बहुत बढ़िया शोधपरक आलेख।बच्चे बड़े सब इसे रुचि से पढ़ेंगे।महादेवी जी के बालगीत भारतीय आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत रहे।माँ के ठाकुर जी आपने उद्धृत की ही है।दुर्भाग्य से इतनी श्रेष्ठ रचनाएँ पाठ्यक्रम से धर्म निरपेक्षता के छद्म में हटा दी गयी।महीयसी महादेवी जी पर झारखंड की प्रख्यात रचनाकार पद्मा मिश्रा जी ने ठीक ही लिखा है- वह स्नेह बांटती धरती को खुद पीड़ा की सहकार बनी वेदना लिए अन्तरमन मे रस बरसाती जलधार बनी वह स्वयं नीरजा नेह सलिल जैसे सपनो की मधु यामा वह महादेवि थी सहज सरल मीरा सी कृष्णा की श्यामा जीवन के रण में प्रति पल क्षण वह जली दीप की शिखा विरल रेखाचित्रों मे गढती थी मानव जीवन के रुप विमल छाया की माया मे पलकर पलकों पर सोये सपनों सी अपनी पीड़ा में साध लिया जग की पीड़ा थी महीयसी तुम भाव बोध की कविता सी हो शक्ति पुंज हे पावन मन ! अंतर की कोमल कविता को शत बार नमन शत बार नमन Reply