शिशु का आहार-विहार

✍ रवि कुमार

घर में शिशु रहता है तो आनन्द रहता है। घर में आने-जाने वाले सभी रिश्तेदार, ईष्ट-मित्र गण के लिए वह शिशु आकर्षण का केंद्र होता है। शिशु अपने क्रियाकलापों से सभी का ध्यान अपनी ओर खींचता है। शिशु-काल अर्थात आयु-अवधि 5 वर्ष तक की मानी गई है। बालक के विषय में शास्त्रों में कहा गया है– “लालयेत पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्।” अर्थात पांच वर्ष तक की आयु में शिशु का लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से करना चाहिए। दस वर्ष तक (15 वर्ष की आयु होने तक), आवश्यक होने पर, बालक को ताड़ना (नियम पालन, संस्कार आदि) भी कर सकते हैं। 16 वर्ष की आयु हो जाए तो बालक के साथ मित्र जैसा व्यवहार करें।

पाँच वर्ष तक की अवस्था में शिशु माँ पर आलंबित है। शिशु के लालन-पालन में उसका आहार-विहार आता है। आहार में माँ का दूध और आयु स्तर अनुसार भोज्य पदार्थ; विहार में उसकी नींद व क्रियाकलाप आते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि आज की माताएं शिशु के आहार-विहार के प्रति जागरूक है क्या? जागरूकता के साथ-साथ आहार-विहार में क्या-क्या ध्यान रखना, इस विषय में उन्हें जानकारी रहती है?

आहार के विषय में सही जानकारी का अभाव

वर्तमान माताएं शिशु के आहार-विहार के लिए जागरूक तो है परंतु इस विषय में उन्हें दिशा स्पष्ट नहीं है। आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में समय का अभाव भी दिखाई देता है। माँ को दिशा की अस्पष्टता व समय का अभाव शिशु को आने वाले जीवन में भुगतना पड़ता है। इन पांच वर्षों में हुई शारीरिक वृद्धि व मानसिक विकास का प्रभाव शिशु के जीवन पर पड़ता है। आज सर्वदूर बाल अवस्था में बालकों में हीनताजन्य रोग (deficiency disease) दिखाई देते हैं। उसका बड़ा कारण शिशु अवस्था में आहार-विहार पर सही ध्यान न देना है।

समय का अभाव, विज्ञापनों का प्रभाव व सही जानकारी के न होने के कारण बाजार में होर्लिक्स तथा सेरेलॉक आदि खाद्य पदार्थों को शिशु आहार का मुख्य भाग मानकर शिशु को देते रहते हैं। इस सब खाद्य पदार्थों में प्रिजरवेटिव (Preservative) रहता है, मीठे की मात्रा भी अधिक होती है, स्वाद बढ़ाने की दृष्टि से चॉकलेट आदि फ्लेवर भी डाले जाते हैं। शिशु की आंतों व शरीर की पाचन प्रक्रिया के लिए ये सब ठीक नहीं है। आजकल बहुत कम आयु के बालकों को डायबिटीज जैसे रोग होने के कारणों में से एक ये भी है। दूध में चॉकलेट पाउडर घोलकर शिशु को पिलाना आम प्रचलन में है। चॉकलेट पाउडर दूध की गुणवत्ता को कम करता है।

शिशु का आहार

आयुर्वेद शास्त्र में बालक के जन्म के पश्चात् उसकी तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं – 1. क्षीरप 2. क्षीरान्नाद 3. अन्नाद। क्षीरप बालक केवल स्तनपान पर ही निर्भर रहता है। अतः इस अवस्था में माता को पौष्टिक आहार की विशेष आवश्यकता रहती है। क्षीरान्नाद अर्थात दूध व अन्न दोनों पर निर्भर रहने वाला बालक। छह मास की आयु के बाद बालक को अन्नप्राशन संस्कार की व्यवस्था है। इस अवस्था में बालक की शारीरिक हलचल बढ़ने के साथ-साथ पाचन शक्ति भी बढ़ती है। छह मास के बाद माँ के दूध के अलावा अन्य प्राणियों (गाय, भैंस) का दूध भी बालक को पिलाते हैं। एक वर्ष के बालक को सभी प्रकार के लघु धान्य- गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा को दूध-घी आदि के साथ तरल मात्रा में दे सकते हैं। अन्नाद अर्थात सम्पूर्ण रूप से धान्य पर निर्भर रहने वाला बालक।

जब तक शिशु माँ का दूध ग्रहण करता है तब तक माँ के द्वारा लिए गए आहार का प्रभाव भी शिशु पर पड़ता है। माँ का स्वास्थ्य बिगड़ता है तो शिशु का भी स्वास्थ्य बिगड़ता है। अतः माँ का आहार शुद्ध सात्विक होना चाहिए। एक परिवार में शिशु को ठंड लग गई। पूछने पर पता चला कि माँ ने कुछ अत्यंत ठंडे पदार्थों का सेवन किया था, इस कारण माँ अस्वस्थ हुई और उसका प्रभाव शिशु पर भी हुआ। शिशु अवस्था में ठंडे पदार्थों आइसक्रीम, ठंडे पेय पदार्थ व अत्यधिक मीठे पदार्थों आदि का सेवन वर्जित है।

शिशु का विहार (नींद और क्रियाकलाप)

शिशु अवस्था में शारीरिक व मानसिक विकास के लिए नींद का बहुत अधिक महत्व है। जन्म के पश्चात वह 24 में से 22 घंटे तक सोता है। धीरे धीरे यह समय कम होता जाता है और शिशु को दिन व रात का भान भी होता जाता है। तीन से पांच वर्ष की आयु में शिशु को न्यूनतम 12 घंटे सोना आवश्यक है। वह शांति से नींद ले सके, इसकी व्यवस्था करना भी आवश्यक है।

शिशु के विहार के लिए खेलना, कूदना, चलना, दौड़ना, सामान इधर से उधर फेंकना-रखना, बाहर घूमने जाना, पैन/पेंसिल/रंग जो हाथ में आ गया उससे कपड़ों/दीवार पर कुछ न कुछ बना देना, ऊपर-नीचे चढ़ना-उतरना, नई नई ध्वनि सुनना व निकालना, मिट्टी में खेलना आदि आते हैं। शिशु का प्रत्येक क्रियाकलाप उसका व्यायाम ही है। इन सारे क्रियाकलापों में परिवार के सदस्यों विशेषकर माँ का संरक्षण आवश्यक है। संरक्षण के साथ स्वतंत्रता, सहजता व सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।

प्रायः परिवारों में ये मनोभाव रहता है कि शिशु के हाथ में जो भी आ जाता है वह उसे फेंक देता है, तोड़ देता है। इसलिए सब सामान शिशु से बचा कर रखो। कक्ष का द्वार खुला मिला तो कहीं भी चला जाएगा, इसलिए द्वार बंद करके रखो, पूरा पहरा दो। ऐसा होना स्वाभाविक है, इसका कारण उस अवस्था में शिशु की ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों की सक्रियता का बढ़ना है। शिशु अपने क्रियाकलाप ठीक से कर सके, इसके लिए उसके वस्त्र भी ऐसे हो कि उसे क्रियाकलाप करने में कोई बाधा या असहजता न हो। इस अवस्था में टीवी व मोबाइल से दूरी बनाना ही ठीक रहता है। अन्यथा शिशु क्रियाकलाप करने की बजाय इन आधुनिक यंत्रों में ही फंसा रहेगा और उसकी शारीरिक-मानसिक वृद्धि रुक जाएगी।

शिशु अवस्था शेष जीवन की नींव है। नींव जितनी मजबूत होगी भवन उतना ही अच्छा बनेगा। इस नींव को मजबूत बनाने के लिए आहार-विहार पर ध्यान देना माताओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। माता की जागरूकता के साथ उसे सही जानकारी हो और उस अनुसार शिशु का लालन-पालन हो  तो ‘आज का स्वस्थ शिशु कल का स्वस्थ नागरिक’ बनता है।

(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

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