सा विद्या या विमुक्तये
✍ रवि कुमार
एक व्यक्ति नौकरी से आकर अपने कक्ष में कम्प्यूटर के सामने बैठकर अपने ऑनलाइन चैटरूम में व्यस्त रहता था। एक दिन उसका इंटरनेट पैक समाप्त हो गया। इस कारण उस दिन चैटरूम में बैठने की बजाय अपने परिवार के सदस्यों के साथ चर्चा करते हुए समय व्यतीत किया। अगले दिन उसने नौकरी से लौटते हुए नेटपैक रिचार्ज करवा लिया। घर आने पर चैटरूम में अपने साथियों के साथ पहला वाक्य लिखा – “कल नेटपैक समाप्त होने के कारण आप सबको जॉइन नहीं कर पाया। कल का समय मैंने अपने परिवार वालों के साथ व्यतीत किया। बहुत अच्छे लोग हैं वे।” यह संस्मरण आजकल के भागदौड़ भरे जीवन का एक उदाहरण है।
परस्पर चर्चा गायब सी होती जा रही है। मोबाइल-इंटरनेट में तो घंटों समय लगता है परंतु आपसी बातचीत के लिए कुछ मिनटों का समय भी हमारे पास नहीं है। परिवार के सदस्यों की आपस में बातचीत नहीं होती। कार्य स्थल पर भी कुछ ऐसा ही दिखता है। कहीं कुछ मित्र मंडली में हो जाए तो ठीक, अन्यथा बड़ी मात्रा में लोगों का जीवन चर्चा-विहीन सा बीतता है।
परस्पर चर्चा होने या न होने का भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। चर्चा अधिक होना, कम होना, सकारात्मक होना या नकारात्मक होना, सबका स्वास्थ्य से सम्बंध है। स्वास्थ्य से चर्चा का कैसा संबंध है, आइए विचार करते हैं।
मनुष्य का मन
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समूह में रहना चाहता है। आजकल के जीवन में वह समूह में रहकर भी अकेला अनुभव करता है। उसका एक मुख्य कारण है कि अपने मन की बात वह किससे कहे? ऐसा कोई स्थान और व्यक्ति उसके जीवन में है क्या, जहां और जिसके सामने वह अपनी मन की बात निसंकोच भाव से खुलकर कह सकता है। जिस व्यक्ति के पास ऐसा स्थान रहता है, वह आजकल सौभाग्यशाली माना जाता है। ऐसे में एक पुराने गीत की पंक्ति स्मरण हो आती है – “कोई होता जिसको अपना हम अपना कह देते।” मन की बात खुलकर कहने से मन हल्का हो जाता है, अन्यथा मन में कुंठाएं-गांठें बनती रहती हैं जो धीरे धीरे दुःख, अवसाद और तनाव आदि का कारण बनती है और आगे चलकर मानसिक रोग का रूप ले लेती है।
सामाजिक दायरा
आजकल मनुष्य का सामाजिक दायरा सिमटता जा रहा है। पहले एक सामान्य मनुष्य का सहज स्वाभाविक दायरा बहुत बड़ा होता था, आज का मनुष्य उस दायरे को रखना नहीं चाहता। बड़ा सामाजिक दायरा उसे अपने व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप दिखाई देता है इसलिए वह छोटे से छोटा दायरा रखना चाहता है। बड़े सामाजिक दायरे का लाभ उसे दिखाई नहीं देता। बस मेरे व्यक्तिगत सुख में कोई दखल न हो, ऐसा वह विचार करता है। यह विचार मूल रूप में पश्चिम का विचार है, भारतीय विचार नहीं है। भारतीय विचार बड़े सामाजिक दायरे का है, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का है। जितना बड़ा सामाजिक दायरा होगा, उतना ही परस्पर चर्चा-संवाद का अवसर मिलेगा और जितना अधिक अवसर मिलेगा, उतना अधिक मन को खोल पाएंगे।
पारिवारिक सम्बन्ध
परिवार के सदस्यों में रक्त संबंध होता है इस कारण उनका एक दूसरे के प्रति सहज जुड़ाव रहता है। सभी सदस्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। अपने मन की बात एक दूसरे को कहना, ये सबकी इच्छा रहती है। परंतु भागदौड़ के जीवन में कहने का अवसर ही नहीं मिल पाता। इसके लिए दिन में कोई एक समय परिवार के सभी सदस्य मिलकर भोजन/जलपान आदि करें। सप्ताह में एक बार 30-40 या 60 मिनट के लिए एक साथ बैठकर खुलकर चर्चा-संवाद करें। परिवार के सदस्यों में जितना संवाद बढ़ेगा, उतनी ही आपसी दूरियां कम होंगी और जीवन आनन्दमय बनेगा।
आहार और मनःस्थिति
आहार अच्छा लेने मात्र से स्वास्थ्य अच्छा नहीं हो जाता। आहार लेते समय मनःस्थिति कैसी है, इसका आहार के पाचन पर सीधा प्रभाव रहता है। प्रसन्नतापूर्वक प्रसाद रूप में ग्रहण किया हुआ भोजन अधिक पाचक होता है और अधिक पौष्टिकता प्रदान करता है। आहार लेते समय मन का भाव अच्छा नहीं है या नकारात्मक भाव है अथवा मन क्रोधित है तो भोजन का पाचन ठीक से नहीं होगा और न ही रस ठीक से बन पाएगा।
रोगी के साथ संवाद की परंपरा
भारत में कोई परिचित रोगग्रस्त हो जाता है तो उसके जानने वाले स्वास्थ्य का हालचाल पूछने के लिए आते हैं। रोगी व्यक्ति जितने अधिक परिचित लोगों से संवाद करता है, उतना उसको ठीक होने की शक्ति बढ़ाता रहता है। रोगी व्यक्ति के ठीक होने की गति तीव्र होती रहती है।
कुछ करणीय बातें
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यश:।
मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मन:॥
– भागवत पुराण (११.३.३०)
अर्थात मनुष्य को चाहिए कि भगवद्भक्तों के साथ एकत्र होकर भगवान् की महिमा-गायन के लिए उनकी संगति करना सीखे। यह विधि अत्यन्त शुद्ध बनाने वाली है। जैसे ही भक्तगण इस प्रकार प्रेमपूर्ण मैत्री स्थापित कर लेते हैं, वैसे ही उन्हें परस्पर सुख तथा तुष्टि का अनुभव होता है। इस प्रकार एक-दूसरे को प्रोत्साहित करके, वे उस भौतिक इन्द्रिय-तृप्ति को त्यागने में सक्षम होते हैं, जो समस्त कष्टों का कारण है।
सकारात्मक चर्चा-संवाद सदा ही सुख देने वाला है। उसे जीवनचर्या का भाग बनाएं और आनंदित रहें। ऐसा करने से हम अपने जीवन को काफी हद तक स्वास्थ्य से भरपूर बना सकते हैं।
(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)
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