क्षमता का विकास कैसे करें?


 – अवनीश भटनागर

क्षमता अर्थात् किसी-किसी में जन्मजात होती है कोई-कोई विकसित करने का प्रयास करता है। उनमें भी कोई-कोई सफल होता है। किसी अन्य में परिस्थिति विशेष के कारण स्वतः जन्म लेती है – ऐसी है यह भाववाचक संज्ञा ‘क्षमता’।

यदि आप भी बनना चाहते है आई.ए.एस तो क्या करे?

एक रोचक तरीके से ध्यान करें इस बात को। अपने देश में, सरकार के तंत्र में, सर्वाधिक क्षमतावान माने जाते हैं आई.ए.एस अधिकारी। वे जो आदेश कर देते है, देश के लिए नियम बन जाता है। बड़ी कठिन प्रतिस्पर्धा में से सफल होकर आते हैं वे।

क्षमता के तीन कारकों का विचार करें – रुचि (Interest), योग्यता (Ability) तथा कौशल (Skill) इन तीनों के पहले अक्षर जोड़ लीजिए आप भी बन गए आई ए.एस। अर्थ स्पष्ट है, जो अपने कार्य या लक्ष्य के प्रति रुचि रखकर, अपनी योग्यता के क्षेत्र को पहचान कर और उस दिशा में कौशल का विकास करता है, वह हो जाता है क्षमता सम्पन्न। जो दूसरों को देखा-सीखी में, बिना अपनी योग्यता को पहचाने, रुचि लिए बिना या मजबूरी में प्रयास करते है वे तो असफल होते हैं।

रुचि को क्षेत्र पहचानें

संभव है कि आप भाग्यशाली हो कि आपकी रुचि का क्षेत्र ही आपका कार्यक्षेत्र भी बन जाए। नहीं बना तो क्या? एक कहावत है Get what you like or like what you get. जो रुचि हो, वैसा पाने की कोशिश करें, और नहीं सम्भव हो तो जो प्राप्त हुआ, उसी में रुचि उत्पन्न करें अन्यथा जीवनपर्यन्त कुण्ठाग्रस्त रहना पडे़गा।

क्षमता विकास के लिए क्षेत्र तय करे

जिस क्षेत्र में आप अपनी क्षमता वृद्धि करना चाहते है उसे सुनिश्चित करें, स्वाध्याय कर या जानकार व्यक्तियों से चर्चा के माध्यम से उस क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ संकलित करें। उसकी पृष्ठभूमि या वैचारिक अधिष्ठान समझे बिना क्षमता कैसे आएगी फिर उसको जीवन व्यवहार में लाने के लिए अपेक्षित कौशल सीखना होगा। उदाहरण स्वरूप तैरना सीखना हो तो तो पुस्तक पढ़कर, यूट्यूब पर वीडियो देखकर नहीं सीख सकते, पानी में उतरकर हाथ-पैर मारने ही होंगे और यह एक दिन में नहीं सीख पायेंगे। इसके लिए धैर्यपूर्वक प्रयास जारी रखने होंगे।

निरन्तरता और ठीक दिशा में प्रयास के बिना सफलता कठिन है। यदि आपके एक गाँव में एक सौ फूट खोदने पर पानी निकलता है तो आपको लगातार उसी स्थान पर खोदना पडे़गा। 20 स्थानों पर पांच-पांच फूट खोदने से पानी नहीं मिलेगा। आखिर “उत्तिष्ठत् जाग्रत” भी “प्राप्य वरान्निाबोधत” के बिना अपूर्ण है। परिस्थितियाँ अनुकूल हो, आवश्यक नहीं किंतु मनःस्थिति को ठीक रख कर, समायोजन और संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना होगा।

क्षमता बनाम साधन

क्षमता विकास के कुछ क्षेत्रों में तकनीकी पक्ष और उसकी बारीकियों को भी जानना आवश्यक है, जैसे कम्प्यूटर, वाहन, लेखन या पत्रकारिता, विज्ञान और तकनीक के विभिन्न क्षेत्र, खेल, योग आदि। कुछ क्षेत्रों में साधन भी आवश्यक होते हैं – पाश्चात्य खेल, आधुनिक वैज्ञानिक व तकनीकी क्षेत्र आदि। किन्तु क्षमता विकास अर्थात् साधनों का विकास नहीं। वाहन एक साधन है, किन्तु वाहन होने पर भी आप से यदि चलाने की क्षमता नहीं होगी तो वाहन अनुपयोगी रहेगा।

कुछ विचारणीय बिन्दु

लक्ष्य के अनुसार क्षमता अर्जित करना या क्षमता के अनुरुप काम करना। जितनी मेरी क्षमता है उतना ही कार्य करुँगा या जब काम का दायित्व स्वीकार किया है तो उसके लिए आवश्यक क्षमता भी तो मुझे ही विकसित करनी होगी। तभी लक्ष्य प्राप्त हो पाएगा।

मेरा क्षेत्र आराम का या चुनौतीपूर्ण। लीक-लीक चलने वाला या नवीनताओं से पूर्ण। माक्षिका स्थाने मक्षिका यानि पिछले कागज पर मरी हुई मक्खी चिपकी है तो इस पर भी मक्खी मार कर चिपकाना या अपनी सूझबूझ से उसी काम को नई दिशा देकर सँवारना यह आपके सोच पर निर्भर है।

यह करने की मेरी सिद्धता, मानसिक तैयारी कितनी है? इसके लिए मैंने प्रयास किया कितना? मान लिजिए बचपन से मैं दारा सिंह का प्रशंसक रहा हूँ। पहलवान मुझे बहुत अच्छे लगते है, मैं भी दारा सिंह जैसा बनना चाहता हूँ किन्तु अखाड़े में जाता ही नहीं, फिर कैसे पहलवान बन सकता हूँ।

आधुनिक प्रबन्धन शास्त्र ने SWOT Analysis की संकल्पना दी है। S-strength अर्थात् सबलताएँ, W-weaknesses अर्थात् दुर्बलताएं O- opportunities अर्थात् सुअवसर तथा T-threats अर्थात् चुनौतियाँ। इन चार आधारों पर स्वयं की तथा कार्य क्षेत्र की समीक्षा करें। अपनी कमजोरियों (Weaknesses) पहचान कर उन्हें दूर करना चाहिए।

सबलताओं (Strengths) को विकसित करना और संगठन/संस्था/कार्यक्षेत्र में आने वाले सुअवसरों का लाभ उठाने तथा चुनौतियों से निपटने की योजना बनाकर अपनी क्षमता असीमित की जा सकती है।

(लेखक शिक्षाविद है और विभिन्न विषयों के जानकार है।)

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