लज्जाराम तोमर कृत पंचपदी शिक्षण पद्धति

✍ विपिन राठी

शिक्षा ही वह आधारशिला है जिस पर खड़े होकर कोई राष्ट्र विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम हो सकता है। अतः किसी भी राष्ट्र की शैक्षिक व्यवस्था ऐसी हो कि एक ओर तो वह अपनी संस्कृति, जीवन दर्शन तथा राष्ट्र प्रेम से आने वाली पीढ़ी को सुसज्जित कर सकें तो दूसरी और आधुनिकता, वैज्ञानिकता तथा तकनीकी स्तर पर भी अपनी पीढ़ी को समृद्ध कर सकें, तभी वह राष्ट्र शक्तिशाली होकर संपूर्ण मानव जाति को संरक्षण व संवर्धन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाएगा। भारतवर्ष हजारों वर्षों के संघर्षों के उत्थान-पतन, जय-विजय के द्वारा 1947 में स्वतंत्र तो हुआ किंतु पाश्चात्य संस्कृति व शिक्षण पद्धति से स्वतंत्र न हो सका।

भाऊराव देवरस, नानाजी देशमुख, कृष्णचंद्र गांधी, हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे मनीषियों व शिक्षाविदों के प्रयासों से 1952 में सरस्वती शिशु मंदिर योजना के अंतर्गत गोरखपुर में प्रथम विद्यालय खोला गया। बाद के वर्षों में यही पौधा ‘विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान’ नामक विशाल वटवृक्ष के रूप में सामने आया है। इसे इतना विशाल बनाने व विस्तार देने में श्री लज्जाराम तोमर जी का योगदान अग्रणी है। जैसे ही लज्जाराम तोमर जी का नाम आता है मुझे पंक्तियां याद आती हैं कि – “कोई चलता पद चिह्नों पर, कोई पद चिह्न बनाता है।” 21 जुलाई 1930 को गांव बघपुरा, जिला मुरैना, मध्य प्रदेश में ठाकुर देव किशन सिंह व माता सावित्री देवी की कोख से जन्मे श्री लज्जाराम तोमर ने शिक्षा जगत में वह कर दिखाया जो आज केवल स्वप्न जैसे लगता है किंतु यथार्थ है। आज ‘विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान’ बीस हजार से अधिक शिक्षा केन्द्रों वाला संगठन है।

लज्जाराम तोमर जी ने एक छोटे से गांव से निकलकर निरंतर कठिनाइयों को पार करते हुए 1957 में आगरा विश्वविद्यालय से M.A. हिंदी व B.Ed की उपाधि प्राप्त की तथा 1958 में शासकीय प्राध्यापक का पद प्राप्त किया। क्योंकि आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों से प्रभावित थे तो आपने अपनी सरकारी नौकरी को छोड़कर आगरा के सरस्वती शिशु मंदिर के संस्थापक प्रधानाचार्य का पदभार ग्रहण किया तथा आगरा में ही 1961 में सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज के प्राचार्य बने। फिर आपने पीछे मुड़कर नहीं देखा 1972 में आप उत्तर प्रदेश भारतीय शिक्षा समिति के संस्थापक मंत्री बने। 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया गया। संघ के सभी स्वयंसेवकों को खोज-खोज कर जेल में डाला गया। आप की भी गिरफ्तारी हुई व जेल गए। लज्जा राम जी के लिए वह दिन कितना कष्टकारी रहा होगा जब विवाह मंडप में हथकड़ी युक्त हाथों से ही अपनी बेटी का कन्यादान करना पड़ा हो। किंतु कहा जाता है कष्टों में तपकर ही महापुरुष पैदा होते हैं। आप अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए और 1977 में पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर आपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में स्वयं को राष्ट्र सेवा में पूर्णतया समर्पित कर दिया और 1979 में विद्या भारती के प्रथम अखिल भारतीय संगठन मंत्री बने।

शिक्षा क्षेत्र में प्रयोग करने वाले संगठनों, संस्थानों का भ्रमण करने, उनका अवलोकन करने तथा शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों से भेंट वार्ता करने में लज्जाराम तोमर विशेष रूचि रखते थे। इसी विशेष रूचि के परिणाम स्वरूप लज्जाराम तोमर जी एक उच्च कोटि के विचारक, शोधकर्ता, प्रबुद्ध एवं परिपक्व लेखक बन सके। ‘भारतीय शिक्षा के मूल तत्व’ 1984, ‘विद्यालय सामाजिक चेतना के केंद्र बने’ 1999, ‘परिवार में संस्कारक्षम वातावरण क्यों और कैसे?’ 1999, ‘भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार’ 1999, ‘प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति’ 2001, ‘विद्या भारती की अभिनव पंचपदी शिक्षण पद्धति’ 2003, ‘बाल भारती शिक्षा’ 2004, ‘विद्या भारती की विद्यालय संकुल योजना’ 2004, जैसी कृतियाँ लज्जाराम तोमर जी द्वारा शिक्षा जगत को समर्पित हैं। उनका समस्त लेखन समाधि की अवस्था का द्योतक है। इस संबंध में उनका स्वयं का कथन है “ये पुस्तकें मैंने नहीं लिखी हैं, किसी भाव जगत में किसी शक्ति ने मुझसे लिखवाया है। मुझे भी नहीं पता मैं चाहूँ तो दोबारा इसे नहीं लिख सकता”। ऐसे महापुरुष की जीवन यात्रा अनेक मार्गों पर अपने स्थाई पद चिह्न छोड़ते हुए 19 नवंबर 2004 को लखनऊ में अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर परम ज्योति में विलीन हो गयी।

शिक्षा जगत में लज्जाराम तोमर जी का कार्य अतुलनीय है। उन्होंने शिक्षा और शिक्षण पद्धतियों के संबंध में बहुत व्यापक चिंतन व मनन किया तथा अध्ययन क्षेत्र में निरंतर नवीन प्रयोग व शोध करते हुए शिक्षण संबंधी नए विचार, अवधारणा व पद्धति निर्माण करने का प्रयास करते रहे। इन्हीं प्रयासों के परिणाम स्वरुप वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालय शिक्षण हेतु मनोवैज्ञानिक शिक्षण सिद्धांतों पर आधारित एक व्यवस्थित शिक्षण पद्धति अपनाई जाए। यह शिक्षण पद्धति इस प्रकार की हो जिसमें छात्र को अपना ज्ञानात्मक, भावनात्मक एवं क्रियात्मक विकास करने की स्वतंत्रता मिल सके। लज्जाराम जी का मत था कि यदि छात्रों को ज्ञान एक उपयुक्त शिक्षण पद्धति के आधार पर दिया जाएगा तो वह स्थाई व व्यावहारिक होगा। अन्यथा सभी संस्कार, सिद्धांत व शैक्षिक उद्देश्य धरे के धरे रह जाएंगे। लज्जाराम तोमर जी का मानना था कि ज्ञान से इच्छा का जागरण होता है और इच्छा क्रियाशीलता को जन्म देती है अर्थात व्यवहार कराती है। इस व्यवहार में परिवर्तन लाना ही शिक्षण का उद्देश्य है। स्वामी विवेकानंद जी का कथन है कि “मनुष्य के अंतर में समस्त ज्ञान अवस्थित है। आवश्यकता है उसे जागृत करने के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करने की। इसी वातावरण का निर्माण करना शिक्षण है।” अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर लज्जाराम तोमर जी ने पाया कि शिक्षण प्रक्रिया में तीन कारक निहित रहते हैं। प्रथम-बालक, द्वितीय-विषयवस्तु, तृतीय-शिक्षण। बालक जन्म से अपरिपक्व होता है अतः उसे पथ प्रदर्शन की आवश्यकता होती है। यह पथ प्रदर्शन संस्कारयुक्त व व्यवस्थित शिक्षण प्रक्रिया से ही संभव है।

पंचपदी शिक्षण पद्धति

लज्जाराम तोमर जी ने अपने विस्तृत अध्ययन में पाया कि प्राचीन भारतीय शिक्षण परंपरा में हमारे यहां शिक्षण की  कोई वैज्ञानिक पद्धति नहीं थी। केवल यही उल्लेख मिलता है कि छात्र ब्रह्मचारी ऋषि कुल में ज्ञानार्जन के लिए जाते थे तथा आपसी संवाद से शिक्षा ग्रहण करते थे। वर्तमान में भी हम अंग्रेजों द्वारा प्रदत हरबर्ट की शिक्षण पद्धति के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अतः लज्जाराम तोमर जी ने ‘पंचपदी शिक्षण पद्धति’ को विकसित कर विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय में इसे स्वयं लागू किया व सभी विद्यालयों में लागू कराने के लिए निरंतर क्रियाशील रहे। लज्जराम तोमर जी द्वारा कृत पंचपदी शिक्षण पद्धति हरबर्ट की वह पद्धति नहीं है जिसका प्रशिक्षण हम B.Ed में प्राप्त करते हैं। हरबर्ट की शिक्षण पद्धति का केंद्र जहां शिक्षण है वहीं लज्जाराम तोमर जी की पंचपदी शिक्षण पद्धति बाल केंद्रित है। लज्जाराम तोमर जी का स्पष्ट मानना था कि एक शिक्षक को माली की तरह होना चाहिए। जैसे कोई माली पौधे की देखभाल करता है, उसे सींचता है, उसी प्रकार एक शिक्षक भी छात्र के लिए शिक्षण का वातावरण निर्मित करें, उसका मार्गदर्शन करें। इसी को ध्यान में रखते हुए वह अपनी कक्षा का कार्यक्रम, अपने विद्यालय की कार्य योजना व कक्षा कक्ष की तैयारी करें। यही पंचपदी शिक्षण पद्धति का आधार है। लज्जाराम तोमर जी ने पंचपदी शिक्षण पद्धति के पांच सोपान बताये हैं-

  1. अधिति 2. बोध 3. अभ्यास 4. प्रयोग 5. प्रसार

अधिति

अधिति का शाब्दिक अर्थ है अध्ययन। इस सोपान में अध्यापक विषय वस्तु को छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए नवीन विषय को छात्रों के पूर्व ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। छात्र विषय की प्रस्तुति के अनुरूप अध्यापक द्वारा प्रदत्त विषय के साथ साथ सभी सिद्धान्तों व तथ्यों को श्रवण, प्रश्नोत्तर व प्रयोग आदि के माध्यम से ग्रहण करते हैं। अध्ययन वही श्रेष्ठ है जिसमें सभी ज्ञानेंद्रियाँ क्रियाशील हों। लज्जाराम जी ने अधिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि कक्षाकक्ष के अंदर विषयवस्तु का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार रखा जाना चाहिए कि बालक की सभी ज्ञानेंद्रियां क्रियाशील रहें तथा बालक विषयवस्तु को उचित ढंग से ग्रहण कर पाए। यदि विषयवस्तु स्वकेंद्रित होगी तो वह नीरस होगी तथा कक्षा का वातावरण भी उबाऊ व बोझिल होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि अधिति में ज्ञानेन्द्रियों की क्रियाशीलता आवश्यक है।

बोध

पंचपदी शिक्षण पद्धति का दूसरा सोपान बोध है। बोध का अर्थ है समझना, आत्मसात करना। अध्येता के द्वारा कक्षा में ज्ञानेंद्रियों के द्वारा जो भी सुना, देखा, परखा गया है उसको ग्रहण करना, ठीक से समझना, आत्मसात करना बोध है। लज्जाराम तोमर जी का मत था कि बुद्धि निरीक्षण और परीक्षण के साथ-साथ विषय का विश्लेषण करते हुए कार्य कारण के भाव आदि की सहायता से अपनी चिंतन प्रक्रिया चलाती है। इस मनन और चिंतन के आधार पर ही ज्ञानेंद्रियों द्वारा ग्रहण विषय वस्तु का बोध होता है अर्थात छात्र विषय को सही से समझ पाता है। लेकिन इस विषय को समझने की एक शर्त भी है माने अध्येता का अध्ययन तभी पूर्ण होगा जब यह अध्येता की बुद्धि का अविभाज्य अंग बनकर दीर्घ काल तक उसमें विराजमान रहे। तभी स्थाई बोध की प्रक्रिया पूर्ण होगी।

अभ्यास

अभ्यास अध्ययन का तीसरा सोपान है। अभ्यास का अर्थ है कि किसी भी क्रिया को बार-बार करना। इसे पुनरावर्तन भी कहा जाता है। कई बार यह अनुभव में आता है कि कक्षाकक्ष में अध्यापन भी ठीक हुआ तथा छात्रों के द्वारा उचित प्रकार से विषय को आत्मसात भी किया गया है। किंतु एक दो सप्ताह बाद यदि छात्र से उस विषय में पूछा जाए तो वह ठीक प्रकार से बोध किये गए विषय के बारे में बता नहीं पाता। इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। अभ्यास अर्थात पुनरावर्तन करने से बोध स्थाई हो जाता है और यह अध्येता की बुद्धि का अविभाज्य अंग बन जाता है। लज्जाराम तोमर जी पाठ के उपरांत दिए गए बोझिल गृहकार्य को अभ्यास नहीं मानते थे। उनका कहना था कि अभ्यास कार्य रुचिकर व प्रयोगात्मक होना चाहिए। तथा वह दैनिक दिनचर्या से कहीं न कहीं संबद्ध होना चाहिए। वह मात्र प्रश्नोत्तर आधारित गृह कार्य के पूर्ण विरोधी थे।

प्रयोग

अध्ययन का चौथा सोपान प्रयोग है। लज्जाराम तोमर जी ने अनुभव किया और यह सत्य भी है कि “हर प्रकार का ज्ञान जीवन में व्यवहार में लाने के उद्देश्य से ही अर्जित किया जाता है। अनुभवजन्य ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान होता है और यह बार-बार प्रयोग से ही संभव है”। इस सिद्धांत के अनुरूप ही पंचपदी शिक्षण विधि में उन्होंने ‘प्रयोग’ नामक सोपान को रखा है। उनका मानना था कि प्रयोग आधारित शिक्षण ही एक अध्येता को समाज उपयोगी बनाता है। इसी के आधार पर वह सर्वे भवंतु सुखिनः….तथा सर्वजन हिताय….. के भाव से अपने क्षेत्र में शोध व अनुसंधान करता है। उदाहरणार्थ – भौतिक विज्ञान का अध्येता भिन्न-भिन्न प्रयोग करते हुए विश्व को कल्याणकारी आविष्कार देता है। संगीत का अध्येता बार-बार प्रयोग के आधार पर जगत को मधुर संगीत दे पाता है।

प्रसार

लज्जाराम तोमर जी की पंचपदी शिक्षण पद्धति का पांचवा सोपान प्रसार है। प्रसार के दो आयाम उन्होंने बताए- स्वाध्याय और प्रवचन।

स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं ही अध्ययन करना अथवा स्वयं का अध्ययन करना। स्वयं ही अध्ययन करने का अर्थ है प्राप्त किए हुए ज्ञान को मनन, चिंतन, अभ्यास और प्रयोग के आधार पर निरंतर परिष्कृत करते रहना। ऐसा करने से ज्ञान अधिकाधिक आत्मसात हो जाता है। यही अनुसंधान भी है। इसमें सारी मौलिकता और सृजनशीलता प्रयुक्त होती है। व्यक्ति के अंतःकरण से ज्ञान प्रस्फुटित होने लगता है। सीखा हुआ विषय पूर्ण रूप से व्यक्ति का अपना हो जाता है और वह स्वयं प्रकट होने लगता है।

प्रसार का दूसरा आयाम प्रवचन है। प्रवचन का अर्थ है अध्यापन। सीखे हुए ज्ञान को अध्येता को देना अध्यापन है। इस प्रक्रिया को इस तरह समझें – गाय घास चरती है। उसकी जुगाली करती है। अपने शरीर में पचाती है। अपने अंतःकरण की सारी भावनाएं उस में डालती है। बछड़े के लिए उसके मन में जो वात्सल्य भाव है वह भी उसमें उड़ेलती है। खाया हुआ घास दूध में परिवर्तित होता है फिर वह बछड़े को दूध पिलाती है। घास से दूध बनने की प्रक्रिया अधिति से प्रसार की प्रक्रिया है। यही अध्ययन से अध्यापन तक पहुंचने की प्रक्रिया है। यही वास्तव में शिक्षा है। ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करने की यही प्रक्रिया है। और ऐसे ही ज्ञान प्रवाह की शृंखला बनती है। इस शृंखला की एक कड़ी अध्यापक है तो दूसरी कड़ी अध्येता है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह देना और लेना चलता रहता है और ज्ञान धारा अविरल बहती रहती है।

पंचपदी की यह शिक्षण प्रक्रिया अत्यंत सहज है किंतु कक्षाकक्ष में इसका पालन नहीं होता। कक्षा में अधिकांश देखा जाता है कि शिक्षक अधिति से सीधे प्रवचन पर पहुँच जाता है। वह बीच के बोध, अभ्यास, प्रयोग आदि की कोई चिंता नहीं करता। जिस कारण से ज्ञान निरर्थक और प्रयोजन हीन बन जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समस्त शिक्षण प्रक्रिया पंचपदी शिक्षण पद्धति पर आधारित होनी चाहिए। विद्यालय में कक्षाकक्ष से होने वाला अध्ययन अध्यापन पंचपदी के आधार पर चले। वर्तमान में ऐसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।

(लेखक दुर्गावती हेमराज टाह स. वि. म. नेहरु नगर, गाजियाबाद-उ०प्र० में प्राचार्य है।)

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