महात्मा ज्योतिबा फुले का शिक्षा दर्शन

 – पांडुरंग कुलकर्णी

विद्या बिना मति गयी ! मति बिना नीति गयी !
नीति बिना गती गयी ! गती बिना वित्त गया !
वित्त विना शुद्र गये! इतने  अनर्थ अविद्या ने किये !

(हिंदी संस्करण) महात्मा ज्योतिबा फुले – पुस्तक: गुलामगिरी

भारतवर्ष में जिनके जीवन को समाज उद्धार के प्रति समर्पित कहा जा सकता हैं, उनमें अग्रणी नाम है ज्योतिबा फुले।
ऊपर दी गयी उनकी पद्य पंक्तियाँ शिक्षा के बारे में ज्योतिबा फुले जी का विचार स्पष्ट करती हैं। महात्मा ज्योतिबा फुले का शिक्षा दर्शन यह विषय उनकी जीवनी का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं, जिसे परखकर आज हमें अपने शैक्षणिक मुल्यों में समाविष्ट करना जरुरी हो गया हैं।

तत्वतः शिक्षा क्या हैं? शिक्षा, संस्कार का दुसरा नाम है। प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर शिक्षा में संस्कार की मात्रा लगभग आधी होनी चाहिए। उसके बाद जीवन सक्षम तथा स्वावलंबी होने के लिये औद्योगिक शिक्षा व अन्य कौशल्य शिक्षा प्राप्त करना जरुरी हैं।
महात्मा ज्योतिबा फुले के कार्यकाल में समाज की विचारधारा बहुत ही अपरिपक्व थी। अनीति, संकुचित भावना समाज मन पर हावी थी। उस समाज को प्रबोधित करके ऊपर उठाने के लिये उनको शिक्षित करना यही एक उपाय था। वह कार्य बड़ी लगन के साथ, पूरी शक्ति लगाकर फुले जी ने किया।

नीति ही मानव जीवन का आधार हैं। विश्व कुटुंब संकल्पना, सत्य धर्म संहिता आदि विषय पर ज्योतिबा जी ने बहुत लेखन किया। 24 सितंबर 1873 को उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। शिक्षा का माध्यम ही उचित हैं, शिक्षा प्रत्येक को समान मात्रा में मिलनी चाहिए और उसमें कोई भी भेदभाव नही होना चाहिए इसलिये ज्योतिबा ने शिक्षा के प्रति समाज में जागृति लाने के लिये अथक प्रयास किए।

मैकाले की शिक्षा नीति का उन्होंने विरोध किया था। शिक्षा के हकदार प्रथम उपेक्षित लोग हैं, बाद में अपेक्षित लोग – यह विचार फुले जी के थे। सभी को ‘समान शिक्षा का अधिकार’ के लिये उन्होंने बहुत प्रयास किए। प्रथमतः अपनी पत्नी सावित्रीबाई को उन्होंने शिक्षित किया। 1848 में भिडे वाडा पुणे में पाठशाला की स्थापना करके सावित्रीबाई को पाठशाला की जिम्मेदारी सौंपी। वह पाठशाला केवल स्त्री शिक्षा के प्रति समर्पित थी। स्त्री स्वयं पहले शिक्षित होनी चाहिए, तभी समाज शिक्षित हो सकता है, यही उनकी धारणा थी। अस्पृश्यता निवारण, स्त्री शिक्षा,  सभी को समान न्याय, त्रिभाषा सूत्री आदि के लिये उन्होंने बहुत प्रयास किया। उन्होंने अपने विचार सभी समाज तक पहुंचाने के लिये लेखन भी किया। एक विचारवंत, समाज उद्धारक, प्रबोधनकार, शिक्षा महर्षि आदि उपाधि के साथ ज्योतिबा जी जाने जाते हैं।

अभी जो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई हैं, उसमें ज्योतिबा के मूल विचार प्रकट होते हुए नजर आते हैं। सभी को शिक्षा लेने का अधिकार, प्राथमिक शिक्षा सभी को अनिवार्य तथा निःशुल्क होनी चाहिए, यह विचारधारा ज्योतिबा जी ने उस समय में रखी थी। उसका पूर्ण रूप हमें अभी नजर आ रहा है। इस शैक्षणिक क्रांति का श्रेय, प्रणेता के रूप में ज्योतिबा फुले के विचार तथा कार्य को जाता है। स्वयं डॉ० बाबासाहेब आंबेडकर ज्योतिबा फुले को गुरू मानते थे। ज्योतिबा ने थॉमस पेन लिखित ‘राईट्स ऑफ मैन’ पुस्तक पढ़ी थी। उसका प्रभाव उनके विचारों पर भी पड़ा था। समाज में जो जाति भेद हैं, वह ईश्वर निर्मित नहीं, बल्कि मानव निर्मित हैं, यह प्रेरणा उस पुस्तक से उन्हें मिली थी। तब से ये उनकी धारणा पक्की हो गयी थी।

बहुजन समाज का अज्ञान, दलित गरीब लोगों पर होने वाले अत्याचार, जाचक रूढी परंपरा, सती की अनिष्ट प्रथा, किसानों पर होने वाले अन्याय, भ्रूण हत्या, गर्भवती विधवा महिला के साथ दुर्व्यवहार, सामाजिक विषमता, जातीय ऊँच-नीच भेदभाव आदि घटनाएँ सदा सर्वदा होती रहती थी। उसके बारे में लोगों के मन में अलग ही धारणा थी, जोकि गलत थी। यह अज्ञान मिटाना जरुरी था। उसी के लिये ज्ञान, शिक्षा सभी लोगों को सम समान मिलने की जरुरत उन्हें अनुभव होती थी। इसलिये शिक्षा प्रणाली में आमुलाग्र परिवर्तन की नीति पर ज्योतिबा जी बहुत ही अधिक कार्य करते रहे।

उस जमाने में जो शिक्षा की नींव रखी गयी थी, उस भवन के शिखर पर अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के रूप में झंडा फहरता हुआ नजर आ रहा है। उसका प्रसार प्रचार करना हमारा परम कर्तव्य हैं। यही हमारी सामाजिक तथा शैक्षिक क्रांति के शिल्पकार, विशाल दृष्टि वाले, ज्योतिबा फुले जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक विद्या भारती पश्चिम महाराष्ट्र प्रान्त की प्रचार टोली के सदस्य है।)

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