नदियों के मर्म को सुनना ही होगा

 – डॉ० रविन्द्र नाथ तिवारी

नदियों के देश कहे जाने वाले भारत में मुख्यतः चार नदी प्रणालियाँ हैं। उत्तर भारत में सिंधु, मध्य भारत में गंगा, उत्तर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र नदी तथा प्रायद्वीपीय भारत में नर्मदा, कावेरी, महानदी आदि नदियाँ विस्तृत नदी प्रणाली का निर्माण करती हैं। भू-वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय तो इन नदियों की प्राकृतिक संरचना को विकसित होने में लाखों वर्ष लगे हैं। भारत में नदियाँ आस्था, विश्वास, संस्कृति और पवित्रता की प्रतीक हैं। भारत में नदियाँ केवल जल ही नहीं अपितु अपने साथ-साथ जीवन की भी धारा सहेजे हुए हैं। भारतीय जनजीवन में इनकी पैठ इतनी गहरी है कि नदियों के बिना यहां जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक, पर्यटन, स्वास्थ्य, कृषि, शैक्षिक, औषधि और न जाने कितने क्षेत्र हैं जो हमारी नदियों से सीधे-सीधे जुडे़ हुए हैं। नदियाँ हमारे जनजीवन से हजारों वर्षों से न केवल जुड़ी हुई हैं बल्कि वे मानव सभ्यता की जननी के रूप में भी जानी जाती रही हैं।  मेसोपोटामिया, मिस्र और सिन्धु सभ्यता के विकास का मुख्य क्षेत्र टिगरिस, युफ्रेटस, नील और सिन्धु नदियां थीं।

सदियों से भारत में नदियों को देवी मानकर उनकी पूजा की जाती रही है। नदियों की पूजा की यह परंपरा तो अभी भी चली आ रही है, लेकिन यह परंपरा शुरू होने के मूल में निहित भावना का लोप सा हो गया है। हमारे यहां लगभग सभी नदियों को आज भी मां के रूप में सम्मान दिया जाता है। गंगा ही नहीं, देश की दूसरी नदियों के प्रति भी देशवासियों के मन में गहरा सम्मान है। गंगा नदी गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल के प्रमुख क्षेत्रों में बहते हुए सुन्दरवन डेल्टा का निर्माण कर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। गंगा नदी का न सिर्फ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है बल्कि देश की 40 प्रतिशत आबादी भी गंगा नदी पर निर्भर है। विष्णु पुराण एवं भविष्य पुराण में गंगा की महिमा का उल्लेख है। वर्तमान समय में यह नदी अपने कई क्षेत्रों में जल की मात्रा एवं गुणवत्ता की समस्या का सामना कर रही है। यमुना नदी यमनोत्री से निकल कर दिल्ली, उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में बहती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से उत्पन्न सूर्य की पुत्री तथा यम की बहन को यमुना कहा गया है। यह नदी दिल्ली, आगरा के कई स्थानों पर शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण की समस्या का सामना कर रही है तथा गर्मी के समय में इसके बहाव में अत्यधिक कमी देखी गई है।

नर्मदा नदी प्रायद्वीपीय भारत की प्राचीन नदियों में से एक है तथा नर्मदा नदी का उल्लेख भागवत पुराण  में मिलता है। यह भूवैज्ञानिक और पौराणिक दृष्टि से देश की प्राचीनतम नदियों में से है। प्रमुख रूप से अमरकंटक से निकलकर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र के कई जिलों से होते हुए अरब सागर में मिलती है। कदाचित यह अकेली नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। मध्य भारत को अन्न-धन से परिपूर्ण बनाने वाली इस सदानीरा नदी पर आबादी का बोझ पिछली एक शताब्दी में काफी बढ़ गया है। नर्मदा बेसिन में सम्मिलित जिलों की आबादी सन् 1901 में 78 लाख के आसपास थी, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार, इन जिलों की आबादी साढ़े तीन करोड़ से ऊपर पहुच गई है।

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भारत ही नहीं एशिया की सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र है। इस नदी के किनारे अनेक संस्कृतियों का मिलन हुआ। यह भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र की प्राचीन एवं प्रमुख नदी है। चरक संहिता में उल्लेख है कि यह मेरुपर्वत से निकलती है जिसे मानव की उत्पत्ति का क्षेत्र कहा जाता है। मेरुपर्वत से निकलने वाले प्रवाह को ब्रह्मपुत्र (सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा के कारण) भी कहा जाता है। ब्रह्मर्षि  परशुराम द्वारा अपने मां के वध के कारण लगे पाप की मुक्ति ब्रह्मपुत्र की शरण में आकर हुआ था। ब्रह्मपुत्र नदी में गाद (सिल्ट) जमने के कारण इसकी जल संधारण क्षमता काफी प्रभावित हुई है।

महाराष्ट्र की प्रमुख नदी गोदावरी है। वराहपुराण एवं महाभारत के भीष्म पर्व में गोदावरी नदी का उल्लेख है। यह दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट से लेकर पूर्वी घाट तक प्रवाहित होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गोदावरी और कृष्णा नदी मिलकर कृष्णा-गोदावरी डेल्टा का निर्माण करती हैं जो सुन्दरवन के बाद दूसरा सबसे बड़ा डेल्टा है। शहरीकरण, औद्योगीकरण एवं जनसंख्या दबाव के कारण इसमें संधारित्र जल की मात्रा एवं गुणवत्ता कई स्थानों पर प्रभावित हुई है। महानदी प्रमुख रूप से छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा प्रान्त में बहती है। महाभारत की भीष्म पर्व, मत्स्य पुराण एवं ब्रह्माण्ड पुराण में इसकी महिमा का उल्लेख है। माइनिंग एवं अन्य उद्योगों के अपशिष्टों के कारण कई स्थानों पर जल की मात्रा एवं गुणवत्ता राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। दक्षिण भारत की गंगा कही जाने वाली कावेरी नदी प्रमुख रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक के क्षेत्रों में बहती है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि कावेरी का विवाह अगस्त्य ऋषि से इस शर्त पर हुआ था कि अगस्त्य ऋषि हमेशा कावेरी नदी के साथ रहेंगे किन्तु अगस्त्य ऋषि के बाहर जाने से कावेरी ने नदी का रूप ले लिया। यह नदी भी कई स्थानों पर जल निर्धारण की मात्रा एवं गुणवत्ता की समस्या का सामना कर रही है।

देश की अधिकतर नदियां प्रदूषण की समस्या से प्रभावित हैं। वर्ष 2018 में 55 जल ग्रहण क्षेत्रों का अध्ययन किया गया, जो प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ। इसमें दर्शाया गया है कि वैतरणी, ब्रह्माणी, गोदावरी, कृष्णा, माही, नर्मदा, साबरमती और ताप्ती समेत भारत के प्रमुख नदी बेसिनों में जल प्रवाह में कमी आ रही है। इसका कारण अल्प वर्षा नहीं बल्कि उनके जल ग्रहण क्षेत्रों में अनियोजित आर्थिक गतिविधियां हैं। इस बात की चिंता जताई गई है कि अगर यह रुझान आगे भी बना रहा तो इन नदियों में से ज्यादातर नदियाँ सूख जाएंगी। पांचवें भारत जल शिखर सम्मेलन 2020 में यह बात सामने आयी है कि नदियों के संरक्षण के लिए सतत मानव अवस्थापन की जरूरत है। राष्ट्रीय जल नीति (2012) का उद्देश्य मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में एकीकृत कानूनों और संस्थानों की एक प्रणाली के निर्माण के लिये रूपरेखा और कार्य योजना पर निर्णय लेना है। जल संसाधन मंत्रालय की यह नीति मानव अस्तित्व के साथ-साथ आर्थिक विकास संबंधी गतिविधियें के लिये जल के महत्व पर प्रकाश डालती हैं। यह इष्टतम, किफायती, टिकाऊ और न्यायसंगत साधनों के माध्यम से जल संसाधनों के संरक्षण के लिये एक रूपरेखा प्रस्तुत करती है।

भारत सरकार, राज्य सरकारों तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा नदियों के संरक्षण हेतु विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं। सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की शुरूआत की गई है। यह मिशन गंगा नदी में पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और न्यूनीकरण के लिये उपाय करने हेतु राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर पांच स्तरीय संरचना की परिकल्पना करता है। इसका उद्देश्य गंगा नदी के कायाकल्प के लिये निरंतर पर्याप्त जल प्रवाह सुनिश्चित करना है। नमामि गंगे परियोजना गंगा नदी को व्यापक रूप से स्वच्छ एवं संरक्षित करने के प्रयासों को एकीकृत करती है। नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु नमामि देवि नर्मदे एवं नर्मदा सेवा यात्रा की शुरूआत की गई है। कावेरी नदी के संरक्षण हेतु ईसा फाउन्डेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कावेरी कालिंग अभियान चलाया है। इसके अन्तर्गत 83000 वर्ग किमी में 2.42 अरब पेड़ लगाया जाना है। इससे 52 लाख किसानों को लाभ मिलेगा तथा 9 लाख करोड़ लीटर से 12 लाख करोड़ लीटर पानी अलग कर 20 से 30 करोड़ कार्बन डाईआक्साइड अलग की जायेगी।

प्राचीन भारतीय ग्रन्थ वेद, पुराण उपनिषद आदि में नदियों के माहात्म्य का वृह्द उल्लेख मिलता है। एकात्मता स्रोत में नदियों का वर्णन  किया गया है। भारत ही नहीं विश्व की अधिकतर सभ्यताओं की उत्पत्ति नदियों के संरक्षण में ही हुई। इन्हें ज्ञानदायिनी, जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी के रूप में ऋषियों ने वर्णित कर जल संरक्षण के प्रति जनमानस को जागरूकता हेतु प्रयास किये गये। शहरीकरण, औद्योगीकरण, अनियोजित विकास, जनसंख्या वृद्धि तथा उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण मातृ तुल्य नदियों के सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। नदियों के संरक्षण के लिए नदी के दोनों ओर कम-से-कम एक किलोमीटर की चौड़ाई में बड़ी संख्या में पेड़ लगाने से पर्यावरण बेहतर होगा, साथ ही देश तथा समाज को सामाजिक और आर्थिक लाभ होंगे। नदियों के मर्म को सुनकर उनको अविरल एवं सदानीरा बनाने हेतु समाज के सभी सदस्यों की भागीदारी आवश्यक है। इनके संरक्षण का कार्य अकेले सरकार पूर्ण नहीं कर सकती है। नदियों के पुनर्जीवन हेतु नदी संरक्षण कार्यक्रम को जनआंदोलन का रूप देना ही होगा तभी इस दिशा में आशातीत सफलता मिलेगी।

(लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष है।)

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