीवन को उसके बृहत् परिप्रेक्ष्य (मात्र सांसारिक नहीं) में देखना ही उसका उद्देश्य है। इस परम्परा में प्रकृति और मनुष्य में साहचर्य एवं परस्पर पूरकता है जबकि भोगवाद इसके विपरीत है।

ये सांख्य, न्याय, वेदान्त, योग, वैशेषिक, मीमांसा छः आस्तिक दर्शन है।

किसी भी साध्य को बिना साधन के प्राप्त नहीं किया जा सकता है। दर्शन लक्ष्य की बात करता है और शिक्षा साधन की। शिक्षा के स्वरूप निर्धारण में दर्शन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य, पाठ्यक्रम, प्रविधियाँ, शिक्षक, विद्यार्थी के बहुस्तरीय संबंध निर्धारण में दर्शन की महत्त्वूपर्ण भूमिका है। भारतीय दर्शन के दो प्रकार के धारक हैं – आस्तिक और नास्तिक। वेद का मूलाधार मानने वाले आस्तिक हैं। जबकि नास्तिक वेद को प्रमाण नहीं मानते।

सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा प्रवर्तित है। यह द्वैतवादी दर्शन है। जिसमें प्रकृति और पुरुष दो मूल तत्त्व हैं। यहाँ ज्ञान के दो रूपों का उल्लेख किया गया है। पदार्थ और विवेक ज्ञान। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, इस ज्ञान की प्राप्ति के साधन हैं। महर्षि कपिल के अनुसार शिक्षा वह है जो मनुष्य को प्रकृति और पुरुष की भिन्नता का ज्ञान कराती है। ज्ञान प्राप्ति की इस यात्रा में ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहम्, बुद्धि और आत्मा उपकरण हैं।

न्याय दर्शन के प्रवर्तक महर्षि गौतम हैं। न्याय दर्शन के अनुसार, सृष्टि का निमित्त कारण ईश्वर है और आधार है पदार्थ। न्याय दर्शन में  ज्ञान को दो भागों में विभक्त किया गया है। अनुभवजन्य ज्ञान और स्मृतिजन्य ज्ञान। आधुनिक शब्दावली में यह ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान कहा जाता है। इसमें शिक्षा वह है जो मनुष्य को पदार्थ और आत्मतत्त्व के स्वरूप से साक्षात्कार कराती है। महर्षि गौतम ने शिक्षा के चार स्तर स्वीकार किए हैं।

(क) प्रमाता – ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी

(ख) प्रमेय – ज्ञान का विषय यानि पाठ्यचर्या

(ग) प्रमाण – ज्ञान प्राप्ति का उपकरण, साधन एवं विधियाँ

(ध) प्रमिति – यथार्थ ज्ञान। जिसे हम आउटकम कहते हैं अर्थात् शिक्षार्थी ने क्या सीखा उसे क्या उपलब्धि हुई।

न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान-तुलना एवं शब्द के माध्यम से शिक्षार्थी ज्ञान की प्राप्ति करता है।

महर्षि कणाद द्वारा प्रवर्तित वैशेषिक दर्शन गोचर जगत् को सत्य मानते हुए द्रव्य आदि पदार्थों के तत्त्वज्ञान से स्थायी कल्याण एवं मोक्ष में विश्वास करता है। पदार्थ ज्ञान से अज्ञान दूर होता है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आचार्य शंकर द्वारा प्रवर्तित वेदांत दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दर्शन है। इसे हम मेरुदंड भी कह सकते हैं। यह जीव और परमात्मा को अद्वैत मानता है। कालान्तर में इसका विस्तार हुआ और रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत तथा मध्वाचार्य कृत द्वैताद्वैत इसकी शाखाएँ बनीं। शंकर के ब्रह्मसूत्र के अनुसार ‘जगन्मिथ्या ब्रह्मसत्य’। वेदान्त का ब्रह्म कर्ता और भोक्ता दोनों भूमिकाओं में हैं, दोनो ही हैं। यहाँ ज्ञान को दो स्वरूपों में विभाजित किया गया है।

अपरा – लौकिक एवं व्यावहारिक ज्ञान

परा – आध्यात्मिक ज्ञान

विद्या वही जो मुक्त करे – ‘सा विद्या या विमुक्तये’

वेदांत परम्परा में ज्ञान के स्रोत हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। ज्ञान का लक्ष्य यहाँ इस रूप में वर्णित है -श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन।

योगदर्शन – महर्षि पतंजलि द्वारा प्रवर्तित है। साधना और अभ्यास के माध्यम से इसमें ज्ञान प्राप्ति का प्रावधान है। योग का शाब्दिक अर्थ है- चित्तवृतियों का निरोध। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है ‘योगः कमसु कौशलम्’ चित्तवृतियों का निरोध इसलिए कि कर्मो में कुशलता प्राप्त की जा सके। ज्ञान योग, कर्म योग और राजयोग इसके तीन रूप बताए गए हैं। शिक्षा का अभिप्रेत यहाँ प्रकृति तत्त्व से ईश्वर तत्त्व की ओर जाना है। शिक्षा का लक्ष्य है- ‘परमानंद’ की प्राप्ति और उसका साक्षात्कार। योग दर्शन में ज्ञान प्राप्ति के जिन साधनों का उल्लेख है वे हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और योग। ज्ञान प्राप्ति की इस यात्रा के पड़ाव हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें प्रथम चार क्रियाएँ हैं, फिर तीन अवस्थाएँ हैं एवं अंतिम समाधि सम्प्राप्ति है। यह सिद्धावस्था है जिसमें वह साक्षात्कार करने के लिए सिद्ध हो जाता है। ये सभी स्थितियाँ परस्पर पूरक हैं।

उपनिषद् वेदों का विस्तार है, उनकी व्याख्या है। वस्तुतः उपनिषद् सिद्धांतों के अनुप्रयोग की दिशा में अगला पड़ाव है। उपनिषद् यानि प्राचीन गुरुकुलों में परम्परा में गुरु के निकट बैठकर ज्ञान प्राप्त करना।

ज्ञानयात्रा अत्यन्त कठिन है। ज्ञान मिल नहीं सकता, कोई किसी को दे नहीं सकता। ज्ञान अर्जित करना पड़ता है और यह स्वयं के प्रयास के द्वारा ही संभव है।

भारतीय परम्परा में पात्र और सुपात्र का उल्लेख मिलता है। वस्तुतः शिक्षा अपनी योग्यता और क्षमतानुसार वैयक्तिक रूप में ही ग्रहण की जा सकती है।

ज्ञान सुपात्र को ही प्रदान किया जाना चाहिए। कुपात्र को ज्ञान देने से उसके दुष्परिणाम के अनेक उदाहरण इतिहास में मिलते हैं।

मीमांसा दर्शन को वेदांत दर्शन के क्रम में देखने की परंपरा है। यह पूर्व मीमांसा कहा जाता है जबकि वेदान्त दर्शन को उत्तर मीमांसा की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। पूर्व मीमांसा में धर्म के विशद स्वरूप का विवेचन है जबकि उत्तर मीमांसा (वेदान्त) ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करता है। वह कैसा है?, क्या है आदि। वस्तुतः हम कह सकते हैं कि धर्म ज्ञान के परस्पर विरोधरहित वेदमंत्रों का विवेचन ही मीमांसा है।

वैदिक संस्कृत में वाक्यशास्त्र का प्रयोग मीमांसा के लिए ही किया जाता है। वहाँ कहा गया है कि वाक्यां द्वारा जिस बोध ज्ञान की प्राप्ति होती है उसे वाक्यार्थ बोध अथवा शब्द बोध कह सकते हैं।

व्याकरणशास्त्र में भी शब्द से अर्थ के बोध को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है -अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना। वाक्यार्थ, लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ (ध्वनि)

आधुनिक युग में अनेक चिंतकों -विचारकों ने शिक्षा पर विचार किया। उनको चिन्तन तत्कालीन परिस्थितियों में भारतीय शिक्षा की दशा और दिशा को प्रतिबिम्बित करने के साथ ही प्रेय मार्ग की ओर भी संकेत करता है। जहाँ शिक्षा भारतीय परम्पराओं से संबद्ध होने के साथ ही आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करने में समर्थ  है।

इस क्रम में आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द प्रमुख हैं। उन्होंने वेद-वेदांग को ज्ञान का स्रोत मानते हुए आर्य दर्शन प्रतिपादित किया। अपने शास्त्रार्थ के लिए प्रसिद्ध महर्षि दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में अपने विचारों को प्रस्तुत किया- ‘विद्या विलास मनसो धृतशील शिक्षा’।

आधुनिक भारतीय निर्माताओं में विवेकानन्द अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। भारतीय मनीषा का लोहा पश्चिम में मनवाने वालों में वे अग्रगण्य हैं। उन्होंने वेदान्त को नव्य वेदांत के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया। शंकराचार्य प्रणीत वेदान्त का वे आधुनिक विवेचन करते हैं। मनुष्य में अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर भारतीयता के नवजागरण कालीन व्याख्याकारों में प्रमुख हैं। कलाविद् का हृदय और चिंतक का मस्तिष्क दोनों एक साथ वहाँ उपस्थित हैं। वे विश्वबोध से युक्त उनकी दृष्टि में समस्त प्राणियों के प्रति एकात्मभाव है। टैगोर जीवन और सृष्टि के बीच समरसता की स्थापना हो जिससे समूची मानवता और विश्व के बीच की विषमताएँ दूर हो सकेगी।

भारतीय चिंतन में शिक्षा की अंतिम परिणति प्रकृति को संस्कृति की ओर ले जाना है विकृति की ओर नहीं। संस्कृति की ओर जो ले जाए वही शिक्षा है।

भारतीय दर्शन परम्परा भगवद् प्राप्ति और साक्षात्कार की बात करती है। यह ध्यान में रखना समीचीन होगा कि भारतीय षड्दर्शन सामानान्तर नहीं, क्रमानुगत हैं। सांख्य से उत्तर मीमांसा तक एक क्रम है, निरन्तरता है। इस निरन्तरता को क्रियारूप मे परिणत करने के लिए प्रमाण, व्यवस्था आदि शिक्षा उपलब्ध कराती है। परिणाम में यह शाश्वत की ओर ले जाती है। आज की भाषा कहें तो यही इसका ‘लर्निंग आउटकम’ है।

(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय मंत्री है।)

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