भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-24 – (दान)

 – वासुदेव प्रजापति

भारतीय शिक्षा की एक प्रमुख विशेषता अर्थ-निरपेक्षता है। आज हमनें पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित होकर जीवन में अर्थ को सर्वोपरि मान लिया है। अर्थ की प्रमुखता होने से जीवन के सभी कार्य अर्थ सापेक्ष हो गये हैं। हमारे यहाँ धर्म, ज्ञान, सेवा व चिकित्सा को पैसों से श्रेष्ठ माना है। ये श्रेष्ठ बातें सबको समान रूप से मिल सके, इसलिए इन्हें पैसों से नहीं जोड़ा गया है। जैसे धर्म, ज्ञान, सेवा और चिकित्सा को हमारे पूर्वजों ने अर्थ निरपेक्ष बनाया है। यही कारण है कि हमारे देश में सभी गुरुकुल अर्थ निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था में ही चला करते थे। इस व्यवस्था में पैसे के आधार पर शिक्षा देना घोर निंदनीय कार्य माना जाता था। ज्ञान का पैसों से सीधा संबंध भी नहीं है, पैसों से ज्ञान नहीं मिलता। ज्ञान तो कर्मेंद्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त से मिलता है। इसी प्रकार जिज्ञासा, श्रद्धा, विनयशीलता व सेवा से ज्ञान प्राप्त होता है। पैसों से कभी ज्ञान प्राप्त नहीं होता, यदि पैसों से ज्ञान प्राप्त होता तो निर्धन कभी ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता और धनिक विद्यार्थी सदैव बहुत अधिक ज्ञानी बन जाता। किंतु समाज में हम देखते हैं कि अनेक बार निर्धन विद्यार्थी भी धनिक विद्यार्थी से अधिक ज्ञान प्राप्त करता है। अतः शिक्षा का अर्थ निरपेक्ष होना ही उत्तम व्यवस्था है।

इससे पूर्व हमने शिक्षा की अर्थ निरपेक्ष व्यवस्था के अंतर्गत गुरु दक्षिणा व भिक्षा जैसे साधनों का परिचय प्राप्त किया है। आज हम दान नामक साधन का महत्त्व जानेंगे।

भारतीय समाज में दान का महत्त्व

भारतीय समाज में धर्म को सर्वोपरि माना गया है। धर्म को सर्वोपरि मानने का अर्थ यह नहीं है कि अर्थ की उपेक्षा की गई है। हमारे पूर्वजों ने अर्थ के महत्त्व को समझकर बहुत कमाने की बात कही है। साथ ही साथ यह निर्देश दिया है कि जो भी कमाओ धर्म से कमाओ और जितना कमाओ उससे अधिक बाँट दो। “शत हस्तेन समाहर, सहस्र हस्तेन संकिर” अर्थात् सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बांटों। यहाँ बांटने का तात्पर्य है, दान करना। बांटने का अर्थ है, धन का त्याग करना। दान क्यों करना चाहिए? क्योंकि हमारी मान्यता है कि धन की तीन गतियाँ होती हैं – दान, उपभोग और नाश। धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग दान करना है, दान के बाद दूसरा स्थान धन का भोग करना है। यदि दान नहीं किया और भोग भी नहीं किया तो उस धन का नाश हो जाता है। इसी आशय का यह श्लोक है –

दान भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।

यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ।।

अर्थात दान करना धन की सर्वश्रेष्ठ गति होने से प्रत्येक सत्पुरुष को दान करना ही चाहिए। जो व्यक्ति दान नहीं करता, उसको समाज में सम्मान नहीं मिलता। जबकि दान देने से स्वर्ग मिलता है।

दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते।

इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानव:।।

अर्थात दान से स्वर्ग प्राप्त होता है, दान से ही सुख मिलता है। इस लोक व परलोक में व्यक्ति दान से ही पूज्य बनता है। भारतीय संस्कृति में दान का इतना अधिक महत्त्व है।

शिक्षा संस्थाएं दान से पोषित होती हैं

हमारे देश में शिक्षा संस्थानों को दान देने की परंपरा अति प्राचीन, सर्व स्वीकृत एवं स्वभाविक है। एक आचार्य को, उपाध्याय को और गुरु को दान लेने का सदैव अधिकार रहा है और इन्हें दान देना समाज का कर्तव्य माना गया है। हमारे समाज में यह भी मान्यता है कि शिक्षा संस्थान को दान देना पुण्यकार्य है। दान से, लेने वाला तो उपकृत होता ही है, देने वाले को भी पुण्यलाभ मिलता है। समाज में यह ‌श्रेष्ठ भाव होने से शिक्षा संस्थान को दान के लिए हाथ नहीं फैलाने पड़ते। समाज अपना कर्तव्य मानकर, आवश्यकता समझकर, बिना मांगे स्वयं आगे बढ़कर दान देता है। दान और भिक्षा में यही अन्तर है कि जो मांग कर ली जाय वह भिक्षा है, और जो बिना मांगे मिले वह दान है। स्वेच्छा पूर्वक दिये गये दान से, दान लेने वाले तथा देने वाले दोनों के गौरव की रक्षा होती है। जैसे प्रतिदिन मंदिर जाकर वहां यथाशक्ति दान करना सर्वमान्य है, उसी प्रकार शिक्षा संस्थानों में भी गृहस्थों को नियम पूर्वक दान करने की श्रेष्ठ परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से चली आई है। जब से शिक्षा संस्थान शुल्क लेने लगे हैं, तब से दान मिलना कम हुआ है, परन्तु अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

दान पर पोषित संस्थान अपरिग्रही होता है

हमारे समाज में एक विशेष परंपरा रही है। गाँव में राजमहल हो अथवा कोई महालय हो, वे कभी भी गाँव के मंदिर से ऊँचे नहीं होते थे। राजमहल राजतंत्र के केंद्र हैं, जबकि मंदिर धर्मतंत्र के केंद्र हैं। हमारे समाज में धर्म का स्थान सर्वोपरि है। धर्म समाज, राज्य, न्याय, उद्योग, व्यवसाय आदि से ऊपर है। धर्म ही समाज को व्यवस्थित चलाता है। यही कारण था कि मंदिर से ऊँचा कोई वैभवशाली राजमहल नहीं होता था। जबसे धर्म निरपेक्षता के नाम पर धर्म को विवादित बनाकर उसकी उपेक्षा की जाने लगी है, तब से यह परंपरा टूटी है।

शिक्षा धर्म की प्रतिनिधि हैं, क्योंकि शिक्षा ही धर्म सिखाती है। धर्म और शिक्षा समाज को प्रेरित व निर्देशित करती है। शिक्षा समाज को शिक्षित व संस्कारित करने का कार्य भी करती है। अतः समाज शिक्षा संस्थानों का दान के माध्यम से पोषण करना अपना कर्तव्य मानता है। समाज यह देखता है कि शिक्षा संस्थानों में जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं योग्य रूप से पूरी हो रही है या नहीं? किसी भी प्रकार की न्यूनता न रहे, सभी आवश्यक व्यवस्थाएं उत्तम हों, इनका समाज पूरा पूरा ध्यान रखता था।

दूसरी ओर विद्या संस्थाएं वैभव, विलासिता, संग्रहवृत्ति, आराम आदि का स्वैच्छिक त्याग करते हुए संयम, सादगी, न्यूनतम आवश्यकताएं, परिश्रम, स्वावलंबन के आधार पर चलनी थीं। यह व्यवस्था समाज का एक सांस्कृतिक भूषण है। एक स्वाभाविक जीवनचर्या ऐसी ही होनी चाहिए, इसमें हीनता बोध को कोई स्थान नहीं है। अत: महालय और विद्यालय के मापदंड भिन्न-भिन्न होने चाहिए। दोनों को स्वयं का विकास अपने-अपने मापदंड़ों के आधार पर करना चाहिए। दूसरे के मापदंड़ों की नकल नहीं करनी चाहिए। आज अनेक शिक्षा संस्थान सादगी को छोड़कर वैभवशाली महालयों से प्रतिस्पर्धा करने लगे हैं, जो अर्थनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था के विपरित है।

समाज में दान के दूषण एवं भूषण दोनों हैं

शिक्षा संस्थानों को दान देने की परंपरा आज भी प्रचलन में है, यह श्रेष्ठ समाज की परिचायक है। किंतु दान की परंपरा में कुछ दूषण घर कर गये हैं, जो इस प्रकार हैं –

कुछ शिक्षा संस्थानों में प्रवेश की शर्त के रूप में दान लिया जाता है तो कुछ में शिक्षकों की नियुक्ति बिना दान के नहीं हो पाती। संचालकों के द्वारा जबरन दान लिए जाने पर दान देने वाले भी उसे अनेक प्रकार से दूषित करते हैं। उधर दान देने वाला संस्थान के संचालन में अपना अधिकार मांगता है, जैसे- ट्रस्टी या संरक्षक का पद अथवा शिक्षकों के चयन व विद्यार्थियों के प्रवेश में अपना अधिकार। इसके साथ-साथ भवन में अपना व अपने बाप-दादाओं के नाम या नामपट्ट लगवाना तथा दानदाता के नाते मान-सम्मान, अग्रक्रम आदि की अपेक्षा रखता है। अनेक दानदाता अपनी दो नंबर की आय में से दान देकर भी ये सभी अपेक्षाएं रखते हैं। जबकि दूसरी ओर आज भी ऐसे दानदाता हैं, जो गुप्त दान करते हैं, किसी को भनक तक लगने नहीं देते, यह दान का भूषण है।

अनुदान दान नहीं है

समाज की भांति सरकार भी दान देती है, परन्तु वह दान नहीं अनुदान होता है। इस अनुदान का पूरा हिसाब-किताब रखना पड़ता है और यह हिसाब सरकार को भेजना पड़ता है। अनुदान की सम्पूर्ण राशि निर्धारित मदों में ही खर्च करनी होती है। खर्च पर सरकार का नियंत्रण रहता है। अनुदान के नियमों से परे जाकर खर्च करने पर सरकार अनुदान देना बन्द कर देती है। अनुदान देने के लिए सरकार से याचना करनी पड़ती है। अतः अनुदान सही अर्थ में निम्न स्तर की भिक्षा ही है, दान नहीं है। जो स्वेच्छा पूर्वक, बिना किसी अधिकार और अपेक्षा के त्याग भाव से दिया जाता है, वह दान होता है। इस सूक्ष्म अंतर को हमें समझना चाहिए।

दान से शिक्षा व समाज दोनों सुसंस्कृत बनते हैं

शिक्षा संस्थानों का दान से पोषित होना और समाज का भली-भांति उनका पोषण करना, यह उत्तम स्थिति है। किन्तु शिक्षा संस्थान दान पाने के लिए अनेक प्रकार से याचना करें और दान-दाता अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास करे, यह स्थिति सुसंस्कृत समाज का लक्षण नहीं है। सुसंस्कृत समाज दान को शुद्ध और प्रवाहित रखता है। इसी प्रकार दान देने की सुव्यवस्था से शिक्षा और समाज दोनों सुसंस्कृत बनते हैं। शिक्षा के सुसंस्कृत होने से चरित्रवान नागरिकों का निर्माण होता है तथा समाज के सुसंस्कृत होने से राष्ट्र का सांस्कृतिक उत्थान होता है। एक सुसंस्कृत राष्ट्र ही विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है और अन्य देशों को भी अपने जैसा सुसंस्कृत राष्ट्र बना सकता है।

आज दान को पवित्र बनाने की आवश्यकता है

आज भी दान देने का संस्कार हमारे समाज में जीवित है। किंतु आज का दान शुद्ध और पवित्र नहीं है, वह अनेक प्रदूषणों से ग्रसित है। इसलिए दान को उन प्रदूषणों से मुक्त कर शुद्ध और पवित्र बनाने की आवश्यकता है। अनेक लोगों को यह असंभव लगता होगा किंतु असंभव है नहीं। यदि इसके लिए शिक्षा संस्थान आगे बढ़कर पहल करें तो यह संभव हो सकता है।

सर्वप्रथम शिक्षा संस्थानों को बाजार बनने से बचना होगा। उन्हें उद्योगों, कार्यालयों और महालयों की पंक्ति से बाहर निकल कर विद्यालय नामक विशिष्ट पंक्ति का निर्माण करना होगा। उत्तम विद्यालय के मापदंड अर्थ से हटाकर धर्म से जोड़ने होंगे और नए सिरे से मापदंड़ बनाते हुए उसके अनुसार अपनी पहचान स्थापित करनी होगी। यदि सभी शिक्षा संस्थान इस प्रकार की पहल करेंगे तो निश्चित रूप से धर्म परायण समाज का सहयोग उन्हें प्राप्त होगा और समाज भी दान को शुद्ध एवं पवित्र बनाने में सहयोगी सिद्ध होगा।

आज हम दान की महत्ता बताने वाली एक कथा का रसास्वादन लेंगे।

सबसे बड़ा कौन?

एक अनपढ़ व भोला-भाला युवक था। वह अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक कुटिया में रहता था। वह कठोर मेहनती था, दिन भर अपने खेत में खेती करता था। खेती से ही उसका और उसकी माँ का जीवन यापन होता था। अनपढ़ होते हुए भी वह स्वभाव से ईमानदार व संतोषी था। कुछ समय बाद उसकी माँ का स्वर्गवास हो गया। अपनी माताजी के चले जाने पर वह एक दिन गाँव के पंडित जी के पास गया। उसने पंडित जी से पूछा –

पंडित जी इस दुनिया में बड़ा कौन है?

पंडित जी ने बताया, बड़ी तो पृथ्वी है।

उसके मन में विचार आया की इससे भी बड़ा कोई और है क्या? उसने पंडित जी से फिर पूछा, पंडित जी क्या पृथ्वी से भी बड़ा कोई है? पंडित जी ने उत्तर दिया, हाँ पृथ्वी से भी बड़ा है।

पृथ्वी से बड़ा कौन है?

पृथ्वी से बड़े पहाड़ हैं।

पहाड़ पृथ्वी से बड़े कैसे हुए?

पंडित जी ने बताया जब भगवान ने इस पृथ्वी को बनाया तब यह पृथ्वी स्थिर नहीं थी, हिलती-डुलती रहती थी। इसे स्थिर करने के लिए भगवान ने पृथ्वी पर जगह जगह पहाड़ बनाएं। इन पहाड़ों को बनाने से पृथ्वी स्थिर हुई, इसलिए पहाड़ पृथ्वी से बड़े हुए।

क्या पहाड़ से भी कोई बड़ा है?

हाँ पहाड़ से बड़ा लोहा है।

लोहा पहाड़ से बड़ा कैसे हुआ?

पंडित जी ने उसे समझाया कि देखो लोहा पहाड़ को काटकर उसमें से मार्ग बना देता है, इसलिए लोहा पहाड़ से बड़ा है।

क्या लोहे से भी बड़ा कोई और है?

हाँ, लोहे से बड़ा अग्नि है।

अग्नि लोहे से बड़ा कैसे हैं?

पंडित जी भी बड़े धैर्यवान थे, वे उस भोले किसान की एक एक जिज्ञासा को शांत करते जा रहे थे। उन्होंने किसान को बताया कि अग्नि लोहे को पिघला देती है। इसलिए अग्नि लोहे से भी बड़ी है।

क्या अग्नि से भी बड़ा कोई है?

हाँ, अग्नि से बड़ा वायु है।

वायु अग्नि से बड़ा कैसे हैं?

पंडित जी ने बताया वायु अग्नि को भी अपने साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर बहा ले जाता है, इसलिए वायु अग्नि से बड़ा है।

पंडित जी वायु से भी बड़ा कोई है?

हाँ, वायु से बड़ा दान है।

दान वायु से बड़ा कैसे हो गया?

पंडित जी ने उसे समझाते हुए कहा, देखो भाई! जब दाहिना हाथ दान देता है तो बाएँ हाथ को भी उसका पता नहीं चलता, इसलिए दान वायु से भी बड़ा है।

तो क्या इस दुनिया में दान सबसे बड़ा है?

हाँ, इस दुनिया में दान सबसे बड़ा है।

तब उसने पंडित जी से अपने मन की इच्छा बताई। पंडित जी महीने भर पहले ही मेरी माता जी का स्वर्गवास हो गया है। मैं उनकी याद में दान करना चाहता हूँ। आप मुझे बताऍं की मैं क्या दान करूँ? पंडित जी ने उसे सुझाया की देखो विद्या से बढ़कर कोई दान नहीं माना जाता, विद्यादान सबसे बड़ा दान है। अपने गाँव में कोई विद्यालय नहीं है, इसलिए तुम दान करना चाहते हो तो गाँव में एक विद्यालय बना दो। उसके मन में भी सबसे बड़ा दान देने की इच्छा थी। इसलिए उसने अपने गाँव में एक विद्यालय बना दिया। उस विद्यालय में पढ़कर गाँव के बालक शिक्षित व संस्कारित नागरिक बनें, जिससे उस किसान की तथा गाँव की ख्याति दूर दूर तक फैली।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-23 – भिक्षा (मधुकरी)

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