गाँधी जी का शिक्षा सिद्वान्त – 2 अक्तूबर जयंती विशेष


 – डॉ हिम्मत सिंह सिन्हा

गाँधी जी का स्थान विश्व में महानतम विभूतियों में आता है। वह आधुनिक राष्ट्र के जनक कहे जाते हैं। गाँधी जी भारतीय संस्कृति एवं भारतीय परम्परा के एक महान पुरुष माने जाते हैं। वह इस इस युग के महान शिक्षा शास्त्री  थे।  उन्होंने शिक्षा के सभी अंगों पर राष्ट्रवाद के सन्दर्भ में अपने विचार अभिव्यक्त किए हैं, जिनमें आदि से अन्त तक राष्ट्रीय भावना का समावेष है। गाँधी जी के अनुसार शिक्षा वही है जो व्यक्ति को यथार्थ एवं वस्तुगत ज्ञान प्रदान करती है। वह वर्तमान शिक्षा को इस देश के लिए अमंगलकारी तथा पतन का कारण मानते थे क्योंकि वर्तमान शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों को विकसित होने ही नहीं देती – इस शिक्षा के दोषों को दूर करने के लिए गाँधी जी ने शिक्षा में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए। उनकी नवीन शिक्षा – बेसिक शिक्षा जीवन व्यापी और राष्ट्र व्यापी निर्माण प्रक्रिया थी।

गाँधी जी के अनुसार शिक्षा का कोई एक उद्देश्य नहीं हो सकता है। उन्होंने जीवन के सभी पक्षों को ध्यान में रखा है और शिक्षा को तदनुसार कई दृष्टिकोणों से देखा है। इस दृष्टि से गाँधी जी शिक्षा के सांस्कृतिक उद्देश्य तथा चरित्र विकास को बहुत महत्त्वपूर्ण मानते थे।

चरित्र विकास भी गाँधी जी के अनुसार शिक्षा का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है “मैंने हृदय की संस्कृति या चरित्र निर्माण को सदा प्रथम स्थान दिया है। मैंने चरित्र-निर्माण को शिक्षा की उपयुक्त आधारशिला माना है।” गाँधी जी का मानना था कि जो शिक्षा चरित्र निर्माण नहीं करती तथा अपने परिवेश से अर्थात् अपनी धरती से नहीं जोड़ती वह शिक्षा कहलाने योग्य नहीं हैं। वह कहते थे कि मेरी पक्की राय है कि भारतीय पाठ्यक्रम में हिन्दी और संस्कृत को श्रेष्ठ स्थान मिलना चाहिए। वह मानते थे कि शिक्षा को इस देश की प्राचीन संस्कृति से जोड़े रखना अति आवश्यक है। जो शिक्षा हमें अपनी जड़ों से नहीं जोड़ती उसका बहिष्कार करना चाहिए।

उपर्युक्त शैक्षिक उद्देश्यों के अतिरिक्त गाँधी जी प्राचीन भारतीय ऋषियों की भाँति यह भी कहते थे कि विद्या सदा मुक्ति के लिए होनी चाहिए। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ उनका भी आदर्श था। शिक्षा द्वारा आध्यात्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए तथा आत्मबल जागृत होना चाहिए इसके लिए वह गोधराज के बलिदान का उदाहरण दिया करते थे।

विदेशी शासन-काल में जो शिक्षा प्रणाली भारतीयों के ऊपर थोपी गई वह सर्वांगीण विकास वाली नहीं थी। इस प्रणाली से देश व समाज का कल्याण नहीं हो रहा था। इस शिक्षा का उद्देश्य सरकारी मशीन को चलाने के लिए क्लर्क उत्पन्न करने का था। इस प्रणाली से निकला हुआ शिक्षित युवक शरीर से तो भारतीय होता था किन्तु हृदय और मस्तिष्क से विदेशी हो जाता था। महात्मा गाँधी ने सोचा यदि राजनैतिक स्वराज्य मिल भी जाए तो भी सामाजिक एवं आर्थिक स्वराज्य देश में तब तक नहीं आ सकता, जब तक कि शिक्षा को राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं बनाया जाता। अतः उन्होंने अपनी नयी शिक्षा नीति जिसे बेसिक शिक्षा का दर्शन कहा जाता है वह देश के समक्ष रखा। बेसिक शिक्षा को गाँधी जी देश के लिए अपनी एक अनुपम ‘भेंट’ मानते थे।

वह मानते थे कि तत्कालीन शिक्षा प्रणाली हमारा युवा पीढ़ी को जीवन से दूर कर रही है। पढ़ी-लिखी लडकियां विवाह के पश्चात घर का काम भी ठीक से नहीं करतीं। इसके आदर्श संकुचित हैं। केवल सरकारी नौकरी प्राप्त करके बाबू बन जाओ बस इतनी ही सोच पाते है।

गाँधी जी ने कहा, “वर्तमान शिक्षा प्रणाली पुस्तकीय, साहित्यिक एवं शास्त्रीय होने के कारण बालक का केवल बौद्धिक विकास कर सकती है। वस्तुतः यह शिक्षा का भी विकास नहीं कर पाती क्योंकि बुद्धि का विकास इन्द्रियों के सदुपयोग से ही सम्भव है। वर्तमान शिक्षा हाथ, पैर, आंख, कान आदि का उपयोग करना सिखाती ही नहीं। देश की प्रगति में यह भावना बाधक बनती है। इसमें मातृभाषा तथा मातृभूमि की सर्वथा उपेक्षा है इसलिए यह निन्दनीय है।”

इसको बदलने हेतु गाँधी जी ने सन् 1936 ई० से ‘हरिजन’ पत्र द्वारा अपने विचार का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1937 ई० में जब देश के नौ प्रांतों में कांग्रेसी मन्त्रिमण्डल स्थापित हुए तो गाँधी जी ने अपनी शिक्षा योजना को लागू करने का विचार किया। अक्तूबर सन् 1937 ई० में नवीन शिक्षा पर विचार करने के लिए वर्धा में शिक्षा शास्त्रियों का एक ‘अखिल भारतीय सम्मेलन’ आयोजित किया गया। इस सम्मेलन के सभापति गाँधी जी थे। गाँधी जी ने शिक्षा-सम्बन्धी अपने विचार इस सम्मेलन में व्यक्त किए। सम्मेलन ने इस विषय पर पर्याप्त विचार-विमर्श किया और कुछ प्रस्ताव पारित किए। यही प्रस्ताव बेसिक शिक्षा के मूलभूत सिद्धांत हैं जो बहुत विषद तथा विस्तृत हैं। संक्षेप में बेसिक शिक्षा के मुख्य नियम हम निम्नलिखित कह सकते हैं:

  1. सात वर्ष तक नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा, भारत निर्धन देश है, हर वर्ग तक झोपड़ी पट्टी तक शिक्षा पहुंचे उसके लिए यह अनिवार्य है कि मिडिल स्कूल तक की शिक्षा निःशुल्क हो।
  2. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। यह तो गाँधी जी का दृढ़ विश्वास था कि अंग्रेजी शिक्षा हमें अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा तथा स्वदेश प्रेम से काट रही है इसलिए इसको तुरन्त हटाकर अपनी भाषा में ही बालक को शिक्षा देनी आवश्यक है।
  3. स्वावलम्बन – गाँधी जी का इस विषय पर बहुत आग्रह था। वह कहते थे कि जब छात्र विद्यालय से निकलता है तो नौकरी के लिए भटकता है और जब नौकरी नहीं मिलती तो भ्रष्टचारी गतिविधियों में फंस जाता है क्योंकि शिक्षा उसको भ्रम विहीन बना देती है।

हमें प्रकृति ने बहुत साधन दिए हैं यदि बालक को उनका उपयोग करना सिखा दिया जाए तो वह हताश तथा निराश होकर नहीं भटकेगा। आजकल मनुष्य पराली जलाकर देश की अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण इसलिए नष्ट कर रहा है कि उसको थोड़ा बहुत पराली का उपयोग नहीं सिखाया। यदि शिक्षा के साथ कोई ऐसी ही दस्तकारी जोड़ दी जाए तो छात्र स्वाबलम्बी तथा स्वाभिमानी बनेगा और ग्राम अर्थव्यवस्था भी दूर होकर गांव की गरीबी दूर होगी।

इन्हीं आधारभूत नियमों पर भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा की बुनियाद खड़ी की गई थी। इस शिक्षा को और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसे – वर्धा योजना, आधारभूत शिक्षा, नेशनल एजूकेशन, मौलिक शिक्षा, बेसिक एजुकेशन आदि। नाम कुछ भी रख लें, उद्देश्य एक ही है – देश के युवक में स्वाभिमान से जीने की भावना, देशप्रेम, चरित्र, मातृभाषा से प्रेम तथा गौरव उत्पन्न हो।

(लेखक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से प्रोफेसर सेवानिवृत है और संस्कृति शिक्षा संस्थान कुरुक्षेत्र में शोध निदेशक है।)

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