आईये बात करें

 – राजेन्द्र सिंह बघेल

बैंगलूर में एक संस्था है उसका नाम है, “अखिल भारतीय मानसिक स्वास्थ्य संगठन” (All India National Institute of mental health) । उसके संचालक शहर के एक प्रसिद्ध समाज सेवी कार्यकर्त्ता हैं। एक बार एक अभिभावक अपने बच्चे की समस्या के निदान हेतु उसे लेकर केंद्र पर आए। वह बालक अत्यंत शरारती और पागल सरीखा था। निदेशक महोदय ने उसे एकांत में ले जाकर अत्यन्त प्रेम पूर्ण व्यवहार करते हुए बातें की और कुछ प्रश्न पूछे। उन्होंने बालक से पूछा, “भगवान तुमसे खूब प्रसन्न होकर कोई तीन वरदान मांगने के लिए कहे तो तुम क्या मांगोगे? उसने उत्तर दिया, “मैं तीनों वरदानों के द्वारा सबसे पहले अपनी माँ, फिर पिता और फिर क्लास टीचर के मर जाने की मांग करूंगा”। यह उत्तर सुनकर संचालक महोदय भौचक्के रह गये। कारण पूछने पर बालक ने रोते-रोते बतलाया – “मेरी माँ मेरे पिता की दूसरी पत्नी है, वह मेरे साथ बहुत खराब और सोतेलेपन का व्यवहार करती हैं। मेरे पिता भी मेरी कोई सहायता नहीं करते और और मेरे क्लास टीचर मेरी कठिनाई समझे बिना बस मुझे मारते रहते हैं”।

स्थिति स्पष्ट है। बच्चे की मानसिक पृष्ठभूमि समझे बिना किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। हमारे प्रयास निष्फल होते रहेंगे। इस प्रसंग से साफ-साफ सब कुछ ध्यान में आ गया। सौतेली मां का व्यवहार पिता का भी अपनी दूसरी पत्नी की हां में हां मिलाना कितनी बड़ी समस्या का कारण बना तथा विद्यालय में कक्षा अध्यापक ने भी वैसा ही व्यवहार किया। स्वभाविक है बालक समय से विद्यालय नहीं पहुंचा होगा, होम वर्क नहीं पूरा कर पाया होगा और अध्यापक ने बालक से उसका कारण जाने बिना उसकी धुलाई कर दी होगी। अनेक परिवारों में वह स्थिति बनती है। यहां घर में मां, पिता तथा विद्यालय के अध्यापक का परिवारिक परिस्थिति को समझ कर समस्या का निदान करना श्रेयस्कर होता। आजकल प्राय: यह देखने में आता है कि घर परिवार के लोग इतने व्यस्त है कि उनके पास अपनी संतानों से जरूरी बात करने तथा बैठकर संवाद करने का समय नहीं है।

आज की यह संवाद हीनता भविष्य में कितनी भारी पड़ेगी उसका अनुमान लगाना कठिन है। एक प्रसंग से उसे अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। प्रयाग विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर/विभागाध्यक्ष रहे प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) पूर्व सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम सर्वविदित है। अपने जीवन काल में प्रवास के समय वे अनेक समाजोपयोगी उदाहरणों का उल्लेख किया करते थे। उसमें से एक उदाहरण – रज्जू भैया के एक पूर्व परिचित से लम्बे समय बाद उनकी भेंट हुई। परिचित सज्जन का पुत्र बड़ा प्रतिभाशाली था । आई.ए.एस. के कंम्पटीशन में आकर किसी ऊंचे पद पर आसीन था। रज्जू भैया ने बेटे के बारे में हाल-चाल पूछा तो उन सज्जन ने बड़े दुख के साथ उत्तर देते हुए जो बताया उससे आप सब पाठकों का भी चिंतित होना यथोचित है। उन सज्जन ने बताया कि उनका बेटा अपनी पत्नी को लेकर अलग रहता है; घर की कोई चिंता नहीं करता है। हम लोगों से उसका कोई संबंध नहीं। बड़ा विचित्र निकला। यह जानकारी प्राप्त करने के बाद बड़ी विनम्रता और आग्रह के साथ उन परिचित बंधु से रज्जू भैया ने जो बातें कही उसमें एक बड़ा संदेश मिलता है।

उनका कहना था कि “बेटे को पढ़ाई के समय उसे किसी के दुख में संवेदनशील होने की बात शायद आपने नहीं ध्यान दिलाई। कभी विद्यालय में बंगाल के दुर्मिम या बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए चंदा हुआ होगा तो आपने कहा होगा कि तुम जो क्रिकेट का बैट खरीदना चाहते हो वह कहां से खरीदोगे? मैं तो चंदा का पैसा नहीं दूंगा। इस प्रकार वह बच्चा मन मसोस कर ही रह गया होगा। बच्चे के मन में उदारता का भाव दब गया होगा। उसी का परिणाम है कि वह केवल अपने विषय में सोचता है। बच्चे के मन की विशाल हृदयता पनपने से रह गयी।” तुलसीदास जी की चौपाई, “परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई” का पाठ पढ़कर भी उस बच्चे के मन में पर पीड़ा में सहायक बनने का भाव प्रत्यक्ष व्यवहार में नहीं आ सका। उन परिचित बंधु को उस संदेश युक्त संवाद से आज उस दिन बहुत कुछ समझ में आया होगा पर अब तो बहुत देर हो चुकी थी न!

अच्छा सोचिए: आजकल घरों में प्राय: अभिभावक अपने पाल्यों को अच्छे स्कूल में भर्ती कराते हैं; महंगी फीस देते हैं, पुस्तक व स्टेशनरी का प्रबध भी कर देते हैं पर बच्चों का यथोचित विकास कैसा/कितना हो रहा है; यह जानने का समय या उसके बारे में बात करने का समय कितनों के पास है? प्रायः यह पूछ लेना कि पढ़ाई कैसी चल रही है? परीक्षा कब है? होमवर्क कर लिया? गणित में अंक कम क्यों आए हैं? यह पूछना पर्याप्त है? ज्यादा हुआ तो यह भी सुना दिया, “देखो पड़ोसी शर्मा जी का बेटा इस परीक्षा में 98% अंक पाकर अपने माता-पिता का नाम रोशन कर रहा है। तुमने केवल 80% ही अंक पाये। आखिर स्कूल में तुम करते क्या हो?”

ये 80% अंक पाने में उसके परीश्रम व लगन की परख कर उसे उत्साहित करना; उसकी समस्याओं को जानकर निदान करना और उसकी विशेष उपलब्धियों पर स्नेह पूर्वक प्रोत्साहन का कार्य कार्य कौन करेगा? यह सब हमारे विचार का भाग होना अत्यावश्यक है। सच पूछिये तो बच्चों को भी बात करने में बड़ा आनंद आता है। आनंदानुभूति कराने वाली बात करने का अवसर तो हम उन्हें दें। जिस दिन यह उसे समझ में आ जाता है कि मेरे माता-पिता, परिवार जन या पड़ोसी अंकल की बातें हमें सुख देती है। उनमें मेरा हित है, और वह मेरे उन्नति के लिए हमेशा बात करते हैं तो आप देखिए कैसे बच्चे आपसे बेहिचक मिलना और बात करना चाहेंगे।

माननीय हो.वे. शेषाद्रि जी से उनके प्रवास के क्रम में कक्षा में पढ़ने वाले एक विद्यार्थी से भेंट हुई। परिचय के क्रम में उन्होंने विद्यार्थी से पूछ लिया कि इंटर साइंस से क्यों पढ रहे हो? इंजीनियर बनने के लिए, बच्चे का उत्तर था। इंजीनियर क्यों बनना चाहते हो? अगला प्रश्न शेषाद्रि जी का था। उत्तर था पैसा कमाने के लिए? फिर प्रश्न; पैसा किस लिए? उत्तर – जीवन चलाना चाहता हूं। परंतु शेषाद्रि जी के प्रश्नों के क्रम में थोड़ी देर बाद बालक निरुत्तर हो पड़ा और कहने लगा, “मेरे पिताजी स्वंय एक हाई स्कूल स्तर के विद्यालय में प्रधानाचार्य है; उन्होंने तो कभी भी ऐसे प्रश्न मुझसे नहीं किए”। स्वाभाविक है आज बालक को टटोलने की जरूरत है। उसके मन को जगाने की जरूरत है। परंतु ध्यान रहे बच्चों से प्रश्न पूछने के साथ अपना भी ज्ञान बढ़ाते रहना चाहिए। बात करने के लिए हमारी स्वंय की अच्छी तैयारी होनी चाहिए।

रज्जू भैया तो प्रयाग विश्वविद्यालय में अपने अध्यापन काल के समय प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहने के बाबजूद बी.एस.सी प्रथम वर्ष के छात्रों की एक कक्षा भी अवश्य लेते थे। कारण प्रयाग विश्वविद्यालय में उन दिनों देश भर के कौन-कौन से विद्यार्थी पढ़ने आते थे पढ़ाई के साथ-साथ अनौपचरिक रूप से वह विद्यार्थियों से बड़ी महत्वपूर्ण बातें करते थे। यथा – कहां के रहने वाले हो? हॉस्टल में या बाहर रहते हैं? भोजन बना लेते हैं? पढ़ाई के लिए पूरा समय मिल पाता है या नहीं? घर से खर्च के पैसे मिल जाते हैं? पढ़ाई के अतिरिक्त आपकी रूचि क्या-क्या है? कोई समस्या हो तो हमसे बेझिझक बताइयेगा। उन बातों/संवादो के मध्य वह विद्यार्थी के जीवन में प्रवेश कर जाते और उसे एक अच्छा विद्यार्थी बनने व उसे समाजोन्मुखी बनाने का मंत्र दे दिया करते थे।

बात करते समय कुछ और भी

  • बात करना एक कला है – यह तथ्य तो हमें ध्यान में आ ही गया। अतः हमें यह ध्यान रखना कि हम जिनसे बात कर रहे हैं उनकी आयु वर्ग क्या है? परिवारिक पृष्ठभूमि जान कौन से वार्ता में और सुविधा होगी।
  • वार्ता के समय सहजता एवं सरल संवाद अधिक आनंद देगा।
  • वार्ता का विषय, समय, स्थान एवं परिवेश का भी बड़ा महत्व होता है।
  • वार्ता में आपका प्रसन्न चित्त होना व चेहरे पर मुस्कान वातावरण को प्रभावित कर सकेगी। Eye contact का भी बड़ा प्रभाव रहता है।
  • शब्दों में बड़ी ताकत होती है; बस आत्मविश्वास के साथ अपनी बात तो कहिये।
  • वार्ता Communication based होने से सबको आनंद आएगा और विषय सरल हो जाएगा।
  • वार्ता के समय प्रेरक एवं प्रभावी उदाहरण गंभीर विषय को भी रोचक बना देते हैं।
  • वार्ता करते करते समय जीवन देखरेख की समझ और समाजोंन्मुखी प्रवृत्ति-जागृत करना पुण्यकारी होगा।
  • आइये हम भी अपने को परखे, क्या हम एक अच्छे वार्ताकार है?
  • Master Communicator बनना जीवन की सफलताओं में से एक सद्गुण है।

(लेखक शिक्षाविद है और विद्या भारती विद्वत परिषद् के अखिल भारतीय संयोजक है।)

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