पाती बिटिया के नाम-26 (ये कहाँ आ गए हम?)

 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

विज्ञान का नाम लेते ही हम एक काल्पनिक दुनिया में खोने लगते हैं। तेज रफ्तार से भागती जिन्दगी में व्यक्ति स्वर्गलोक भ्रमण की सी स्थिति में पहुँच जाता है। मनुष्य ने इस एक शब्द से क्या नहीं पा लिया? यदि हम यह कहें कि मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पा ली तो गलत न होगा क्या विज्ञान ने मनुष्य को देवता बना दिया? एक मन कहता है हाँ! क्योंकि ब्रह्माजी ने मानव का निर्माण किया विज्ञान ने टेस्टट्यूब में बच्चों को जन्म दे दिया। विष्णु जी ने सृष्टि का पालन करने का जिम्मा लिया, विज्ञान ने नित्य नए अनाज और फल-फूल उगा दिए। और तो और ऐसे-ऐसे बीज बना लिए कि पौधें में ऊपर टमाटर लगे और उसी पौधे की जड़ में आलू यानि एक साथ दो सब्जियाँ।

भगवान शंकर ने प्रकृति संतुलन अर्थात् विनाश का कार्य किया तो विज्ञान ने बम, पिस्तौलें ही नहीं अणु बम तक बना डाले। हनुमान जी हवा में उड़े तो राईट बंधुओं का बनाया हवाई जहाज सबको उड़ा रहा है। भगवान के वामन अवतार ने तीन पग में धरती पाताल और आकाश नाप लिया तो विज्ञान भला पीछे क्यों रहता? उसने रॉकेट, पनडुब्बी और तेज गति के वाहन बनाकर यह कार्य कर दिखाया। विज्ञान ने रेगिस्तान में वर्षा करा ली, समुद्र का खारा पानी मीठा कर दिया, प्लास्टिक सर्जरी से कटे अंग जोड़ दिए, कुरुपता सुन्दरता में बदल गई, और तो और अंधों को आँख, बहरों को कान, लंगड़ों को हाथ और पाँव भी उसने दे दिए तो क्या इन सब उपलब्धियों ने हमें सुखी कर दिया?

आओ विज्ञान के सिक्के का दूसरा पहलु भी देख लें। अमेरिका में नशे के कारण प्रतिवर्ष तीन लाख पचास हजार लोग मरते हैं, रूस के लोग प्रतिवर्ष 200 अरब रुपये की ‘वोदका’ शराब पी जाते हैं। मानव द्वारा पैदा किए प्रदूषण के कारण अमेरिका में प्रतिवर्ष तीन लाख बच्चे विकलांग पैदा होते हैं, इंग्लैण्ड में हर 40 बच्चों पर एक, हाँगकाँग में 87 पर एक, स्पेन में 75 पर एक तो आस्ट्रेलिया में हर 53 बच्चों पर एक विकलांग पैदा होता है। पाश्चात्य देशों में हर पाँचवा बच्चा 15 वर्ष की आयु तक जेल की हवा खा चुका होता है। युद्धों की स्थिति क्या है? मरने वाले प्रति एक लाख सैनिकों पर मानवीय आयु के 25 लाख घण्टे तो लड़ाई में होम कर दिये जाते हैं। विश्व में औसतन प्रति मनुष्य 10 वर्ष नशे में गुजार देता है अर्थात् हमारे बीस अरब वर्ष तो अब तक नशा ही खा गया।

वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रदूषण को देखें तो 1952 में अमेरिका में 4 दिनों तक धुंए की धुंध छा जाने से हजारों लोगों का प्राणान्त हो गया। जापान के बारे में सुना है वहाँ गैस मास्क अनिवार्य आवश्यकता है। सड़क के दोनों किनारे ऑक्सीजन टैंकर रखे होते है। घुटन होते ही तत्काल रूक कर ऑक्सीजन लेनी होती है। सुनकर आश्चर्य होता था, किन्तु पिछले माह जब हमारे अपने इन्दौर में एक ऑक्सीजन पार्लर खुला तो विश्वास करना पड़ा। मुम्बई, दिल्ली में मास्क लगाकर चलना आम बात हो गई है। अकेले अमेरिका में वायु मण्डल में हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फ ऑक्साइड और सीसे जैसे विषैले तत्व बीस करोड़ टन की मात्रा में भर रहे हैं।

तुम यह न सोचना कि भारत इन सबसे अछूता है। कुछ दिनों पहले कलकत्ता का एक सर्वेक्षण हुआ जिससे पता लगा कि वहाँ के वायुमण्डल में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा 27 थी जबकि उसी समय न्यूयार्क में यह आँकड़ा मात्र 20 पर था। अब आप ही सोचिए एक धुंए भरे कमरे में दम तोड़ने जैसा अनुभव लेने से हम कितनी दूर हैं? वैज्ञानिकों ने चेतावनी दे ही दी है कि पानी (पीने योग्य) अब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। रासायनिक खादों से पैदा किया गया भोजन जो हम नित्यप्रति स्वाद के साथ ग्रहण कर रहे हैं हमारे शरीर में डी.डी.टी. और ‘नर्व गैस’ जैसे रसायन प्रवेश करा रहा है।

कुल मिलाकर सिक्के का यह पहलु ज्यादा विकृत है। हम भौतिक सुखों के पीछे दौड़ते-दौड़ते मौलिक आवश्यकताओं हवा, पानी, भोजन को भूल गए हैं। इन आविष्कारों से पहले भले ही मनुष्य गिरा हुआ देवता था लेकिन अब तो वह उठा हुआ पशु भी नहीं रहा। बचपन में एक वैज्ञानिक का परिचय पढ़ा था जिसने गंभीर बीमारी के टीके का आविष्कार करने हेतु भिन्न-भिन्न दवाइयों का असर देखने के लिए अपने ही शरीर का उपयोग किया वह टीका बनाने में सफल तो हो गया लेकिन उसका शरीर गल-गलकर नष्ट हो गया। ‘मृत्यु हो तो ऐसी जो दूसरों को जीवन दे’ कथन का पालन इसी तरह होता है।

आओ हम नमन करें ऐसे सभी मानवतावादी वैज्ञानिकों को धन्यवाद करें, आविष्कारकों का। ईश्वर उस विज्ञान को सद्बुद्धि दे जो मानव विनाश के पथ पर चल रहा है। सामंजस्य बनाकर उसके साथ चलें जो देश की प्रगति का आधार होगा। ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान।‘

– तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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