शिशु शिक्षा – 10 – जन्म से एक वर्ष के शिशु का पालन पोषण (संगोपन)

 – नम्रता दत्त

शिशु के पालन पोषण की प्रक्रिया भी शिशु शिक्षा के लिए एक अध्याय का कार्य करती है। अतः इस सोपान में विशेषतः ऐसी ही बातों पर चिन्तन एवं विचार करेंगे। नौ माह गर्भ के अंधकार के पश्चात् शिशु अब खुले प्रकाश में आ गया है। यह सारा वातावरण उसके लिए नया है जिसमें उसे संयोजन करना है, परन्तु वह स्वयं तो कुछ भी नहीं कर सकता, वह तो दूसरों पर आश्रित है। वह अपनी परेशानी को मात्र रो कर ही बता सकता है। अतः उसके रोने की भाषा को समझने का ज्ञान माता एवं परिवार जन को लेना होगा।

शिशु का जन्म होना प्राकृतिक है। अतः उसे प्राकृतिक रूप से ही होने देना चाहिए। आजकल प्रसव की पीङा (लेबर पेन) से घबराकर सर्जरी से बच्चा पैदा करना अधिक सहज लगता है। प्रसव की पीङा में माता और शिशु दोनों ही परस्पर एक दूसरे की पीङा को महसूस करते हैं जिसके कारण उनका परस्पर सम्बन्ध (बोन्डिग) मजबूत बनता है। यह सम्बन्ध केवल माता के साथ मातृभूमि से भी है।

जन्म के पश्चात् शिशु के रोने से ही यह पता चल पाता है कि शिशु जीवित है अर्थात् उसमें प्राणों का संचार हो रहा है। सामान्यतः इस समय शिशु श्रवर्णेन्द्रिय अथवा स्पर्शन्द्रिय के माध्यम से अनुभूति कर पाता है। इसलिए जन्म के पश्चात् उसे मधुर ध्वनि/स्वर ही सुनाया जाए और प्रेमपूर्ण स्पर्श किया जाए क्योंकि यह उसकी इस नए वातावरण की प्रथम अनुभूति होगी। कहते है कि First impression is the last impression.

सामान्यतः जन्म के पश्चात् 40 दिन माता और शिशु स्वास्थ्य लाभ लेते हैं। इस समय में उनके रहने का स्थान पर्याप्त हवा और रोशनी वाला, सुन्दर, साफ, सुसज्जित एवं शोरगुल से अलग होना चाहिए। इस अवधि के मध्य शिशु का नामकरण संस्कार और निष्क्रमण संस्कार किया जाता है। शिशु का नाम प्रकृति, गुण अथवा देवी देवताओं के नाम पर रखना चाहिए। नाम का भी जीवन पर प्रभाव होता है। अतः सार्थक नाम रखें। बंटी, बबली जैसे नाम न रखें। निष्क्रमण संस्कार में जब पहली बार शिशु को घर से बाहर ले जाएं तो सूर्य दर्शन कराएं और किसी धार्मिक स्थान पर लेकर जाएं।

यूं तो शिशु (पंचमहाभूत से निर्मित) के विकास में प्रकृति कहें या परमात्मा, उसके सबसे बङे साथी हैं इसी कारण शारीरिक विकास के साथ साथ वह अपना विकास अन्तःप्रेरणा एवं सक्रियता से करता जाता है। जन्म से एक वर्ष की आयु में उसकी वृद्वि तेजी से होती है जैसे – करवट लेना, बैठना, घुटने चलना, दांत निकालना आदि आदि….। इन क्रियाओं में परिवारजन चाह कर भी सहयोग नहीं कर सकते। उसके लिए यह साधना किसी व्यस्क वैज्ञानिक की साधना से कम नहीं है। ऐसी स्थिति में परिवार का दायित्व केवल उसे प्रेम, स्नेह, सहजता, स्वतंत्रता, स्वच्छता एवं सुरक्षा देने का है। परिवार का यह प्रेमपूर्ण वातावरण ही भविष्य में उसे इन सब भावनाओं को दूसरों को देना सीखाने की भूमिका निभाएगा क्योंकि जैसा पाएगा वैसा ही देगा। इस वातावरण के कारण वह स्वयं को सुरक्षित अनुभव करेगा और उसका विकास शीघ्रता से होगा। स्वस्थ तन के साथ स्वस्थ मन भी विकसित होगा।

शैशवास्था में शिशु की अपनी स्वाभाविक विशेषताएं हैं जो प्रकृति ने उसके श्रेष्ठ विकास हेतु प्रदान की हैं। अतः माता पिता को उनके अनुसार अपनी दिनचर्या को बनाना चाहिए। जैसे ब्रह्ममुहूर्त में उठना एवं रात्रि में जल्दी सोना शिशु का स्वाभाविक गुण है। परन्तु सामान्यतः देर से उठने वाले माता पिता शिशु को भी जबरदस्ती थपकी देकर सुला देते हैं। अतः शिशु को श्रेष्ठ आदतें डालने के लिए माता पिता को भी अपनी दिनचर्या ठीक बनानी चाहिए। उठने के पश्चात् शौच आदि कराने की सही आदत इसी समय में डाली जा सकती है।

जन्म से दो-तीन मास तक शिशु के सोने का समय अधिक होता है। वह केवल भूख लगने अथवा गीला होने पर ही जागता है। यह भरपूर नींद ही उसके विकास में सहयोगी होती है। अतः उसकी मालिश कर, स्नान कराकर स्वच्छ, ढीले और सूती वस्त्र पहनाकर, साफ एवं मुलायम बिस्तर पर उसे लोरी सुनाकर सुलाना चाहिए। एक वर्ष तक पालने में सुलाएं तो अच्छा होगा। भरपूर नींद शिशु को स्वस्थ रखती है। यदि शिशु हंसता हुआ उठता है तो मान लीजिए कि वह स्वस्थ है और उसने सुखद नींद का आनन्द लिया है।

जन्म से एक वर्ष की अवस्था को क्षीरादावस्था कहा जाता है। ‘क्षीर’ का अर्थ है ‘दूध’। सामान्यतः शिशु छह मास तक माता का दूध ही पीता है। अतः माता का खान पान स्तनपान को भी प्रभावित करता है। शिशु के स्वास्थ्य के लिए माता को वायुकारक एवं तेज मसालों के भोजन का परहेज करना चाहिए तथा शुद्व सात्विक भोजन का सेवन करना चाहिए। सात्विक भोजन से शिशु सतोगुणी अर्थात् संस्कारी बनता है। छह मास में शिशु का अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है। इस संस्कार में शिशु को षडरस (नमकीन, मीठा, तीखा, कङवा, खट्टा, और कसैला) चटाया जाता है। इस संस्कार का उद्देश्य शिशु की स्वादेन्द्रिय को सभी रसों का परिचय करवाने से है। छह मास के पश्चात् शिशु को दूध जैसे पतले अन्न (सूजी की खीर, दाल/चावल का पानी, पतली खीर/खिचङी), फल एवं सब्जी का रस/सूप दिया जा सकता है। बहुत अधिक ठंडे पदार्थों को खिलाने पिलाने से बचना चाहिए। घर का बना सात्विक आहार ही अल्पमात्रा में शिशु को देना चाहिए। स्तनपान कराते समय तथा भोजन पकाते एवं शिशु को खिलाते समय माता का मन शांत एवं श्रेष्ठ भावनाओं से भरा होना चाहिए। माता जीजाबाई ने बालक शिवाजी को देशप्रेम की घुट्टी गर्भावस्था और अपने दूध में ही पिलाई थी। माता को अपना दूध भी स्वच्छता से पिलाना चाहिए।

शिशु को किसी प्रकार का रोग होने पर उसका घरेलू उपचार ही करना चाहिए। जन्म के पश्चात् शिशु का जातकर्म संस्कार किया जाता है। इस संस्कार में शिशु को माता के दुग्धपान से भी पूर्व देसी घी, शहद और सुवर्ण भस्म को स्वर्ण श्लाका से चटाया जाता है। इसका हेतु शिशु के स्वर्णिम भविष्य से तो है ही साथ ही यह शिशु के पेट में जमी हुई गर्भ की गंदगी को भी साफ करता है। इससे शिशु को दस्त होता है और उसका पेट साफ हो जाता है। इसी प्रकार दांत निकालते समय भी शिशु को दस्त लग जाते हैं। शिशु का आयुर्वेदिक उपचार ही करना चाहिए। एलोपैथिक दवाएं शिशु की आंतरिक कोमल शारीरिक संरचना को नुकसान पहुंचाती हैं।

शैशवास्था (0 से 05 वर्ष) का यह तीसरा चरण है। अतः पूर्व गर्भावस्था एवं गर्भावस्था की भांति इस चरण में भी सजग रहना अनिवार्य है। पांच वर्ष तक की यह कङी टूटनी नहीं चाहिए क्योंकि इसी अवस्था में 89 प्रतिशत संस्कारिक विकास (चरित्र निर्माण) होता है।

अगले सोपान में एक से तीन वर्ष के शिशु के संगोपन पर विचार करेंगे।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

और पढ़ें : शिशु शिक्षा – 9 – गर्भावस्था-2

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