भारत में वैचारिक प्रदूषण


 – दिलीप बेतकेकर

पूरी दुनिया प्रदूषण से ग्रस्त है। प्रदूषण को रोकने के लिए विभिन्न प्रयास चल रहे हैं। विश्वस्तर से लेकर छोटे-छोटे शहरों में प्रदूषण को लेकर चर्चा, विचार-विमर्श चल रहा है। सेमिनार, कार्यशाला, रैली का आयोजन किया जाता है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, अन्न प्रदूषण आदि प्रदूषणों की चर्चा चलती है। यह सब दिखने में अलग प्रकार के प्रदूषण लगते हैं लेकिन इसके मूल में जाने की यदि कोशिश की जाए तो पता चलता है कि सब प्रदूषणों की जड़ एक ही है। सब का मूल मनुष्य के मन में है, विचार में हैं।

तीस साल पहले दिल्ली में ‘नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री’ देखने गया था। वहाँ देश भर से आए शिक्षकों का समूह भी था। म्यूजियम में बहुत सारी ‘गैलरीज’ थीं। सैकड़ों साल पहले जो पक्षी, प्राणी, वनस्पति की प्रजातियाँ थीं, उनका वह बहुत सुन्दर प्रदर्शन था। उनमें से बहुत प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी हैं, आज देखने को भी नहीं मिलती। वह सारा नैसर्गिक धन, खजाना आज लुप्त हो गया। यह महसूस होता था और स्वाभाविक रूप से मन को बहुत पीड़ा, वेदना होती थी। सब गैलरियाँ देखकर बाहर जाने के लिए दरवाज़े के पास हम पहुँचे। वहाँ भी कुछ प्रदर्शनीय था इसलिए रुक कर हर व्यक्ति देख रहा था। हम भी रुक गये। एक बड़ा आइना था और उस पर लिखा था And now you see the animal which is responsible for all the destruction. रुकने वाला हर व्यक्ति यह पढ़कर गंभीर होता था, अंतर्मुख होता था। निसर्ग के ह्रास के लिए मैं भी जिम्मेदार हूँ यह हर व्यक्ति की समझ में आता था। बहुत ही अच्छे ढंग से संदेश पहुँचाने की एक उत्तम व्यवस्था थी।

किसी भी प्रकार के प्रदूषण को दूर करना है तो उसकी जड़ में जाने की आवश्यकता है, और यह मूल है मनुष्य का मन! बाहर से या ऊपर से ठीक करने की बजाय मन को ठीक करना महत्त्वपूर्ण कार्य है। अँग्रेजी में एक बार पढ़ा था, “It is good to take a person out of the gutter, but more important is to take gutter out of the person.”

भारत में आज जो अनेक प्रकार के प्रदूषण दिख रहे हैं, उनकी जड़ है विचार प्रदूषण। इस विचार प्रदूषण ने ही हमारे राष्ट्रीय जीवन का बहुत बड़ा नुकसान किया है। आज अनेक समस्याओं की जड़ विचारों के प्रदूषण में है। इस क्षति, हानि की हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

महात्मा विदुर ने महाभारत में कहा  –

एकं विषरसो हन्ति, शस्त्रेणैकश्च वध्यते।

सराष्ट्रं सप्रजं हन्ति, राजानं मंत्रविप्लवः।।

(विष प्रयोग करके एक व्यक्ति को मारा जा सकता है। शस्त्रप्रयोग से भी एक व्यक्ति नष्ट हो सकता है लेकिन यदि मनन और चिंतन में भ्रम और भ्रान्ति निर्माण की गई तो राष्ट्र, प्रजा और प्रजापालक सबका विनाश होगा।

दूसरा सुभाषित है-

एकं हन्यात् न वा हन्यात् इषुर्मुक्तो धनुष्मता।

र्बुद्धिर्बुद्धिमता उत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्रं सराजकम्।।

(धनुर्धारी के तीर से एक व्यक्ति मर सकता है या मर नहीं भी सकता है। लेकिन बुद्धिमान् की बुद्धि की युक्ति से राजा से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश हो सकता है।)

और भी एक सुभाषित है –

शस्त्रैहतास्तु पुरुषाः न हता भवन्ति।

प्रज्ञाहताश्च नितरां सुहता भवन्ति।।

शस्त्रम् निहन्ति पुरुषस्य शरीरमेकं।

प्रज्ञा कुलं च विभवं च यशश्च हन्ति।।

(शस्त्र द्वारा मारे गए व्यक्ति वास्तव में नहीं मरते। लेकिन बुद्धि द्वारा जिनको मारा जाता है वह सचमुच मरते हैं क्योंकि शस्त्र से केवल शरीर मरता या नष्ट होता है परन्तु बुद्धि के द्वारा कुल, वैभव, यश, धन सबका विनाश हो जाता है।)

इन तीनों सुभाषितों का अर्थ लगभग समान हैं। शस्त्र से भी अधिक बुद्धि भ्रष्ट होने से नुकसान होता है। भारत में विदेशी आक्रामकों ने शस्त्रों के प्रयोग से जितनी हानि की, उससे हजारों गुना अधिक क्षति विधर्मियों ने हमारे लोगों के मन में गड़बड़ी निर्माण करके की। केवल स्वतंत्रता पूर्व ही नहीं अपितु स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 साल बाद भी हमारे देश का, समाज का नुकसान करने की योजना चल ही रही है। जब तक यह वैचारिक प्रदूषण बंद नहीं होता तब तक राष्ट्र-जीवन को खतरा बना ही रहेगा।

अँग्रेज और अँग्रेजियत से सम्बन्ध के कारण क्या हुआ यह सर जॉन शोर ही बताते हैं। वे कहते हैं कि “It has been observed as a general truth that the more connection in the natives have had with English, the more immoral and the more worse in every respect they became.”

ब्रिटिश सांसद एडवर्ड थोरंटन ने कहा था कि जैसे ही भारतीय प्रथम दर्जे के विद्वान बनेंगे, वे हिन्दू नहीं रहेंगे। हिन्दू, हिन्दू न रहे यही उनका मकसद था, जो उन्होंने छिपाया नहीं।

युद्ध तीन प्रकार के होते हैं। बाहुबल पर आधारित शारीरिक युद्ध, धनबल पर आधारित वाणिज्यिक युद्ध और बुद्धिबल पर आधारित विचारयुद्ध। बुद्धि को मोहित कर उसमें आत्माभिमान और आत्मशक्ति पर अविश्वास उत्पन्न कराना, इस युद्ध का प्रधान लक्ष्य होता है।

सितम्बर 1909 के मोर्डन रिव्यू में लाला हरदयाल लिखते हैं , “जब तक कोई विजेता विजित जाति के सामाजिक कार्यों पर अपना प्रभुत्व नहीं जमा लेता अर्थात् उनका परिचालन नहीं करने लगता, तब तक उसकी राजनीतिक जय पूरी नहीं होती और उस जय की स्थिरता भी नहीं रहती । जाति की आत्मा को नष्ट करने के लिए सामाजिक जय की आवश्यकता है।”

विजित जाति जिस समय अपनी निकृष्टता स्वीकार करती हैं और भविष्योन्नति की आशा को छोड़ देती है; यहीं से उसका मानसिक अधःपतन प्रारम्भ होता है।

अँग्रेजों ने बहुत चालाकी से कुछ विचार हमारे मन में घुसाने की कोशिश की और बहुत हद तक उन्हें सफलता भी मिली। मुंशी प्रेमचन्द कहते हैं, “हमारा शिक्षित वर्ग गर्दन पर रखे जोत को ही मूल्यवान माला समझने लगा।”

आर्य बाहर से आए, वह मूलतः भारत के नहीं थे, यह विचार हमारे मन में योजनाबद्ध तरीके से स्थापित किया गया। इस भ्रम ने हमारा बहुत नुकसान किया। भारत को आर्य, द्रविड़ में तो बाँटा ही और उसके साथ-साथ इस देश के लोगों में यह गलत धारणा निर्मित की कि जैसे आर्य बाहर से आए वैसे ही अँग्रेज बाहर से आए। बाहर से आए हुए लोगों को दूसरे को बाहर जाओ, ऐसा कहने का अधिकार नहीं रहता। भारत के कई लोग यह भी मानने लगे कि ‘British rule in India is a God sent opportunity.’

आर्यों के मूलस्थान की जो थ्योरी स्थापित की गई वह आज अनेक ऐतिहासिक तथ्य सामने आने के बावजूद देश को विभाजित कर रही है।

हिन्दुत्व के बारे में गलत धारणा स्थापित करने में उन्हें कामयाबी मिली। हिन्दुत्व यद्यपि जीवन शैली है, उन्होंने इसको ‘रिलीजन’ माना और यह विचार समाज मानस में दृढ़ करने का कुत्सित प्रयास किया। हिन्दुत्व और प्रतिगामित्व एक है, यह गलत विचार भी भारत के लोगों में, सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हिन्दुओं में भी यह विचार स्थापित किया, इसके कारण हिन्दू स्वयं को दीन-हीन समझने लगा। इसे कोनराड अस्स्ट self negatienism कहते हैं।

पाश्चात्य पद्धति और परम्परानुसार टुकड़ों में विचार करने की आदत बन गई। एकात्म विचार पद्धति खत्म हुई। हर बात को टुकड़ों में देखना स्वभाव बन गया। इसके कारण भी बहुत हानि हुई। यह सब दुनिया भगवान ने मनुष्य के लिए बनाई है ऐसे विचारों से शोषण की वृत्ति बढ़ गई।

‘सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः’ यह विचार पिछड़ गया और सिर्फ स्वयं का हित, स्वयं का स्वार्थ, अहम बन गया। ‘खाओ, पिओ, नाचो, मौज करो’ के विचार को पुष्टि मिली। जीवन केवल मौजमजे के लिए है, ऐसी आत्मनाशक विचार-परम्परा को बढ़ावा मिलने लगा। वस्तु से लेकर मनुष्य तक सब का केवल उपयोग करो, यह स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित सोच बढ़ी और इसी से उपयोग करो और फेंको (use & throw) की व्यवस्था का निर्माण हुआ। पाश्चात्यीकरण को ही आधुनिकीकरण समझने की होड़ लगी। दोनों  में अंतर समझने की विवेक बुद्धि नष्ट हो गई। हर बात में पश्चिम का अनुकरण करना शुरू हुआ।

केन्या के लोकप्रिय लेखक थियोगो इसको ‘सांस्कृतिक बम’ कहते हैं। थियोगो लिखते हैं, “सांस्कृतिक बम सबसे बड़ा शस्त्र है, जो दिन-प्रतिदिन छोड़ा और चलाया जाता है। सांस्कृतिक बम का प्रभाव लोगों के अपने नाम, भाषा, वातावरण, संघर्ष परम्परा, अपनी एकता, अपनी क्षमताओं और अंततः अपना अपनत्व-सब कुछ समाप्त कर देता है। यह उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा देता है, जहाँ उन्हें अपने अतीत की उपलब्धियाँ बंजर भूमि के सदृश दिखाई देती हैं और वे तथाकथित बंजर भूमि से दूरी बनाने को प्रेरित होते हैं।”

फ्रेंच इतिहासकार ओंगरे डी रिच्यूकोर्ट The soul of India’ में स्वीकार करते हैं कि “भारत के संदर्भ में पाश्चात्य बुद्धिवादियों की सोच में कुछ गलती थी।”

उन्हीं की गलती भारतीय आज ढो रहे हैं। 1947 में अँग्रेजी शासन को भारत से उखाड़ फेंका गया। आज उनकी इस सोच को भी उखाड़कर फेंकने की आवश्यकता है। भारत में जो वैचारिक प्रदूषण है, उसका एक मात्र यही उपाय है। आज की शिक्षा के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है।

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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