लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का शिक्षा दर्शन

– डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता

लोकमान्य

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और में इसे लेकर रहूँगा” की उद्‌घोषणा करने वाले तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में अग्रणी हैं। स्वतंत्रता, स्वराज्य और स्वदेशी को परिवर्तन का केंद्र बिन्दु मानने वाले तिलक के विचारों में इतनी ज्वाला थी कि विदेशी लेखकों ने तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ कहा। प्रबुद्ध चिंतक और विचारक तिलक इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते थे कि जब तक भारत स्वतंत्र नहीं होगा, स्वदेशी नहीं अपनाएगा, भारत और भारतीयों का उत्थान संभव नहीं है। 1856 में महाराष्ट्र के रत्नागिरि स्थान पर जन्मे बाल गंगाधर तिलक को 1897 में अंग्रेजों द्वारा राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा गया। राष्ट्रभक्ति के कारण तिलक के जेल जाने से सामान्य भारतीयों में तिलक की प्रतिष्ठा स्थापित हुई और इन्हें लोकमान्य कहा जाने लगा।

भारत की स्वतंत्रता को सर्वोच्च लक्ष्य मानने वाले तिलक भारतीय क्रांतिकारियों के लिए प्रमुख आदर्श थे। महात्मा गाँधी ने तिलक को ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ तथा पंडित नेहरू ने ‘भारतीय क्रांति के जनक’ का नाम दिया। बाल गंगाधर तिलक उन विचारकों और चिंतकों में से थे जो अत्यंत दूरदृ‌ष्टि रखते थे तथा समग्रता और व्यापकता के साथ देश के भविष्य की कल्पना कर सकते थे। आदर्श भारत की उनकी संकल्पना में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान था। शिक्षा के प्रति आग्रही तिलक तत्कालीन भारत में प्रचलित अंग्रेजी शिक्षा से असंतुष्ट थे। उनके शिक्षा संबंधी विचार अध्ययन, शोध, विश्लेषण तथा जानने की दृष्टि से भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

शिक्षा का कार्य तथा उद्देश्य केवल साक्षरता प्रदान करना नहीं – बाल गंगाधर तिलक के अनुसार शिक्षा का कार्य तथा उद्देश्य केवल साक्षरता प्रदान करना नहीं है बल्कि हमारे प्राचीन ज्ञान व सांस्कृतिक मूल्यों को समाज की नवीनतम और युवा पीढ़ी के विचारों और जीवन शैली में समाहित कर ऐसा परिवर्तन लाना है जिससे हमारे समाज और राष्ट्र का जागरण और पुनर्निर्माण संभव हो सके। शिक्षा एक और मनुष्य के भौतिक जीवन यापन में सहायक है तो दूसरी ओर राष्ट्र की प्रतिष्ठा और संपन्नता में वृद्धि का कारक भी है।

शिक्षा केवल सूचनाओं का संग्रह मात्र नहीं अपितु ज्ञान प्राप्ति का मार्ग तथा माध्यम है- तिलक का मानना था कि केवल तथ्यों और जानकारियों का संग्रह कर लेना तथा पढ़ना-लिखना बोलना आदि सीख लेना ही शिक्षा नहीं है। शिक्षा अनुभवों का पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को स्थानान्तरण है जो विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार करती है। शिक्षा में जीवन परिवर्तित करने की क्षमता होती है जो शिक्षार्थी की कार्य करने की, समाज को समझने की, राष्ट्र की चिंताओं  और आवश्यकताओं को समझ कर उस अनुरूप कार्य करने के सामर्थ्य को विकसित करती है। शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के उस  मार्ग का नाम है जो हमें भारतीय दृष्टि से जीवन के शाश्वत लक्ष्य ‘मुक्ति’ की ओर ले जाता है।

मातृभाषा में शिक्षा पर बल लोकमान्य तिलक का मानना था कि भारतीयों के लिए विकसित शिक्षा प्रणाली में जो अंग्रेजी का प्रभाव और बाध्यता है वह  सम्भवत: विश्व में किसी भी देश की शिक्षा प्रणाली में नहीं है। पराजित मानसिकता के कारण अंग्रेजी जानने वाले लोगों को ही शिक्षित मान लेना, तिलक की दृष्टि में अस्वीकार्य था। वे मातृभाषा में शिक्षा के पक्षधर थे। उनका मानना था कि जो शिक्षा मातृभाषा में विद्यार्थी आठ-दस साल में पा सकते हैं, विदेशी भाषा में उसी शिक्षा को प्राप्त करने में बीस-पच्चीस वर्ष लग जाते हैं। अत: विद्यार्थी और शिक्षा प्रणाली के लिए मातृभाषा में शिक्षण ही लाभकारी है, तिलक की ऐसी मान्यता थी। यहाँ यह ध्यान करना आवश्यक है कि वे एक भाषा के रूप में अंग्रेजी के विरुद्ध नहीं थे, लेकिन अंग्रेजी को बाध्य बनाने और उसके कारण भारतीयों में उपजी हीन भावना के विरुद्ध थे।

व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा को पाठ्यक्रम में उचित स्थान – महात्मा गांधी की भाँति तिलक भी इस बात को समझते थे कि तत्कालीन मैकालेवादी शिक्षा केवल ‘काले अंग्रेजों’ का निर्माण करने वाली शिक्षा है और जिसका भारतीयों को रोजगार देने और आत्मनिर्भर बनाने से कोई सम्बन्ध नहीं है। भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए तिलक का मत था कि शिक्षा ऐसी हो जिसमें स्वरोजगार तथा आत्मनिर्भरता पर विशेष बल दिया जाए। इसलिए गांधी की भाँति तिलक ने भी इस बात पर बल दिया कि तकनीकी शिक्षा व अन्य स्थानीय व्यवसायों की शिक्षा को भी देश की शिक्षा प्रणाली का अनिवार्य अंग बनाना चाहिए।

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शिक्षा का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य चरित्र निर्माण – विद्यार्थी का चरित्र निर्माण, तिलक की दृष्टि में शिक्षा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण लक्ष्य था। उनका मानना था कि विद्यार्थी के चरित्र निर्माण से ही श्रेष्ठ नागरिक और श्रेष्ठ नागरिकों के समुच्चय से ही श्रेष्ठ समाज व राष्ट्र का निर्माण होगा। वे इस बात से भली-भांति परिचित थे कि अगर भारत को पुन: सोने की चिड़िया बनाना है तो युवा वर्ग को न केवल आत्मनिर्भर होना होगा बल्कि उनका चरित्र भी समोन्नत होना चाहिए। विद्यार्थी ही देश का भविष्य हैं – इस उक्ति को स्वीकारते हुए उन्होंने शिक्षा के माध्यम से युवा वर्ग, विशेषकर विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।

भारतीय संस्कृति, मूल्यों तथा महापुरुषों को पाठ्यक्रम में स्थान – तिलक तथा अन्य क्रांतिकारियों ने भारतीय संस्कृति, भारतीय वेद, रामायण, गीता आदि ग्रंथों, भारतीय मूल्यों और शिवाजी, महाराणा प्रताप आदि महापुरुषों से प्रेरणा प्राप्त की। तिलक इस बात पर बहुत बल देते थे कि हमारे ग्रन्थ, सांस्कृतिक मूल्य और महापुरूष, हमारी शिक्षा पद्धति के अनिवार्य अंग होने चाहिए। इससे न केवल विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलेगी बल्कि उनके व्यक्तित्व में से निर्बलताओं का उन्मूलन होगा और सबलताओं और सद्गुणों का समावेश होगा।

जनजागरण और राष्ट्रीयता के विकास के लिए राष्ट्रभाषा हिंदी हो – राष्ट्रभाषा के माध्यम से भारतीयों में राष्ट्रीयता का भाव जागरण सम्भव है। तिलक की दृष्टि में भाषा-भेद आधारित विभाजन को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए एक राष्ट्रभाषा की स्वीकार्यता आवश्यकता थी। उनकी दृष्टि में हिन्दी भाषा के अलावा अन्य कोई भाषा नहीं थी जो हिन्दी के समान भौगोलिक रूप से विस्तृत और जन प्रचलित हो। नागरी प्रचारिणी सभा की बैठक में उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में तथा देवनागरी लिपि को भारत की सभी आम भाषाओं  की लिपि होना चाहिए। तिलक ने राष्ट्रभाषा हिंदी के महत्व को समझा और भविष्य में भाषा को लेकर आने वाली समस्याओं को समझते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी का समर्थन दिया।

भारत की शिक्षा की प्रकृति भारतीय प्रकृति हो – भारत में प्रचलित तत्कालीन मैकाले शिक्षा प्रणाली से तिलक अत्यंत रुष्ट थे। उन्होंने इसलिए भारत में ‘भारतीय’ अथवा ‘राष्ट्रीय’ शिक्षा का समर्थन किया। उनका मानना था कि प्रत्येक देश की शिक्षा का स्वरूप उस देश की समाज और संस्कृति के अनुरूप तय किया जीना चाहिए। इसलिए तिलक ने आगरकर तथा चिपलूणकर के साथ मिलकर भारतीय शिक्षा की रूपरेखा बनाई। तिलक की प्रेरणा से महाराष्ट्र व दक्षिण भारत में भारतीय दृष्टि के कई शिक्षा संस्थान खोले गए।

इस प्रकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के शिक्षा संबंधी विचार प्राचीन भारतीय वैदिक गुरुकुल परंपरा के वाहक प्रतीत होते हैं। जिस प्रकार से गुरुकुल परंपरा से परिष्कृत, प्रतिष्ठित और विकसित व्यक्तित्व, समाज और राष्ट्र जागरण के लिए निकलते थे, लगभग उसी प्रकार के स्वस्थ, सुदृढ़, चरित्रवान और बुद्धिमान विद्यार्थियों का निर्माण तिलक के शिक्षा सम्बन्धी विचारों का सार-तत्त्व है। तिलक ऐसे विद्यार्थी वर्ग का निर्माण करना चाहते थे जो शरीर, मन, बुद्धि, संस्कार और आत्मा की दृष्टि से स्वदेशी, स्वतंत्र, सद्‌भावी, सच्चरित्र और श्रेष्ठ हो तथा राष्ट्र की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के लिए कार्य कर सके। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने चरित्र-निर्माण, मातृभाषा में शिक्षा, स्वदेशी प्रकृति की निजी संस्थाओं के निर्माण, जन शिक्षा, शिक्षा में महापुरूषों व प्राचीन ग्रंथों, भारतीय संस्कृति और मूल्यों के समावेश पर बल दिया।

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(लेखक विद्या भारती विद्वत परिषद के अखिल भारतीय संयोजक है एवं चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी-हरियाणा में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)

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