राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हमारी ज्ञान विरासत


 – वासुदेव प्रजापति

आदिकाल से अखिल विश्व को देती जीवन यही धरा, गौरवशाली परम्परा।

सघन ध्यान एकाग्र ज्योति से, किये गहनतम अनुसन्धान।

कला शिल्प संगीत रसायन, गणित अणु आयुर्विज्ञान।

सभी विधायें आलोकित कर, महिमा मय भूलोक वरा।। गौरवशाली परम्परा।।

हमारे देश की ज्ञान परम्परा अति प्राचीन एवं गौरवशाली रही है। पश्चिमी जगत को जब पहली बार भारतीय ज्ञान तथा साहित्य की एक झलक मात्र मिली तो वह विस्मय-चकित हो गया।

सन 1789 में विलियम जोन्स ने जब कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुन्तलम् व पंडित नारायण लिखित हितोपदेश पढ़ा तो उसका मन मयूर नाँच उठा। उसने उसी समय दोनों रचनाओं का अनुवाद कर लिया।

सन 1794 में मनु के धर्मशास्त्र का परिचय मिला तो उसका भी लैटिन में अनुवाद कर लिया गया।

सन 1801 में अन्तकुवेतिल दुपरोन ने दारा शिकोह कृत उपनिषदों के फारसी अनुवाद का लैटिन में ओपनेखत (उपनिषद्) नाम से अनुवाद कर लिया।

उपनिषदों के अनुवाद को पढने के प्रसिद्ध जर्मन विद्वान शोपन हॉवर ने कहा – “उपनिषद् सर्वोच्च मानव बुद्धि की उपज है। यह मेरे जीवन के लिए शान्ति का आश्वासन रहा है और मेरी मृत्यु के बाद तक बना रहेगा।” 

सन 1805 में हेनरी कोलब्रुक ने “ओन दी वेदाज” नाम से लेख लिखा। इन सभी रचनाओं से पश्चिम में भारत के ज्ञान को और अधिक जानने की ललक लगी। फलत: जर्मनी में आगस्त विलहेम श्लेगल एवं विल्हेम हम्बोल्ट जैसे विद्वान संस्कृत वांग्मय से प्रभावित हुए बिना न रह सके। हम्बोल्ट गीता को संसार का गंभीरतम और उच्चतम ज्ञान मानते थे। ऐसे श्रेष्ठ भारतीय ज्ञान के प्रचार-प्रसार से ईसाई धर्म प्रचारकों तथा पादरियों के कान खड़े हो गये। उन्हें लगने लगा कि यदि भारतीय ज्ञान इसी प्रकार फैला तो “बाइबिल में व्यक्त विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार है” यह धारणा ही ध्वस्त हो जायेगी, इसलिए कुछ तो करना होगा?

रचा एक षड़यंत्र

भारतीय ज्ञान से भयभीत ईसाई धर्म प्रचारकों ने जर्मनी और इंग्लैण्ड के लेखकों की एक फौज खड़ी की। इस फौज के लेखकों ने अपने-अपने ढंग से भारत के साहित्य, संस्कृति व इतिहास को विकृत करने का प्रयत्न किया। इस विकृतिकरण के दो  प्रमुख प्रयत्न हुए, जो अधोलिखित थे:-

1. वेदों के अर्थ बदलना

यह कार्य मुख्य रूप से मैक्समूलर ने किया। उसने हिन्दुओं की वेदों पर से श्रद्धा हटाने के हेतु से उनका अनुवाद किया। ऊपर-ऊपर से देखने पर उसका कार्य परिश्रमजन्य तथा अध्ययनपूर्ण दिखाई देता है, परन्तु उसका प्रभाव भारतीय संस्कृति के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुआ।

2. प्राचीनता को नकारना

भारतीय इतिहास की प्राचीनता को नकार कर आधुनिक इतिहास के नाम पर उसे विकृत करना। यह कार्य जेम्स मिल ने किया। मिल ने इसके लिए दो नये शब्द गढ़े, ‘मिथक तथा माइथोलॉजी’। अपने सभी प्राचीन महापुरुष जैसे राम-कृष्ण आदि को मिथक अर्थात काल्पनिक माना गया। इसी तरह जिन ग्रन्थों में इन महापुरुषों के वर्णन हैं, ऐसे सभी ग्रन्थ जैसे वेद-उपनिषद् तथा रामायण-महाभारतादि सभी ग्रन्थ भी माइथोलॉजी करार दे दिए गये। 

इस प्रकार जिन ग्रन्थों में भारतीय जीवन के सभी पक्ष- राजनीति, अर्थनीति, भूगोल, खगोल व शिक्षानीति और सहस्रों वर्षों का अखण्ड जीवन-प्रवाह वर्णित है, उन सब ग्रन्थों को षड़यन्त्रपूर्वक शिक्षा की मूलधारा से बाहर कर दिया गया।

इसका परिणाम कितना घातक हुआ ? आज तक हमारी लगभग दस से बारह पीढ़ियाँ भारतीय ज्ञान से वंचित रह गई। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीय नवयुवक केवल अपने केरियर के  ही पीछे भाग रहा है। उसे न अपने परिवार से लेना-देना है और न समाज व देश से कोई लेना-देना है। इसमें दोष उनका नहीं है, दोष शिक्षा का है। आज भी हमारे देश की शिक्षा हमारी जड़ों से कटी हुई है। जब तक हम अपनी शिक्षा को अपने ज्ञान, अपने धर्म व अपनी संस्कृति से नहीं जोड़ेंगे तब तक देश का युवा यूँ ही भटकता रहेगा।

राष्ट्रीय शिक्षानीति 2020

शिक्षा का एक सामान्य सूत्र है -” जैसी शिक्षा वैसा देश।” अत: इस देश की शिक्षा को श्रेष्ठ बनाने के लिए आजादी के बाद से ही समय-समय पर शिक्षा नीतियाँ बनीं, अनेक शिक्षा आयोग भी गठित हुए, किन्तु अभी तक भारतीय शिक्षा अपनी जड़ों से जुड़ नहीं पाई है।

इस बार देश के नेतृत्व ने अपनी प्रबल इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए शिक्षा को अपनी जड़ों से जोड़ने की पहल की है। इस दृष्टि से मैं मात्र दो बिन्दुओं की ओर आपका ध्यान आकृष्ट कर रहा हूँ।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में ये दो प्रावधान दिये गये हैं:-

1.     हमारी शिक्षा भारतीय जड़ों और गौरव से बँधी रहनी चाहिए- भारत की समृद्ध और विविध, प्राचीन और आधुनिक संस्कृति और ज्ञान प्रणालियों और परम्पराओं को शामिल करना और प्रेरणा पाना। – बोक्स में

2.     “भारत का ज्ञान ” नामक शीर्षक के अन्तर्गत लिखा है कि प्राचीन भारत का ज्ञान और उसका योगदान शिक्षा में शामिल होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य व पर्यावरण आदि तत्त्वों को पूरे स्कूल पाठ्यक्रम में जहाँ भी प्रासंगिक हो, वहाँ वैज्ञानिक तरीके से एक सटीक रूप में शामिल किया जायेगा।

जिन विषयों को शामिल किया जायेगा, उनका उल्लेख इस प्रकार है- गणित, खगोल, विज्ञान, दर्शन, योग, वास्तुकला, चिकित्सा, कृषि, इंजीनियरिंग, भाषाविज्ञान, साहित्य तथा खेल के साथ-साथ शासन व्यवस्था एवं राज्य व्यवस्थादि। अंग्रेजों ने भारतीय ज्ञान के बारे में अनेक भ्रम फैलाये। मैकाले ने भारतीय ज्ञान को ज्ञान माना ही नहीं, वह एक स्थान पर कहता है कि- “इंगलैण्ड की लाइब्रेरी की किसी अलमारी में रखी दो पुस्तकें भारत के सम्पूर्ण साहित्य से अधिक मूल्यवान है।”

अंग्रेजी परस्त भारतीयों का आज भी यह मानना है कि वेद-उपनिषद तो गडरियों के गीत हैं। अनेक तथाकथित विद्वान भी यही मानते हैं कि भारत ने आध्यात्मिक उन्नति तो की, किन्तु विज्ञान एवं तकनीकी की उन्नति के श्रेय का हकदार तो यूरोप ही है। उपर्यक्त कथन में अंश मात्र भी सत्यता नहीं है। बल्कि वास्तविकता यह है कि भारत ने आदि काल से केवल विज्ञान ही नहीं तो मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान पताका फहराई है। हमारे वेदों में विज्ञान भरा पड़ा है, इसीलिए तो जर्मनी वेदों के अनुसंधान में जुटा हुआ है। प्रासंगिक प्रश्न यह है कि भारत किन -किन क्षेत्रों में ज्ञान-विज्ञान के उच्चतम शिखरों तक पहुँचा था? और ज्ञान के क्षेत्र में भारत ने विश्व को क्या-क्या दिया था? जिसके कारण भारत विश्वगुरु माना गया।

प्राचीन ज्ञान की झलकियाँ

हम सब यह जानते हैं कि भारत प्राचीनतम राष्ट्र है। मानव जाति के इतिहास ने जब आँखें खोलीं तो उसने भारत को एक सुसंस्कृत, सबल व समृद्ध राष्ट्र के रूप में देखा। मानव जाति ने शान्ति, समन्वय, सौहार्द एवं एकात्मता का संदेश भारत से ही प्राप्त किया था। भारत की इस भूमिका के कारण ही मार्क ट्वेन ने लिखा – “भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी तथा परम्परा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है।”

अन्तिम सत्य

भारत प्रारम्भ से ज्ञान की साधना में रत है। ज्ञान का उद्देश्य अन्तिम सत्य को प्राप्त करना है। हमारे ऋषियों  ने अन्तिम सत्य की खोज की और पाया कि इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक सर्वोपरि चिरन्तन तत्त्व “आत्मा” सबमें व्याप्त है। इसी तत्त्व को हम परब्रह्म, परमात्मा और ईश्वर आदि नामों से पुकारते हैं। यह भौतिक जगत उसी आत्मतत्त्व की अभिव्यक्ति मात्र है। आज विज्ञान भी इस जगत के परे भारत की आध्यात्मिक सत्ता को मानने के लिए बाध्य हो रहा है।

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