सा विद्या या विमुक्तये
– नम्रता दत्त
गत सोपान में हमने लालयेत् पंचवर्षाणि पर चिन्तन किया था। उस सोपान में हमने विचार किया कि शिशु का पांच वर्ष तक लालन पालन क्यों करना चाहिए। इस सोपान में हम विचार करेंगे कि लालन पालन कैसे करना चाहिए अर्थात् परिवार को उसके संगोपन में कैसी व्यवस्था/ वातावरण देना चाहिए।
जन्म के समय से शिशु परावलम्बी अर्थात् दूसरों पर आश्रित रहता है। स्वावलम्बी होने में उसे पांच वर्ष तक का समय लगता है। इसलिए शून्य से पांच वर्ष तक का यह एक कालखण्ड है जिसमें शिशु माता-पिता एवं परिवारजन के आधीन रहता है। इस कालखण्ड में उसकी वृद्धि एवं विकास के लिए शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने का दायित्व परिवार का ही है। अतः वह भविष्य में एक श्रेष्ठ नागरिक बने इसके लिए यह अवस्था नींव का काम करती है।
शारीरिक पूर्ति के लिए मुख्यतः भोजन, निद्रा एवं व्यायाम की आवश्यकता होती है। संक्षेप में इस विषय को देखते हैं –
शिशु की स्वस्थ एवं संस्कारित मानसिकता के लिए परिवारिक वातावरण में निम्नलिखित व्यवस्थाओं का होना अपेक्षित है –
अतः बालक की प्रगति के लिए उसे सुरक्षा के घेरे में रखते हुए स्वतंत्रता देना परिवार का महत्वपूर्ण दायित्व है।
ध्यान रखें कि हमें शिशु के मनोविज्ञान के अनुरूप उसकी गति से चलना है न कि अपनी गति से शिशु को चलाना है।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)
और पढ़ें : शिशु शिक्षा – 4 (लालयेत् पंचवर्षाणि)
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