राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षक

– डॉ० रविन्द्र नाथ तिवारी

भारतीय संस्कृति और दर्शन का विश्व में बड़ा प्रभाव रहा है, इस समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए न सिर्फ सहेज कर संरक्षित रखने की जरूरत है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने हेतु शोध कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए और नए-नए उपयोग भी सोचे जाने चाहिए। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में शिक्षा व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु शिक्षक या गुरु रहा है, जिसके बिना जीवन का अर्थ समझ पाना संभव नहीं है। गुरु को ईश्वर की श्रेणी में रखा गया है जैसे –

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरुदेव महेश्वरः।

गुरु साक्षात्परमब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नमः।।

भारतवर्ष में गुरु पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रह कर निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके, उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्य अनुसार गुरु दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं है। गुरु की महिमा को महाकवि संत तुलसीदास ने अपने महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ में गुरु वंदना से की है। जैसे –

बदऊं गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।’

ऋषि काल से ही देश में गुरु के महत्व को कुछ इस तरह से दर्शाया गया है। शास्त्रों में ‘गु’ का अर्थ बताया गया है अंधकार या मूल अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ किया गया है, उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर ज्ञानांजनशलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहते हैं। गुरु को ईश्वर के समान समझा गया है। ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है –

“अज्ञानान्तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।”

वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षक के महत्व पर सर्वाधिक जोर देती है। जिसमें उल्लेख है कि प्रत्येक छात्र का विशिष्ट क्षमताओं की पहचान और उसके विकास के लिए शिक्षकों और अभिभावकों को इनकी क्षमताओं के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा। जिससे की छात्रों की अकादमिक और अन्य क्षमताओं का पूर्ण विकास हो सके। उच्चतर शिक्षा के अनुभवजन्य क्षेत्रों में प्रवेश की ऐसी अपार संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं, जो व्यक्तियों और समुदायों को भी प्रतिकूल परिस्थितियों के कुचक्र से निकाल सकते है। इसी कारण सभी के लिए उच्चतर गुणवत्ता युक्त शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने को सर्वोच्च प्राथमिकताएं होनी चाहिए।

शिक्षक वास्तव में बच्चों के भविष्य को आकार देते हैं तथा छात्र और शिक्षक दोनों मिलकर हमारे समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करते हैं। पूर्ण योगदान के कारण मेधावी छात्र और योग्य शिक्षक हमेशा समाज में सम्मानित सदस्य रहे हैं। विद्वान ही हमेशा अच्छे शिक्षक बनते हैं। प्राचीन सभ्यताओं के अनुसार अच्छा शिक्षक छात्रों को निर्धारित ज्ञान, कौशल और नैतिक मूल्य प्रदान करने का कार्य करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में अध्यापक की शिक्षा गुणवत्ता, भर्ती, पदस्थापना, सेवा शर्तें और शिक्षकों के अधिकारों की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया गया है। उक्त तथ्यों पर ध्यान देने से ही शिक्षा की गुणवत्ता और  शिक्षकों के उत्साह को वांछित मानक प्राप्त होगा।

छात्रों को भी प्राचीन सभ्यता के अनुसार शिक्षकों को उच्चतर दर्जा और उनके प्रति आदर सम्मान के भाव को पुनर्जीवित होगा। हमारे राष्ट्र को सर्वोत्तम राष्ट्र बनाने के लिए शिक्षकों और छात्रों में प्रेरणा और सशक्तिकरण की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे शिक्षण संस्थानों का अभाव सदियों से चला आ रहा है, जिससे वहां की युवा पीढ़ी अध्ययन अध्यापन में पीछे रह जाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस पर विशेष ध्यान दिया गया है तथा बी.एड. पाठ्यक्रम में अध्ययन कर रहे छात्रों को मेरिट के आधार पर छात्रवृत्ति आवंटित करने का प्रावधान रखा गया है। चार वर्षीय बी.एड. डिग्री सफलतापूर्वक करने के बाद स्थानीय क्षेत्रों में छात्रों (विशेषकर छात्राओं) को निश्चित रोजगार देने का प्रावधान भी शामिल है, जिससे कि यह विद्यार्थी स्थानीय क्षेत्रों के रोल मॉडल के रूप में और उच्चतर शिक्षकों के रूप में सेवा दे सकें।

उत्कृष्ट शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा और विशेष तौर पर उस क्षेत्र में जहां शिक्षक की कमी पहले से ही है। ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रों को पढ़ाने के लिए एक प्रमुख प्रोत्साहन स्कूल और उसके आसपास स्थानीय आवास का प्रावधान भी रखा गया है। शिक्षक का दायित्व है कि समुदाय के बीच संबंध बनाए रखें, जिससे छात्र को रोल मॉडल और शैक्षिक वातावरण मिल सके जो कि शिक्षक का बार-बार स्थानांतरण से संभव नहीं हो पाता है। अतः शिक्षक के स्थानान्तरण को शासन द्वारा अत्यावश्यक होने पर ही (कम से कम) करने की बात कही गई है। शिक्षक का चयन विशेष प्रतियोगी परीक्षाओं से होना चाहिए, इसके लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा टीईटी को और विकसित करने पर बल दिया गया है। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया एक अभिन्न अंग होता है, इसके लिए सभी साक्षात्कारों को स्थानीय भाषा में करने से किसी भी व्यक्ति की दक्षता का सही आकलन किया जा सकता है। ऐसा करने से शिक्षक छात्रों की प्रचलित भाषा में बातचीत कर सकेंगे इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया है।

छात्रों का पूर्ण विकास केवल संबंधित विषय का अध्ययन करने से नहीं हो पाता है। पूर्ण विकास के लिए छात्रों को कला, शारीरिक शिक्षा, व्यवसायिक शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं का भी ज्ञान होना आवश्यक है। इसके लिए सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में संभावित शिक्षकों की नियुक्ति के बारे में भी जोर दिया गया है। आवश्यकतानुसार शिक्षकों की भर्ती में गुणवत्ता प्रोत्साहन भी किए जाने की बात है। विद्यालय के कार्यों के वातावरण और संस्कृतियों को आमूल-चूल परिवर्तन करने का प्राथमिक लक्ष्य है, जिससे शिक्षक और छात्र दोनों का अधिकतम स्तर पर विकास हो सके।

वातावरण और संस्कृतियों में परिवर्तन होने से शिक्षक, छात्र, अभिभावक, प्रधानाध्यापक और अन्य सहायक कर्मचारी के समावेशी समुदाय का हिस्सा बन सकेंगे। इन सब का एक ही लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी छात्र अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके। स्कूलों में सभ्य और सुखद कार्य सुनिश्चित करने के लिए संसाधनों की विशेष जरूरत पड़ती है जैसे कि भौतिक संसाधन, शौचालय, स्वच्छ पेयजल, सीखने के लिए स्वच्छ और आकर्षक स्थान, बिजली, कंप्यूटर उपकरण, इंटरनेट, पुस्तकालय और खेल मनोरंजन के साधन। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इन सारी आवश्यक चीजों पर विशेष जोर दिया गया है। छोटे-छोटे स्कूलों, कॉलेजों को मिलाकर एक कॉन्प्लेक्स बनाकर शिक्षा देने का भी प्रयास काफी प्रभावशाली रहेगा। इससे छात्रों को बड़े समुदाय के साथ शिक्षण करने का मौका मिलेगा। शिक्षकों को आगे बढ़ाने और सीखने के लिए प्रभावी सामुदायिक वातावरण बनाने में मदद मिलेगी।

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उच्चतर शिक्षण संस्थाओं में अगली पीढ़ी को आकार देने वाले शिक्षकों की एक टीम के निर्माण में अध्यापक शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। शिक्षकों को तैयार करना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके लिए बहुत ही संयुक्त दृष्टिकोण और ज्ञान की आवश्यकता के साथ-साथ बेहतरीन तथ्यों के निर्देशन में मान्यताओं और मूल्यों के निर्माण के साथ ही साथ उनके अभ्यास की भी आवश्यकता होती है। यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि अध्यापक शिक्षा और शिक्षण प्रक्रियाओं से संबंधित अध्ययन प्रगति के साथ ही साथ भारतीय मूल्यों, भाषाओं, ज्ञान, लोकाचार और परंपराओं, जनजातीय परंपराओं सहित के प्रति जागरूक रहें।

अध्यापक शिक्षा के लिए बहु-विषयक इनपुट के साथ ही साथ उच्चतर गुणवत्ता युक्त विषय वस्तु और शैक्षणिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। अतः इसे ध्यान में रखते हुए सभी अध्यापक, शिक्षा कार्यक्रमों को समग्र बहु-विषयी संस्थानों में ही आयोजित किया जाना चाहिए। इसके लिए सभी बहु-विषयक विश्वविद्यालयों के साथ-साथ सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालय और बड़े बहु-विषयक महाविद्यालय का लक्ष्य होगा कि वे अपने यहां उत्कृष्ट शिक्षा विभागों की स्थापना और विकास करें जो कि शिक्षा में अत्याधुनिक अनुसंधानों को बढ़ावा देने के साथ-साथ मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र, समाजशास्त्र, तंत्रिका विज्ञान, भारतीय भाषाओं, कला, संगीत इत्यादि और साहित्य के साथ-साथ विज्ञान और गणित जैसे अन्य विशिष्ट विषयों से संबंधित विभागों के सहयोग से भविष्य के शिक्षकों को शिक्षित करने के लिए बीएड कार्यक्रम भी संचालित किया जाएगा। इसके साथ ही साथ वर्ष 2030 तक सभी एकल शिक्षक शिक्षा संस्थानों को बहु विषयक संस्थानों के रूप में बदलने की आवश्यकता होगी, क्योंकि उन्हें चार वर्षीय एकीकृत शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को संचालित करना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार शिक्षा विभाग में संकाय सदस्यों की प्रोफाइल में विविधता होना एक आवश्यक लक्ष्य है। हर किसी के लिए पी.एच.डी. धारक होना आवश्यक नहीं होगा लेकिन शिक्षण क्षेत्र में शोध के अनुभव को महत्ता प्रदान की जाएगी। सीधे-सीधे विद्यालय शिक्षा से जुड़ने वाले सामाजिक विज्ञान के क्षेत्रों में जैसे कि मनोविज्ञान, बाल विकास, भाषा, विज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन, अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान के साथ ही साथ विज्ञान शिक्षा, गणित, शिक्षा, सामाजिक विज्ञान शिक्षा और भाषा शिक्षा जैसे कार्यक्रमों से संबंधित विषयों में प्रशिक्षण प्राप्त संकाय सदस्यों को शिक्षक शिक्षा संस्थानों में आकर्षित और नियुक्त करने का प्रावधान है, जिससे शिक्षकों की बहु-विषयी शिक्षा को और उनके अवधारणात्मक विकास को मजबूती प्रदान हो सके।

सभी नए पी.एच.डी. धारक चाहे वह किसी भी विषय में प्रवेश ले, ऐसा अपेक्षित होगा कि वह अपने डॉक्टरेट प्रशिक्षण अवधि के दौरान उनके द्वारा चुने गए पी.एच.डी. विषय से संबंधित प्रशिक्षण, शिक्षा, अध्यापन लेखन में क्रेडिट आधारित पाठ्यक्रम लें। डॉक्टरेट प्रशिक्षण अवधि के दौरान उन्हें शैक्षणिक प्रक्रिया, पाठ्यक्रम निर्माण, विश्वसनीय मूल्यांकन प्रणाली और संचार जैसे क्षेत्रों का अनुभव प्रदान किया जाएगा, क्योंकि संभव है कि इनमें से कई शोध विद्वान अपने चुने हुए विषयों के संकाय सदस्य या सार्वजनिक प्रतिनिधि/संचारक बनेंगे। पी.एच.डी. छात्रों के लिए शिक्षण सहायक और अन्य साधनों के माध्यम से अर्जित किए गए वास्तविक शिक्षण अनुभव के न्यूनतम घंटे भी तय होंगे। देशभर के विश्वविद्यालयों में संचालित पी.एच.डी. कार्यक्रमों का इस उद्देश्य के लिए पुनरून्मुखीकरण किया जाएगा।

कॉलेज और विश्वविद्यालयों में सेवारत शिक्षकों के लिए सतत व्यवसायिक विकास प्रशिक्षण मौजूदा संस्थागत व्यवस्था और जारी पहलुओं के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाना राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जारी रहेगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए आवश्यक समृद्ध शिक्षण अधिगम प्रक्रियाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इनका सुदृढ़ीकरण और विस्तार होगा। शिक्षकों के ऑनलाइन प्रशिक्षण के लिए स्वयं दीक्षा जैसे प्रौद्योगिक प्लेटफार्म के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि मानकीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रमों को कम समय के भीतर अधिक शिक्षकों को मुहैया कराया जा सके।

इस प्रकार यह परिलक्षित होता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल उद्देश्य यह है कि अच्छे मनुष्यों का विकास करना जो कि तर्कसंगत विचार और कार्य करने में सक्षम हो जिसमें करुणा और सहानुभूति, साहस और लचीलापन, वैज्ञानिक चिंतन और रचनात्मक कल्पना शक्ति, नैतिक मूल्य और आधार जैसी भावनाओं का समावेश हो। इसका उद्देश्य ऐसे उत्पादक लोगों को तैयार करना है जो कि अपने संविधान द्वारा परिकल्पित समावेशी और बहुलतावादी समाज के निर्माण में बेहतर तरीके से योगदान करें ताकि भारत पुनः विश्व-गुरु का दर्जा हासिल कर मानवता के विकास में अग्रणी भूमिका निभा सके।

(लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष है।)

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One thought on “राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षक

  1. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समाज में स्वीकार्यता बढ़े इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है |

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