पालक, पालय और पैसा

– दिलीप वसंत बेतकेकर

“Money is a terrible master but an excellent servant.”

“पैसा मालिक के रूप में भयानक है, परन्तु नौकर के रूप में उत्तम।” प्रश्न इस बात का है कि हम पैसे को किस दृष्टि से देखते हैं? पैसे की ओर देखने की ये दृष्टि ही महत्वपूर्ण है, सब बातों की नींव है। ये दृष्टि बच्चों को देने का महत्वपूर्ण काम पालकों का है। बचपन से ही पैसे की ओर देखने की निरपेक्ष दृष्टि बच्चों को प्राप्त हो तो बड़े होकर वे पैसों का विनियोग उचित ढंग से करेंगे। पैसों का महत्व और मर्यादा उचित समय पर समझना आवश्यक है। पैसा किस मार्ग से प्राप्त करें, खर्च कब और कैसा करें, भविष्य के लिये उसकी किस प्रकार बचत करें, इन सब बातों का शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुभव, आदत आदि सभी बातों की आवश्यकता होती है। शाला-कॉलेज की शिक्षा हेतु आजकल बहुत खर्च होता है, परन्तु इस पैसे के सम्बन्ध में किंचित ही चर्चा की जाती हो।

शिक्षा के लिये पालकगण पैसे खर्च करते हैं। फीस, पुस्तकें आदि के लिये पैसे खर्च किये जाते हैं। बच्चों के हाथ में भी पैसे खनखनाते हैं। बच्चे बड़े होकर, शिक्षित होकर, बहुत पैसा कमाएं ऐसा पालक चाहते हैं, परतु पैसों के विविध पहलुओं की चर्चा अथवा उस हेतु प्रशिक्षण कम दिखाई देता हैं। बच्चों के मांगने पर उनकी मांग के अनुसार पैसा देना अथवा उनके लिए खर्च करना ही बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है, ऐसी धारणा यदि पालक के मन में हो तो वह खतरे से खाली नहीं। ‘पैसा’, इस संवेदनशील विषय पर पालकों द्वारा अपने पाल्य से गंभीरतापूर्वक चर्चा करनी चाहिये। आज के मौज-मस्ती वाले वातावरण में पैसों के सम्बन्ध में बच्चों की धारणा विकसित करने की आवश्यकता है। तो शुरु कैसे करें और कहाँ से?

परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में बच्चों को वास्तविकता से अवगत कराएं। परिवार की आमदनी के बारे में चर्चा की जाए। आमदनी का स्रोत कौनसा है, कितनी आमदनी है, घर खरीदने के लिये यदि कर्ज लिया हो तो उसकी विस्तृत जानकारी, कर्ज की मद में दिये जाने वाली किश्त आदि के अदा करने पर शेष कितनी राशि बचती है, घर चलाने हेतु मासिक खर्च का ब्यौरा, ये सब जानकारी बच्चों को होनी चाहिये। बच्चों की आयु ध्यान में रखते हुये ये चर्चाएं करें! कष्ट, परिश्रम, काम, नौकरी करने पर ही पैसा प्राप्त होता है। कष्ट के बिना पैसे प्राप्त नहीं होते, यह बात उन्हें समझानी होगी। पैसों का मूल्य यदि वे न समझ पाये, तो भविष्य में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर घर गृहस्थी चलाना कठिन होगा।

आर्थिक अनुशासन न होने से बच्चों के लिये कितना भी खर्च करें और उनके भविष्य के लिए आर्थिक व्यवस्था करें तो भी उसका सुयोग्य परिणाम नहीं दिखेगा। “पूत कपूत तो क्यों धन संचय?, पूत-सपूत तो क्यों धन संचय? आसपास दिखने वाले विज्ञापनों के कारण बच्चों को प्रत्येक वस्तु लेने की इच्छा रहती है। इस हेतु वे ज़िद, उठा-पटक, हंगामा करते हैं, इतना ही नहीं घर से चले जाने की धमकी भी देते हैं। कभी तो आत्महत्या तक की धमकी दी जाती है। ऐसे प्रसंग कुशलतापूर्वक सुलझाने की आवश्यकता है। उतावला न होते हुए सामंजस्य दिखाकर, दृढ़ता से परिस्थिति को संभालना होगा।

मॉल, सुपर मार्किट अब केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं रहे हैं, वरन पचास-साठ हजार जनसंख्या की छोटी बस्तियों में, गांवों में भी शान से खड़े दिखते हैं। युवा पीढ़ी में उनका आकर्षण बढ़ रहा है। ये सारी मायावी दुनिया है। शाला में पढ़ने वाले बच्चे भी मॉल, सुपर मार्किट में जाने की ज़िद करते हैं। इसे संकट कहें अथवा अवसर? अवसर समझते हुए उसका उपयोग कर सकते हैं। वहां की विविध आकर्षक वस्तुओं को देखना, उनकी उपयुक्तता के संदर्भ में चर्चा करना, मोलभाव के बारे में समझना और समझाना, वही वस्तु अन्यत्र कितने मूल्य की मिल सकती है, भिन्न मूल्य होने पर उन दोनों मूल्यों में अंतर, ये अंतर कैसा, किस कारण आदि छोटे-छोटे परन्तु महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करने की आदत डालना व उस सम्बन्ध में शिक्षा देने का अच्छा अवसर मिलेगा!

आवश्यकता और इच्छा इन दोनों के अंतर को उचित ढंग से समझाया जाए तो अनेक प्रश्न अपने आप सुलझ सकते हैं। आवश्यक वस्तु कौन सी और केवल स्पर्धा या दिखावे की वस्तु कौन सी, इनमें अंतर पहचानना सीखना और सिखाना आ जाये तो अति उत्तम!

एक दम्पती भेंट वस्तु क्रय करने के लिये सुपर मार्किट में जाते हैं। साथ में उनका बालक भी है। स्वाभाविकतः उसे भी अपने लिये कुछ वस्तु खरीदने की इच्छा होती है। परन्तु माँ-पिता उसको स्पष्ट और कठोरता से कहते हैं – “देखो, आज हम यहां भेंट वस्तु खरीदने के लिये आये हैं, तुम्हारे लिये कुछ खरीदने नहीं आए हैं।” यह कहते हुए उपयोग किये गये शब्द, आवाज़, सुर, हावभाव आदि किस प्रकार के हैं, इस पर अधिकतर परिणाम निर्भर करता है। और फिर, ऐसा वाक्य सुनकर बच्चे चुप रहने वाले हैं क्या? ऐसा भ्रम पालना उचित नहीं।

एक परिवार में बहुत अच्छा प्रयोग किया गया। बच्चे को तीन डिब्बे दिये। तीनों डिब्बों पर लेबल लगा दिये। एक डिब्बे पर ‘सेविंग (बचत)’, दूसरे पर ‘शेयरिंग’ और तीसरे पर ‘स्पेंडिंग’ लिख दिया। बच्चे को ऐसी आदत डाली कि माता-पिता अथवा ताऊ, मामा, मौसी आदि द्वारा दिये गये पैसे समान विभाजित कर तीनों डिब्बों में डालें, पहले डिब्बे के पैसे ‘बचत’, दूसरे डिब्बे के पैसे किसी अच्छे कार्य हेतु अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान देने हेतु और तीसरे डिब्बे के पैसे आवश्यकतानुसार खर्च करें।

अन्य बालक जो खरीद करते हैं, आनन्द लेते हैं मौज-मस्ती करते हैं, पैसों का दुरुपयोग करते हैं, ये देखकर हम क्यों पीछे रहें, हम भी क्यों न ऐसा ही करें, जीवन शैली उसी प्रकार की रखें, ऐसे विचार कच्चे बाल मन में आना स्वाभाविक है। फिर वह बच्चे माता-पिता से पैसों के लिये ज़िद करते हैं। ऐसी स्थिति में पालक पशोपेश में पड़ जाते हैं। द्विविधा की मनःस्थिति हो जाती है। ऐसी स्थिति आने पर पालकों द्वारा बच्चों को स्पष्ट रूप से और दृढ़तापूर्वक अपनी आर्थिक परिस्थिति कैसी है और आर्थिक मर्यादा क्या है यह बता देना उचित रहेगा। माता और पिता दोनों का एकमत होना आवश्यक है। दूसरे पालक अपने बालकों के लिये कैसा और कितना खर्च करते हैं इसका तनाव अथवा भार अपने सिर पर लेने की आवश्यकता नहीं है।

घर की आवश्यक वस्तुओं की खरीद के लिये बच्चों को साथ ले जाएं। वस्तुओं का मूल्य, गुणवत्ता, उपयुक्तता आदि अनेक मुद्दों पर खरीद करते समय विचार करना पड़ता है। बच्चे साथ होने पर स्वतः ही उनको भी इस सम्बन्ध में प्रशिक्षण प्राप्त होगा। साथ ले जाने का उद्देश्य बच्चे को अवश्य बताएं, निरीक्षण करने हेतु उन्हें सूचना दें अन्यथा केवल बाजार, दुकान, मार्किट, मॉल, सुपरमार्किट में साथ ले जाना सार्थक नहीं रहेगा।

विविध माध्यमों द्वारा वस्तुओं के आकर्षक विज्ञापनों के छोटे-बड़े सभी व्यक्ति शिकार हो जाते हैं। विज्ञापन में प्रदर्शित सभी बातें शत-प्रतिशत सही हों, आवश्यक नहीं। ये बात भी बच्चों के ध्यान में लाएं। दिखावटी, आकर्षक और ठगने वाले विज्ञापनों के जाल में न फंसते हुए क्रय करने का निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी चाहिये अन्यथा हर क्षण ठगी के शिकार होने की सम्भावना रहती है। ग्राहक हित, ग्राहक अधिकार, ग्राहक आन्दोलन, ग्राहक हित मंच आदि के बारे में शिक्षा दी जाए तो उत्तम रहेगा।

अनेक कंपनियां क्रेडिट कार्ड्स का व्यवहार करती हैं। दिखने में सरल, आकर्षक स्वरूप होने के कारण उनसे ‘ऋण’ लेकर मौज मनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जिस वस्तु की वास्तव में आवश्यकता है उसे खरीदना ठीक है। परन्तु जिस वस्तु के बिना कार्य चल सकता है उसे भी खरीदने की प्रथा चल पड़ी है। वॉरेन बुपफे का एक मार्मिक वाक्य याद आता है, “आपको आवश्यक नहीं ऐसी वस्तुएं यदि आप खरीदने लगे तो सम्भव है कि आपको आपकी आवश्यक वस्तुओं को बेचने की नौबत आ जाए।”

हाथ में पैसा आते ही उसे खर्च कर देना, कोई वस्तु अनावश्यक दिखे, उसे भी खरीद लेना ऐसी आदत अनेकों में होती है। बचपन से ही ऐसी आदत को रोकें नहीं तो भविष्य में परेशानी आती है। अंधाधुंध, बेशुमार, खरीदारी करने के संदर्भ में श्री विल रॉजर्स कहते हैं – “Too many people spend money they haven’t earned , to buy things they don’t want, to impress people”.

महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के एक सर्वेक्षण में एक प्रश्न पूछा था – “आप अपने पॉकेटमनी के पैसों में से कुछ बचत करते हैं क्या?” पचास में से सोलह विद्यार्थी नियमित बचत करने वाले, उनतीस कभी-कभी बचत करने वाले और पांच विद्यार्थी कभी भी बचत न करने वाले पाए गये। बच्चों के लिये अनेक बचत योजनाएं उपलब्ध हैं। अध्ययन करते समय मासिक बचत की आदत डालनी चाहिये। पालकों द्वारा आवश्यक रूप से बैंक, पोस्ट ऑफिस आदि में बच्चों के नाम से बचत खाता खोलकर बचत करना प्रारंभ करें तो उच्च शिक्षा के लिये वह उपयुक्त हो सकता है। परिवार के स्वास्थ्य के लिये भी अनेक योजनाएं उपलब्ध हैं। उन पर भी विचार करना लाभकारी रहेगा।

वॉरेन बुपेफ के अनुसार – “खर्च करने के पश्चात बचत करने के ऐवज़ में बचत के बाद शेष राशि खर्च करें अर्थात् सभी प्रकार से विचार करने के उपरांत, विचार करके आर्थिक अथवा अन्य परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए निर्णय लें।”

पैसा एक साधन है, साध्य नहीं, ये बात ध्यान में रखें। किसी भी मार्ग से पैसा प्राप्त करना, यही उद्देश्य होगा तो उसका पर्याप्त मूल्य भी चुकाना पड़ता है। “भले आदमी के दिमाग में पैसा होना चाहिये, दिल में नहीं” ऐसा सावधानी दर्शाने वाला संदेश जोनाथन स्विफ्रट द्वारा दिया गया है।

एडी स्टैनले के अनुसार – “लालच आर्थिक बीमारी न होकर हृदय की बीमारी है।”

मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पैसा आवश्यक है, ये बात नकार नहीं सकते। परन्तु पैसा ही सर्वस्व और सभी कार्य पैसों के बल पर सम्पन्न हो सकते हैं अथवा पैसे से सब कुछ खरीद सकते हैं, ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगी।

पैसा प्राप्त करने की लत, स्पर्धा, धुन में पैसों से खरीद न सकने वाली चीज़ों को हम खो तो नहीं रहे हैं? इस ओर प्रत्येक पालक को ध्यान देना चाहिये और ऐसा ही अपने पाल्य को भी सिखाना चाहिए। अन्यथा, “मिली थी जिंदगी किसी के काम आने के लिये, पर वक्त बीत रहा है कागज़ के टुकड़े कमाने के लिये”।

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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