शिशु शिक्षा – 12- तीन से पांच वर्ष के शिशु का पालन पोषण (संगोपन)

 – नम्रता दत्त

शिशु अवस्था (0 से 05 वर्ष) स्वाभाविक विकास की अवस्था है। यह विकास शिशु अपनी अन्तःप्रेरणा से ही करता है। इस अवस्था में माता पिता एवं परिवारजन उसको केवल उचित वातावरण देने का ही कार्य कर सकते हैं। परन्तु होता इसके विपरीत ही है। सामान्यतः माता पिता अज्ञानता के कारण उसकी अन्तःप्रेरणा को अनदेखा करके उसके विकास में सहायक नहीं अपितु बाधक ही बनते हैं।

माता पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि शिशु अपनी क्षमता के अनुरूप सही समय पर ही कार्य करता है जैसे – यदि दो मास के शिशु को आप कुछ ठोस आहार खिलाने की कोशिश करते हैं तो वह उसे तुरन्त मुंह से बाहर निकाल देगा क्योंकि वह जानता है कि वह उसे नहीं खा सकता। वह दांत निकलने पर ही उसे खाएगा। दो दिन के बच्चे को कोई नहीं सीखाता कि उसे मां का दूध कैसे पकङना है अथवा चूसना/पीना है, यह कार्य वह अन्तःप्रेरणा से ही करता है। वह कार्य को अपनी क्षमता विकसित होने पर क्रमशः करता है जैसे – पहले करवट लेना…..फिर बैठना….सहारे से खङा होना…..चलना आदि। यह कार्य वह अन्तःप्रेरणा से करता है। माता पिता चाह कर भी ये सब स्वयं सीखा नहीं सकते। वे केवल उसकी क्षमता विकसित होने पर उसे उचित वातावरण देकर उसके अभ्यास/विकास में सहयोगी बन सकते हैं।

संजय और मीना बहुत परेशान हैं क्योंकि उनका तीन वर्ष का बेटा मयंक जब नहाने जाता है तो बाथरूम से बाहर ही आना नहीं चाहता। धूप में भी पार्क जाने की जिद करता है। पार्क में जाते ही मिट्टी में खेलने लग जाता है। बारिश में नहाना तो उसे बहुत ही अच्छा लगता है। वायुयान की आवाज सुनते ही बालकॉनी में जाकर खङा हो जाता है। आसमान में उङते पक्षी देखना उसे बहुत पसन्द है। और प्रश्न तो इतने पूछता है कि बस…। कहानी सुने बिना तो सोता ही नहीं। संजय और मीना उसे आफत की पुङिया कहते हैं।

शिशु का स्वाभाविक विकास उसके स्वाभाविक गुणों के कारण ही होता है। पंचमहाभूत तत्वों से बना यह शरीर जितना उनके सानिध्य में रहेगा उतना ही फले फूलेगा। इसलिए उसकी अन्तःप्रेरणा उसे उनके बीच में जाने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु माता पिता इस बात से अनजान हैं। वह उसे वहां जाने नहीं देना चाहते। उसका जिज्ञासा का स्वभाव उसे हर बात में प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है। परन्तु माता पिता के पास उसके प्रश्नों का जवाब देने का ज्ञान अथवा समय ही नहीं है। वह बङों की भांति ही उनका अनुकरण करके सब कार्य स्वयं करना चाहता है, परन्तु माता पिता अपने भय के कारण उसे करने ही नहीं देते। यह गिर जाएगा, यह टूट जाएगा, तुम्हें चोट लग जाएगी, तुम खराब कर दोगे, तुम देर लगाओगे, तुम अभी नहीं कर सकते, तुम अभी छोटे हो……….आदि। ऐसा करते हुए वे अनजाने में उसकी अन्तःप्रेरणा को नकार देते हैं और उसको अनुभव लेने से वंचित कर देते हैं।

यह समय उसकी कर्मेन्द्रियों के विकास का समय है उसके दौङने, कूदने, उछलने, गाने, शोर मचाने, खेलने आदि के लिए उसे अनुकूल वातावरण देना चाहिए न कि शैतान और शरारती कह कर उसे हर समय डांटना चाहिए। यह अवस्था तो लालयेत् पंचवर्षाणि की है। इस अवस्था में किसी भी प्रकार का भय उसके विकास अथवा संस्कार निर्माण में बाधा ही बनेगा।

परिवार के वातारवण से ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा वह जो अनुभव प्राप्त करता उसे ही वह अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। अतः परिवार का वातावरण संस्कारक्षम होना चाहिए। श्रेष्ठ संस्कार देने के लिए अपनी संस्कृति और अपने जीवन दर्शन का ज्ञान और उसके अनुरूप व्यवहार करना अनिवार्य है। शिशु भाषण से नहीं बल्कि व्यवहार से सरलता से सीखता है।

यह अवस्था ही सीखने की अवस्था है। शिशु कोई व्यक्तिगत सम्पति नहीं अपितु राष्ट्र की धरोहर है। अतः अपने राष्ट्र की धरोहर को उसके लिए तैयार करना परिवार का दायित्व है। पाश्चात्य संस्कृति को आधुनिकता का नाम देकर शिशु को दो नावों पर सवार करना ठीक नहीं। अन्य संस्कृतियों का सम्मान करना परन्तु अपनी परम्पराओं को स्वयं भी श्रद्धा और विवेक से धारण करना और पारिवारिक वातावरण से शिशु में भी उसके प्रति गौरव का भाव जगाना, परिवार का कार्य है। यह भाव भोजन के प्रति हो, वेशभूषा के प्रति हो या उसके महापुरुषों अथवा परम्पराओं के प्रति। शिशु कच्ची मिट्टी है इस समय उसे जो संस्कार दिए जाएंगे वही उसके आजीवन के संस्कार बन जाएंगे।

पवित्र धन और पवित्र मन से घर में बना शुद्ध सात्विक भोजन उसके तन और मन को पवित्र भावों से भर देगा। प्रादेशिक वेशभूषा उसके सौदंर्य को तो बढाएगी ही साथ ही अपने प्रदेश के प्रति गौरव को भी बढाएगी। वह आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति को नहीं जानता। उसे तो परिवार जिस वातावरण में रखेगा उस पर वही संस्कार पङ जाएंगे।

सृष्टि के जीवों के प्रति दया, प्रेम, करूणा, परोपकार उनका संरक्षण आदि करने के श्रेष्ठ संस्कार इसी अवस्था में दिए जा सकते हैं। पौधों को पानी देना, चिङियों/चींटियों को दाना देना, गाय को रोटी देना, दोस्तों से अपने खिलौने बांट कर खेलना, भोजन बांट कर खाना, अपनी बारी का इंतजार करना, अपनी और आस पास की सफाई का ध्यान रखना, अपने सामान को यथा स्थान रखना आदि बातें उसे परिवार के वातावरण से ही सीखने को मिलती हैं। शिशु को सीखाने के लिए स्वयं परिवार को भी यह सब संयमित व्यवहार सीखना होगा और अपनी दिनचर्या एवं आहार विहार को बदलना होगा।

तीन वर्ष की आयु में वह परिवार से निकलकर विद्यालय (जिसे समाज का छोटा रूप भी कहा जाता है) भी जाने लगता है। ऐसे में विद्यालय को भी अपनी भूमिका का ज्ञान होना चाहिए। इस आयु में उसे किसी औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती बल्कि उसकी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को विकसित करते हुए उसके मन को श्रेष्ठ भावनाओं के द्वारा आत्मा को संस्कारित करने की आवश्यकता है। बिना कुछ सीखाए उसे बहुत कुछ सीखाने की कला (खेल खेल में शिक्षा) माता पिता एवं विद्यालय की दीदी को आनी चाहिए। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की यही नींव है क्योंकि इस अवस्था में चित की सक्रियता रहती है।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

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