मातृभाषा के बिना मौलिक विचारों का सृजन सम्भव नहीं


– देशराज शर्मा

जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते है। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषायी पहचान है तथा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना से उत्प्रेरित करती है । सच तो यह है कि मातृभाषा आत्मा की आवाज है इसलिए गाँधी जी देश की एकता के लिए यह आवश्यक मानते थे कि अंग्रेजी का प्रभुत्व शीघ्र समाप्त होना चाहिए। भाषा अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है, अत: किसी विदेशी भाषा को जानने का विरोध नहीं होना चाहिए लेकिन स्वभाषा पर स्वाभिमान रखना भी जरूरी है।

मातृभाषा व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त साधन है। बच्चे का मानसिक विकास एवं व्यक्तित्व निर्माण उन विचारों पर निर्भर करता है जो उसे परिवार एवं शिक्षा संस्थान से प्राप्त हुए है। हम जानते है कि मातृभाषा वह प्रथम मूल आधार है जिसमें बच्चे दुनिया में सबसे पहले अंतर्क्रिया की शुरुआत करते है। जीवन के प्रारंभिक वर्षो में संसार की सभी वस्तुओं, क्रियाओं व घटनाओं को समझने का आधार मातृभाषा ही है यानि वह भाषा जो उसके परिवार में बोली जाती है जिसे ‘माँ बोली’ भी कहते हैं ।

बच्चा जब विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो उसे उसी भाषा में शिक्षा देनी चाहिए जो उसके परिवार की भाषा है यदि उसे परिवार में बोलने वाली भाषा में शिक्षा न दी जाए तो बच्चा भ्रमित होने लगता है । बच्चे को परिवार व विद्यालय की भाषा में यदि अंतर दिखता है तो वह अंतर अवधारणाओं को समझने में सबसे बड़ा अवरोधक बन जाता है।

भारत के सविधान में शिक्षा संघ व राज्य सूची का विषय है। हमारे सविधान के अनुच्छेद 345 में प्रावधान है कि देश में सभी शासकीय कार्यो के लिए हिंदी या राज्यों की भाषाओं का प्रयोग होना चाहिए। संविधान की आठवी सूची में अंग्रेजी को कहीं स्थान नहीं है, फिर भी कार्यालयों में काम-काज अंग्रेजी में प्रमुखता से होता है तथा कई विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम भी अंग्रेजी है। अंग्रेजी की चाहत में कहीं हम अपनी भाषाओं से अनभिज्ञ रहते हुए अपनी बहुमूल्य संपदा को नष्ट तो नहीं कर रहे हैं?

सविधान अनुच्छेद 246 (7वीं अनुसूची तथा समवर्ती सूची 3 के क्रमांक 25 एवं 26) के अनुसार केंद्र व राज्य सरकारों का दायित्व है कि सम्पूर्ण शिक्षा के उद्देश्यों, मानकों के बारे में स्पष्ट नीति बनाई जाये लेकिन आज़ादी के 72 वर्षों के उपरान्त भी ऐसा दिखाई नहीं देता है । शायद एक यह भी बड़ा कारण हो कि विश्वविद्यालयों में पढाई करने वाले अधिकतर युवकों में रचनात्मक तथा सृजनात्मक विचारों की कमी दिखाई देती है।

हमारे संविधान निर्मातओं की आकांक्षा थी कि आज़ादी के बाद देश का शासन हमारी अपनी भाषाओ में चले और समाज में एक सामंजस्य स्थापित हो और सभी की समान प्रगति हो। संविधान की उद्देश्यिका एवं अनुच्छेद 14, 21क, 45, 344, 351 विदेशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने की ना तो अनुमति देता है ना ही अनुसमर्थन करता है।

मातृभाषा सीखने, समझने एवं ज्ञान की प्राप्ति के लिए सरल और सहज भाषा है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी का मानना था कि मैं वैज्ञानिक इसलिए बन पाया क्योंकि मैंने प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की थी तथा गणित व विज्ञान की शिक्षा भी मातृभाषा में ही ली थी। महात्मा गाँधी जी भी विदेशी भाषा में शिक्षा के माध्यम को बच्चो की तंत्रिकाओं पर बोझ डालने का कार्य मानते थे तथा कहा करते थे कि मातृभाषा यदि शिक्षा का माध्यम नहीं होगा तो बच्चे रटने के लिए मजबूर हो जाएँगे जिससे उनमें सृजनात्मकता समाप्त हो जाएगी।

 विश्व के संपन्न देश अमेरिका, रूस, जापान, कोरिया, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन तथा इजराइल में शिक्षा एवं शासन की भाषा वहां की मातृभाषा ही है। इजराइल के 16 विद्वानों ने तो नोबेल पुरस्कार अपनी मातृभाषा हिब्रू में ही प्राप्त किये हैं। माइक्रोसॉफ्ट के सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.सक्रांत सानु ने अपनी  पुस्तक “अंग्रेजी माध्यम का भ्रमजाल” में दिए तथ्यों के आधार पर बताया है कि विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में प्रथम पंक्ति के बीस देश सारा कार्य अपनी मातृभाषा में ही करते हैं। इनमें से चार ऐसे देश है जिनकी अपनी मातृभाषा अंग्रेजी ही है।

बच्चों के मानसिक विकास की लिए मातृभाषा उतनी ही आवशक है जितना शारीरिक विकास के लिए माँ का दूध आवश्यक माना जाता है । हमें ज्ञात है कि फ्रांसीसी, जापानी, जर्मनी बोलने वालों की संख्या 2 प्रतिशत से भी कम होने पर दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित माने जाते है। इसलिए मातृभाषा की अपेक्षा विदेशी भाषा की बोल-चाल से भारतियों को सभ्य तथा प्रतिष्ठित मानना भी एक भ्रम जाल ही है।

भाषा संस्कृति व संस्कारों की संवाहिका होती है, भाषा बदलने से जीवन मूल्य भी बदल जाते हैं तथा संस्कृति और संस्कारों का पतन हो जाता है। भारत में यदि हमें स्वाभिमान, स्वदेश एकता, अखंडता, सांस्कृतिक धरोहर एवं छुपे ज्ञान को समझकर देश की प्रगति अपनी प्रकृति के अनुसार करनी चाहते हैं तो मातृभाषा को अधिमान देना ही होगा। सरकार तथा समाज को इस सत्य को समझने के लिए कार्य करने की आवश्यकता है।

मातृभाषा स्वाभिमान के लिए हम इसकी शुरुआत भारत को इंडिया नहीं भारत ही कहे और लिखे, अपने हस्ताक्षर अपनी मातृभाषा में करे, नाम पटिका तथा निमंत्रण पत्र स्वभाषा में लिखने से कर सकते हैं। इस छोटी-सी  शुरुआत से हम देश में भावनात्मक तथा सांस्कृतिक एकता स्थापित कर सकेंगे। भारतीय संविधान में उल्लेखित सभी 22 भाषाएँ हमारी राष्ट्रीय भाषाएँ हैं। राष्ट्र को प्रतीक्षा है कि इन भाषाओं के सम्मान तथा प्रतिभाओं को उभारने के लिए भारत सरकार नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम देकर स्थापित कर पाएगी?

मातृभाषा के महत्व को समझते हुए युनेस्को ने 17 नवम्बर 1999 को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की स्वीकृति दी थी। विश्व भर में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रतिवर्ष 21 फरवरी को मनाया जाता है।

(लेखक शिक्षाविद है और शिक्षा के विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ है।)

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